भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 124, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंएक मिट जाने की हसरत,
अब दिले-बिस्मिल में है!
फिर ईश्वर के आगे प्रार्थना की और फिर एक मन्त्र पढ़ना शुरू किया। रस्सी
खींची गयी। रामप्रसाद जी फाँसी पर लटक गये। आज वह वीर इस संसार में नहीं
है। उसे अंग्रेज़ी सरकार ने अपना ख़ौफ़नाक दुश्मन समझा। आम ख़याल यह है कि
उसका क़सूर यही था कि वह इस गुलाम देश में जन्म लेकर भी एक बड़ा भारी
बोझ बन गया था और लड़ाई की विद्या से खूब परिचित था। आपको मैनपुरी
षड्यन्त्र के नेता श्री गेंदालाल दीक्षित जैसे शूरवीर ने विशेष तौर पर शिक्षा देकर
तैयार किया था। मैनपुरी के मुक़दमे के समय आप भागकर नेपाल चले गये थे।
अब वही शिक्षा आपकी मृत्यु का एक बड़ा कारण हो गया। 7 बजे आपकी लाश
मिली और बड़ा भारी जुलूस निकला। स्वदेशप्रेम में आपकी माता ने कहा –
“मैं अपने पुत्र की इस मृत्यु पर प्रसन्न हूँ, दुखी नहीं। मैं श्री रामचन्द्र जैसा
ही पुत्र चाहती थी। बोलो श्री रामचन्द्र की जय!”
इत्र-फुलेल और फूलों की वर्षा के बीच उनकी लाश का जुलूस जा रहा था।
दुकानदारों ने उनके ऊपर से पैसे फेंके। 11 बजे आपकी लाश श्मशान भूमि में
पहुँची और अन्तिम-क्रिया समाप्त हुई।
आपके पत्र का आख़िरी हिस्सा आपकी सेवा में प्रस्तुत है –
“मैं खूब सुखी हूँ। 19 तारीख़ को प्रातः जो होना है उसके लिए तैयार हूँ।
परमात्मा काफ़ी शक्ति देंगे। मेरा विश्वास है कि मैं लोगों की सेवा के लिए फिर
जल्द ही जन्म लूँगा। सभी से मेरा नमस्कार कहें। दया कर इतना काम और भी
करना कि मेरी ओर से पण्डित जगतनारायण (सरकारी वकील जिसने इन्हें फाँसी
लगवाने के लिए बहुत ज़ोर लगाया था) को अन्तिम नमस्कार कह देना। उन्हें हमारे
ख़ून से लथपथ रुपयों से चैन की नींद आये। बुढ़ापे में ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे।”
रामप्रसाद जी की सारी हसरतें दिल ही दिल में रह गयीं। आपने एक
लम्बा-चौड़ा एलान किया है, जिसे संक्षेप में हम दूसरी जगह दे रहे हैं। फाँसी से
दो दिन पहले सी.आई.डी. के मि. हैमिल्टन आप लोगों की मिन्नतें करते रहे कि
आप मौखिक रूप से सब बातें बता दो, आपको पाँच हज़ार रुपया नक़द दे दिया
जायेगा और सरकारी ख़र्चे पर विलायत भेजकर बैरिस्टर की पढ़ाई करवायी जायेगी।
लेकिन आप कब इन बातों की परवाह करते थे। आप हुकूमतों को ठुकराने वाले
व कभी-कभार जन्म लेने वाले वीरों में से थे। मुक़दमे के दिनों आपसे जज ने पूछा
था, “आपके पास क्या डिग्री है?” तो आपने हँसकर जवाब दिया था, “सम्राट
बनाने वालों को डिग्री की कोई ज़रूरत नहीं होती, क्लाइव के पास भी कोई डिग्री
नहीं थी।” आज वह वीर हमारे बीच नहीं है। आह!!
118 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़