भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 131, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोने के बाद में आपको छोड़ दिया गया।
तत्पश्चात सरदार अजीत सिंह भी छूटकर आ गये। और सन् 1909 में
भारतमाता बुक सोसाइटी की नींव डाली गयी। इसका अधिकतर कार्य सूफ़ी जी
ही किया करते थे। आपने 'बाग़ी मसीह' या 'विद्रोही मसीह' नामक एक पुस्तक
प्रकाशित करवायी जो बाद को ज़ब्त कर ली गयी।
इसी वर्ष लोकमान्य तिलक पर अभियोग चलाया गया और उन्हें भी 6 वर्ष
का कारावास मिला। तब देशभक्त-मण्डल के सभी सदस्य साधु बनकर पर्वतों की
ओर यात्रा करने निकल पड़े। पर्वतों के ऊपर जा रहे थे। एक भक्त भी साथ आया।
साधु बैठे तो उस भक्त ने सूफ़ी जी के चरणों पर सीस नवाकर नमस्कार किया।
बड़ा जैण्टलमैन था। खूब सूट-बूट पहने था। सूफ़ी जी के चरणों पर शीश रखा और
पूछने लगा – बाबा जी, आप कहाँ रहते हैं?
सूफ़ी जी ने कठोर शब्दों में उत्तर दिया – रहते हैं तुम्हारे सर में!
– साधु जी, आप नाराज़ क्यों हो गये?
– अरे बेवकूफ़! तूने मुझे क्यों नमस्कार किया! इतने और साधु भी थे, इनको
प्रणाम क्यों न किया?
– मैं आपको साधु समझा था।
– अच्छा खैर जाओ, खाने-पीने की वस्तुएँ लाओ।
वह कुछ देर बाद अच्छे-अच्छे पदार्थ लेकर आया। खा-पीकर सूफ़ी जी ने
उसे फिर बुलाया और कहने लगे – क्यों बे, हमारा पीछा छोड़ेगा या नहीं?
– भला मैं आपसे क्या कहता हूँ जी?
– चालाकी को छोड़। आया है जासूसी करने! जा, अपने बाप से कह देना
कि सूफ़ी पहाड़ में ग़दर करने जा रहे हैं।
वह चरणों पर गिर पड़ा – हजूर, पेट की ख़ातिर सबकुछ करना पड़ता है!
आपने सन् 1909 में 'पेशवा' अख़बार निकाला। उन्हीं दिनों बंगाल में
क्रान्तिकारी आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ा। सरकार को चिन्ता हुई कि कहीं यह पंजाब
को भी जला न डाले। अस्तु, दमन-चक्र आरम्भ हुआ। तब सूफ़ी जी, सरदार अजीत
सिंह और ज़िया-उल-हक़ ईरान चले गये। वहाँ पहुँचकर ज़िया-उल-हक़ की
नीयत बदल गयी। उसने चाहा, इन्हें पकड़वा दूँ तो इनाम मिलेगा और सज़ा भी न
होगी। परन्तु सूफ़ी जी ताड़ गये। उन्होंने उसे आगे भेज दिया। फलस्वरूप वह स्वयं
ही पकड़ा गया और ये दोनों बच निकले।
ईरान में वे कैसे रहे, क्या हुआ, ये बातें तो किसी अवसर पर खुलेंगी परन्तु
जो कुछ सुनने में आया, उसी का उल्लेख इस स्थान पर किया जाता है। ईरान में
अंग्रेज़ों ने उनकी बहुत खोज की और उन्हें कई प्रकार के कष्ट सहन करने पड़े।
कहा जाता है कि वे एक स्थान पर घेर लिये गये। वहाँ से निकलना असम्भव-सा
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 125