भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
हाय, हम जिस पर भी तैयार थे मर जाने को।
जीते जी हमसे छुड़ाया उसी काशाने को।
हम लोग एक आह भरकर समझ लेते हैं कि हमारा फ़र्ज़ पूरा हो गया। हमें
आग नहीं लग उठती, हम तड़प नहीं उठते, हम इतना मुर्दे हो गये हैं। आज वे
भूख-हड़ताल कर बैठे हैं और तड़प रहे हैं और हम चुपचाप सब तमाशा देख रहे
हैं। ईश्वर उन्हें बल व शक्ति दे कि वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों
के बलिदान रंग लायें।
लेखक
'विद्रोही'
112 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
काकोरी के शहीदों की
फाँसी के हालात
जनवरी, 1928 के ‘किरती’ में भगतसिंह ने एक और लेख काकोरी के शहीदों
के बारे में ‘विद्रोही’ के नाम से लिखा। – स.
‘किरती’ के पाठकों को पहले किसी अंक में हम काकोरी के मुक़दमे के हालात
बता चुके हैं। अब इन चार वीरों को फाँसी दिये जाने का हाल बताते हैं।
17 दिसम्बर, 1927 को श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी को गोण्डा जेल में फाँसी दी
गयी और 19 दिसम्बर, 1927 को श्री रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ को गोरखपुर जेल में,
श्री अशफ़ाक़उल्ला को फ़ैज़ाबाद जेल में और श्री रोशन सिंह जी को इलाहाबाद
जेल में फाँसी चढ़ा दिया गया।
इस मुक़दमे के सेशन जज मि. हेमिल्टन ने फैसला देते हुए कहा था कि
ये नौजवान देशभक्त हैं और इन्होंने अपने किसी लाभ के लिए कुछ भी नहीं
किया और यदि ये नौजवान अपने किये पर पश्चाताप करें तो उनकी सज़ाओं में
रियायत की जा सकती है। उन चारों वीरों द्वारा इस आशय की घोषणा भी हुई,
लेकिन उन्हें फाँसी दिये बग़ैर डायन नौकरशाही को चैन कैसे पड़ता। अपील में
बहुत-से लोगों की सज़ाएँ बढ़ा दी गयीं। फिर न तो गवर्नर और न ही वायसराय
ने उनकी जवानी की ओर ध्यान दिया और प्रिवी कौंसिल ने उनकी अपील सुनने
से पहले ही ख़ारिज कर दी। यू.पी. कौंसिल के बहुत-से सदस्यों, असेम्बली और
कौंसिल और स्टेट के बहुत-से सदस्यों ने वायसराय को उनकी जवानी पर दया
करने की दरख़्वास्त दी, लेकिन होना क्या था? उनके इतने हाथ-पाँव मारने का
कोई परिणाम न निकला। यू.पी. कौंसिल के स्वराज पार्टी के नेता श्री गोविन्द
वल्लभ पन्त उनके मामले पर बहस के लिए अपना मत वायसराय और लाट
साहिब को भेजने के लिए शोर मचा रहे थे। पहले तो प्रेजिडेण्ट साहिब ही
अनुमति नहीं दे रहे थे, लेकिन बहुत-से सदस्यों ने मिलकर कहा तो सोमवार
को बहस के लिए इजाज़त मिली, लेकिन फिर छोटे अंग्रेज़ अध्यक्ष ने, जो उस
समय अध्यक्ष का काम कर रहा था, सोमवार को कौंसिल की छुट्टी ही कर
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 113
दी। होम मेम्बर नवाब छत्तारी के दर पर जा चिल्लाये, लेकिन उनके कानों पर
जूँ तक न सरकी। और कौंसिल में उनके सम्बन्ध में एक शब्द भी न कहा जा
सका और उन्हें फाँसी पर लटका ही दिया गया। इसी क्रोध में नीचता के साथ
रूसी ज़ार और फ़्रांसीसी लुइस बादशाह होनहार युवकों को फाँसी पर
लटका-लटकाकर दिलों की भड़ास निकालते रहे लेकिन उनके राज्यों की नींवें
खोखली हो गयी थीं और उनके तख़्ते पलट गये। इसी ग़लत तरीक़े का आज
फिर इस्तेमाल हो रहा है। देखें यदि इस बार इनकी मुरादें पूरी हों। नीचे हम उन
चारों वीरों के हालात संक्षेप में लिखते हैं, जिससे यह पता चले कि ये अमूल्य
रत्न मौत के सामने खड़े होते हुए भी किस बहादुरी से हँस रहे थे।
श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी
आप हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस के एम.ए. के छात्र थे। 1925 में कलकत्ते के पास
दक्षिणेश्वर बम फैक्टरी पकड़ी गयी थी, उसमें आप भी पकड़े गये थे और आपको
सात बरस की क़ैद हो गयी थी। वहीं से आपको लखनऊ लाया गया और काकोरी
केस में आपको फाँसी की सज़ा दे दी गयी। आपको बाराबंकी और गोण्डा जेलों
में रखा गया। आप मौत को सामने देख घबराते नहीं थे, बल्कि हमेशा हँसते रहते
थे। आपका स्वभाव बड़ा हँसमुख और निर्भय था। आप मौत का मज़ाक़ उड़ाते रहते
थे। आपके दो पत्र हमारे सामने हैं। एक छह अक्टूबर को तब लिखा था जब
वायसराय ने रहम की दरख्वास्त नामंजूर कर दी थी। आप लिखते हैं —
छह महीने बाराबंकी और गोण्डा की काल-कोठरियों में रहने के बाद आज
मुझे बताया गया है कि एक हफ़्ते के भीतर फाँसी दे दी जायेगी, क्योंकि वायसराय
ने दरख्वास्त नामंजूर कर दी है। अब मैं फ़र्ज़ समझता हूँ कि अपने इन मित्रों का
(यहाँ उनके नाम हैं) धन्यवाद कर जाऊँ जिन्होंने मेरे लिए बहुत-सी कोशिशें कीं।
आप मेरा अन्तिम नमस्कार स्वीकार करें। हमारे लिए मरना-जीना पुराने कपड़े
बदलने से अधिक कुछ भी नहीं (यहाँ जेलवालों ने कुछ काट-छाँट की है, जो
बिल्कुल पढ़ा नहीं जाता) मौत आ रही है, हँसते-हँसते बड़े चाव और खुशी से उसे
ज़ोर से गले लगा लूँगा। जेल के क़ानून अनुसार और कुछ नहीं लिख सकता।
आपको नमस्कार, देश के दर्दमन्दों को नमस्कार, वन्देमातरम!
आपका,
राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी
फिर इस पत्र के बाद फाँसी नहीं हो सकी, क्योंकि प्रिवी कौंसिल में अपील
की गयी थी। दूसरा पत्र आपने 14 दिसम्बर को एक मित्र के नाम लिखा था —
कल मुझे पता चला है कि प्रिवी कौंसिल ने मेरी अपील ख़ारिज कर दी है।
आप लोगों ने हमें बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन लगता है कि देश की
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बलि-वेदी पर हमारे प्राणों के बलिदान की ही ज़रूरत है। मौत क्या है? जीवन की
दूसरी दिशा के सिवाय कुछ नहीं। जीवन क्या है? मौत की ही दूसरी दिशा का
नाम है। फिर डरने की क्या ज़रूरत है? यह तो प्राकृतिक बात है, उतनी ही
प्राकृतिक जितना कि प्रातः में सूर्योदय। यदि हमारी यह बात सच है कि इतिहास
पलटा खाता है तो मैं समझता हूँ कि हमारा बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा।
मेरा नमस्कार सबको – अन्तिम नमस्कार!
