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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

गृह मन्त्रालय, भारत सरकार को स्मरणपत्र
द्वारा,
स्पेशल मजिस्ट्रेट, लाहौर षड्यन्त्र केस, लाहौर
28 जनवरी, 1930
20 जनवरी, 1930 के हमारे तार के सन्दर्भ में, जो नीचे दिया जा रहा है, हमें कोई
उत्तर नहीं दिया गया –
गृह सदस्य भारत सरकार, दिल्ली–लाहौर साज़िश केस के विचाराधीन
(अण्डर ट्रायल) बन्दियों ने इस आश्वासन पर भूख हड़ताल स्थगित की थी कि
सरकार जेल कमेटी की सिफ़ारिशों पर विचार कर रही है। अखिल भारतीय
सरकारी कॉन्फ़्रेंस समाप्त हो गयी लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी
– राजनीतिक बन्दियों के साथ प्रतिशोधात्मक व्यवहार अभी भी किया जा रहा है।
निवेदन है कि लाहौर साज़िश केस के बन्दियों के बारे में सरकार हमें अपने अन्तिम
निर्णय से एक हफ़्ते में अवगत करा दे।
जिस प्रकार उपरोक्त तार में संक्षेप में बताया है, आपके ध्यान में हम यह लाना
चाहते हैं कि पंजाब की जेलों में बन्द लाहौर साज़िश के बन्दियों और प्रत्येक
राजनीतिक बन्दी को पंजाब जेल जाँच कमेटी के सदस्यों के इस आश्वासन से कि
बहुत जल्द ही राजनीतिक बन्दियों के व्यवहार का प्रश्न हमारी तसल्ली के अनुसार
हल किया जा रहा है, भूख हड़ताल स्थगित कर दी। महान शहीद यतीन्द्रनाथ दास
की शहादत के बाद यह मामला लेजिस्लेटिव असेम्बली में उठा और सर जेम्स
कर्रीर ने सार्वजनिक रूप से यह आश्वासन दिया कि अब मन बदल गया है। और
तभी यह कहा गया था कि राजनीतिक कैदियों के साथ व्यवहार के प्रश्न पर उन्हें
बहुत सहानुभूति है। ऐसे राज–बन्दियों ने जो देश के भिन्न-भिन्न भागों की जेलों
में भूख हड़ताल पर थे, उस समय – उपरोक्त आश्वासन और कुछ बन्दियों की
बदतर हालत को सामने रखकर पास किये गये अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के
पारित प्रस्ताव और निवेदन पर – अपनी हड़ताल स्थगित कर दी थी। उस समय
से सभी स्थानीय सरकारों ने अपनी सिफ़ारिशें पेश कर दी हैं। अलग-अलग राज्यों
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 365

की जेलों के इंस्पेक्टर जनरलों की बैठक लखनऊ में अभी समाप्त हुई है। अखिल
भारतीय सरकारी कॉन्फ्रेंस का विचार-विमर्श दिल्ली में हुआ है। अखिल भारतीय
कॉन्फ्रेंस पिछले दिसम्बर महीने में हुई थी। एक माह से अधिक बीत चुका है,
लेकिन सरकार ने अभी तक एक भी सिफ़ारिश लागू नहीं की। इस तरह के
लटकाये रखने वाले व्यवहार में दूसरों की तरह हमें भी इस बात का भय है कि
सम्भवतः इस सवाल को एक ओर कर दिया गया है। पिछले चार महीनों में जिस
प्रकार भूख हड़तालों और राजनीतिक बन्दियों के साथ प्रतिशोधात्मक व्यवहार
हुआ है, उससे हमारी आशंका और पक्की हुई है। जो यातनाएँ राजनीतिक बन्दियों
को दी जा रही हैं, उनके सम्बन्ध में पूरी जानकारी होना हमारे लिए बहुत कठिन
है लेकिन फिर भी जेल की चारदीवारी में से जो थोड़ी-बहुत सूचनाएँ हमें मिल
सकती हैं वे हमें वस्तुस्थिति से परिचित कराने के लिए पर्याप्त हैं। ऐसे ही कुछ
उदाहरण हम नीचे दे रहे हैं, जिनमें हम विचलित हुए बिना नहीं रह सके और जो
सरकारी आश्वासनों में मेल नहीं खाते -

