भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 137, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंथा और इन्होंने भारत की ओर उन लोगों की सहानुभूति आकृष्ट करने का भरसक
प्रयत्न किया था। वैंकोवर लौटकर अपने निष्फल प्रयत्न का इतिहास सुनाते हुए श्री
बलवन्त सिंह जी ने एक बड़ी प्रभावशाली वक्तृता दी थी। ऐसी वक्तृताएँ राष्ट्रों के
इतिहास में विशेष मान पाती हैं। गहरे मनन के बाद आपको चारों ओर से यही
सुनायी देने लगा था, उनके अन्तस्तल से यही एक ध्वनि उठने लगी थी कि 'सब
रोगों की एकमात्र औषधि भारत की स्वतन्त्रता है।' आपने भाषण में अपना अनुभव
तथा गहरे मनन से जो परिणाम निकाला था, सब कह सुनाया।
वह उनकी सफ़ाई, शान्ति, वीरता, गम्भीरता और निर्भीकता को देखकर कहा
करते थे कि "बलवन्त सिंह सिक्खों के पादरी हैं अथवा सेनापति (General), यह
निश्चय करना बड़ा कठिन है।" अस्तु।
शीघ्र भविष्य में क्या किया जावे, यह तो कुछ निश्चय करने का अवसर नहीं
मिला, कि एक और समस्या सामने आ खड़ी हुई – कामागाटामारू जहाज़ आ
पहुँचा। किनारे पर लगने की आज्ञा ही नहीं मिली, उलटे उन पर अनेक अत्याचार
ढाये जाने लगे। जितने दिनों जहाज़ वहाँ रहा उतने दिन सभी भारतीय दत्तचित्त हो
उसी की सहायता में लगे रहे। नेतृत्व फिर हमारे नायक के हाथ में था। आपने
दिन-रात एक कर दिया। इतना परिश्रम और कोई कर पाता अथवा नहीं, सो नहीं
कह सकते। किराये के क़िस्त की अदायगी में देर लगवाकर जो अड़चन गोरेशाही
डालना चाहती थी, उसका भार भी आप पर पड़ा। 11 हज़ार डॉलर की आवश्यकता
थी। सभा में 11 हज़ार डॉलर के लिए जो अपील आपने की थी, उसमें इतना दर्द
और इतना प्रभाव था कि वर्णन नहीं किया जा सकता। 11 हज़ार डॉलर इकट्ठा
हो गये। उनकी आर्थिक आवश्यकताएँ पूरी करने के बाद आप और सलाह-मशवरा
करने के लिए दक्षिण की ओर बहुत दूर चले गये। अचानक वे अमेरिका की सीमा
पर पहुँच गये। गोरी सरकार ने पकड़ लिया। कहा, "अमेरिका से आये हो और चोरी
से कैनेडा में प्रविष्ट हुए हों।" यह निराधार दोष भी एक लम्बे झगड़े का कारण
हुआ, आख़िर कुछ झगड़े के बाद मामला तय हुआ और वैंकोवर पहुँचे। कुछ दिन
बाद निराश होकर कामागाटामारू जहाज़ भी लौटने पर विवश हो गया।
कामागाटामारू के साथ भारत की जितनी आशाएँ सम्बद्ध थीं, सभी एकाएक
मटियामेट कर दी गयीं। भारत का व्यवसाय की ओर यही तो पहला प्रयत्न था। उसी
में भारत-हितकारी शासकों ने पूरी तरह से ऐसा पीसने की कोशिश की कि फिर
कोई ऐसी चेष्टा करने का दुःसाहस न कर सके। कैनेडा में जितने दिन जहाज़ ठहरा,
उतने दिन उनके साथ जो अमानुषिक व्यवहार हुए थे, उनका रोमांचकारी वर्णन
लिखने का यह स्थान नहीं। पर उनकी याद दिल को आग लगा देती है, पागल
कर देती है, रुला-रुला जाती है। उन सबका उत्तरदायित्व इमिग्रेशन विभाग के
वैंकोवर वाले मुख्य अध्यक्ष मि. हॉपकिंसन पर ही था। ये लोग उनसे बहुत नाराज़
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 131