आपका
राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी
कितना भोला, कितना सुन्दर और निर्भीकतापूर्ण पत्र है। इनका लेखन कितना
भोला है! फिर इन्हें ही अन्यों से दो दिन पहले ही फाँसी दे दी गयी। फाँसी के
समय आपको हथकड़ी पहनाने का इन्तज़ाम किया जाने लगा तो आपने कहा कि
क्या ज़रूरत है। आप मुझे रास्ता बताते जाओ, मैं स्वयं ही उधर चल पड़ता हूँ। अर्थी
का जलूस निकाला गया और बड़े जोश से अन्तिम संस्कार किया गया। वहीं यादगार
बनाने की सलाह की जा रही है।
श्री रोशन सिंह जी
आपको 19 दिसम्बर को इलाहाबाद में फाँसी दी गयी। उनका एक आख़िरी पत्र
13 दिसम्बर का लिखा हुआ है। आप लिखते हैं –
इस हफ़्ते फाँसी हो जायेगी। ईश्वर के आगे विनती है कि आपके प्रेम का
आपको फल दे। आप मेरे लिए कोई ग़म न करना। मेरी मौत तो खुशी वाली है।
चाहिए तो यह कि कोई बदफैली करके बदनाम होकर न मरे और अन्त समय ईश्वर
याद रहे। सो यही दो बातें हैं। इसलिए कोई ग़म नहीं करना चाहिए। दो साल
बाल-बच्चों से अलग रहा हूँ। ईश्वर-भजन का ख़ूब अवसर मिला। इसलिए
मोह-माया सब टूट गयी। अब कोई चाह बाक़ी न रही। मुझे विश्वास है कि जीवन
की दुख भरी यात्रा ख़त्म करके सुख के स्थान पर जा रहा हूँ। शास्त्रों में लिखा है,
युद्ध में मरने वालों की ऋषियों जैसी रहत (श्रेणी) होती है। (आगे अस्पष्ट है)
'ज़िन्दगी ज़िन्दादिली को जानिये रोशन!' वरना कितने मरे और पैदा होते जाते
हैं। आख़िरी नमस्कार!
श्री रोशन सिंह रायबरेली के काम करने वालों में थे। किसान आन्दोलन में जेल
जा चुके थे। सबको विश्वास था कि हाईकोर्ट से आपकी मौत की सज़ा टूट जायेगी
क्योंकि आपके ख़िलाफ़ कुछ भी नहीं था। लेकिन फिर भी वे अंग्रेज़शाही का
शिकार हो ही गये और फाँसी पर लटका दिये गये। तख़्ते पर खड़े होने के बाद
आपके मुँह से जो आवाज़ निकली, वह यह थी –
'वन्देमातरम्!'
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 115
आपकी अर्थी के जुलूस की इजाज़त नहीं दी गयी। लाश की फ़ोटो लेकर
दोपहर में आपका दाह-संस्कार कर दिया गया।
श्री अशफ़ाक़उल्ला
यह मस्ताना शायर भी हैरान करने वाली खुशी से फाँसी चढ़ा। बड़ा सुन्दर और
लम्बा-चौड़ा जवान था, तगड़ा बहुत था। जेल में कुछ कमज़ोर हो गया था। आपने
मुलाक़ात के समय बताया कि कमज़ोर होने का कारण ग़म नहीं, बल्कि खुदा की
याद में मस्त रहने की ख़ातिर रोटी बहुत कम खाना है। फाँसी से एक दिन पहले
आपकी मुलाक़ात हुई। आप खूब सजे-सँवरे थे। बड़े-बड़े कढ़े हुए केश खूब सजते
थे। बड़ा हँस-हँसकर बातें करते रहे। आपने कहा, कल मेरी शादी होने वाली है।
दूसरे दिन सुबह छह बजे आपको फाँसी दी गयी। कुरान शरीफ़ का बस्ता
लटकाकर हाजियों की तरह वज़ीफ़ा पढ़ते हुए बड़े हौसले से चल पड़े। आगे जाकर
तख्ते पर रस्सी को चूम लिया। वहीं आपने कहा –
“मैंने कभी किसी आदमी के खून से अपने हाथ नहीं रँगे और मेरा इन्साफ़
खुदा के सामने होगा। मेरे ऊपर लगाये सभी इल्ज़ाम ग़लत हैं।” खुदा का नाम लेते
ही रस्सी खींची गयी और वे कूच कर गये। उनके रिश्तेदारों ने बड़ी मिन्नतों-
खुशामदों से उनकी लाश ली और उन्हें शाहजहाँपुर ले आये। लखनऊ स्टेशन पर
मालगाड़ी के एक डिब्बे में उनकी लाश देखने का अवसर कुछ लोगों को मिला।
फाँसी के दस घण्टे बाद भी चेहरे पर वैसी ही रौनक थी। ऐसा लगता था कि अभी
ही सोये हों। लेकिन अशफ़ाक़ तो ऐसी नींद सो गये थे कि जहाँ से वे कभी नहीं
जागेंगे। अशफ़ाक़ शायर थे और उनका शायर उपनाम हसरत था। मरने से पहले
आपने ये दो शेर कहे थे –
‘फ़नाह हैं हम सबके लिए, हम पै कुछ नहीं मौक़ूफ़!
बक़ा है एक फ़कत जाने की ब्रिया के लिए।’
(नाश तो सभी होंगे, कोई हम अकेले थोड़े होंगे। न मरने वाला तो सिर्फ़ एक
परमात्मा है।)
और –
‘तंग आकर हम उनके जुल्म से बेदाद से,
चल दिये सूए अदम ज़िन्दाने फ़ैज़ाबाद से।’
श्री अशफ़ाक़ की ओर से एक माफ़ीनामा छपा था, उसके सम्बन्ध में
श्री रामप्रसाद जी ने अपने आख़िरी एलान में पोज़ीशन साफ़ कर दी है। आपने कहा
है कि अशफ़ाक़ माफ़ीनामा तो क्या, अपील के लिए भी राजी नहीं थे। आपने कहा
था, मैं खुदा के सिवाय किसी के आगे झुकना नहीं चाहता। परन्तु रामप्रसाद के
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एक मिट जाने की हसरत,
अब दिले-बिस्मिल में है!
फिर ईश्वर के आगे प्रार्थना की और फिर एक मन्त्र पढ़ना शुरू किया। रस्सी
खींची गयी। रामप्रसाद जी फाँसी पर लटक गये। आज वह वीर इस संसार में नहीं
है। उसे अंग्रेज़ी सरकार ने अपना ख़ौफ़नाक दुश्मन समझा। आम ख़याल यह है कि
उसका क़सूर यही था कि वह इस गुलाम देश में जन्म लेकर भी एक बड़ा भारी
बोझ बन गया था और लड़ाई की विद्या से खूब परिचित था। आपको मैनपुरी
षड्यन्त्र के नेता श्री गेंदालाल दीक्षित जैसे शूरवीर ने विशेष तौर पर शिक्षा देकर
तैयार किया था। मैनपुरी के मुक़दमे के समय आप भागकर नेपाल चले गये थे।
अब वही शिक्षा आपकी मृत्यु का एक बड़ा कारण हो गया। 7 बजे आपकी लाश
मिली और बड़ा भारी जुलूस निकला। स्वदेशप्रेम में आपकी माता ने कहा –
“मैं अपने पुत्र की इस मृत्यु पर प्रसन्न हूँ, दुखी नहीं। मैं श्री रामचन्द्र जैसा
ही पुत्र चाहती थी। बोलो श्री रामचन्द्र की जय!”