  1. श्रीयुत ब.क. बनर्जी, जो दक्षिणेश्वर बम केस के सम्बन्ध में लाहौर सेण्ट्रल
    जेल में पाँच बरस की सज़ा भुगत रहे हैं, गत वर्ष आम भूख हड़ताल में शामिल
    हो गये। उनकी सज़ा के हिसाब से उनकी रिहाई पिछले दिसम्बर माह में हो जानी
    थी, लेकिन अब चार माह के लिए टाल दी गयी है। इस जेल में लाहौर साज़िश
    के सम्बन्ध में आजीवन बन्दी की सज़ा भुगत रहे सत्तर वर्षीय वृद्ध बाबा सोहन
    सिंह¹ को सज़ा दी गयी है। इसके अलावा अन्यों में से मियाँवाली जेल में बन्द
    सरदार काबल सिंह² और सरदार गोपाल सिंह³ को आम भूख हड़ताल में शामिल
    होने के कारण सज़ाएँ दी गयी हैं। इनमें से अनेक मामलों में कैद बढ़ा दी गयी है,
    जबकि कुछ स्पेशल क्लास से हटा दिये गये हैं।
  2. इसी अपराध में अर्थात आम भूख हड़ताल में शामिल होने के कारण आगरा
    सेण्ट्रल जेल में बन्द सर्वश्री शचीन्द्रनाथ सान्याल, रामकृष्ण खत्री, सुरेश चन्द्र
    भट्टाचार्य, रामकुमार सिन्हा, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त तथा काकोरी
    केस के अनेक बन्दियों को सख़्त सज़ाएँ दी गईं। विश्वस्त सूत्र से पता चला है कि
    श्री सान्याल को बेड़ियाँ डालकर एकान्त कोठरी में रखा गया है, जिसके कारण
    उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया है। उनका वज़न 18 पौण्ड कम हो गया है। मालूम हुआ
    कि श्री भट्टाचार्य तपेदिक के मरीज हैं। बरेली जेल के तीन बन्दियों को भी सज़ाएँ
    दी गयी हैं। उनकी समस्त सुविधाएँ वापस ले ली गयीं। यहाँ तक कि अपने
  3. बाबा सोहन सिंह भकना, (1867-1968), ग़दर पार्टी के पहले अध्यक्ष
  4. काबल सिंह गोविन्दपुरी
  5. गोपाल सिंह क़ौमी
    366 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सम्बन्धियों से मुलाक़ात एवं पत्र-व्यवहार करने जैसे आम अधिकार भी छीन लिये
गये हैं। उनके वज़न काफ़ी कम हो गये हैं। इस सम्बन्ध में पण्डित जवाहरलाल
ने सितम्बर, 1929 और जनवरी, 1930 में दो प्रेस वक्तव्य दिये थे।
3. भूख हड़ताल के सम्बन्ध में अखिल भारतीय कांग्रेस का प्रस्ताव, स्वीकृत
होने के पश्चात, तार द्वारा अलग-अलग राजनीतिक बन्दियों को भेजा गया। इनकी
कापियाँ जेल-अधिकारियों ने रोक लीं। फिर इस सम्बन्ध में सरकार ने बन्दियों से
मुलाक़ात के लिए कांग्रेस प्रतिनिधि मण्डल को इजाज़त नहीं दी।
4. पुलिस के उच्च अधिकारियों के आदेशानुसार 23 एवं 24 अक्टूबर, 1929
को लाहौर साज़िश केस के मुलज़िम बन्दियों पर वहशियाना हमला किया गया।
विवरण समाचारपत्रों में प्रकाशित हुए हैं। स्पेशल मजिस्ट्रेट पण्डित श्रीकृष्ण ने
हममें से एक व्यक्ति का बयान दर्ज किया था। इस बयान की कापी आपको
16 दिसम्बर, 1929 को भेजी जा चुकी है। पर न तो पंजाब सरकार और न ही
भारत सरकार ने उत्तर देना या हमारी ओर से जाँच कराने की माँग को आवश्यक
समझा, जबकि दूसरी ओर से इसी घटना के सम्बन्ध में 'हिंसात्मक प्रतिशोध' लेने
के इरादे से स्थानीय सरकार ने हम पर मुक़दमा चलाने की बहुत आवश्यकता
महसूस की है।
5. दिसम्बर, 1929 के अन्तिम सप्ताह में लाहौर बोर्स्टल जेल में क़ैद बन्दी
श्री किरणचन्द्र दास तथा अन्य आठ को जब मजिस्ट्रेट की अदालत में लाकर पेश
किया गया तो उन्हें हथकड़ियों और ज़ंजीरों से जकड़ा हुआ था। यह पंजाब जेल
जाँच कमेटी और पंजाब की जेलों के इंस्पेक्टर जनरल के समझौते का सरासर
उल्लंघन था। यह ध्यान देने योग्य है कि ये जमानत योग्य जुर्म के तहत बन्दी थे।
इस सम्बन्ध में डॉक्टर मोहम्मद आलम, लाला दुनीचन्द लाहौर वाले और लाला
दुनीचन्द अम्बाला वाले के लम्बे बयान 'ट्रिब्यून' में प्रकाशित हुए हैं।
जब हमें राजनीतिक बन्दियों की समस्त यातनाओं का पता चला तो हमने भूख
हड़ताल पुनः प्रारम्भ करने से गुरेज किया। भले ही इस बात का हमें अत्यन्त दुख
था, लेकिन हमने सोचा कि समस्या जल्द ही तय हो जायेगी। लेकिन अब उपरोक्त
उदाहरणों की रोशनी में क्या हम यह मानें कि भूख हड़ताल की अनकही, भयंकर
यातनाएँ और यतीन्द्रनाथ दास की महान शहादत ऐसे ही चली गयी? क्या हम यही
मानें कि उभर रहे जन-आन्दोलन को रोकने और संकटमय दौर को टालने की
नीयत से ही सरकार ने हमें आश्वासन दिये थे? हम आशा करते हैं कि आप हमसे
असहमत नहीं होंगे कि हमने काफ़ी समय तक धैर्य से प्रतीक्षा की है। लेकिन हम
अनन्त काल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते। सरकार के अपने ढुलमुल व्यवहार एवं
राजनीतिक बन्दियों के साथ दुर्व्यवहार के चलते हमारे पास पुनः संघर्ष शुरू करने
के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया है। हम जानते हैं कि भूख हड़ताल आरम्भ
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 367

करना और उसे जारी रखना कोई सरल कार्य नहीं, लेकिन साथ ही हम बता देते
हैं कि भारत अन्य बहुत-से यतीन्द्र और रामरक्खा और भान सिंह पैदा कर सकता
है। (अन्तिम दोनों ने 1917 में अण्डमान द्वीपों में अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया
था। पहले ने 92 दिनों की भूख हड़ताल के बाद आख़िरी साँस ली और दूसरा छह
महीने तक चुपचाप अमानवीय अत्याचार सहते हुए महान नायक की मृत्यु को प्राप्त
हुआ।)
राजनीतिक बन्दियों से अच्छे व्यवहार के समर्थन में जनता में से लोगों ने तथा
हमने काफ़ी कुछ कहा है। इसे दोहराने की ज़रूरत नहीं है। वर्गीकरण के मामले
में सबसे अहम पक्ष और मूल मन्तव्य की स्थापना के बारे में हम कुछ शब्द कहना
चाहेंगे। वर्गीकरण के मापदण्ड के प्रश्न पर हंगामा हुआ है। अलग-अलग सरकारों
को सुझाये हुए मापदण्ड में से मूल मन्तव्य को बिल्कुल निकाल दिया गया है। यह
वास्तव में अजब व्यवहार है। मात्र मूल मन्तव्य से ही किसी भी कार्यवाही की सही
क़द्र का निर्णय किया जा सकता है। क्या हम यह समझें कि सरकार – एक ऐसे
हमलावर जो अपने शिकार का शोषण करते हुए उसे जान से मार डालता है और
एक खड्गबहादुर, जो एक बदमाश की हत्या करके नौजवान लड़की की इज़्ज़त
बचाता है और समाज को सबसे अधिक दुराचारी चापलूस से मुक्ति दिलाता है –
दोनों के बीच अन्तर करने में असमर्थ है? क्या दोनों को एक ही वर्ग का व्यक्ति
समझा जाये? क्या एक जैसा अपराध करने वाले दो व्यक्तियों में कोई अन्तर नहीं
जिनमें एक स्वार्थी है और दूसरा निस्वार्थ? इसी तरह क्या एक सामान्य हत्यारे और
एक राजनीतिक कार्यकर्ता में कोई अन्तर नहीं? भले ही राजनीतिक कार्यकर्ता हिंसा
भी अपना ले, उसकी यह निस्वार्थता क्या उसे शेष अपराधियों से ऊँचा नहीं कर
देती? ऐसी स्थितियों में हमारी मान्यता है कि वर्गीकरण के मापदण्ड में मन्तव्य को
सबसे मुख्य पक्ष की तरह लिया जाना चाहिए।
गत वर्ष हमारी भूख हड़ताल आरम्भ होने पर जब इसी बात पर विचार के लिए
अनेक जन-नेता – जिनमें डॉ. गोपीचन्द्र और लाला दुनीचन्द अम्बाला वाले भी थे,
जिन्होंने पंजाब जेल में जाँच कमेटी की सिफ़ारिशों पर हस्ताक्षर किये हैं – हमारे
पास आये और जब उन्होंने बताया कि आतंकवादी अपराध के बन्दियों में से सज़ा
पाये राजनीतिक बन्दियों को सरकार विशेष वर्ग के बन्दी मानने पर विचार कर रही
है, तब वास्तव में हत्या के अपराधियों को बाहर रखने वाली हद तक की सिफ़ारिश
को समझौते के तौर पर मान लिया गया, लेकिन बाद में बहस के दौरान दूसरा ही
रवैया अपना लिया गया और पंजाब जेल जाँच कमेटी के लिए हवाले की शर्तों
वाला संयुक्त बयान इस तरह लिखा गया, जिससे प्रतीत होता था कि मूल मन्तव्य
का प्रश्न बिल्कुल ही अलग कर दिया गया है और समूचा वर्गीकरण दो चीज़ों पर
आधारित था –
368 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

