सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 375
  1. अपराध का ढंग, और
  2. अपराधी का सामाजिक स्तर।
    इस मापदण्ड ने समस्या के निदान के बजाय उसे पेचीदा बना दिया।
    अहिंसात्मक और हिंसात्मक अपराधों वाले राजनीतिक बन्दियों में दो वर्गों
    वाली बात हम समझ सकते थे। लेकिन पंजाब जेल जाँच कमेटी की सिफ़ारिशों
    में सामाजिक स्तर का प्रश्न आ जाता है। जिस प्रकार चौधरी अफ़ज़ल हक़ ने रिपोर्ट
    से असहमति की टिप्पणी में ठीक ही कहा है कि स्वतन्त्रता के कार्य में जुटे रहने
    के कारण कंगाल हो गये राजनीतिक कार्यकर्ताओं का क्या होगा? क्या उन्हें किसी
    न्यायाधीश की दया पर छोड़ दिया जाये, जो प्रत्येक को साधारण अपराधी कहकर
    अपनी वफ़ादारी सिद्ध करने की कोशिश करता रहेगा। या यह आशा की जाये कि
    एक असहयोगी जेल से अच्छे व्यवहार की प्रार्थना करते हुए उन लोगों के आगे हाथ
    फैलायेगा, जिनके विरुद्ध वह जूझ रहा है? क्या यह ढंग इस बेचैनी के कारण को
    दूर करने का है या बढ़ाने का? तर्क दिया जा सकता है कि जेलों के बाहर दरिद्रता
    में जीते लोगों को जेलों में ऐशो-आराम की आशा नहीं रखनी चाहिए जहाँ कि उन्हें
    सज़ा के उद्देश्य से बन्दी बनाकर रखा गया है। पर वे कौन-से सुधार हैं जिनकी
    ऐश के लिए आवश्यकता होती है? क्या वे मात्र साधारण जीवन-स्तर की
    आवश्यकताएँ नहीं हैं? माँगी जाने वाली समस्त सुविधाओं के बावजूद जेल सदा
    जेल ही रहेगी। बाहर के लोगों को आकर्षित करने के लिए (जेल) कोई चुम्बकीय
    शक्ति नहीं होती और न ही कभी हो सकती है। केवल जेल आने के लिए कोई
    भी अपराध नहीं करता। हम यह कहने का साहस रखते हैं कि किसी भी सरकार
    का यह बहुत घटिया तर्क होगा कि नागरिकों को इस दर्जे तक मोहताजगी हो गयी
    है, और उनके रहने का स्तर जेल के स्तर की अपेक्षा घटिया हो गया है। क्या ऐसे
    तर्क में सरकार के अस्तित्व की कोई सम्भावना शेष रह जाती है? खैर, इस समय
    हमें इन बातों से कोई सरोकार नहीं है। हम कहना चाहते हैं कि बेचैनी को दूर करने
    का सबसे बेहतर ढंग यह है कि राजनीतिक बन्दियों को भिन्न वर्ग में रखा जाये।
    बाद में अगर आवश्यकता महसूस हो तो इसको पुनः दो वर्गों – एक, जो अहिंसक
    अपराधों में सज़ायाफ़्ता हैं और दूसरे, जो हिंसक अपराधों में सज़ायाफ़्ता हैं – में बाँटा
    जा सकता है। इस स्थिति में मन्तव्य निर्णयात्मक पहलू बन जायेगा। यह कहना कि
    राजनीतिक मामलों में मन्तव्य का फ़ैसला नहीं किया जा सकता, एक झूठा दावा
    है। वह कौन-सी चीज़ है जो आज जेल-अधिकारियों से जेलों में 'राजनीतिकों' को
    साधारण सुविधाओं से वंचित करने के लिए कहती है? वह कौन-सी चीज़ है जो
    उनकी नम्बरदारियाँ छीनती है? वह कौन-सी चीज़ है जो अधिकारियों से यह
    कहती है कि उन्हें शेष बन्दियों से अलग रखा जाये? यही चीज़ वर्गीकरण में भी
    मदद कर सकती है।
    जेल की सलाखों के पीछे से / 369