भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
VIII.
जेल की सलाख़ों के पीछे से
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इंस्पेक्टर जनरल के नाम पत्र
12 जून, 1929 को असेम्बली बमकाण्ड के मुक़दमे का ड्रामा ख़त्म हुआ।
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को उम्रक़ैद की सज़ा दी गयी। भगतसिंह को दिल्ली
से पंजाब ले जाकर मियाँवाली जेल में व दत्त को लाहौर केन्द्रीय जेल में रखा गया।
उन्होंने जेल में राजनीतिक बन्दियों के साथ व्यवहार के लिए संघर्ष की योजना गाड़ी
में ही बना डाली। उनके अनुसार, “सज़ा पाने के बाद हमने देखा कि हमारे वर्ग के
राजनीतिक क़ैदियों की स्थिति बहुत ख़राब थी।” 17 जून, 1929 को भगतसिंह और
बटुकेश्वर दत्त ने अलग-अलग नोटिसों में 15 जून से भूख हड़ताल शुरू करने की
सूचना और अपनी माँगों की सूची सरकार को पेश की। बाद में, 14 सितम्बर, 1929
को ये दोनों नोटिस पं. मदनमोहन मालवीय द्वारा लेजिस्लेटिव असेम्बली में पढ़े गये।
एक दूसरे पत्र में भगतसिंह ने स्वयं को लाहौर जेल भेजने की बात उठायी ताकि
साथियों के सम्पर्क में रह सकें।
मियाँवाली जेल
17 जून, 1929
सेवा में,
इंस्पेक्टर जनरल, जेल,
पंजाब (जेल्स) लाहौर।
प्रिय महोदय,
इस सच्चाई के बावजूद कि साण्डर्स शूटिंग केस में गिरफ़्तार दूसरे नौजवानों के
साथ ही मुझ पर भी मुक़दमा चलेगा, मुझे दिल्ली से मियाँवाली जेल में बदल दिया
गया है। उस केस की सुनवाई 26 जून, 1929 से शुरू होने वाली है। मैं यह समझने
में सर्वथा असमर्थ रहा हूँ कि मुझे यहाँ तब्दील करने के पीछे क्या भावना काम
कर रही है।
जो भी हो, न्याय की माँग है कि हरेक अभियुक्त (अण्डर ट्रायल) को वे सब
सुविधाएँ मिलनी चाहिए, जिनसे वह अपने मुक़दमे की तैयारी कर सके और लड़
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 347
सके। मैं यहाँ रहते कैसे अपना वकील नियुक्त कर सकता हूँ? क्योंकि यहाँ रहते
हुए मुझे अपने पिता या दूसरे रिश्तेदारों से सम्पर्क रखना कठिन है। यह स्थान काफ़ी
अलग-थलग है, रास्ता कठिन है और लाहौर से काफ़ी दूर है।
मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे तुरन्त लाहौर सेण्ट्रल जेल में बदलने का
आदेश दें, जिससे कि मुझे अपना केस लड़ने की तैयारी करने का उचित अवसर
मिले। आशा है कि शीघ्र ध्यान दिया जायेगा।
आपका
भगतसिंह
348 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
भूख हड़ताल का नोटिस ( भगतसिंह )
17 जून, 1929
प्रति,
इंस्पेक्टर जनरल, जेल्स, पंजाब, लाहौर।
असेम्बली बमकाण्ड दिल्ली के सम्बन्ध में मुझे आजीवन क़ैद की सज़ा दी
गयी है, इसलिए स्पष्ट है कि मैं राजनीतिक बन्दी हूँ। दिल्ली जेल में मुझे विशेष
भोजन मिलता था, लेकिन यहाँ पहुँचने पर मेरे साथ सामान्य अपराधियों जैसा सलूक
किया जा रहा है इसलिए मैं 15 जून, 1929 की सुबह से भूख हड़ताल पर हूँ।
इन दो-तीन दिनों में मेरा वज़न दिल्ली जेल की अपेक्षा 6 पौण्ड कम हो गया है।
मैं आपका ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि मुझे हर हाल में राजनीतिक
बन्दी का विशेष दर्जा मिलना चाहिए। मेरी माँगें हैं : अच्छा भोजन (दूध, घी, दाल,
चावल आदि के साथ), मशक़्क़त न करायी जाये, स्नान-सुविधा (साबुन,
तेल-हजामत आदि), प्रत्येक तरह का साहित्य (इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीतिक
विज्ञान, कविता, नाटक या उपन्यास, समाचारपत्र)। मुझे उम्मीद है कि आप