  1. अपराध का ढंग, और
  2. अपराधी का सामाजिक स्तर।
    इस मापदण्ड ने समस्या के निदान के बजाय उसे पेचीदा बना दिया।
    अहिंसात्मक और हिंसात्मक अपराधों वाले राजनीतिक बन्दियों में दो वर्गों
    वाली बात हम समझ सकते थे। लेकिन पंजाब जेल जाँच कमेटी की सिफ़ारिशों
    में सामाजिक स्तर का प्रश्न आ जाता है। जिस प्रकार चौधरी अफ़ज़ल हक़ ने रिपोर्ट
    से असहमति की टिप्पणी में ठीक ही कहा है कि स्वतन्त्रता के कार्य में जुटे रहने
    के कारण कंगाल हो गये राजनीतिक कार्यकर्ताओं का क्या होगा? क्या उन्हें किसी
    न्यायाधीश की दया पर छोड़ दिया जाये, जो प्रत्येक को साधारण अपराधी कहकर
    अपनी वफ़ादारी सिद्ध करने की कोशिश करता रहेगा। या यह आशा की जाये कि
    एक असहयोगी जेल से अच्छे व्यवहार की प्रार्थना करते हुए उन लोगों के आगे हाथ
    फैलायेगा, जिनके विरुद्ध वह जूझ रहा है? क्या यह ढंग इस बेचैनी के कारण को
    दूर करने का है या बढ़ाने का? तर्क दिया जा सकता है कि जेलों के बाहर दरिद्रता
    में जीते लोगों को जेलों में ऐशो-आराम की आशा नहीं रखनी चाहिए जहाँ कि उन्हें
    सज़ा के उद्देश्य से बन्दी बनाकर रखा गया है। पर वे कौन-से सुधार हैं जिनकी
    ऐश के लिए आवश्यकता होती है? क्या वे मात्र साधारण जीवन-स्तर की
    आवश्यकताएँ नहीं हैं? माँगी जाने वाली समस्त सुविधाओं के बावजूद जेल सदा
    जेल ही रहेगी। बाहर के लोगों को आकर्षित करने के लिए (जेल) कोई चुम्बकीय
    शक्ति नहीं होती और न ही कभी हो सकती है। केवल जेल आने के लिए कोई
    भी अपराध नहीं करता। हम यह कहने का साहस रखते हैं कि किसी भी सरकार
    का यह बहुत घटिया तर्क होगा कि नागरिकों को इस दर्जे तक मोहताजगी हो गयी
    है, और उनके रहने का स्तर जेल के स्तर की अपेक्षा घटिया हो गया है। क्या ऐसे
    तर्क में सरकार के अस्तित्व की कोई सम्भावना शेष रह जाती है? खैर, इस समय
    हमें इन बातों से कोई सरोकार नहीं है। हम कहना चाहते हैं कि बेचैनी को दूर करने
    का सबसे बेहतर ढंग यह है कि राजनीतिक बन्दियों को भिन्न वर्ग में रखा जाये।
    बाद में अगर आवश्यकता महसूस हो तो इसको पुनः दो वर्गों – एक, जो अहिंसक
    अपराधों में सज़ायाफ़्ता हैं और दूसरे, जो हिंसक अपराधों में सज़ायाफ़्ता हैं – में बाँटा
    जा सकता है। इस स्थिति में मन्तव्य निर्णयात्मक पहलू बन जायेगा। यह कहना कि
    राजनीतिक मामलों में मन्तव्य का फ़ैसला नहीं किया जा सकता, एक झूठा दावा
    है। वह कौन-सी चीज़ है जो आज जेल-अधिकारियों से जेलों में 'राजनीतिकों' को
    साधारण सुविधाओं से वंचित करने के लिए कहती है? वह कौन-सी चीज़ है जो
    उनकी नम्बरदारियाँ छीनती है? वह कौन-सी चीज़ है जो अधिकारियों से यह
    कहती है कि उन्हें शेष बन्दियों से अलग रखा जाये? यही चीज़ वर्गीकरण में भी
    मदद कर सकती है।
    जेल की सलाखों के पीछे से / 369

जहाँ तक विशेष माँगों का सम्बन्ध है, हम पहले ही पंजाब जेल जाँच कमेटी
से अपने स्मरण-पत्र में पूरी तरह कह चुके हैं। फिर भी हम इस बात पर ज़ोर देना
चाहते हैं कि किसी भी राजनीतिक बन्दी का चाहे जो अपराध हो, उसे सख़्त और
सम्मान-विरोधी मशक़्क़त नहीं मिलनी चाहिए। एक जेल में ऐसे सभी बन्दियों को
एक ही वार्ड में साथ-साथ रखना चाहिए और स्थानीय भाषा या अंग्रेज़ी का कम
से कम एक समाचारपत्र उन्हें दिया जाना चाहिए। अध्ययन के लिए सभी आवश्यक
सुविधाएँ दी जानी चाहिए और व्यक्तिगत साधनों से भोजन और कपड़े पर ख़र्च
बढ़ाने की इजाज़त दी जानी चाहिए।
हम अभी भी आशान्वित हैं कि सरकार हमें और जनता को दिये गये आश्वासन
को अविलम्ब कार्यरूप में लायेगी, ताकि भूख हड़ताल का फिर अवसर न आये।
आगामी सात दिनों में यदि सरकार ने अपना आश्वासन पूरा न किया तो हम पुनः
भूख हड़ताल करने के लिए बाध्य होंगे।
आपके,
भगतसिंह, दत्त और अन्य क़ैदी
लाहौर षड्यन्त्र केस।
370 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

स्पेशल मजिस्ट्रेट, लाहौर के नाम
द्वारा, सुपरिटेण्डेण्ट, सेन्ट्रल जेल, लाहौर
11 फ़रवरी, 1930
मिस्टर मजिस्ट्रेट,
4 फ़रवरी, 1930 के सिविल एण्ड मिलिट्री गजट में प्रकाशित आपके बयान
के सम्बन्ध में यह ज़रूरी जान पड़ता है कि हम अपने अदालत में न आने के कारणों
से आपको परिचित करवायें, ताकि कोई ग़लतफ़हमी और ग़लत-प्रस्तुति सम्भव न
हो।
पहले हम यह कहना चाहेंगे कि हमने अभी तक ब्रिटिश अदालतों का बायकाट
नहीं किया है। हम मि. लुइस की अदालत में जा रहे हैं, जो हमारे विरुद्ध जेल एक्ट
धारा 22 के अधीन मुक़दमे की सुनवाई कर रहे हैं। यह घटना 29 जनवरी को
आपकी अदालत में घटित हुई थी। लाहौर षड्यन्त्र केस के सम्बन्ध में यह क़दम
उठाने के लिए हमें विशेष परिस्थितियों ने मजबूर किया है। हम शुरू से ही महसूस
करते रहे हैं कि अदालत के ग़लत रवैये द्वारा या जेल के अथवा अन्य अधिकारियों
द्वारा हमारे अधिकारों की सीमा लाँघकर हमें निरन्तर जान-बूझकर परेशान किया जा
रहा है ताकि हमारी पैरवी में बाधाएँ डाली जा सकें। कुछ दिन पहले जमानत की
दरख़्वास्त में हमने अपनी तकलीफ़ें आपके सामने रखी थीं, लेकिन उस दरख़्वास्त
को कुछ क़ानूनी नुक्तों पर नामंजूर करते हुए आपने बन्दियों की तकलीफ़ों का ज़िक्र
करना ज़रूरी नहीं समझा, जिनके आधार पर जमानत की दरख़्वास्त दी गयी थी।
हम महसूस करते हैं कि मजिस्ट्रेट का पहला व मुख्य फ़र्ज़ यह होता है कि
उसका व्यवहार निष्पक्ष व दोनों पक्षों के ऊपर उठा होना चाहिए। यहाँ तक कि उस
दिन माननीय जस्टिस कोर्ट ने यह रूलिंग दी थी कि मजिस्ट्रेट को दूसरी सबसे
महत्त्वपूर्ण बात अपने सामने रखनी चाहिए कि विचाराधीन क़ैदी को अपनी पैरवी
के सम्बन्ध में किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े और यदि कोई मुश्किल
हो तो उसे दूर करना चाहिए, अन्यथा पूरा मुक़दमा एक मज़ाक़ बनकर रह जाता
है। लेकिन ऐसे महत्त्वपूर्ण मुक़दमे में मजिस्ट्रेट का व्यवहार इससे उल्टा रहा है,
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 371

