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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 788 में से

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पृष्ठ 132

हो गया। वहाँ व्यापारियों का एक क़ाफ़िला ठहरा हुआ था। ऊँटों पर बहुत-से सन्दूक
लदे थे। आगे वस्त्र आदि भरे थे। एक ऊँट के दोनों सन्दूकों में सूफ़ी जी तथा अजीत
सिंह को बन्द कर दिया गया और वहाँ से बचाकर निकाला गया।
फिर किसी अमीर के घर ठहरे। पता चल गया और वह घेर लिये गये। उसी
समय उन दोनों को बुरका पहना ज़नाने में बिठा दिया गया। सबकी तलाशी ली गयी
और अन्त में स्त्रियों की भी तलाशी ली जाने लगी। एक-दो स्त्रियों के बुरके उठाये
भी गये, परन्तु मुसलमान लोग लड़ने-मरने को तैयार हो गये और फिर अन्य किसी
स्त्री का बुरका नहीं उठाने दिया गया। इस तरह वे दोनों यहाँ से भी बचे।
पीछे उन्होंने वहाँ से 'आबे हयात' नामक पत्र निकाला और राष्ट्रीय आन्दोलन
में भाग लेने लगे। सरदार साहिब के टर्की चले जाने पर वहाँ का सारा कार्य इन्हीं
के सर आ पड़ा और फिर ये वहाँ आकर सूफ़ी के नाम से प्रसिद्ध हुए। सन् 1915
में जिस समय ईरान में अंग्रेज़ों ने पूर्ण प्रभुत्व जमाना चाहा तो फिर कुछ उथल-पुथल
मची थी। शीराज़ पर घेरा डाला गया। उस समय सूफ़ी जी ने बायें हाथ से रिवाल्वर
चलाकर मुक़ाबला किया था, परन्तु अन्त में आप अंग्रेज़ों के हाथ आ गये। उनका
कोर्ट मार्शल किया गया। फ़ैसला हुआ कि कल गोली से उड़ा दिये जायेंगे। सूफ़ी
कोठरी में बन्द थे। प्रातः समय देखा तो वे समाधि की अवस्था में थे। उनके प्राण
पखेरू उड़ चुके थे! उनके जनाज़े के साथ असंख्य ईरानी गये और उन्होंने बहुत
शोक मनाया। कई दिन तक नगर में उदासी छायी रही। सूफ़ी जी की क़ब्र बनायी
गयी। अभी तक हर वर्ष उनकी क़ब्र पर उत्सव मनाया जाता है। लोग उनका नाम
सुनते ही श्रद्धा से सर झुका लेते हैं। वे पैर से भी लेखनी पकड़कर अच्छी तरह
लिख सकते थे। एक दिन एक महाशय कह रहे थे कि मुझे उन्होंने पैर से ही
लिखकर एक नुस्ख़ा दिया था।
एक और कहानी मित्रों ने सुनायी थी। पता नहीं कहाँ तक सच है। परन्तु बहुत
सम्भव है वह सच हो। कहते हैं, जब भोपाल या किसी और स्टेट में रेज़िडेण्ट कुछ
गड़बड़ कर रहे थे और उसको हड़प करने की चिन्ता में थे, तो वहाँ का भेद
प्रकाशित करने के लिए अमृत बाज़ार पत्रिका की ओर से सूफ़ी जी वहाँ भेजे गये।
यह बात 1890 के लगभग की है।
एक पागल-सा मनुष्य रेज़िडेण्ट के बैरे के पास नौकरी की खोज में आया और
अन्त में केवल भोजन पर ही रख लिया गया। वह पागल बरतन साफ़ करता तो
मिट्टी में लथपथ हो जाता। मुँह पर मिट्टी पोत लेता। वह सौदा ख़रीदने में बड़ा
चतुर था, अस्तु चीजें ख़रीदने वही भेजा जाता था।
उधर अमृत बाज़ार पत्रिका में रेज़िडेण्ट के विरुद्ध धड़ाधड़ लेख निकलने लगे।
अन्त में इतना बदनाम हुआ कि पदच्युत कर दिया गया। जिस समय वह स्टेट से
बाहर पहुँच गया तो एक जंक्शन पर एक काला-सा आदमी हैट लगाये, पतलून-बूट
126 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़