उदारतापूर्वक मेरे कथन पर विचार करेंगे और अपना फ़ैसला लेंगे।
भगतसिंह
आजीवन बन्दी न. 117,
मियाँवाली जेल
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भूख हड़ताल का नोटिस (बी.के. दत्त)
17 जून, 1929
सुपरिण्टेण्डेण्ट, सेण्ट्रल जेल, लाहौर
मैं आपको और उच्च अधिकारियों को बताना चाहता हूँ कि राजनीतिक बन्दी
होने के नाते मैं निम्न सुविधाओं की माँग कर सकता हूँ। असेम्बली में बम फेंकने
के बाद लॉर्ड इर्विन ने अपने अन्तिम भाषण में कहा था, “यह बम किसी एक
व्यक्ति की ओर नहीं बल्कि एक संस्था पर फेंके गये हैं।” फिर श्री मिडल्टन ने
अपने फ़ैसले में उल्लेख किया है कि “ये लोग (दत्त और भगतसिंह) अदालत में
‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’, ‘सर्वहारा ज़िन्दाबाद’ आदि के नारे लगाते हुए आते थे
जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि वे इस तरह के राजनीतिक विचारों के हैं। इन्हीं
विचारों के प्रचार को रोकने के लिए मैं इनको जीवन क़ैद की सज़ा देता हूँ।”
मैं पुनः यह बता देना चाहता हूँ कि जब कोई यूरोपियन स्वार्थपरता के लिए
स्वयं क़ानून की अवहेलना करता है तब जेल में उसको सभी तरह की सुविधाएँ
मिलती हैं। उसे बिजली वाला हवादार कमरा, सबसे अच्छी खुराक (दूध, मक्खन,
डबल रोटी, गोश्त आदि) और अच्छे कपड़े मिलेंगे। लेकिन हम राजनीतिक क़ैदियों
को ये सुविधाएँ मुहैया नहीं करायी जा रहीं। लॉर्ड इर्विन और श्री मिडल्टन की
टिप्पणियाँ यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि हम राजनीतिक बन्दी हैं और
इस आधार पर मैं माँग करता हूँ कि हमारे साथ राजनीतिक बन्दियों जैसा व्यवहार
होना चाहिए। मुझे अच्छी खुराक मिलनी चाहिए, जोकि मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए
आवश्यक है।
इसके साथ ही राजनीति पर विचार करने के लिए मुझे हर प्रकार का साहित्य
और समाचारपत्र मिलने चाहिए। लोग हमें अक्खड़, गुमराह और बेसब्र नौजवान
कहते हैं, इसलिए हमें अलग-अलग पुस्तकें पढ़ने का अवसर दिया जाना चाहिए,
ताकि हम देख सकें कि हम वास्तव में बेसब्र, गुमराह नौजवान हैं या नहीं, हमारे
काम का विचार ठीक है या नहीं। मेरी माँगें इस प्रकार हैं –
- अच्छी खुराक, सुबह दूध और डबल रोटी। दोपहर को दाल, चावल, घी,
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सब्ज़ी और चीनी और रात को डबल रोटी, गोश्त और चटनी।
2. मशक़्क़त न करायी जाये।
3. समाचारपत्र और हर प्रकार का साहित्य।
4. स्नान, साबुन, तेल, कंघी और हज्जाम आदि सहित।
5. अच्छी रिहायश।
6. अपने कपड़े।
सज़ा से पहले और बाद में मुझे ये सब चीज़ें जेल के ख़र्च पर मिलती थीं,
लेकिन यहाँ ये सब चीज़ें नहीं मिल रहीं। इसलिए मैंने 14 जून, 1929 से भूख
हड़ताल शुरू कर दी है। इन्हीं कारणों से मियाँवाली जेल में मेरे साथी भगतसिंह
ने भी भूख हड़ताल की हुई है। मैं तब तक भूख हड़ताल नहीं छोड़ूँगा जब तक
कि सरकार हमारी माँगों को नहीं स्वीकार करती।
मैं तुरन्त उत्तर की आशा करता हूँ। जो भी कोई सरकारी अधिकारी आयेगा
उससे इस विषय पर विचार-विमर्श के लिए मैं तैयार हूँ।
बी.के. दत्त,
क़ैदी, असेम्बली बम केस
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यतीन्द्रनाथ दास का पत्र
3 जुलाई, 1929
सम्राट बनाम यतीन्द्रनाथ दास
महोदय,
आपका प्रार्थी अत्यन्त सम्मानपूर्वक प्रार्थना करता है कि –
(क) क़रीब चार या पाँच दिन पहले रेलवे स्टेशन पुलिस लॉकअप, जहाँ मैं
बन्दी रखा गया था, में शिनाख़्ती परेड करवायी गयी।