जिसमें 18 नवयुवकों पर गम्भीर आरोपों जैसे हत्या, डकैती और षड्यन्त्र - के
अधीन मुक़दमा चलाया जा रहा है, जिनसे सम्भव है उन्हें मृत्युदण्ड दिया जाये।
जिन प्रमुख मुद्दों पर हम आपकी अदालत में न आने के लिए विवश हुए हैं, वे इस
तरह हैं -
विचाराधीन क़ैदियों में से अधिकांश दूर-दराज प्रान्तों से हैं और सभी मध्य
वर्गीय लोग हैं। ऐसी स्थिति में उनके सम्बन्धियों द्वारा उनकी पैरवी के लिए
बार-बार आना न सिर्फ़ बहुत मुश्किल है, बल्कि बिल्कुल असम्भव है। वे अपने
कुछ दोस्तों से मुलाक़ात करना चाहते थे, जिन्हें वे अपनी पैरवी की सभी
ज़िम्मेदारियाँ सौंप सकते थे। साधारण बुद्धि का भी यही तक़ाज़ा है कि उन्हें
मुलाक़ात करने का हक़ हासिल है, इस मक़सद के लिए बार-बार प्रार्थना की
गयी, लेकिन सभी प्रार्थनाएँ अनसुनी रहीं।
श्री बी.के. दत्त बंगाल के रहने वाले हैं और श्री कमलनाथ तिवारी बिहार के।
दोनों अपनी-अपनी मित्र कुमारी लज्जावती व श्रीमती पार्वती से भेंट करना चाहते
थे। लेकिन अदालत ने उनकी दरख़्वास्त जेल-अधिकारियों को भेज दी और उन्होंने
यह कहकर दरख़्वास्त रद्द कर दी कि मुलाक़ात सिर्फ़ सम्बन्धियों व वकीलों से
ही हो सकती है। यह मामला बार-बार आपके ध्यान में लाया गया, लेकिन ऐसा
कोई क़दम नहीं उठाया गया, जिससे बन्दी पैरवी के लिए आवश्यक प्रबन्ध कर
सकते। बाद में उन्हें इनका वकालतनामा हासिल करने पर भी मुलाक़ात करने की
आज्ञा नहीं दी गयी और यहाँ तक कि मजिस्ट्रेट ने जेल-अधिकारियों को यह
लिखने से भी इन्कार कर दिया कि बन्दी उसकी ओर से चलाये जा रहे मुक़दमे
की पैरवी के सम्बन्ध में इन मुलाक़ातों की माँग कर रहे थे और इस प्रकार बन्दी
ऊपर की अदालत में जाने योग्य नहीं रहे। लेकिन मुक़दमे की सुनवाई जारी रही।
इन परिस्थितियों में बन्दी बिल्कुल विवश थे और उनके लिए मुक़दमा मज़ाक़ से
अधिक कुछ नहीं था। यह बात नोट करने योग्य है कि दूसरे बन्दियों में भी
अधिकांश की ओर से कोई वकील पेश नहीं हो रहा था।
मेरा कोई वकील नहीं है और न ही मैं पूरे समय के लिए किसी को वकील
रख सकता हूँ। मैं कुछ नुकतों सम्बन्धी क़ानूनी परामर्श चाहता हूँ और एक विशेष
पड़ाव पर मैं चाहता था कि वे (वकील) कार्रवाई को स्वयं देखें, ताकि अपनी
राय बनाने के लिए वे बेहतर स्थिति में हों, लेकिन उन्हें अदालत में बैठने तक की
जगह नहीं दी गयी। हमारी पैरवी रोकने के लिए, हमें परेशान करने के लिए क्या
सम्बन्धित अधिकारियों की यह सोची-समझी चाल नहीं थी? वकील अपने सायलों
(प्रार्थियों) के हितों को देखने के लिए अदालत में आता है, जो न तो स्वयं
उपस्थित होते हैं और न उनका कोई प्रतिनिधि वहाँ होता है। इस मुक़दमे की ऐसी
कौन-सी विशेष परिस्थितियाँ हैं, जिससे मजिस्ट्रेट वकीलों के प्रति ऐसा सख़्त रवैया
372 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

अपनाने पर मजबूर हुए? इस प्रकार हर उस वकील की हिम्मत तोड़ी गयी जो
बन्दियों को मदद के लिए बुलाये जा सकते थे। श्री अमरदास को पैरवी (डिफ़ेंस)
की कुर्सी पर बैठने की इजाज़त देने की क्या तुक थी, जबकि वे किसी भी पक्ष
का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे और न ही उन्होंने किसी को क़ानूनी परामर्श दिया।
अपने मुख़्तारों से मुलाक़ातों के सम्बन्ध में मुझे क़ानूनी सलाहकार से विचार-विमर्श
करना था और इसी नुक्ते को लेकर हाईकोर्ट जाने के लिए उनसे कहना था। लेकिन
उनके साथ इस सम्बन्ध में बात करने का मुझे कोई अवसर ही नहीं मिला और
कुछ न हो सका। इस सबका क्या मतलब है? यह दिखाकर कि मुक़दमा क़ानून
के अनुसार चलाया जा रहा है, क्या लोगों की आँखों में धूल नहीं झोंकी जा रही?
अपने बचाव का इन्तज़ाम करने के लिए बन्दियों को क़तई कोई अवसर नहीं दिया
गया। इस बात के ख़िलाफ़ हम रोष प्रकट करते हैं। यदि सबकुछ उचित ढंग से
नहीं किया जाता तो इस तमाशे की कोई ज़रूरत नहीं है। न्याय के नाम पर हम
अन्याय होता नहीं देख सकते। इन परिस्थितियों में हम सभी ने सोचा कि या तो
हमें अपनी ज़िन्दगी बचाने का उचित अवसर मिलना चाहिए, और या हमें हमारी
अनुपस्थिति में चले मुक़दमे में हमारे ख़िलाफ़ दी सज़ाओं को भुगतने के लिए तैयार
रहना चाहिए।
तीसरी बड़ी शिकायत अख़बारों के बाँटने सम्बन्धी है। विचाराधीन क़ैदियों को
कभी भी दण्ड प्राप्त कैदी नहीं माना जाना चाहिए और यह रोक उन पर तभी
लगायी जा सकती जब उनकी सुरक्षा के लिए बेहद ज़रूरी हो। इससे अधिक इसे
उचित नहीं माना जा सकता। जमानत पर रिहा न हो सकने वाले बन्दी को कभी
भी दण्ड के तौर पर कष्ट नहीं देने चाहिए। सो प्रत्येक शिक्षित विचाराधीन क़ैदी
को कम से कम एक अख़बार लेने का अधिकार है। अदालत में 'एक्ज़ीक्यूटिव'
कुछ सिद्धान्तों पर हमें हर रोज़ एक अंग्रेज़ी अख़बार देने के लिए सहमत हुई थी।
लेकिन अधूरी चीजें न होने से भी बुरी होती हैं। अंग्रेज़ी न जानने वाले बन्दियों के
लिए स्थानीय अख़बार देने के अनुरोध व्यर्थ सिद्ध हुए। अतः स्थानीय अख़बार न
देने के आदेश के विरुद्ध रोष प्रकट करते हुए हम दैनिक ट्रिब्यून लौटाते रहे हैं।
इन तीन आधारों पर हमने 29 जनवरी को अदालत में आने से इन्कार करने
की घोषणा की थी। ज्यों ही ये मुश्किलें दूर कर दी जायेंगी, हम बाखुशी अदालत
में आयेंगे।
भगतसिंह व अन्य
('हिन्दुस्तान टाइम्स' में 13 फ़रवरी, 1930 को प्रकाशित)
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 373