इत्र-फुलेल और फूलों की वर्षा के बीच उनकी लाश का जुलूस जा रहा था।
दुकानदारों ने उनके ऊपर से पैसे फेंके। 11 बजे आपकी लाश श्मशान भूमि में
पहुँची और अन्तिम-क्रिया समाप्त हुई।
आपके पत्र का आख़िरी हिस्सा आपकी सेवा में प्रस्तुत है –
“मैं खूब सुखी हूँ। 19 तारीख़ को प्रातः जो होना है उसके लिए तैयार हूँ।
परमात्मा काफ़ी शक्ति देंगे। मेरा विश्वास है कि मैं लोगों की सेवा के लिए फिर
जल्द ही जन्म लूँगा। सभी से मेरा नमस्कार कहें। दया कर इतना काम और भी
करना कि मेरी ओर से पण्डित जगतनारायण (सरकारी वकील जिसने इन्हें फाँसी
लगवाने के लिए बहुत ज़ोर लगाया था) को अन्तिम नमस्कार कह देना। उन्हें हमारे
ख़ून से लथपथ रुपयों से चैन की नींद आये। बुढ़ापे में ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे।”
रामप्रसाद जी की सारी हसरतें दिल ही दिल में रह गयीं। आपने एक
लम्बा-चौड़ा एलान किया है, जिसे संक्षेप में हम दूसरी जगह दे रहे हैं। फाँसी से
दो दिन पहले सी.आई.डी. के मि. हैमिल्टन आप लोगों की मिन्नतें करते रहे कि
आप मौखिक रूप से सब बातें बता दो, आपको पाँच हज़ार रुपया नक़द दे दिया
जायेगा और सरकारी ख़र्चे पर विलायत भेजकर बैरिस्टर की पढ़ाई करवायी जायेगी।
लेकिन आप कब इन बातों की परवाह करते थे। आप हुकूमतों को ठुकराने वाले
व कभी-कभार जन्म लेने वाले वीरों में से थे। मुक़दमे के दिनों आपसे जज ने पूछा
था, “आपके पास क्या डिग्री है?” तो आपने हँसकर जवाब दिया था, “सम्राट
बनाने वालों को डिग्री की कोई ज़रूरत नहीं होती, क्लाइव के पास भी कोई डिग्री
नहीं थी।” आज वह वीर हमारे बीच नहीं है। आह!!
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काकोरी के शहीदों के लिए
प्रेम के आँसू
जनवरी, 1928 के 'किरती' ने काकोरी के शहीदों सम्बन्धी एक सम्पादकीय
नोट भी प्रकाशित किया। यह भगतसिंह का लिखा हुआ तो नहीं है, लेकिन उनके
साथी भगवतीचरण वोहरा का हो सकता है। निश्चय ही, यह भी ऐतिहासिक दस्तावेज़
है, जिसे नीचे दिया जा रहा है। – स.
काकोरी केस के चार वीरों को फाँसी पर लटका दिया गया। वे लाड़-प्यार से पले
शूरवीर हँसते-हँसते शहादत प्राप्त कर गये। भारतमाता के चार सुपुत्र अपने शीश देश
और राष्ट्र के नाम अर्पण कर गये। उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा, अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया।
वे इस पंच भौतिक शरीर की क़ैद से आज़ाद हो गये और हम गुलामों को अपनी
गुलामी के दुखड़े रोने के लिए पीछे छोड़ गये!!!
जिस देश में देशभक्ति गुनाह समझा जाता हो, जिस देश में आज़ादी की
ख़्वाहिश रखना बग़ावत समझा जाता हो, जहाँ लोककल्याण की सज़ा मौत हो, जहाँ
देशभक्तों की गर्दन में फाँसी का रस्सा डाला जाता हो, उस देश की हालत ख़्याल
में तो भले ही आ जाये, लेकिन बयान नहीं की जा सकती। किसी देश की
अधोगति इससे ज़्यादा क्या हो सकती है। लेकिन जिस देश में यह अन्याय नित्य
प्रति होते हों, जहाँ ऐसे अत्याचार दिन-प्रतिदिन ही होते रहें यदि वहाँ के निवासी
ऐसे-ऐसे अन्यायों, ऐसे अत्याचारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी तो दूर, आह तक न
भर सकते हों तो उस देश के निवासियों की हालत कैसी होगी?
हिन्दुस्तान गुलाम है। इसकी बागडोर विदेशियों के हाथ है। इससे प्रेम करना
मौत को पुकारना है। इसकी आज़ादी के सपने देखना घर-बार, बाल-बच्चे छोड़कर
जलावतनी की ज़िन्दगी गुज़ारना है। इस महीवाल के प्रेम ने कई सोहनियों को गहरे
समुद्रों में डुबोया। इसके प्रेम ने कई प्रेमियों के दल के दल ख़त्म किये। इसका
प्रेम अगाध है, अथाह है। इसके प्रेमी बेअन्त हैं, असंख्य हैं। न इस प्रेम का स्वर
पता चलता है, न इसके प्रेमियों को ताव आती है। यहाँ तो 'चुप भाई चुप' वाली
बात है।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 119
यह ज़ुल्म कब तक रहेगा? इस अन्याय का भाण्डा कब फूटेगा? बेगुनाहों को
कब तक शहीद किया जायेगा? देश-प्रेमियों को कब तक गोली का निशाना बनाया
जायेगा? कब तक इस गुलामी डायन का और मुँह देखना पड़ेगा? आज़ादी देवी के
दर्शन कब तक होंगे? अभी कितनी शहीदियाँ प्राप्त करनी होंगी। अभी और कितनों
को फाँसी पर चढ़ाया जायेगा?
रब्बा! वह दिन कब आयेगा, जब ये शहीदियाँ रंग लायेंगी। ईश्वर, वह दिन कब
देखेंगे जब हमारा बग़ीचा हरा-भरा होगा? यहाँ से पतझड़ का कूच कब होगा? उल्लू
कब तक इस बाग़ में डेरा जमाये बैठे रहेंगे? बुलबुलें किस दिन फिर यहाँ
चहचहायेंगी? ये पिंजरे कब टूटेंगे? आज़ादी कब लौटेगी, उजड़े कब फिर बसेंगे?
लोगो! भारतमाता के चार सुन्दर जवान फाँसी चढ़ा दिये गये। वे नौकरशाही के
डसे, दुश्मनी का शिकार हो गये। कौन बता सकता है कि यदि वे जीवित रहते तो
क्या-क्या नेकी के काम करते, कौन-कौन से परोपकार करते? कौन कह सकता
है कि उनके रहने से संसार पहले से सुन्दर और रहने योग्य न दिखायी देता? वे
वीर थे, आज़ादी के आशिक़ थे। उन्होंने देश और क़ौम की ख़ातिर अपनी जान लुटा
दी। वे अपनी माँओं की कोख को सफल बना गये।
यदि भारतमाता आज़ाद होती तो इनके बलिदानों का मोल पड़ता। यदि आज
हिन्दुस्तान में कुछ जान होती तो ये बलिदान बेकार न होते। हाय! आज़ादी के वीर
चले गये। उन्हें किसी ने न पहचाना, उन्हें किसी ने न कहा, आप शूरवीर हो, आप
बहादुर हो। वह जगह धन्य है, जहाँ आप जन्मे-पले! जहाँ आप खेले। वे राहें धन्य
हैं, जहाँ आप चले, जहाँ आप कूदे-भागे। वीर, मातृभूमि के लाड़ले वीर चले गये!
वे अपना जन्म सफल कर गये!
बातें करनी आसान हैं, बड़कें मारनी आसान हैं। चगल-चगल करना और बात
है, कुर्बानी देना और बात है। परीक्षा अलूणी चट्टान है, इसे चाटना आसान नहीं
है। परीक्षा से बड़े-बड़े तौबा कर उठे थे। परीक्षा के आगे कोई ज़िगर वाला ही टिक
सकता है। इन वीरों ने किस हिम्मत, किस बहादुरी से परीक्षा दी है। इनकी बहादुरी
कभी भूल सकती है? धन्य हैं इनके माँ-बाप, जिन्होंने उन्हें जन्म दिया। धन्य हैं
ये स्वयं, जो बलिदान के पुंज, आत्मत्याग की मिसाल हैं।
जब कभी आज़ादी का इतिहास लिखा जायेगा, जब कभी शहीदों का ज़िक्र
होगा, जब कभी भारतमाता के लिए बलिदान करने वालों की चर्चा होगी तो वही
- राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी 2. रामप्रसाद बिस्मिल, 3. रोशन सिंह और 4. अशफ़ाक़उल्ला
का नाम ज़रूर लिया जायेगा। उस समय आने वाली पीढ़ियाँ इन शहीदों के आगे
शीश झुकायेंगी और इन वीरों के बहादुरी भरे क़िस्से सुन-सुन सिर हिलायेंगी। उस
समय ये क़ौम का आदर्श माने जायेंगे, इन बुजुर्गों की पूजा होगी।
आज हम कमज़ोर हैं, निःशक्त हैं। आज हम गिरे हुए हैं, झूठे हैं। आज हम
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अपनी दिली भावनाएँ नहीं बता सकते – क्योंकि हम कायर हैं, डरपोक हैं, आज
हमें सच कहने से डर लगता है, क्योंकि क़ानून की तलवार हमारे सिरों पर लटकती
दिखायी देती है। इससे यह नहीं कह सकते, ‘काकोरी के शहीदो! आपने जो किया,
भारतमाता के बन्धन तोड़ने के लिए किया। आपने जो कष्ट उठाये, वह हिन्दुस्तान
को आज़ाद करवाने के लिए उठाये।’ आज हम यह नहीं कह सकते कि ‘आपने
अपने मतानुसार अच्छा किया।’
गुलामों की अवस्था कितनी गिर जाती है। गुलामों में कितनी गिरावट आ जाती
है। दैवी गुण उनमें से किस तरह भाग जाते हैं। वे कितने ढोंगी और पाखण्डी बन
जाते हैं। वे कितने बुज़दिल व कायर बन जाते हैं। वे सच्ची-खरी बातें मुँह पर नहीं
कह सकते। वे दिल में कुछ और रखते हैं और बाहर कुछ और। उनकी हालत
कितनी दयनीय हो जाती है!
