भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 383, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंविशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना पर
भगतसिंह और उनके साथी मुक़दमे के परिणाम से पूरी तरह परिचित थे और
मिलने वाली सज़ाओं की ओर से बिल्कुल बेपरवाह। वे अपने विचार जनता तक ले
जाने और लोगों को ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी के लिए तैयार करना चाहते थे, इसलिए
यह भी इच्छा रखते थे कि मुक़दमे की कार्रवाई धीमी गति से आगे बढ़े, ताकि जनता
तक उनके विचार पहुँच सकें। लेकिन सरकार खीझ रही थी। आख़िर 1 मई, 1930
को एक विशेष अध्यादेश द्वारा एक विशेष ट्रिब्यूनल स्थापित किया गया। उस
अध्यादेश के बारे में बताये गये सरकारी बहाने का उत्तर भगतसिंह ने 2 मई, 1930
को प्रस्तुत निम्नलिखित दस्तावेज़ में दिया। – स.
गवर्नर जनरल, भारत, शिमला (पंजाब)
श्रीमान,
हमारे मुक़दमे को जल्द निबटाने के लिए जारी किये आर्डिनेंस की पूरी कॉपी
पढ़कर सुनायी जा चुकी है। इसके लिए पंजाब हाईकोर्ट के अधिकार-क्षेत्र में एक
ट्रिब्यूनल की नियुक्ति की गयी है। अगर इस सम्बन्ध में अपनाये गये व्यवहार का
उल्लेख न किया होता और इसकी सारी जवाबदेही हमारे सिर पर न मढ़ी होती तो
हम शायद अपनी ज़ुबान बन्द रखते, परन्तु वर्तमान स्थितियों में इसके सम्बन्ध में
हम अपना बयान देना आवश्यक समझते हैं।
हम आरम्भ से ही जानते हैं कि सरकार जान-बूझकर हमारे बारे में ग़लतफ़हमी
पैदा कर रही है। आख़िरकार यह एक लड़ाई है और हम भली प्रकार जानते हैं कि
अपने दुश्मनों का मुक़ाबला करने के लिए ग़लतफ़हमियों का जाल बनाना सरकार
का सबसे बड़ा हथकण्डा है। इस घृणित कार्य को रोकने का हमारे पास कोई साधन
नहीं, लेकिन कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए हम कुछ कहने के लिए
मजबूर हैं।
आपने लाहौर साज़िश केस के बारे में जारी अध्यादेश में हमारी भूख हड़ताल
के बारे में अपना स्पष्टीकरण शामिल किया है। आपने स्वयं स्वीकारा है कि हममें
से दो ने इस मुक़दमे के सम्बन्ध में स्पेशल मजिस्ट्रेट पण्डित श्रीकृष्ण की अदालत
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 377