हिन्दुस्तानी एसोसिएशन, बर्लिन के नाम तार
कृपया भारत में समाजवादी क्रान्तिकारी आन्दोलन के झण्डा-बरदारों में से एक
कामरेड कृष्ण वर्मा के देहान्त पर हमारा हार्दिक शोक अपने साथियों तक पहुँचायें।
उनका जीवन भारतीय मुक्ति के लम्बे संघर्ष के आदर्श में एक राष्ट्रीय सम्पत्ति
है, जो आज़ादी की लड़ाई के कार्यकर्ताओं को हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।
विचाराधीन कैदी,
5 अप्रैल, 1930 लाहौर षड्यन्त्र केस
(‘ट्रिब्यून’, लाहौर 8 अप्रैल, 1930 में प्रकाशित)
374 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

काकोरी केस के बन्दियों के नाम तार
द्वारा, स्पेशल मजिस्ट्रेट, लाहौर
5 अप्रैल, 1930
कृपया निम्न तार तुरन्त काकोरी-क़ैदियों को भेज दें, जो बरेली जेल में भूख
हड़ताल पर हैं और जिनके बारे में कहा जाता है कि वे गम्भीर हालत में हैं।
आपके भगतसिंह, बी. के. दत्त
तार
गुप्त, बख्शी, सिन्हा, मुकन्दीलाल
काकोरी-क़ैदी,
सेण्ट्रल जेल,
बरेली।
आपकी नाजुक हालत के बारे में जानकर बहुत दुख है। हमारा पहला तार आप
तक नहीं पहुँचा। हम आपसे हार्दिक निवेदन करते हैं कि सरकार की ओर से
बन्दियों के वर्गीकरण के अन्तिम नोटिस को ध्यान में रखते हुए आप अपना संघर्ष
त्याग दें। जहाँ तक नये नियमों के लागू होने का प्रश्न है, हमें एक साथ इन्तज़ार
करना चाहिए।
भगतसिंह और दत्त
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 375

गवाहियों की अपेक्षा रसगुल्ले ज़्यादा ज़रूरी
आज अदालत में भगतसिंह ने शिकायत की है कि जब बचाव समिति के एक
सदस्य दोपहर में भोजन के लिए कुछ वस्तुएँ ला रहे थे तब खाने योग्य वस्तुएँ
अदालत में नहीं लाने दी गयीं।
दोपहर में भोजन के बाद कथित अपराधी जतिन सान्याल ने मजिस्ट्रेट से
शिकायत की कि उनके लिए बंगाल से रसगुल्ले का पार्सल आया था, लेकिन
जेल-अधिकारियों ने वह इस तरह कुचल डाला कि वे खाने योग्य न रहे।
सरदार भगतसिंह (मजिस्ट्रेट से) : रसगुल्ले बाहर पड़े हैं। क्या आप उनका
मुआयना करने का कष्ट करेंगे। आहा! एक ख़ूबसूरत दृश्य है! बस ज़रा अवलोकन
कर लें! इन गवाहियों की अपेक्षा रसगुल्ले हमारे लिए ज़्यादा ज़रूरी हैं।
जतिन सान्याल : सभी चीजें बहुत बेहूदा हाल में हैं। क्या आप इसे तर्कसंगत
कहते हैं?
सरदार भगतसिंह : यह (मजिस्ट्रेट) बिल्कुल तर्कविहीन हैं।
जतिन सान्याल : यह हम किसे वापस करें, आपको या जेल-अधिकारियों
को?
मजिस्ट्रेट : जेल-अधिकारियों को।
सरदार भगतसिंह : लेकिन इसकी क़ीमत कौन देगा? हमारे दोस्त ने काफ़ी
रकम ख़र्च की है इस पर।
मजिस्ट्रेट : यह बात जेल-अधिकारियों के साथ सम्बन्ध रखती है।
(‘ट्रिब्यून’, लाहौर, 9 अप्रैल 1930 में प्रकाशित)
376 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना पर
भगतसिंह और उनके साथी मुक़दमे के परिणाम से पूरी तरह परिचित थे और
मिलने वाली सज़ाओं की ओर से बिल्कुल बेपरवाह। वे अपने विचार जनता तक ले
जाने और लोगों को ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी के लिए तैयार करना चाहते थे, इसलिए
यह भी इच्छा रखते थे कि मुक़दमे की कार्रवाई धीमी गति से आगे बढ़े, ताकि जनता
तक उनके विचार पहुँच सकें। लेकिन सरकार खीझ रही थी। आख़िर 1 मई, 1930
को एक विशेष अध्यादेश द्वारा एक विशेष ट्रिब्यूनल स्थापित किया गया। उस
अध्यादेश के बारे में बताये गये सरकारी बहाने का उत्तर भगतसिंह ने 2 मई, 1930
को प्रस्तुत निम्नलिखित दस्तावेज़ में दिया। – स.
गवर्नर जनरल, भारत, शिमला (पंजाब)
श्रीमान,
हमारे मुक़दमे को जल्द निबटाने के लिए जारी किये आर्डिनेंस की पूरी कॉपी
पढ़कर सुनायी जा चुकी है। इसके लिए पंजाब हाईकोर्ट के अधिकार-क्षेत्र में एक
ट्रिब्यूनल की नियुक्ति की गयी है। अगर इस सम्बन्ध में अपनाये गये व्यवहार का
उल्लेख न किया होता और इसकी सारी जवाबदेही हमारे सिर पर न मढ़ी होती तो
हम शायद अपनी ज़ुबान बन्द रखते, परन्तु वर्तमान स्थितियों में इसके सम्बन्ध में
हम अपना बयान देना आवश्यक समझते हैं।
हम आरम्भ से ही जानते हैं कि सरकार जान-बूझकर हमारे बारे में ग़लतफ़हमी
पैदा कर रही है। आख़िरकार यह एक लड़ाई है और हम भली प्रकार जानते हैं कि
अपने दुश्मनों का मुक़ाबला करने के लिए ग़लतफ़हमियों का जाल बनाना सरकार
का सबसे बड़ा हथकण्डा है। इस घृणित कार्य को रोकने का हमारे पास कोई साधन
नहीं, लेकिन कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए हम कुछ कहने के लिए
मजबूर हैं।
आपने लाहौर साज़िश केस के बारे में जारी अध्यादेश में हमारी भूख हड़ताल
के बारे में अपना स्पष्टीकरण शामिल किया है। आपने स्वयं स्वीकारा है कि हममें
से दो ने इस मुक़दमे के सम्बन्ध में स्पेशल मजिस्ट्रेट पण्डित श्रीकृष्ण की अदालत
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 377