इस हालत को सुधारने का एक ही साधन है, इस दुर्दशा को बदलने का
एकमात्र इलाज है, इस दुर्दशा की एक ही दवा है, और वह है आज़ादी। आज़ादी
कुर्बानियों के बग़ैर नहीं मिल सकती। शहीदों की इज़्ज़त करने से, शहीदों के
कारनामे याद करने से कुर्बानी का चाव उमड़ता है। जो क़ौम शहीदों को शहीद
नहीं कह सकती, उसे क्या खाक आज़ाद होना है?
लोगो! देखे हैं आशिक़ सूली पर चढ़ते? वे मौत से मज़ाक़ करते थे। वे मौत
पर हँसते थे, उन्हें मृत्यु का भय नहीं था। वे यार की गली में शीश तली पर रखकर
आये थे। उन्हें डर क्या था, वे तो आये ही मरने थे। मृत्यु का तो वे पहले ही वरण
कर चुके थे, जीवन की आशा तो वे पहले ही छोड़ चुके थे। वे तो गाते थे –
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है।
कहाँ वे और कहाँ हम? वे तो किसी और ही देश के निवासी थे। वे तो ग़रीबों
की आह सुनकर मैदान में उतरे थे। वे तो हिन्दुस्तान से भूख-नंग को दूर करने आये
थे। वे तो मज़दूरों और किसानों का हाल पूछने आये थे। वे तो किसी ऊँचे आदर्श
के पुजारी थे। वे तो किसी ऊँचे स्वप्न की उड़ान में मस्त थे। वे तो वे नज़ारे देखते
थे, जहाँ न भूख है, न नग्नता। जहाँ न ग़रीबी है, न अमीरी। जहाँ न जुल्म है, न
अन्याय। बस जहाँ प्रेम है, एकता है, जहाँ इन्साफ़ है, आज़ादी है, जहाँ सुन्दरता है।
पर हम? हम?...हाय रे!
किसी का आदर्श कमाना, आप खाना और बच्चों को पालना होता है। किसी
का आदर्श स्वयं को ऊँचा उठाने का होता है। किसी का आदर्श ग़रीबों, दुखियों
को लूटकर धन-दौलत इकट्ठा करना होता है, किसी का आदर्श अपने सुन्दर शरीर
को तकलीफ़ से दूर करने का होता है।
किसी का आदर्श कुछ होता है, किसी का कुछ। लेकिन उनका आदर्श देश
था। उनका आदर्श हिन्दुस्तान की आज़ादी था। उनका कोई स्वार्थ नहीं था। उनके
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 121
खाने के लिए, उन्हें ओढ़ने के लिए किसी बात की कमी न थी। वे तो जो कुछ
करते थे, लोक-कल्याण की ख़ातिर, लोक-सेवा के लिए करते थे। वे इतने
बलिदान के पुंज निकले, कि स्वयं को हमारे ऊपर वार दिया। आइये, इन वीरों को
प्रणाम करें।
मातृभूमि के लाड़लो! क्या हुआ यदि डर के मारे आज हम आपका नाम भी
लिखने से घबराते हैं? क्या हुआ जो आज हम दिल की बातें कहने में झिझकते
हैं? क्या हुआ यदि आज हिन्दुस्तान में मुर्दानोशी छायी है और आपका नाम लेने से
ही षड्यन्त्रकारी बन जाते हैं? क्या हुआ यदि कोई हिन्दुस्तानी आपको भला-बुरा
भी कहे, लेकिन समय आयेगा जब आपकी क़द्र होगी, जब आपको शहीद कहा
जायेगा, जिस तरह 1857 के ग़दर को अब 'आज़ादी की जंग' कहा जाता है। समय
सिद्ध कर देता है, समय सच्ची-सच्ची कहलवा देता है, समय किसी का लिहाज़
नहीं करता। उस समय आप अपनी असली शान से चमकेंगे और उस समय
हिन्दुस्तान आप पर बलिहारी जायेगा।
शहीद वीरो! हम कृतघ्न हैं, हम तुम्हारे किये को नहीं जानते। हम कायर हैं,
हम सच-सच नहीं कह सकते। हमें आप माफ़ करो, हमें आप क्षमादान दो। हमें
मौत से भय लगता है, हमारा दिमाग़ सूली का नाम सुनते ही चक्कर खा जाता है।
आप धन्य थे। आपके बड़े जिगर थे कि आपने फाँसी को टिच्च समझा। आपने मौत
के समय मज़ाक़ किये! पर हम? हमें चमड़ी प्यारी है, हमें तो ज़रा-सी तकलीफ़
ही मौत बनकर दिखने लगती है। आज़ादी! आज़ादी का तो नाम सुनते ही हमें
कँपकँपी छिड़ जाती है। हाँ! गुलामी के साथ हमें प्यार है, गुलामी की ठोकरों से
हमें मज़ा आता है! आपकी नस-नस से, रग-रग से आज़ादी की पुकार गूँजती थी
लेकिन हमारी रग-रग से, हमारी नस-नस से, गुलामी की आवाज़ निकलती है।
आपका और हमारा क्या मेल? हमें आप क्षमा करो, आप हमारे केवल यह प्रेम के
अश्रु ही स्वीकार करो।
कहो, धन्य हैं, काकोरी के शहीद...!
122 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
शहीदों के जीवन-चरित्र
काकोरी के शहीदों को दिसम्बर, 1927 में फाँसी होने के बाद भगतसिंह ने
अपने साथियों - भगवतीचरण वोहरा, शिव वर्मा, जयदेव कपूर आदि - से
विचार-विमर्श करते हुए अपने देश के शहीदों व क्रान्तिकारी आन्दोलन सम्बन्धी
जानकारी देने के निरन्तर यत्न शुरू किये। वे स्वयं भी इन आन्दोलनों का गहराई से
अध्ययन कर रहे थे और देशवासियों को जागृत भी कर रहे थे।
फ़रवरी, 1928 में 'चाँद' का 'फाँसी अंक' प्रकाशित हुआ। भारतीय क्रान्तिकारी
आन्दोलन और शहीदों के जीवन-चरित्र सम्बन्धी इस अंक में 'विद्रोही' छद्म नाम
से भगतसिंह ने कई देशभक्तों के जीवन-चरित्र लिखे। यहाँ प्रस्तुत तीन जीवन-चरित्र
वहीं से लिये गये हैं। - स.
