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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 788 में से

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पृष्ठ 275

उन्होंने बड़ा पाप किया। मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया।
आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया। बहुत दमन और
अन्याय किया गया। आज उस सबके प्रायश्चित का वक़्त है।
इसके साथ एक दूसरी गड़बड़ी हो गयी। लोगों के मनों में आवश्यक कार्यों
के प्रति घृणा पैदा हो गयी। हमने जुलाहे को भी दुत्कारा। आज कपड़ा बुनने वाले
भी अछूत समझे जाते हैं। यू.पी. की तरफ़ कहार को भी अछूत समझा जाता है।
इससे बड़ी गड़बड़ी पैदा हुई। ऐसे में विकास की प्रक्रिया में रुकावटें पैदा हो
रही हैं।
इन तबकों को अपने समक्ष रखते हुए हमें चाहिए कि हम न इन्हें अछूत कहें
और न समझें। बस, समस्या हल हो जाती है। नौजवान भारत सभा तथा कांग्रेस ने
जो ढंग अपनाया है, वह काफ़ी अच्छा है। जिन्हें आज तक अछूत कहा जाता रहा,
उनसे अपने इन पापों के लिए क्षमा-याचना करनी चाहिए तथा उन्हें अपने जैसा
इन्सान समझना, बिना अमृत छकाये, बिना कलमा पढ़ाये या शुद्धि किये उन्हें अपने
में शामिल करके उनके हाथ से पानी पीना, यही उचित ढंग है। और आपस में
खिंचतान करना और व्यवहार में कोई भी हक़ न देना, कोई ठीक बात नहीं है।
जब गाँवों में मज़दूर-प्रचार शुरू हुआ, उस समय किसानों को सरकारी आदमी
यह बात समझाकर भड़काते थे कि देखो, ये भंगी-चमारों को सिर पर चढ़ा रहे
हैं और तुम्हारा काम बन्द करवायेंगे। बस किसान इतने में ही भड़क गये। उन्हें याद
रहना चाहिए कि उनकी हालत तब तक नहीं सुधर सकती जब तक कि वे इन
ग़रीबों को नीच और कमीना कहकर अपनी जूती के नीचे दबाये रखना चाहते हैं।
अक्सर कहा जाता है कि वे साफ़ नहीं रहते। इसका उत्तर साफ़ है – वे ग़रीब हैं।
ग़रीबी का इलाज करो। ऊँचे-ऊँचे कुलों के ग़रीब लोग भी कोई कम गन्दे नहीं
रहते। गन्दे काम करने का बहाना भी नहीं चल सकता, क्योंकि माताएँ बच्चों का
मैला साफ़ करने से मेहतर तथा अछूत तो नहीं हो जातीं।
लेकिन यह काम उतने समय तक नहीं हो सकता जितने समय तक कि
अछूत क़ौमें अपनेआप को संगठित न कर लें। हम तो समझते है कि उनका स्वयं
को अलग संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमों के बराबर गिनती में होने के कारण
उनके बराबर अधिकारों की माँग करना बहुत आशाजनक संकेत है। या तो
साम्प्रदायिक भेद का झंझट ही ख़त्म करो, नहीं तो उनके अलग अधिकार उन्हें दे
दो। कौंसिलों और असेम्बिलयों का कर्त्तव्य है कि वे स्कूल-कॉलेज, कुएँ तथा
सड़क के उपयोग की पूरी स्वतन्त्रता उन्हें दिलायें। ज़बानी तौर पर ही नहीं, वरन
साथ ले जाकर उन्हें कुओं पर चढ़ायें। उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलायें।
लेकिन जिस लेजिस्लेटिव असेम्बली में बाल-विवाह के विरुद्ध पेश किये बिल
तथा मज़हब के बहाने हाय-तौबा मचायी जाती है, वहाँ वे अछूतों को अपने साथ
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 269