भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished788 पृष्ठ
पृष्ठ 133, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 133
पहने उसकी ओर आया। उसे देखकर रेजिडेण्ट चकित-सा रह गया। ये तो वही है
जो मेरे बरतन साफ़ किया करता था! आज पागल नहीं है। उसने आते ही अंग्रेज़ी
में बातचीत शुरू की। उसे देखकर रेजिडेण्ट काँपने लगा। आख़िर उसने कहा -
तुम्हें इनाम तो दिया जा चुका है, अब तुम मेरे पास क्यों आये हो?
- आपने कहा था - जो आदमी उस गुप्तचर को, जिसने कि आपका भेद
खोला है, पकड़वाये तो आप कुछ इनाम देंगे। - हाँ, कहा तो था। क्या तुमने उसे पकड़ा?
- हाँ, हाँ...इनाम दीजिये। वह मैं स्वयं ही हूँ।
वह थर-थर काँपने लगा। बोला - यदि राज्य के अन्दर ही मुझे तेरा पता चल
जाता तो बोटी-बोटी उड़वा देता। खैर, उसने उन्हें एक सोने की घड़ी दी और कहा - यदि तुम स्वीकार करो तो जासूस विभाग से 1000 रु. मासिक वेतन दिला
सकता हूँ। परन्तु सूफ़ी जी ने कहा - अगर वेतन ही लेना होता तो आपके बरतन
क्यों साफ़ करता?
आज सूफ़ी जी इस देश में नहीं हैं। पर ऐसे देशभक्त का स्मरण ही
स्फूर्तिदायक होता है। भगवान उनकी आत्मा को चिर शान्ति दे।
फ़रवरी, 1928
श्री बलवन्त सिंह
वे बड़े ईश्वर-भक्त थे। धर्मनिष्ठा के कारण उन्हें सिक्खों में पुरोहित बना दिया गया
था। शान्ति के परम उपासक बलवन्त का स्वभाव बड़ा मृदुल था। वे सुमधुर भाषी
थे। पहले-पहल वे ईश्वरोपासना की ओर लगे। फिर लोगों को उस ओर लाने की
चेष्टा प्रारम्भ की। बाद में लोगों के कष्ट दूर करने के प्रयास में धीरे-धीरे गौराँग
महाप्रभुओं से मुठभेड़ होती गयी और अन्त में फाँसी पर मुस्कुराते हुए आपने
प्राण-त्याग किया।
श्री बलवन्त सिंह का जन्म गाँव खुर्दपुर, ज़िला जालन्धर में पहिली आश्विन,
सम्वत 1939 विक्रम शुक्रवार को हुआ था। आपके पिता का नाम सरदार बुद्ध सिंह
था।
परिवार बड़ा धनाढ्य था। पिता को धन के अतिरिक्त स्वभाव तथा अन्य
गुणों के कारण सभी मान तथा आदर की दृष्टि से देखते थे। आपको होश
सँभालते ही आदमपुर के मिडिल स्कूल में शिक्षा के लिए दाख़िल करवा दिया।
विद्यार्थी-जीवन में ही आपका विवाह हो गया। परन्तु विवाह के बाद शीघ्र ही
धर्मपत्नी की मृत्यु हो गयी। मिडिल पास किये बिना ही स्कूल छोड़कर वे फ़ौज
में जा भरती हुए। पल्टन में आपका सन्त कर्म सिंह जी से संसर्ग हुआ। उनकी
संगति से आपका ईश्वर-भजन की ओर झुकाव हो गया। दस साल ज्यों-त्यों
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 127