सूफ़ी अम्बा प्रसाद
आज भारतवर्ष में कितने लोग उनका नाम जानते हैं? कितने उनकी स्मृति में
शोकातुर होकर आँसू बहाते हैं? कृतघ्न भारत ने कितने ही ऐसे रत्न खो दिये और
क्षणभर के लिए भी दुख अनुभव नहीं किया।
वे सच्चे देशभक्त थे। उनके हृदय में देश के लिए दर्द था। वे भारत की
प्रतिष्ठा देखना चाहते थे, भारत को उन्नति के शिखर पर पहुँचाना चाहते थे, तो भी
आज भारत के बहुत कम लोग उनका नाम जानते हैं। उनकी क़दर भी की तो ईरान
ने, आज यहाँ आका सूफ़ी का नाम सर्वप्रिय हो रहा है।
सूफ़ी जी का जन्म 1858 में मुरादाबाद में हुआ था। आपका दाहिना हाथ जन्म
से ही कटा था। आप हँसी में कहा करते थे - अरे भाई! हमने सत्तावन में अंग्रेज़ों
के विरुद्ध युद्ध किया। हाथ कट गया। मृत्यु हो गयी। पुनर्जन्म हुआ, हाथ कटे का
कटा आ गया!
आपने मुरादाबाद, बरेली और जालन्धर आदि कई शहरों में शिक्षा पायी।
एफ़.ए. पास करने के पश्चात आपने वकालत पढ़ी, परन्तु की नहीं। आप उर्दू के
प्रभावशाली लेखक थे। आपने यही काम सँभाला।
सन् 1890 में आपने मुरादाबाद से जाम्युल इलूक नामक उर्दू साप्ताहिक पत्र
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 123
निकाला। इसका प्रत्येक शब्द उनकी आन्तरिक अवस्था का परिचय देता था। वे
हास्यरस के प्रसिद्ध लेखक थे, परन्तु इनमें गम्भीरता भी कम न थी। वे
हिन्दू-मुस्लिम-एकता के कट्टर पक्षपाती थे और शासकों की कड़ी आलोचना
किया करते थे।
सन् 1897 में आपको राजद्रोह के अपराध में डेढ़ वर्ष का कारागार मिला। जब
1899 में छूटकर आये तो यू.पी. के कुछ छोटे राज्यों पर अंग्रेज़ लोग हस्तक्षेप कर
रहे थे। सूफ़ी जी ने वहाँ के अंग्रेज़ों तथा रेज़िडेण्टों का खूब भण्डाफोड़ किया। आप
पर मिथ्या दोषारोपण का अभियोग चलाया गया और सारी जायदाद ज़ब्त कर 6
साल का कारागार दिया गया। जेल में उन्हें अकथनीय कष्ट सहन करने पड़े, परन्तु
वे कभी विचलित नहीं हुए।
सूफ़ी जी जेल में बीमार पड़े। एक गलीज़ कोठरी में बन्द थे। उन्हें औषधि
नहीं दी जाती थी, यहाँ तक कि पानी आदि का भी ठीक प्रबन्ध न था। जेलर आता
और हँसता हुआ प्रश्न करता – सूफ़ी, अभी तक तुम ज़िन्दा हो? खैर! ज्यों-त्यों
कर जेल कटी और 1906 के अन्त में आप बाहर आये।
सूफ़ी जी का निज़ाम हैदराबाद से घनिष्ठ सम्बन्ध था। जेल से छूटते ही वहाँ
गये। निज़ाम ने उनके लिए एक अच्छा-सा मकान बनवाया। मकान बन जाने पर
उन्होंने सूफ़ी जी से कहा – ‘आपके लिए मकान तैयार हो गया।’ आपने उत्तर दिया
– ‘हम भी तैयार हो गये हैं।’ आपने वस्त्रादि उठाये और पंजाब के लिए चल दिये।
वहाँ जाकर आप ‘हिन्दुस्तान’ अख़बार में काम करने लगे। सुनते हैं वहाँ आपकी
चतुरता, वाक्पटुता और समझदारी देखकर सरकार की ओर से 1000 रुपया मासिक
जासूस विभाग से पेश किये गये थे, परन्तु आपने उनकी अपेक्षा जेल और दरिद्रता
को ही श्रेष्ठ समझा। बाद को ‘हिन्दुस्तान’-सम्पादक से भी आपकी न बनी। आपने
वहाँ से भी त्यागपत्र दे दिया।
उन्हीं दिनों सरदार अजीत सिंह ने भारतमाता सोसाइटी की नींव डाली और
पंजाब के न्यू कालोनी बिल के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ कर दिया। सूफ़ी जी का
भी मेल उनसे बनने लगा। उधर वे इनकी ओर आकर्षित होने लगे।
सन् 1906 में पंजाब में फिर धर-पकड़ आरम्भ हुई तो सरदार अजीत सिंह
के भाई सरदार किशन सिंह और भारतमाता सोसाइटी के मन्त्री मेहता आनन्द
किशोर के साथ वे नेपाल चल दिये। वहाँ नेपाल राज्य के गवर्नर श्री जंगबहादुर
जी से आपका परिचय हो गया। वे इनसे बहुत अच्छी तरह पेश आये। बाद
को श्री जंगबहादुर जी सूफ़ी को आश्रय देने के कारण ही पदच्युत कर दिये
गये। उनकी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली गयी। खैर, सूफ़ी जी वहाँ पकड़े गये और
लाहौर लाये गये। लाला पिण्डीदास जी के पत्र ‘इण्डिया’ में प्रकाशित आपके
लेखों के सम्बन्ध में ही आप पर अभियोग चलाया गया, परन्तु निर्दोष सिद्ध
124 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
होने के बाद में आपको छोड़ दिया गया।
तत्पश्चात सरदार अजीत सिंह भी छूटकर आ गये। और सन् 1909 में
भारतमाता बुक सोसाइटी की नींव डाली गयी। इसका अधिकतर कार्य सूफ़ी जी
ही किया करते थे। आपने 'बाग़ी मसीह' या 'विद्रोही मसीह' नामक एक पुस्तक
प्रकाशित करवायी जो बाद को ज़ब्त कर ली गयी।
इसी वर्ष लोकमान्य तिलक पर अभियोग चलाया गया और उन्हें भी 6 वर्ष
का कारावास मिला। तब देशभक्त-मण्डल के सभी सदस्य साधु बनकर पर्वतों की
ओर यात्रा करने निकल पड़े। पर्वतों के ऊपर जा रहे थे। एक भक्त भी साथ आया।
साधु बैठे तो उस भक्त ने सूफ़ी जी के चरणों पर सीस नवाकर नमस्कार किया।
बड़ा जैण्टलमैन था। खूब सूट-बूट पहने था। सूफ़ी जी के चरणों पर शीश रखा और
पूछने लगा – बाबा जी, आप कहाँ रहते हैं?
सूफ़ी जी ने कठोर शब्दों में उत्तर दिया – रहते हैं तुम्हारे सर में!
– साधु जी, आप नाराज़ क्यों हो गये?
– अरे बेवकूफ़! तूने मुझे क्यों नमस्कार किया! इतने और साधु भी थे, इनको
प्रणाम क्यों न किया?
– मैं आपको साधु समझा था।
– अच्छा खैर जाओ, खाने-पीने की वस्तुएँ लाओ।
वह कुछ देर बाद अच्छे-अच्छे पदार्थ लेकर आया। खा-पीकर सूफ़ी जी ने
उसे फिर बुलाया और कहने लगे – क्यों बे, हमारा पीछा छोड़ेगा या नहीं?
– भला मैं आपसे क्या कहता हूँ जी?
– चालाकी को छोड़। आया है जासूसी करने! जा, अपने बाप से कह देना
कि सूफ़ी पहाड़ में ग़दर करने जा रहे हैं।
वह चरणों पर गिर पड़ा – हजूर, पेट की ख़ातिर सबकुछ करना पड़ता है!
