भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 373, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंसम्बन्धियों से मुलाक़ात एवं पत्र-व्यवहार करने जैसे आम अधिकार भी छीन लिये
गये हैं। उनके वज़न काफ़ी कम हो गये हैं। इस सम्बन्ध में पण्डित जवाहरलाल
ने सितम्बर, 1929 और जनवरी, 1930 में दो प्रेस वक्तव्य दिये थे।
3. भूख हड़ताल के सम्बन्ध में अखिल भारतीय कांग्रेस का प्रस्ताव, स्वीकृत
होने के पश्चात, तार द्वारा अलग-अलग राजनीतिक बन्दियों को भेजा गया। इनकी
कापियाँ जेल-अधिकारियों ने रोक लीं। फिर इस सम्बन्ध में सरकार ने बन्दियों से
मुलाक़ात के लिए कांग्रेस प्रतिनिधि मण्डल को इजाज़त नहीं दी।
4. पुलिस के उच्च अधिकारियों के आदेशानुसार 23 एवं 24 अक्टूबर, 1929
को लाहौर साज़िश केस के मुलज़िम बन्दियों पर वहशियाना हमला किया गया।
विवरण समाचारपत्रों में प्रकाशित हुए हैं। स्पेशल मजिस्ट्रेट पण्डित श्रीकृष्ण ने
हममें से एक व्यक्ति का बयान दर्ज किया था। इस बयान की कापी आपको
16 दिसम्बर, 1929 को भेजी जा चुकी है। पर न तो पंजाब सरकार और न ही
भारत सरकार ने उत्तर देना या हमारी ओर से जाँच कराने की माँग को आवश्यक
समझा, जबकि दूसरी ओर से इसी घटना के सम्बन्ध में 'हिंसात्मक प्रतिशोध' लेने
के इरादे से स्थानीय सरकार ने हम पर मुक़दमा चलाने की बहुत आवश्यकता
महसूस की है।
5. दिसम्बर, 1929 के अन्तिम सप्ताह में लाहौर बोर्स्टल जेल में क़ैद बन्दी
श्री किरणचन्द्र दास तथा अन्य आठ को जब मजिस्ट्रेट की अदालत में लाकर पेश
किया गया तो उन्हें हथकड़ियों और ज़ंजीरों से जकड़ा हुआ था। यह पंजाब जेल
जाँच कमेटी और पंजाब की जेलों के इंस्पेक्टर जनरल के समझौते का सरासर
उल्लंघन था। यह ध्यान देने योग्य है कि ये जमानत योग्य जुर्म के तहत बन्दी थे।
इस सम्बन्ध में डॉक्टर मोहम्मद आलम, लाला दुनीचन्द लाहौर वाले और लाला
दुनीचन्द अम्बाला वाले के लम्बे बयान 'ट्रिब्यून' में प्रकाशित हुए हैं।
जब हमें राजनीतिक बन्दियों की समस्त यातनाओं का पता चला तो हमने भूख
हड़ताल पुनः प्रारम्भ करने से गुरेज किया। भले ही इस बात का हमें अत्यन्त दुख
था, लेकिन हमने सोचा कि समस्या जल्द ही तय हो जायेगी। लेकिन अब उपरोक्त
उदाहरणों की रोशनी में क्या हम यह मानें कि भूख हड़ताल की अनकही, भयंकर
यातनाएँ और यतीन्द्रनाथ दास की महान शहादत ऐसे ही चली गयी? क्या हम यही
मानें कि उभर रहे जन-आन्दोलन को रोकने और संकटमय दौर को टालने की
नीयत से ही सरकार ने हमें आश्वासन दिये थे? हम आशा करते हैं कि आप हमसे
असहमत नहीं होंगे कि हमने काफ़ी समय तक धैर्य से प्रतीक्षा की है। लेकिन हम
अनन्त काल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते। सरकार के अपने ढुलमुल व्यवहार एवं
राजनीतिक बन्दियों के साथ दुर्व्यवहार के चलते हमारे पास पुनः संघर्ष शुरू करने
के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया है। हम जानते हैं कि भूख हड़ताल आरम्भ
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 367