भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंदी। होम मेम्बर नवाब छत्तारी के दर पर जा चिल्लाये, लेकिन उनके कानों पर
जूँ तक न सरकी। और कौंसिल में उनके सम्बन्ध में एक शब्द भी न कहा जा
सका और उन्हें फाँसी पर लटका ही दिया गया। इसी क्रोध में नीचता के साथ
रूसी ज़ार और फ़्रांसीसी लुइस बादशाह होनहार युवकों को फाँसी पर
लटका-लटकाकर दिलों की भड़ास निकालते रहे लेकिन उनके राज्यों की नींवें
खोखली हो गयी थीं और उनके तख़्ते पलट गये। इसी ग़लत तरीक़े का आज
फिर इस्तेमाल हो रहा है। देखें यदि इस बार इनकी मुरादें पूरी हों। नीचे हम उन
चारों वीरों के हालात संक्षेप में लिखते हैं, जिससे यह पता चले कि ये अमूल्य
रत्न मौत के सामने खड़े होते हुए भी किस बहादुरी से हँस रहे थे।
श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी
आप हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस के एम.ए. के छात्र थे। 1925 में कलकत्ते के पास
दक्षिणेश्वर बम फैक्टरी पकड़ी गयी थी, उसमें आप भी पकड़े गये थे और आपको
सात बरस की क़ैद हो गयी थी। वहीं से आपको लखनऊ लाया गया और काकोरी
केस में आपको फाँसी की सज़ा दे दी गयी। आपको बाराबंकी और गोण्डा जेलों
में रखा गया। आप मौत को सामने देख घबराते नहीं थे, बल्कि हमेशा हँसते रहते
थे। आपका स्वभाव बड़ा हँसमुख और निर्भय था। आप मौत का मज़ाक़ उड़ाते रहते
थे। आपके दो पत्र हमारे सामने हैं। एक छह अक्टूबर को तब लिखा था जब
वायसराय ने रहम की दरख्वास्त नामंजूर कर दी थी। आप लिखते हैं —
छह महीने बाराबंकी और गोण्डा की काल-कोठरियों में रहने के बाद आज
मुझे बताया गया है कि एक हफ़्ते के भीतर फाँसी दे दी जायेगी, क्योंकि वायसराय
ने दरख्वास्त नामंजूर कर दी है। अब मैं फ़र्ज़ समझता हूँ कि अपने इन मित्रों का
(यहाँ उनके नाम हैं) धन्यवाद कर जाऊँ जिन्होंने मेरे लिए बहुत-सी कोशिशें कीं।
आप मेरा अन्तिम नमस्कार स्वीकार करें। हमारे लिए मरना-जीना पुराने कपड़े
बदलने से अधिक कुछ भी नहीं (यहाँ जेलवालों ने कुछ काट-छाँट की है, जो
बिल्कुल पढ़ा नहीं जाता) मौत आ रही है, हँसते-हँसते बड़े चाव और खुशी से उसे
ज़ोर से गले लगा लूँगा। जेल के क़ानून अनुसार और कुछ नहीं लिख सकता।
आपको नमस्कार, देश के दर्दमन्दों को नमस्कार, वन्देमातरम!
आपका,
राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी
फिर इस पत्र के बाद फाँसी नहीं हो सकी, क्योंकि प्रिवी कौंसिल में अपील
की गयी थी। दूसरा पत्र आपने 14 दिसम्बर को एक मित्र के नाम लिखा था —
कल मुझे पता चला है कि प्रिवी कौंसिल ने मेरी अपील ख़ारिज कर दी है।
आप लोगों ने हमें बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन लगता है कि देश की
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