आपने सन् 1909 में 'पेशवा' अख़बार निकाला। उन्हीं दिनों बंगाल में
क्रान्तिकारी आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ा। सरकार को चिन्ता हुई कि कहीं यह पंजाब
को भी जला न डाले। अस्तु, दमन-चक्र आरम्भ हुआ। तब सूफ़ी जी, सरदार अजीत
सिंह और ज़िया-उल-हक़ ईरान चले गये। वहाँ पहुँचकर ज़िया-उल-हक़ की
नीयत बदल गयी। उसने चाहा, इन्हें पकड़वा दूँ तो इनाम मिलेगा और सज़ा भी न
होगी। परन्तु सूफ़ी जी ताड़ गये। उन्होंने उसे आगे भेज दिया। फलस्वरूप वह स्वयं
ही पकड़ा गया और ये दोनों बच निकले।
ईरान में वे कैसे रहे, क्या हुआ, ये बातें तो किसी अवसर पर खुलेंगी परन्तु
जो कुछ सुनने में आया, उसी का उल्लेख इस स्थान पर किया जाता है। ईरान में
अंग्रेज़ों ने उनकी बहुत खोज की और उन्हें कई प्रकार के कष्ट सहन करने पड़े।
कहा जाता है कि वे एक स्थान पर घेर लिये गये। वहाँ से निकलना असम्भव-सा
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 125
हो गया। वहाँ व्यापारियों का एक क़ाफ़िला ठहरा हुआ था। ऊँटों पर बहुत-से सन्दूक
लदे थे। आगे वस्त्र आदि भरे थे। एक ऊँट के दोनों सन्दूकों में सूफ़ी जी तथा अजीत
सिंह को बन्द कर दिया गया और वहाँ से बचाकर निकाला गया।
फिर किसी अमीर के घर ठहरे। पता चल गया और वह घेर लिये गये। उसी
समय उन दोनों को बुरका पहना ज़नाने में बिठा दिया गया। सबकी तलाशी ली गयी
और अन्त में स्त्रियों की भी तलाशी ली जाने लगी। एक-दो स्त्रियों के बुरके उठाये
भी गये, परन्तु मुसलमान लोग लड़ने-मरने को तैयार हो गये और फिर अन्य किसी
स्त्री का बुरका नहीं उठाने दिया गया। इस तरह वे दोनों यहाँ से भी बचे।
पीछे उन्होंने वहाँ से 'आबे हयात' नामक पत्र निकाला और राष्ट्रीय आन्दोलन
में भाग लेने लगे। सरदार साहिब के टर्की चले जाने पर वहाँ का सारा कार्य इन्हीं
के सर आ पड़ा और फिर ये वहाँ आकर सूफ़ी के नाम से प्रसिद्ध हुए। सन् 1915
में जिस समय ईरान में अंग्रेज़ों ने पूर्ण प्रभुत्व जमाना चाहा तो फिर कुछ उथल-पुथल
मची थी। शीराज़ पर घेरा डाला गया। उस समय सूफ़ी जी ने बायें हाथ से रिवाल्वर
चलाकर मुक़ाबला किया था, परन्तु अन्त में आप अंग्रेज़ों के हाथ आ गये। उनका
कोर्ट मार्शल किया गया। फ़ैसला हुआ कि कल गोली से उड़ा दिये जायेंगे। सूफ़ी
कोठरी में बन्द थे। प्रातः समय देखा तो वे समाधि की अवस्था में थे। उनके प्राण
पखेरू उड़ चुके थे! उनके जनाज़े के साथ असंख्य ईरानी गये और उन्होंने बहुत
शोक मनाया। कई दिन तक नगर में उदासी छायी रही। सूफ़ी जी की क़ब्र बनायी
गयी। अभी तक हर वर्ष उनकी क़ब्र पर उत्सव मनाया जाता है। लोग उनका नाम
सुनते ही श्रद्धा से सर झुका लेते हैं। वे पैर से भी लेखनी पकड़कर अच्छी तरह
लिख सकते थे। एक दिन एक महाशय कह रहे थे कि मुझे उन्होंने पैर से ही
लिखकर एक नुस्ख़ा दिया था।
एक और कहानी मित्रों ने सुनायी थी। पता नहीं कहाँ तक सच है। परन्तु बहुत
सम्भव है वह सच हो। कहते हैं, जब भोपाल या किसी और स्टेट में रेज़िडेण्ट कुछ
गड़बड़ कर रहे थे और उसको हड़प करने की चिन्ता में थे, तो वहाँ का भेद
प्रकाशित करने के लिए अमृत बाज़ार पत्रिका की ओर से सूफ़ी जी वहाँ भेजे गये।
यह बात 1890 के लगभग की है।
एक पागल-सा मनुष्य रेज़िडेण्ट के बैरे के पास नौकरी की खोज में आया और
अन्त में केवल भोजन पर ही रख लिया गया। वह पागल बरतन साफ़ करता तो
मिट्टी में लथपथ हो जाता। मुँह पर मिट्टी पोत लेता। वह सौदा ख़रीदने में बड़ा
चतुर था, अस्तु चीजें ख़रीदने वही भेजा जाता था।
उधर अमृत बाज़ार पत्रिका में रेज़िडेण्ट के विरुद्ध धड़ाधड़ लेख निकलने लगे।
अन्त में इतना बदनाम हुआ कि पदच्युत कर दिया गया। जिस समय वह स्टेट से
बाहर पहुँच गया तो एक जंक्शन पर एक काला-सा आदमी हैट लगाये, पतलून-बूट
126 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पहने उसकी ओर आया। उसे देखकर रेजिडेण्ट चकित-सा रह गया। ये तो वही है
जो मेरे बरतन साफ़ किया करता था! आज पागल नहीं है। उसने आते ही अंग्रेज़ी
में बातचीत शुरू की। उसे देखकर रेजिडेण्ट काँपने लगा। आख़िर उसने कहा -
तुम्हें इनाम तो दिया जा चुका है, अब तुम मेरे पास क्यों आये हो?
- आपने कहा था - जो आदमी उस गुप्तचर को, जिसने कि आपका भेद
खोला है, पकड़वाये तो आप कुछ इनाम देंगे। - हाँ, कहा तो था। क्या तुमने उसे पकड़ा?
- हाँ, हाँ...इनाम दीजिये। वह मैं स्वयं ही हूँ।
वह थर-थर काँपने लगा। बोला - यदि राज्य के अन्दर ही मुझे तेरा पता चल
जाता तो बोटी-बोटी उड़वा देता। खैर, उसने उन्हें एक सोने की घड़ी दी और कहा - यदि तुम स्वीकार करो तो जासूस विभाग से 1000 रु. मासिक वेतन दिला
सकता हूँ। परन्तु सूफ़ी जी ने कहा - अगर वेतन ही लेना होता तो आपके बरतन
क्यों साफ़ करता?
