भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 379, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपनाने पर मजबूर हुए? इस प्रकार हर उस वकील की हिम्मत तोड़ी गयी जो
बन्दियों को मदद के लिए बुलाये जा सकते थे। श्री अमरदास को पैरवी (डिफ़ेंस)
की कुर्सी पर बैठने की इजाज़त देने की क्या तुक थी, जबकि वे किसी भी पक्ष
का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे और न ही उन्होंने किसी को क़ानूनी परामर्श दिया।
अपने मुख़्तारों से मुलाक़ातों के सम्बन्ध में मुझे क़ानूनी सलाहकार से विचार-विमर्श
करना था और इसी नुक्ते को लेकर हाईकोर्ट जाने के लिए उनसे कहना था। लेकिन
उनके साथ इस सम्बन्ध में बात करने का मुझे कोई अवसर ही नहीं मिला और
कुछ न हो सका। इस सबका क्या मतलब है? यह दिखाकर कि मुक़दमा क़ानून
के अनुसार चलाया जा रहा है, क्या लोगों की आँखों में धूल नहीं झोंकी जा रही?
अपने बचाव का इन्तज़ाम करने के लिए बन्दियों को क़तई कोई अवसर नहीं दिया
गया। इस बात के ख़िलाफ़ हम रोष प्रकट करते हैं। यदि सबकुछ उचित ढंग से
नहीं किया जाता तो इस तमाशे की कोई ज़रूरत नहीं है। न्याय के नाम पर हम
अन्याय होता नहीं देख सकते। इन परिस्थितियों में हम सभी ने सोचा कि या तो
हमें अपनी ज़िन्दगी बचाने का उचित अवसर मिलना चाहिए, और या हमें हमारी
अनुपस्थिति में चले मुक़दमे में हमारे ख़िलाफ़ दी सज़ाओं को भुगतने के लिए तैयार
रहना चाहिए।
तीसरी बड़ी शिकायत अख़बारों के बाँटने सम्बन्धी है। विचाराधीन क़ैदियों को
कभी भी दण्ड प्राप्त कैदी नहीं माना जाना चाहिए और यह रोक उन पर तभी
लगायी जा सकती जब उनकी सुरक्षा के लिए बेहद ज़रूरी हो। इससे अधिक इसे
उचित नहीं माना जा सकता। जमानत पर रिहा न हो सकने वाले बन्दी को कभी
भी दण्ड के तौर पर कष्ट नहीं देने चाहिए। सो प्रत्येक शिक्षित विचाराधीन क़ैदी
को कम से कम एक अख़बार लेने का अधिकार है। अदालत में 'एक्ज़ीक्यूटिव'
कुछ सिद्धान्तों पर हमें हर रोज़ एक अंग्रेज़ी अख़बार देने के लिए सहमत हुई थी।
लेकिन अधूरी चीजें न होने से भी बुरी होती हैं। अंग्रेज़ी न जानने वाले बन्दियों के
लिए स्थानीय अख़बार देने के अनुरोध व्यर्थ सिद्ध हुए। अतः स्थानीय अख़बार न
देने के आदेश के विरुद्ध रोष प्रकट करते हुए हम दैनिक ट्रिब्यून लौटाते रहे हैं।
इन तीन आधारों पर हमने 29 जनवरी को अदालत में आने से इन्कार करने
की घोषणा की थी। ज्यों ही ये मुश्किलें दूर कर दी जायेंगी, हम बाखुशी अदालत
में आयेंगे।
भगतसिंह व अन्य
('हिन्दुस्तान टाइम्स' में 13 फ़रवरी, 1930 को प्रकाशित)
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 373