में होने वाली जाँच-पड़ताल होने से पहले भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। सामान्य
समझ वाले साधारण व्यक्ति की समझ में भी यह बात आ सकती है कि इस
मुक़दमे का भूख हड़ताल से कोई सम्बन्ध नहीं है। भूख हड़ताल आरम्भ करने के
कुछ विशेष कारण थे, इस स्थिति में सरकार को उन कारणों के बारे में स्पष्टीकरण
देना था जिसके आधार पर भूख हड़ताल की गयी थी। जब सरकार ने इस समस्या
को सुलझाने के लिए कुछ प्रबन्ध करने की स्वीकृति दी और जेल जाँच कमेटी
स्थापित की तब हमने भूख हड़ताल समाप्त की थी। लेकिन सबसे पहले हमें यह
बताया गया था कि यह समस्या नवम्बर तक सुलझा दी जायेगी लेकिन उसमें
दिसम्बर तक विलम्ब किया गया। जनवरी भी बीत गयी लेकिन इस बात का कोई
संकेत नहीं मिल रहा कि सरकार वास्तव में इस सम्बन्ध में कुछ करेगी भी या
नहीं। हमें लगा कि मामला समाप्त कर दिया गया है। इन स्थितियों में हमने पूरे एक
हफ़्ते का नोटिस देकर 4 फ़रवरी, 1930 से पुनः भूख हडताल आरम्भ कर दी।
इसके बाद ही सरकार ने इस समस्या को अन्तिम रूप से हल करने के लिए कुछ
क़दम उठाये।
इस आशय का एक विज्ञापन फिर सरकार ने समाचारपत्रों में जारी किया। तब
हमने भूख हड़ताल समाप्त कर दी। यहाँ तक कि हमने इस बात का इन्तज़ार भी
नहीं किया कि सरकार अपने अन्तिम निर्णय लागू करती भी है या नहीं? लेकिन
आज ही हमने यह महसूस किया है कि अंग्रेज़ सरकार ऐसे साधारण मामलों में भी
झूठ और फ़रेब का सहारा लेने से बाज़ नहीं आयी। वह विज्ञापन ख़ास निश्चित और
निर्णय निकालने वाले आधार पर निर्धारित थे, लेकिन हमने देखा कि उस पर भी
विपरीत अमल किया गया। जो भी हो, इस विषय पर बहस करने का यह उचित
अवसर नहीं। अगर यह मामला पुनः कभी उठा तो हम इसका अवश्य निर्णय करेंगे।
लेकिन हम पुरज़ोर कहना चाहते हैं कि भूख हड़ताल का उद्देश्य इसतगासा की
कार्यवाही के विरुद्ध कोई क़दम नहीं था, ऐसे साधारण कारणों से हमने इतनी
यातनाएँ नहीं सही थीं। यतीन्द्रनाथ दास ने इतने सामान्य कारण के लिए अपने
जीवन का बलिदान नहीं दिया, राजगुरु और सुखदेव ने भी इस बचाव के लिए ही
अपने जीवन संकट में नहीं डाले थे।
आप स्वयं हमारे मुक़दमे के सन्दर्भ में यह अच्छी तरह जानते थे कि अध्यादेश
जारी करने की वजह भूख हड़ताल नहीं थी। लेकिन असल कारण तो कुछ और
हैं जिनके बारे में सोचकर आपकी सरकार के होश-हवास गुम हो गये। न तो वे
इस मुक़दमे में विलम्ब के कारण हुए और न ही कोई ऐसी संकटमय स्थिति पैदा
हुई, जिसके कारण इस बेक़ानून के क़ानून के ऊपर हस्ताक्षर किये। ज़रूर ही इसके
पीछे कुछ और है।
लेकिन हम यह बता देना चाहते हैं कि उन अध्यादेशों से हमारी भावनाओं को
378 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

कुचला नहीं जा सकता। भले ही आप कुछ इन्सानों को कुचल देने में सफलता
हासिल कर लें, लेकिन याद रहे, आप इस राष्ट्र को नहीं कुचल सकते। जहाँ तक
इस अध्यादेश का सन्दर्भ है, हम इसे अपनी शानदार सफलता मानते हैं। हम आरम्भ
से ही यह बताने का प्रयास करते रहे हैं कि आपका यह क़ानून एक खूबसूरत फ़रेब
है। यह न्याय नहीं दे सकता। लेकिन अफ़सोस है कि जेल में जो सुविधाएँ क़ानूनन
और इंसाफ़ करके अपराधियों को मिलती हैं और साधारण बन्दियों को भी दी जाती
हैं, वे सुविधाएँ भी हम राजनीतिक बन्दियों को नहीं दी जातीं। हम चाहते थे कि
सरकार पर्दे से बाहर आये और स्पष्ट कहे कि राजनीतिक बन्दियों को बचाव का
कोई अवसर नहीं दिया जा सकता।
हमें लगता है कि सरकार ने यही बात स्पष्ट रूप से स्वीकारी है। हम
आपको और आपकी सरकार को इस साफ़गोई के लिए धन्यवाद देते हैं और
अध्यादेश का स्वागत करते हैं।
आपके प्रतिनिधि स्पेशल मजिस्ट्रेट और इस्तगासा के सरकारी वकील द्वारा
लगातार हमारे उचित व्यवहार को साफ़-साफ़ स्वीकारने के बावजूद सिर्फ़ हमारे
मुक़दमे के वजूद के बारे में सोचते ही आपके मस्तिष्क में भयंकर खलबली मची
हुई है। हमारे इस संघर्ष की शानदार सफलता का इससे बढ़कर भरोसा और क्या
हो सकता है?
आपके आदि-आदि
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 379