आज सूफ़ी जी इस देश में नहीं हैं। पर ऐसे देशभक्त का स्मरण ही
स्फूर्तिदायक होता है। भगवान उनकी आत्मा को चिर शान्ति दे।
फ़रवरी, 1928
श्री बलवन्त सिंह
वे बड़े ईश्वर-भक्त थे। धर्मनिष्ठा के कारण उन्हें सिक्खों में पुरोहित बना दिया गया
था। शान्ति के परम उपासक बलवन्त का स्वभाव बड़ा मृदुल था। वे सुमधुर भाषी
थे। पहले-पहल वे ईश्वरोपासना की ओर लगे। फिर लोगों को उस ओर लाने की
चेष्टा प्रारम्भ की। बाद में लोगों के कष्ट दूर करने के प्रयास में धीरे-धीरे गौराँग
महाप्रभुओं से मुठभेड़ होती गयी और अन्त में फाँसी पर मुस्कुराते हुए आपने
प्राण-त्याग किया।
श्री बलवन्त सिंह का जन्म गाँव खुर्दपुर, ज़िला जालन्धर में पहिली आश्विन,
सम्वत 1939 विक्रम शुक्रवार को हुआ था। आपके पिता का नाम सरदार बुद्ध सिंह
था।
परिवार बड़ा धनाढ्य था। पिता को धन के अतिरिक्त स्वभाव तथा अन्य
गुणों के कारण सभी मान तथा आदर की दृष्टि से देखते थे। आपको होश
सँभालते ही आदमपुर के मिडिल स्कूल में शिक्षा के लिए दाख़िल करवा दिया।
विद्यार्थी-जीवन में ही आपका विवाह हो गया। परन्तु विवाह के बाद शीघ्र ही
धर्मपत्नी की मृत्यु हो गयी। मिडिल पास किये बिना ही स्कूल छोड़कर वे फ़ौज
में जा भरती हुए। पल्टन में आपका सन्त कर्म सिंह जी से संसर्ग हुआ। उनकी
संगति से आपका ईश्वर-भजन की ओर झुकाव हो गया। दस साल ज्यों-त्यों
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 127
नौकरी की, फिर एकाएक नौकरी छोड़ अपने गाँव में रहकर ईश्वरोपासना शुरू
कर दी। पलटन की नौकरी में ही आपका दूसरा विवाह भी हुआ था। गाँव के
पास एक गुफा थी। उसी में बन्द रहकर भगवद्भजन में तल्लीन रहने लगे। ग्यारह
महीने वहीं रहने के बाद बाहर आते ही सन् 1905 में कैनेडा जाने का निश्चय
कर, उधर ही प्रस्थान कर दिया।
कैनेडा में जाकर आपने अपने दूसरे साथी श्री भाग सिंह जी से, जिन्हें एक
देशद्रोही ने बाद में गोली मार दी थी, मिलकर गुरुद्वारा बनाने का कार्य आरम्भ
किया। वैंकोवर में ही उनके प्रयत्न से अमेरिका का सबसे पहला गुरुद्वारा स्थापित
हुआ। उस समय वहाँ गये हुए भारतवासियों में कोई संगठन न था। उन्हें गोरे लोग
तंग किया करते थे, परन्तु हमारे नायक वहाँ गये तो उन्होंने इन सब त्रुटियों को दूर
करने का भरसक प्रयत्न किया।
उस समय वहाँ के प्रवासी हिन्दुओं तथा सिक्खों को मृतक-संस्कार करने में
बड़ी विपत्ति होती। मुर्दे जलाने की उन्हें आज्ञा न थी। ऐसी अवस्था में बेचारे उन
लोगों को अनेकानेक कष्ट सहन करने पड़ते। कई बार उन्हें वर्षा में, बर्फ़ में, शव
को जंगल में ले जाकर, कुछ लकड़ियाँ इकट्ठा कर, तेल डाल आग लगाकर
भागना पड़ता। ऐसी अवस्था में भी कैनेडियन लोगों की गोली का निशाना बनने का
डर रहता। श्री बलवन्त सिंह जी ने यह असुविधा दूर करने का प्रबन्ध किया। कुछ
ज़मीन खरीद ली। दाह-संस्कार करने की आज्ञा भी प्राप्त कर ली। गुरुद्वारे में
भारतीय मज़दूरों का संगठन भी करने लगे। उनमें सच्चरित्रता तथा ईश्वरोपासना का
प्रचार किया करते। गुरुद्वारा बड़े प्रयत्न से बन पाया था, उन सबमें आपका परिश्रम
ही सबसे अधिक था, अतः सबने मिलकर आपको ही ग्रन्थी बनाने का निश्चय
किया। पहले तो आपने कुछ इन्कार किया, परन्तु बाद में स्वीकार कर लिया।
सिक्ख लोग बड़े हृष्ट-पुष्ट तथा परिश्रमी होते हैं। उनके कैनेडा में जाने से गोरे
मज़दूरों की क़द्र कम हो गयी। उधर अंग्रेज़ मज़दूरों से उनका वेतन भी कहीं कम
होता। उनके पहले दल के पहुँचते ही गोरे मज़दूरों ने दंगा-फ़साद शुरू कर दिया
था। परन्तु योद्धा-वीर सिक्ख इन बातों से डरने वाले नहीं थे। इससे गोरे और भी
चिढ़ उठे। और उधर गुरुद्वारा बनने से इनका संगठन बढ़ने लगा। नवीन आगन्तुकों
को हर प्रकार की सुविधा होने लगी। यह सब देखकर वहाँ की गोरी सरकार ने
उनको निकालने के लिए यत्किंचित उपाय ढूँढ़ने शुरू किये। इमिग्रेशन विभाग वालों
ने भारतीय मज़दूरों को बहुत-कुछ फुसलाकर हण्डूरॉस नामक द्वीप में चले जाने
पर राजी करने का प्रयत्न किया। उस द्वीप की बहुत तारीफ़ की गयी। परन्तु भाई
बलवन्त सिंह जी खूब समझते थे कि यह सब धोखे की टट्टी है। आपने अपने
किसी विश्वस्त सज्जन को वह स्थान देख आने के लिए भेजा। उस सज्जन का
नाम था श्री नागर सिंह। उन्हें वहाँ इमिग्रेशन विभाग वालों ने भारत में पाँच मुरब्बे
128 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
ज़मीन और पाँच हज़ार डॉलर देने का लोभ देकर इस बात पर राजी करना चाहा
कि वह भारतवासियों को हण्डूराँस में आने पर राजी कर दें। उन्होंने आते ही सब
भेद खोल दिया। इमिग्रेशन विभाग भी खुल खेले। अब खुल्लमखुल्ला युद्ध छिड़
गया। इमिग्रेशन विभाग ने औचित्यानौचित्य का विचार छोड़ दिया। ज्यों-ज्यों मामला
बढ़ा त्यों-त्यों श्री बलवन्त सिंह जी भी आगे बढ़ते गये।
प्रवासी भारतवासियों की इच्छा थी कि वे लोग भारत लौटकर अपने परिवारों
को साथ ले जा सकें। बहुत दिनों तक खींचातानी हुई। आख़िर एक सलाह सोची
गयी। श्री बलवन्त सिंह, श्री भाग सिंह तथा भाई सुन्दर सिंह जी को भारत
लौटकर अपने परिवार लाने के लिए भेजने का प्रस्ताव हुआ। वे तीनों सज्जन
भारत को लौट आये।
1911 में वे फिर सपरिवार रवाना हुए। हाँगकाँग पहुँचकर टिकट न मिलने के
कारण रुक जाना पड़ा। वहीं पड़े रहकर वे वैंकोवर गुरुद्वारा वालों से पत्र-व्यवहार
द्वारा सलाह करते रहे। आख़िर तीनों सज्जन चल दिये। श्री सुन्दर सिंह जी तो गये
वैंकोवर को तथा शेष दोनों सज्जन तीनों परिवार सहित सानफ्रांसिस्को रवाना हुए।
भाई सुन्दर सिंह तो वैंकोवर पहुँच गये, परन्तु संयुक्त राज्य अमेरिका भी तो आख़िर
गोरों का देश था और इधर तो वे ही गुलाम भारतवासी थे, परिवारों सहित उन दोनों
सज्जनों को वहाँ उतरने की आज्ञा न मिली। वे फिर हाँगकाँग लौट आये। फिर बहुत
दिन बाद बड़े यत्न से परिवारों के लिए वैंकोवर के टिकट मिले। वैंकोवर में उन
दोनों सज्जनों को तो उतरने की आज्ञा मिल गयी, परिवारों को उतरने की आज्ञा न
मिली। बड़ा झंझट बढ़ा। आख़िर परिवारों को उतने दिनों तक उतरने की आज्ञा
मिली, जितने दिनों में कि आशा की जा सकती थी कि इमिग्रेशन विभाग के
केन्द्रीय ओटावा (Ottava) से अन्तिम आज्ञा आ जायेगी। परिवार उतरे तो सही, पर
जमानत पर। जमानत की अवधि पूरी हो जाने के दो दिन बाद इमिग्रेशन विभाग वाले
परिवारों को लेने के लिए आये, परन्तु सिक्ख लोग झगड़े के लिए तैयार हो गये।
