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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 788 में से

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पृष्ठ 134

नौकरी की, फिर एकाएक नौकरी छोड़ अपने गाँव में रहकर ईश्वरोपासना शुरू
कर दी। पलटन की नौकरी में ही आपका दूसरा विवाह भी हुआ था। गाँव के
पास एक गुफा थी। उसी में बन्द रहकर भगवद्भजन में तल्लीन रहने लगे। ग्यारह
महीने वहीं रहने के बाद बाहर आते ही सन् 1905 में कैनेडा जाने का निश्चय
कर, उधर ही प्रस्थान कर दिया।
कैनेडा में जाकर आपने अपने दूसरे साथी श्री भाग सिंह जी से, जिन्हें एक
देशद्रोही ने बाद में गोली मार दी थी, मिलकर गुरुद्वारा बनाने का कार्य आरम्भ
किया। वैंकोवर में ही उनके प्रयत्न से अमेरिका का सबसे पहला गुरुद्वारा स्थापित
हुआ। उस समय वहाँ गये हुए भारतवासियों में कोई संगठन न था। उन्हें गोरे लोग
तंग किया करते थे, परन्तु हमारे नायक वहाँ गये तो उन्होंने इन सब त्रुटियों को दूर
करने का भरसक प्रयत्न किया।
उस समय वहाँ के प्रवासी हिन्दुओं तथा सिक्खों को मृतक-संस्कार करने में
बड़ी विपत्ति होती। मुर्दे जलाने की उन्हें आज्ञा न थी। ऐसी अवस्था में बेचारे उन
लोगों को अनेकानेक कष्ट सहन करने पड़ते। कई बार उन्हें वर्षा में, बर्फ़ में, शव
को जंगल में ले जाकर, कुछ लकड़ियाँ इकट्ठा कर, तेल डाल आग लगाकर
भागना पड़ता। ऐसी अवस्था में भी कैनेडियन लोगों की गोली का निशाना बनने का
डर रहता। श्री बलवन्त सिंह जी ने यह असुविधा दूर करने का प्रबन्ध किया। कुछ
ज़मीन खरीद ली। दाह-संस्कार करने की आज्ञा भी प्राप्त कर ली। गुरुद्वारे में
भारतीय मज़दूरों का संगठन भी करने लगे। उनमें सच्चरित्रता तथा ईश्वरोपासना का
प्रचार किया करते। गुरुद्वारा बड़े प्रयत्न से बन पाया था, उन सबमें आपका परिश्रम
ही सबसे अधिक था, अतः सबने मिलकर आपको ही ग्रन्थी बनाने का निश्चय
किया। पहले तो आपने कुछ इन्कार किया, परन्तु बाद में स्वीकार कर लिया।
सिक्ख लोग बड़े हृष्ट-पुष्ट तथा परिश्रमी होते हैं। उनके कैनेडा में जाने से गोरे
मज़दूरों की क़द्र कम हो गयी। उधर अंग्रेज़ मज़दूरों से उनका वेतन भी कहीं कम
होता। उनके पहले दल के पहुँचते ही गोरे मज़दूरों ने दंगा-फ़साद शुरू कर दिया
था। परन्तु योद्धा-वीर सिक्ख इन बातों से डरने वाले नहीं थे। इससे गोरे और भी
चिढ़ उठे। और उधर गुरुद्वारा बनने से इनका संगठन बढ़ने लगा। नवीन आगन्तुकों
को हर प्रकार की सुविधा होने लगी। यह सब देखकर वहाँ की गोरी सरकार ने
उनको निकालने के लिए यत्किंचित उपाय ढूँढ़ने शुरू किये। इमिग्रेशन विभाग वालों
ने भारतीय मज़दूरों को बहुत-कुछ फुसलाकर हण्डूरॉस नामक द्वीप में चले जाने
पर राजी करने का प्रयत्न किया। उस द्वीप की बहुत तारीफ़ की गयी। परन्तु भाई
बलवन्त सिंह जी खूब समझते थे कि यह सब धोखे की टट्टी है। आपने अपने
किसी विश्वस्त सज्जन को वह स्थान देख आने के लिए भेजा। उस सज्जन का
नाम था श्री नागर सिंह। उन्हें वहाँ इमिग्रेशन विभाग वालों ने भारत में पाँच मुरब्बे
128 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़