भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे परिवार तो वहीं रह गये, परन्तु शेष भारतीयों के परिवार लाने की समस्या
वैसे-की-वैसी खड़ी रही। दो साल तक निरन्तर झगड़ा किया, परन्तु परिणाम कुछ
न निकला। आख़िर तय पाया कि इंग्लैण्ड की सरकार तथा जनता और भारत
सरकार तथा जनता के सामने अपनी माँगें रखी जावें और उनकी सहायता से इस
उलझन को सुलझाया जाये।
एक डेपूटेशन बनाया गया जो इंग्लैण्ड भी गया और भारतवर्ष भी। उसके तीन
सदस्यों में एक हमारे नायक श्री बलवन्त सिंह भी थे। इंग्लैण्ड गये। सभी उच्च
अधिकारियों से मिले। कहा गया — "मामला भारत सरकार द्वारा यहाँ पहुँचना
चाहिए।" निराश हो भारत में आये। आन्दोलन शुरू किया। उस समय प्रमुख नेता
लाला लाजपत राय जी ने भी सड़ा-सा उत्तर देकर उनसे पीछा छुड़ा लिया था। फिर
क्या था? कुछेक सज्जनों की सहायता मिली। सार्वजनिक सभाएँ की गयीं। क्रोध
था, घायल राष्ट्रीय भाव था, विवशता थी और थी घोर निराशा। जले दिलों से जो
कुछ निकला, कहा और फिर? सर माईकेल ओडायर अपने, 'India: As I Knew
it' नामक ग्रन्थ में लिखते हैं – "At this Stage I sent a warning to the
delegates that if this continued, I would be compelled to take serious
action... The delegates on this asked for an interview with me. I had a long
talk with them and repeated my warning. Two of them were... and spacious;
the manner of third seemed to be that of a dangerous revolutionary. They
wished to see The Viceroy, and in sending them on to him, I particularly
warned him about this man."
यह तीसरे सज्जन, जिन पर हमारे लाट ने इतना कुछ कह डाला है, यह वही
नायक बलवन्त थे। उस भावुक हृदय ने तो गहरे घाव खाये थे। आत्मसम्मान का
भाव बार-बार ठुकराया जा चुका था। उन्होंने धीरे-धीरे निश्चय कर लिया था कि
भारत को हरसम्भव उपाय से स्वतन्त्र करवाना ही प्रत्येक भारतवासी का सर्वप्रथम
कर्तव्य है। ख़ैर!
डेपूटेशन हताश-निराश हो 1914 के आरम्भ में वापस लौट गया। इन्हीं दिनों
भारतीय विद्रोही श्री भगवान सिंह तथा श्री बरकतुल्ला भी अमेरिका पहुँच गये।
संयुक्त राज्य अमेरिका में इन दिनों हिन्दुस्थान-एसोसिएशन (Hindusthan
Association) का कार्य ज़ोरों पर होने लगा। ग़दर दल, ग़दर प्रेस, ग़दर अख़बार
जारी हो गये। परन्तु उपरोक्त डेपूटेशन वाले सज्जनों का उस समय तक उनसे कोई
सम्बन्ध न था। किन्तु उनको सर माईकेल ओडायर ने ग़दर दल के ही प्रतिनिधि
लिखा है। अस्तु।
उस समय तक भारतवर्ष के अभियोग अन्य जातियों के सामने नहीं रखे गये
थे। परन्तु यह डेपूटेशन जापान और चीन के राजनीतिज्ञों से मिलता हुआ ही गया
130 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़