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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 788 में से

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पृष्ठ 127

अपनी दिली भावनाएँ नहीं बता सकते – क्योंकि हम कायर हैं, डरपोक हैं, आज
हमें सच कहने से डर लगता है, क्योंकि क़ानून की तलवार हमारे सिरों पर लटकती
दिखायी देती है। इससे यह नहीं कह सकते, ‘काकोरी के शहीदो! आपने जो किया,
भारतमाता के बन्धन तोड़ने के लिए किया। आपने जो कष्ट उठाये, वह हिन्दुस्तान
को आज़ाद करवाने के लिए उठाये।’ आज हम यह नहीं कह सकते कि ‘आपने
अपने मतानुसार अच्छा किया।’
गुलामों की अवस्था कितनी गिर जाती है। गुलामों में कितनी गिरावट आ जाती
है। दैवी गुण उनमें से किस तरह भाग जाते हैं। वे कितने ढोंगी और पाखण्डी बन
जाते हैं। वे कितने बुज़दिल व कायर बन जाते हैं। वे सच्ची-खरी बातें मुँह पर नहीं
कह सकते। वे दिल में कुछ और रखते हैं और बाहर कुछ और। उनकी हालत
कितनी दयनीय हो जाती है!
इस हालत को सुधारने का एक ही साधन है, इस दुर्दशा को बदलने का
एकमात्र इलाज है, इस दुर्दशा की एक ही दवा है, और वह है आज़ादी। आज़ादी
कुर्बानियों के बग़ैर नहीं मिल सकती। शहीदों की इज़्ज़त करने से, शहीदों के
कारनामे याद करने से कुर्बानी का चाव उमड़ता है। जो क़ौम शहीदों को शहीद
नहीं कह सकती, उसे क्या खाक आज़ाद होना है?
लोगो! देखे हैं आशिक़ सूली पर चढ़ते? वे मौत से मज़ाक़ करते थे। वे मौत
पर हँसते थे, उन्हें मृत्यु का भय नहीं था। वे यार की गली में शीश तली पर रखकर
आये थे। उन्हें डर क्या था, वे तो आये ही मरने थे। मृत्यु का तो वे पहले ही वरण
कर चुके थे, जीवन की आशा तो वे पहले ही छोड़ चुके थे। वे तो गाते थे –
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है।
कहाँ वे और कहाँ हम? वे तो किसी और ही देश के निवासी थे। वे तो ग़रीबों
की आह सुनकर मैदान में उतरे थे। वे तो हिन्दुस्तान से भूख-नंग को दूर करने आये
थे। वे तो मज़दूरों और किसानों का हाल पूछने आये थे। वे तो किसी ऊँचे आदर्श
के पुजारी थे। वे तो किसी ऊँचे स्वप्न की उड़ान में मस्त थे। वे तो वे नज़ारे देखते
थे, जहाँ न भूख है, न नग्नता। जहाँ न ग़रीबी है, न अमीरी। जहाँ न जुल्म है, न
अन्याय। बस जहाँ प्रेम है, एकता है, जहाँ इन्साफ़ है, आज़ादी है, जहाँ सुन्दरता है।
पर हम? हम?...हाय रे!
किसी का आदर्श कमाना, आप खाना और बच्चों को पालना होता है। किसी
का आदर्श स्वयं को ऊँचा उठाने का होता है। किसी का आदर्श ग़रीबों, दुखियों
को लूटकर धन-दौलत इकट्ठा करना होता है, किसी का आदर्श अपने सुन्दर शरीर
को तकलीफ़ से दूर करने का होता है।
किसी का आदर्श कुछ होता है, किसी का कुछ। लेकिन उनका आदर्श देश
था। उनका आदर्श हिन्दुस्तान की आज़ादी था। उनका कोई स्वार्थ नहीं था। उनके
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 121