भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिकाला। इसका प्रत्येक शब्द उनकी आन्तरिक अवस्था का परिचय देता था। वे
हास्यरस के प्रसिद्ध लेखक थे, परन्तु इनमें गम्भीरता भी कम न थी। वे
हिन्दू-मुस्लिम-एकता के कट्टर पक्षपाती थे और शासकों की कड़ी आलोचना
किया करते थे।
सन् 1897 में आपको राजद्रोह के अपराध में डेढ़ वर्ष का कारागार मिला। जब
1899 में छूटकर आये तो यू.पी. के कुछ छोटे राज्यों पर अंग्रेज़ लोग हस्तक्षेप कर
रहे थे। सूफ़ी जी ने वहाँ के अंग्रेज़ों तथा रेज़िडेण्टों का खूब भण्डाफोड़ किया। आप
पर मिथ्या दोषारोपण का अभियोग चलाया गया और सारी जायदाद ज़ब्त कर 6
साल का कारागार दिया गया। जेल में उन्हें अकथनीय कष्ट सहन करने पड़े, परन्तु
वे कभी विचलित नहीं हुए।
सूफ़ी जी जेल में बीमार पड़े। एक गलीज़ कोठरी में बन्द थे। उन्हें औषधि
नहीं दी जाती थी, यहाँ तक कि पानी आदि का भी ठीक प्रबन्ध न था। जेलर आता
और हँसता हुआ प्रश्न करता – सूफ़ी, अभी तक तुम ज़िन्दा हो? खैर! ज्यों-त्यों
कर जेल कटी और 1906 के अन्त में आप बाहर आये।
सूफ़ी जी का निज़ाम हैदराबाद से घनिष्ठ सम्बन्ध था। जेल से छूटते ही वहाँ
गये। निज़ाम ने उनके लिए एक अच्छा-सा मकान बनवाया। मकान बन जाने पर
उन्होंने सूफ़ी जी से कहा – ‘आपके लिए मकान तैयार हो गया।’ आपने उत्तर दिया
– ‘हम भी तैयार हो गये हैं।’ आपने वस्त्रादि उठाये और पंजाब के लिए चल दिये।
वहाँ जाकर आप ‘हिन्दुस्तान’ अख़बार में काम करने लगे। सुनते हैं वहाँ आपकी
चतुरता, वाक्पटुता और समझदारी देखकर सरकार की ओर से 1000 रुपया मासिक
जासूस विभाग से पेश किये गये थे, परन्तु आपने उनकी अपेक्षा जेल और दरिद्रता
को ही श्रेष्ठ समझा। बाद को ‘हिन्दुस्तान’-सम्पादक से भी आपकी न बनी। आपने
वहाँ से भी त्यागपत्र दे दिया।
उन्हीं दिनों सरदार अजीत सिंह ने भारतमाता सोसाइटी की नींव डाली और
पंजाब के न्यू कालोनी बिल के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ कर दिया। सूफ़ी जी का
भी मेल उनसे बनने लगा। उधर वे इनकी ओर आकर्षित होने लगे।
सन् 1906 में पंजाब में फिर धर-पकड़ आरम्भ हुई तो सरदार अजीत सिंह
के भाई सरदार किशन सिंह और भारतमाता सोसाइटी के मन्त्री मेहता आनन्द
किशोर के साथ वे नेपाल चल दिये। वहाँ नेपाल राज्य के गवर्नर श्री जंगबहादुर
जी से आपका परिचय हो गया। वे इनसे बहुत अच्छी तरह पेश आये। बाद
को श्री जंगबहादुर जी सूफ़ी को आश्रय देने के कारण ही पदच्युत कर दिये
गये। उनकी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली गयी। खैर, सूफ़ी जी वहाँ पकड़े गये और
लाहौर लाये गये। लाला पिण्डीदास जी के पत्र ‘इण्डिया’ में प्रकाशित आपके
लेखों के सम्बन्ध में ही आप पर अभियोग चलाया गया, परन्तु निर्दोष सिद्ध
124 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़