अदालत एक ढकोसला है
छह साथियों का एलान
कमिश्नर,
विशेष ट्रिब्यूनल,
लाहौर साज़िश केस, लाहौर
जनाब,
अपने छह साथियों की ओर से, जिनमें कि मैं भी शामिल हूँ, निम्नलिखित
स्पष्टीकरण इस सुनवाई के शुरू में ही देना आवश्यक है। हम चाहते हैं कि यह
दर्ज किया जाये।
हम मुक़दमे की कार्यवाही में किसी भी प्रकार भाग नहीं लेना चाहते, क्योंकि
हम इस सरकार को न तो न्याय पर आधारित समझते हैं और न ही क़ानूनी तौर
पर स्थापित। हम अपने विश्वास से यह घोषणा करते हैं कि “समस्त शक्ति का
आधार मनुष्य है। कोई व्यक्ति या सरकार किसी भी ऐसी शक्ति की हक़दार नहीं
है जो जनता ने उसको न दी हो।” क्योंकि यह सरकार इन सिद्धान्तों के विपरीत
है इसलिए इसका अस्तित्व ही उचित नहीं है। ऐसी सरकारें जो राष्ट्रों को लूटने के
लिए एकजुट हो जाती हैं उनमें तलवार की शक्ति के अलावा कोई आधार क़ायम
रहने के लिए नहीं होता। इसीलिए वे वहशी ताक़त के साथ मुक्ति और आज़ादी
के विचार और लोगों की उचित इच्छाओं को कुचलती हैं।
हमारा विश्वास है कि ऐसी सरकारें, विशेषकर अंग्रेज़ी सरकार जो असहाय और
असहमत भारतीय राष्ट्र पर थोपी गयी है, गुण्डों, डाकुओं का गिरोह और लुटेरों का
टोला है जिसने क़त्लेआम करने और लोगों को विस्थापित करने के लिए सब प्रकार
की शक्तियाँ जुटायी हुई हैं। शान्ति-व्यवस्था के नाम पर यह अपने विरोधियों या
रहस्य खोलने वाले को कुचल देती है।
हमारा यह भी विश्वास है कि साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी की साज़िश
के अलावा कुछ नहीं। साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों मनुष्य के और राष्ट्र के हाथों
380 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

राष्ट्र के शोषण का चरम है। साम्राज्यवादी अपने हितों, और लूटने की योजनाओं को
पूरा करने के लिए न सिर्फ़ न्यायालयों एवं क़ानून को क़त्ल करते हैं, बल्कि
भयंकर हत्याकाण्ड भी आयोजित करते हैं। अपने शोषण को पूरा करने के लिए जंग
जैसे ख़ौफ़नाक अपराध भी करते हैं। जहाँ कहीं लोग उनकी नादिरशाही शोषणकारी
माँगों को स्वीकार न करें या चुपचाप उनकी ध्वस्त कर देने वाली और घृणा योग्य
साज़िशों को मानने से इन्कार कर दें तो वह निरपराधियों का खून बहाने से संकोच
नहीं करते। शान्ति-व्यवस्था की आड़ में वे शान्ति-व्यवस्था भंग करते हैं। भगदड़
मचाते हुए लोगों की हत्या, अर्थात हर सम्भव दमन करते हैं।
हम मानते हैं कि स्वतन्त्रता प्रत्येक मनुष्य का अमिट अधिकार है। हर मनुष्य
को अपने श्रम का फल पाने जैसा सभी प्रकार का अधिकार है और प्रत्येक राष्ट्र
अपने मूलभूत प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण स्वामी है। अगर कोई सरकार जनता
को उसके इन मूलभूत अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का केवल यह
अधिकार ही नहीं बल्कि आवश्यक कर्त्तव्य भी बन जाता है कि ऐसी सरकार को
समाप्त कर दे। क्योंकि ब्रिटिश सरकार इन सिद्धान्तों, जिनके लिए हम लड़ रहे
हैं, के बिल्कुल विपरीत है, इसलिए हमारा दृढ़ विश्वास है कि जिस भी ढंग से
देश में क्रान्ति लायी जा सके और इस सरकार का पूरी तरह ख़ात्मा किया जा
सके, इसके लिए हर प्रयास और अपनाये गये सभी ढंग नैतिक स्तर पर उचित
हैं। हम वर्तमान ढाँचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में क्रान्तिकारी
परिवर्तन लाने के पक्ष में हैं। हम वर्तमान समाज को पूरे तौर पर एक नये सुगठित
समाज में बदलना चाहते हैं। इस तरह मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असम्भव
बनाकर सभी के लिए सब क्षेत्रों में पूरी स्वतन्त्रता विश्वसनीय बनायी जाये। जब
तक सारा सामाजिक ढाँचा बदला नहीं जाता और उसके स्थान पर समाजवादी
समाज स्थापित नहीं होता, हम महसूस करते हैं कि सारी दुनिया एक तबाह कर
देने वाले प्रलय-संकट में है।
जहाँ तक शान्तिपूर्ण या अन्य तरीक़ों से क्रान्तिकारी आदर्शों की स्थापना का
सम्बन्ध है, हम घोषणा करते हैं कि इसका चुनाव तत्कालीन शासकों की मर्जी पर
निर्भर है। क्रान्तिकारी अपने मानवीय प्यार के गुणों के कारण मानवता के पुजारी
हैं। हम शाश्वत और वास्तविक शान्ति चाहते हैं, जिसका आधार न्याय और समानता
है। हम झूठी और दिखावटी शान्ति के समर्थक नहीं जो बुज़दिली से पैदा होती है
और भालों और बन्दूक़ों के सहारे जीवित रहती है।
क्रान्तिकारी अगर बम और पिस्तौल का सहारा लेता है तो यह उसकी चरम
आवश्यकता में से पैदा होता है और आख़िरी दाँव के तौर पर होता है। हमारा
विश्वास है कि अमन और क़ानून मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य अमन और
क़ानून के लिए।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 381

फ़्रांस के उच्च न्यायाधीश का यह कहना उचित है कि क़ानून की आन्तरिक
भावना स्वतन्त्रता समाप्त करना या प्रतिबन्ध लगाना नहीं, वरन स्वतन्त्रता को सुरक्षित
रखना और उसे आगे बढ़ाना है। सरकार को क़ानूनी शक्ति बनाये गये उन उचित
क़ानूनों से मिलेगी जो केवल सामूहिक हितों के लिए बनाये गये हैं, और जो जनता
की इच्छाओं पर आधारित हों, जिनके लिए यह बनाये गये हैं। इससे विधायकों समेत
कोई भी बाहर नहीं हो सकता।
क़ानून की पवित्रता तभी तक रखी जा सकती है जब तक वह जनता के दिल
यानी भावनाओं को प्रकट करता है। जब यह शोषणकारी समूह के हाथों में एक
पुर्ज़ा बन जाता है तब अपनी पवित्रता और महत्त्व खो बैठता है। न्याय प्रदान करने
के लिए मूल बात यह है कि हर तरह के लाभ या हित का ख़ात्मा होना चाहिए।
ज्यों ही क़ानून सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करना बन्द कर देता है त्यों ही
ज़ुल्म और अन्याय को बढ़ाने का हथियार बन जाता है। ऐसे क़ानूनों को जारी रखना
सामूहिक हितों पर विशेष हितों की दम्भपूर्ण ज़बरदस्ती के सिवाय कुछ नहीं है।
वर्तमान सरकार के क़ानून विदेशी शासन के हितों के लिए चलते हैं और हम
लोगों के हितों के विपरीत हैं। इसलिए इनकी हमारे ऊपर किसी भी प्रकार की
सदाचारिता लागू नहीं होती।
अतः हर भारतीय की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि इन क़ानूनों को चुनौती दे
और इनका उल्लंघन करे। अंग्रेज़ न्यायालय, जो शोषण के पुर्जे हैं, न्याय नहीं दे
सकते। विशेषकर राजनीतिक क्षेत्रों में, जहाँ सरकार और लोगों के हितों का टकराव
है। हम जानते हैं कि ये न्यायालय सिवाय न्याय के ढकोसले के और कुछ नहीं
हैं।
इन्हीं कारणों से हम इसमें भागीदारी करने से इन्कार करते हैं और इस मुक़दमे
की कार्यवाही में भाग नहीं लेंगे।
5-5-30
जज ने नोट किया – यह रिकॉर्ड में तो रखा जाये लेकिन इसकी कॉपी न दी
जाये, क्योंकि इसमें कुछ अनचाही बातें लिखी हैं।
382 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

