भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 378, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिसमें 18 नवयुवकों पर गम्भीर आरोपों जैसे हत्या, डकैती और षड्यन्त्र - के
अधीन मुक़दमा चलाया जा रहा है, जिनसे सम्भव है उन्हें मृत्युदण्ड दिया जाये।
जिन प्रमुख मुद्दों पर हम आपकी अदालत में न आने के लिए विवश हुए हैं, वे इस
तरह हैं -
विचाराधीन क़ैदियों में से अधिकांश दूर-दराज प्रान्तों से हैं और सभी मध्य
वर्गीय लोग हैं। ऐसी स्थिति में उनके सम्बन्धियों द्वारा उनकी पैरवी के लिए
बार-बार आना न सिर्फ़ बहुत मुश्किल है, बल्कि बिल्कुल असम्भव है। वे अपने
कुछ दोस्तों से मुलाक़ात करना चाहते थे, जिन्हें वे अपनी पैरवी की सभी
ज़िम्मेदारियाँ सौंप सकते थे। साधारण बुद्धि का भी यही तक़ाज़ा है कि उन्हें
मुलाक़ात करने का हक़ हासिल है, इस मक़सद के लिए बार-बार प्रार्थना की
गयी, लेकिन सभी प्रार्थनाएँ अनसुनी रहीं।
श्री बी.के. दत्त बंगाल के रहने वाले हैं और श्री कमलनाथ तिवारी बिहार के।
दोनों अपनी-अपनी मित्र कुमारी लज्जावती व श्रीमती पार्वती से भेंट करना चाहते
थे। लेकिन अदालत ने उनकी दरख़्वास्त जेल-अधिकारियों को भेज दी और उन्होंने
यह कहकर दरख़्वास्त रद्द कर दी कि मुलाक़ात सिर्फ़ सम्बन्धियों व वकीलों से
ही हो सकती है। यह मामला बार-बार आपके ध्यान में लाया गया, लेकिन ऐसा
कोई क़दम नहीं उठाया गया, जिससे बन्दी पैरवी के लिए आवश्यक प्रबन्ध कर
सकते। बाद में उन्हें इनका वकालतनामा हासिल करने पर भी मुलाक़ात करने की
आज्ञा नहीं दी गयी और यहाँ तक कि मजिस्ट्रेट ने जेल-अधिकारियों को यह
लिखने से भी इन्कार कर दिया कि बन्दी उसकी ओर से चलाये जा रहे मुक़दमे
की पैरवी के सम्बन्ध में इन मुलाक़ातों की माँग कर रहे थे और इस प्रकार बन्दी
ऊपर की अदालत में जाने योग्य नहीं रहे। लेकिन मुक़दमे की सुनवाई जारी रही।
इन परिस्थितियों में बन्दी बिल्कुल विवश थे और उनके लिए मुक़दमा मज़ाक़ से
अधिक कुछ नहीं था। यह बात नोट करने योग्य है कि दूसरे बन्दियों में भी
अधिकांश की ओर से कोई वकील पेश नहीं हो रहा था।
मेरा कोई वकील नहीं है और न ही मैं पूरे समय के लिए किसी को वकील
रख सकता हूँ। मैं कुछ नुकतों सम्बन्धी क़ानूनी परामर्श चाहता हूँ और एक विशेष
पड़ाव पर मैं चाहता था कि वे (वकील) कार्रवाई को स्वयं देखें, ताकि अपनी
राय बनाने के लिए वे बेहतर स्थिति में हों, लेकिन उन्हें अदालत में बैठने तक की
जगह नहीं दी गयी। हमारी पैरवी रोकने के लिए, हमें परेशान करने के लिए क्या
सम्बन्धित अधिकारियों की यह सोची-समझी चाल नहीं थी? वकील अपने सायलों
(प्रार्थियों) के हितों को देखने के लिए अदालत में आता है, जो न तो स्वयं
उपस्थित होते हैं और न उनका कोई प्रतिनिधि वहाँ होता है। इस मुक़दमे की ऐसी
कौन-सी विशेष परिस्थितियाँ हैं, जिससे मजिस्ट्रेट वकीलों के प्रति ऐसा सख़्त रवैया
372 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़