अफ़सर लोग ज़रा गरम हुए, परन्तु वीर योद्धाओं की लाल आँखें देख, अपना-सा
मुँह लेकर लौट गये। लाल आँखों के पीछे कौन-सा बल था, कौन-सी दृढ़ता थी
और कौन-सा निश्चय था जिससे कैनेडा की राजशक्ति और उनका इमिग्रेशन
विभाग थर-थर काँप उठे, और उन परिवारों को वहीं रहने दिया गया – ये बातें
तब गुलाम भारतवासी नहीं समझ सकते थे। उनकी कूपमण्डूकता, उनका संकीर्ण
दृष्टिकोण नहीं समझ सकता था कि राष्ट्रों को बनाने में कैसे समय, कैसी घड़ियाँ
उपस्थित हुआ करती हैं। स्वतन्त्र भारत अपने स्वातन्त्र्य संग्राम की इन अद्वितीय
घटनाओं को याद किया करेगा। उसके इतिहास-लेखक ही इन सब बातों को खूब
वास्तविक रूप में लिख सकने का सुअवसर पा सकेंगे। दफ़ा 124अ आदि
विकराल दानव गला दबाये, आँखें निकाले उनकी साँस बन्द नहीं किये रहा करेंगे।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 129
वे परिवार तो वहीं रह गये, परन्तु शेष भारतीयों के परिवार लाने की समस्या
वैसे-की-वैसी खड़ी रही। दो साल तक निरन्तर झगड़ा किया, परन्तु परिणाम कुछ
न निकला। आख़िर तय पाया कि इंग्लैण्ड की सरकार तथा जनता और भारत
सरकार तथा जनता के सामने अपनी माँगें रखी जावें और उनकी सहायता से इस
उलझन को सुलझाया जाये।
एक डेपूटेशन बनाया गया जो इंग्लैण्ड भी गया और भारतवर्ष भी। उसके तीन
सदस्यों में एक हमारे नायक श्री बलवन्त सिंह भी थे। इंग्लैण्ड गये। सभी उच्च
अधिकारियों से मिले। कहा गया — "मामला भारत सरकार द्वारा यहाँ पहुँचना
चाहिए।" निराश हो भारत में आये। आन्दोलन शुरू किया। उस समय प्रमुख नेता
लाला लाजपत राय जी ने भी सड़ा-सा उत्तर देकर उनसे पीछा छुड़ा लिया था। फिर
क्या था? कुछेक सज्जनों की सहायता मिली। सार्वजनिक सभाएँ की गयीं। क्रोध
था, घायल राष्ट्रीय भाव था, विवशता थी और थी घोर निराशा। जले दिलों से जो
कुछ निकला, कहा और फिर? सर माईकेल ओडायर अपने, 'India: As I Knew
it' नामक ग्रन्थ में लिखते हैं – "At this Stage I sent a warning to the
delegates that if this continued, I would be compelled to take serious
action... The delegates on this asked for an interview with me. I had a long
talk with them and repeated my warning. Two of them were... and spacious;
the manner of third seemed to be that of a dangerous revolutionary. They
wished to see The Viceroy, and in sending them on to him, I particularly
warned him about this man."
यह तीसरे सज्जन, जिन पर हमारे लाट ने इतना कुछ कह डाला है, यह वही
नायक बलवन्त थे। उस भावुक हृदय ने तो गहरे घाव खाये थे। आत्मसम्मान का
भाव बार-बार ठुकराया जा चुका था। उन्होंने धीरे-धीरे निश्चय कर लिया था कि
भारत को हरसम्भव उपाय से स्वतन्त्र करवाना ही प्रत्येक भारतवासी का सर्वप्रथम
कर्तव्य है। ख़ैर!
डेपूटेशन हताश-निराश हो 1914 के आरम्भ में वापस लौट गया। इन्हीं दिनों
भारतीय विद्रोही श्री भगवान सिंह तथा श्री बरकतुल्ला भी अमेरिका पहुँच गये।
संयुक्त राज्य अमेरिका में इन दिनों हिन्दुस्थान-एसोसिएशन (Hindusthan
Association) का कार्य ज़ोरों पर होने लगा। ग़दर दल, ग़दर प्रेस, ग़दर अख़बार
जारी हो गये। परन्तु उपरोक्त डेपूटेशन वाले सज्जनों का उस समय तक उनसे कोई
सम्बन्ध न था। किन्तु उनको सर माईकेल ओडायर ने ग़दर दल के ही प्रतिनिधि
लिखा है। अस्तु।
उस समय तक भारतवर्ष के अभियोग अन्य जातियों के सामने नहीं रखे गये
थे। परन्तु यह डेपूटेशन जापान और चीन के राजनीतिज्ञों से मिलता हुआ ही गया
130 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
था और इन्होंने भारत की ओर उन लोगों की सहानुभूति आकृष्ट करने का भरसक
प्रयत्न किया था। वैंकोवर लौटकर अपने निष्फल प्रयत्न का इतिहास सुनाते हुए श्री
बलवन्त सिंह जी ने एक बड़ी प्रभावशाली वक्तृता दी थी। ऐसी वक्तृताएँ राष्ट्रों के
इतिहास में विशेष मान पाती हैं। गहरे मनन के बाद आपको चारों ओर से यही
सुनायी देने लगा था, उनके अन्तस्तल से यही एक ध्वनि उठने लगी थी कि 'सब
रोगों की एकमात्र औषधि भारत की स्वतन्त्रता है।' आपने भाषण में अपना अनुभव
तथा गहरे मनन से जो परिणाम निकाला था, सब कह सुनाया।
वह उनकी सफ़ाई, शान्ति, वीरता, गम्भीरता और निर्भीकता को देखकर कहा
करते थे कि "बलवन्त सिंह सिक्खों के पादरी हैं अथवा सेनापति (General), यह
निश्चय करना बड़ा कठिन है।" अस्तु।
शीघ्र भविष्य में क्या किया जावे, यह तो कुछ निश्चय करने का अवसर नहीं
मिला, कि एक और समस्या सामने आ खड़ी हुई – कामागाटामारू जहाज़ आ
पहुँचा। किनारे पर लगने की आज्ञा ही नहीं मिली, उलटे उन पर अनेक अत्याचार
ढाये जाने लगे। जितने दिनों जहाज़ वहाँ रहा उतने दिन सभी भारतीय दत्तचित्त हो
उसी की सहायता में लगे रहे। नेतृत्व फिर हमारे नायक के हाथ में था। आपने
दिन-रात एक कर दिया। इतना परिश्रम और कोई कर पाता अथवा नहीं, सो नहीं
कह सकते। किराये के क़िस्त की अदायगी में देर लगवाकर जो अड़चन गोरेशाही
डालना चाहती थी, उसका भार भी आप पर पड़ा। 11 हज़ार डॉलर की आवश्यकता
थी। सभा में 11 हज़ार डॉलर के लिए जो अपील आपने की थी, उसमें इतना दर्द
और इतना प्रभाव था कि वर्णन नहीं किया जा सकता। 11 हज़ार डॉलर इकट्ठा
हो गये। उनकी आर्थिक आवश्यकताएँ पूरी करने के बाद आप और सलाह-मशवरा
करने के लिए दक्षिण की ओर बहुत दूर चले गये। अचानक वे अमेरिका की सीमा
पर पहुँच गये। गोरी सरकार ने पकड़ लिया। कहा, "अमेरिका से आये हो और चोरी
से कैनेडा में प्रविष्ट हुए हों।" यह निराधार दोष भी एक लम्बे झगड़े का कारण
हुआ, आख़िर कुछ झगड़े के बाद मामला तय हुआ और वैंकोवर पहुँचे। कुछ दिन
बाद निराश होकर कामागाटामारू जहाज़ भी लौटने पर विवश हो गया।
कामागाटामारू के साथ भारत की जितनी आशाएँ सम्बद्ध थीं, सभी एकाएक
मटियामेट कर दी गयीं। भारत का व्यवसाय की ओर यही तो पहला प्रयत्न था। उसी
में भारत-हितकारी शासकों ने पूरी तरह से ऐसा पीसने की कोशिश की कि फिर
कोई ऐसी चेष्टा करने का दुःसाहस न कर सके। कैनेडा में जितने दिन जहाज़ ठहरा,
उतने दिन उनके साथ जो अमानुषिक व्यवहार हुए थे, उनका रोमांचकारी वर्णन
लिखने का यह स्थान नहीं। पर उनकी याद दिल को आग लगा देती है, पागल
कर देती है, रुला-रुला जाती है। उन सबका उत्तरदायित्व इमिग्रेशन विभाग के
वैंकोवर वाले मुख्य अध्यक्ष मि. हॉपकिंसन पर ही था। ये लोग उनसे बहुत नाराज़
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 131