विशेष ट्रिब्यूनल के पुनर्गठन पर
1 मई, 1930 को अध्यादेश द्वारा स्थापित विशेष ट्रिब्यूनल के सदस्य थे –
जस्टिस जे. कोल्डस्ट्रीम (अध्यक्ष), जस्टिस आग़ा हैदर व जस्टिस जी.सी. हिल्टन।
5 मई को कार्रवाई शुरू हुई। पुंज हाउस को अदालत बनाया गया। क्रान्तिकारी युवक
अदालत में क्रान्तिकारी गीत गाते और क्रान्तिकारी नारे लगाते आते। भगतसिंह ने माँग
की कि उन्हें 15 दिन का समय दिया जाये, ताकि वे ट्रिब्यूनल के गैर-क़ानूनी होने
सम्बन्धी तर्क पेश कर सकें। लेकिन यह माँग मानी नहीं गयी। 24 क्रान्तिकारियों के
नाम मुक़दमे के लिए लिये गये, जिनमें से 16 पर मुक़दमा चलाया गया। बाद में
बटुकेश्वर दत्त के ख़िलाफ़ केस वापिस ले लिया गया। जिन पर मुक़दमा शुरू किया
गया वे थे – सुखदेव, भगतसिंह, किशोरी लाल, देसराज, प्रेमदत्त, जयदेव कपूर, शिव
वर्मा, महावीर सिंह, यतीन्द्रनाथ दास, अजयकुमार घोष, यतीन्द्र सान्याल, विजयकुमार
सिन्हा, शिवराम राजगुरु, कुन्दनलाल व कमलनाथ तिवारी। भगतसिंह और उनके
साथियों ने वकील करने से इन्कार कर दिया। 12 मई, 1930 को भगतसिंह और
उनके साथियों को हथकड़ियों में अदालत में लाया गया। हथकड़ियाँ न खोलने के
विरोध में उन्होंने बस से उतरने से इन्कार कर दिया। ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष ने उन्हें
ज़बरदस्ती उतारने का आदेश दिया। भगतसिंह और उनके साथियों ने अदालत का
बायकाट कर दिया। यद्यपि उन लोगों की हथकड़ियाँ दोपहर के खाने के लिए खोली
गयीं, लेकिन खाने के बाद फिर लगाने का आदेश दे दिया गया, जिसका भगतसिंह
और उनके साथियों ने विरोध किया। अध्यक्ष ने भारतीयों को गाली देते हुए भगतसिंह
को लाठियों से पीटने का आदेश दिया।
अदालत में क्रान्तिकारियों, ख़ासकर भगतसिंह को संवाददाताओं और जनता के
सामने लाठियों और जूतों से मारा गया। भगतसिंह ने भारतीयों को गाली देने पर
आपत्ति करते हुए जस्टिस आग़ा हैदर के भारतीय होने पर सवाल किया और पूछा
कि ऐसी मानसिक स्थिति वाले जज न्याय कैसे करेंगे? जस्टिस आग़ा हैदर ने उस
दिन की कार्रवाई पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। इस घटना की दुनियाभर
में चर्चा हुई। सारे भारत में भगतसिंह-दिवस मनाया गया, जिसके फलस्वरूप जस्टिस
कोल्डस्ट्रीम को लम्बी छुट्टी पर जाना पड़ा और 21 जून को ट्रिब्यूनल नये सिरे से
गठित किया गया। अब जस्टिस जी.सी. हिल्टन को अध्यक्ष व जस्टिस जे.के. टैप और
जस्टिस अब्दुल कादिर को सदस्य बनाया गया।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 383

इस पर भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने निम्नलिखित पत्र में अपने विचार प्रकट
किये। – स.
कमिश्नर,
विशेष ट्रिब्यूनल
लाहौर षड्यन्त्र केस, लाहौर
श्रीमान जी,
जबकि ट्रिब्यूनल के दो न्यायाधीशों को हटा दिया गया है या वे हट गये
हैं और दो नये न्यायाधीश उनके स्थान पर नियुक्त कर दिये गये हैं, इसलिए
हम अपना स्पष्टीकरण दर्ज कराना आवश्यक समझते हैं, ताकि हम अपना पक्ष
स्पष्ट कर सकें और किसी भी प्रकार की शंकाएँ पैदा होने से बचा जा सके।
12 मई, 1930 को न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम ने जोकि अध्यक्ष भी हैं, एक
अदालती आदेश पास किया जिसके अन्तर्गत हमें अदालत में हथकड़ियाँ पहनाने
का आदेश दिया गया। इस आदेश का पालन कराने के लिए पुलिस को
बल-प्रयोग करने के लिए भी कहा गया।
इस अचानक और असाधारण आदेश का कारण जानने के लिए हमने इस
अदालत से निवेदन किया था, जिसे सुनने की आवश्यकता महसूस नहीं की
गयी। ऐसी स्थितियों में पुलिस हमें ज़बरन हथकड़ियाँ लगाकर वापिस जेल ले
आयी। अगले दिन तीन में से एक न्यायाधीश आगा़ हैदर ने अध्यक्ष के इस
आदेश से अपने को अलग कर लिया। उस दिन से हम न्यायालय में नहीं जा
रहे।
जिन शर्तों पर हम न्यायालय में आने को तैयार हैं, वे अगले दिन न्यायालय
के समक्ष रखी गयी थीं। शर्तें थीं कि या तो अध्यक्ष क्षमा माँगें या फिर उन्हें
बदल दिया जाये। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि उनकी जगह पर ऐसे
एक न्यायाधीश को बैठा दिया जाये जो उस आदेश में भागीदार था।
पाँच हफ़्ते तक तो अपराधियों की शिकायत को विचार-योग्य ही नहीं
समझा गया।
वर्तमान ट्रिब्यूनल के निर्माण में दोनों अध्यक्ष और दूसरे न्यायाधीश – जो
उनके साथ सहमत नहीं हुए थे – को बदलकर दो नये न्यायाधीश लगाये गये
हैं। इस तरह एक न्यायाधीश को जो उस आदेश में भागीदार था, क्योंकि
आदेश बहुमत के आधार पर दिया गया था, ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष बनाया गया
है। ऐसी स्थिति में हम पुरज़ोर यह कहना चाहते हैं कि न्यायाधीश कोल्डस्ट्रीम
से व्यक्तिगत स्तर पर हमारा कोई शिकवा नहीं था और न ही शिकायत थी।
384 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़