(ख) कि रेलवे स्टेशन से गन्दे कपड़े पहने व क़रीब तीस-पैंतालीस साल
की उम्र के बीच के कुछ पंजाबी भंगियों और कुलियों को लाया गया। इन व्यक्तियों
को इस लॉकअप पर एक गली से लाया गया, जिसके क़रीब मजिस्ट्रेट की कार
में पहचान कराने वाला बैठा हुआ था। जब मुझे इन छह व्यक्तियों के बीच खड़ा
कर दिया गया और यद्यपि ऐसी शिनाख़्ती परेड के बेतुकेपन के विषय में मैंने
मजिस्ट्रेट से रोष भी प्रकट किया, क्योंकि ये पंजाबी न सिर्फ़ अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट
थे उनके चेहरे के रूप तक से कोई भी यह बता सकता था कि वे बंगाली नहीं
हैं। लेकिन मेरी आपत्तियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया, हालाँकि मैंने मजिस्ट्रेट
से बार-बार यह कहा कि न्यायोचित यह होगा कि मुझे मुझसे मिलते-जुलते
बंगालियों के बीच खड़ा किया जाये, क्योंकि पुलिस के पास मेरा फ़ोटो, मेरे
हस्ताक्षर आदि थे जिन्हें वे मेरी शिनाख़्त करने आने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों को
दिखा सकते थे।
(ग) कि जो व्यक्ति मेरी शिनाख़्त करने आया उससे, मैं जिस तारीख़ को
उसने कथित रूप से मुझे देखा, उस बारे में कुछ सवाल पूछना चाहता था लेकिन
न सिर्फ़ मेरा अनुरोध नहीं माना गया, वहाँ आये पुलिस-अधिकारियों द्वारा शिनाख़्त
करने आये, उस व्यक्ति को वहाँ से घसीटकर दूर ले जाया गया।
(घ) कि यह कार्रवाई बड़े गोपनीय तरीक़े व जल्दबाज़ी से की गयी और मुझे
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डर है कि इसमें गम्भीर अनियमितता पायी गयी है, जिससे मेरे बचाव में भारी
नुक़सान होगा।
यतीन्द्रनाथ दास,
3 जुलाई, 1929
2.10 अपराह्न
(क्रान्तिकारियों के विरुद्ध मुक़दमे की कार्रवाई किस ढंग से चल रही थी और
ब्रिटिश न्याय किस तरह से एक ढकोसला था, यह तथ्य मजिस्ट्रेट के नाम यतीन्द्रनाथ
दास के इस विरोध-पत्र से भली-भाँति उजागर होता है। – स.)
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होम मेम्बर के नाम पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर \hfill 24 जुलाई, 1929
श्रीमान,
होम मेम्बर, भारत सरकार,
हमें (भगतसिंह और बी.के. दत्त) 12 जून, 1929 को दिल्ली के असेम्बली
बम केस में आजीवन कारावास का दण्ड सुनाया गया। जब तक हम दिल्ली जेल
में हवालाती क़ैदी (अण्डर ट्रायल) रहे, हमारे साथ बड़ा अच्छा सलूक किया गया,
पर जब से उस जेल से हमारी तब्दीली मियाँवाली और लाहौर सेण्ट्रल जेल में हुई,
तब से हमारे साथ इखलाकी क़ैदियों जैसा सलूक किया जा रहा है। पहले ही दिन
हमने उच्च अधिकारियों से अच्छी खुराक तथा कुछ और सुविधाओं की माँग की
और जेल की रोटी खाने से इन्कार कर दिया। हमारी माँगें इस प्रकार थीं –
- राजनीतिक क़ैदी होने के नाते हमें अच्छा खाना दिया जाना चाहिए, इसलिए
हमारे भोजन का रूप यूरोपियन क़ैदियों जैसा होना चाहिए। हम उसी तरह की
खुराक की माँग नहीं करते, बल्कि खुराक का स्तर वैसा चाहते हैं। - हमें मशक्क़त के नाम पर जेलों में सम्मानहीन काम करने के लिए बाध्य
नहीं किया जाना चाहिए। - बिना किसी रोक-टोक के पूर्व स्वीकृत (जिन्हें जेल-अधिकारी स्वीकृत
कर लें) पुस्तकें और लिखने का सामान लेने की सुविधा होनी चाहिए। - कम से कम एक दैनिक पत्र हरेक क़ैदी को मिलना चाहिए।
- हरेक जेल में राजनीतिक क़ैदियों का एक विशेष वार्ड होना चाहिए, जिसमें
उन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की सुविधा होनी चाहिए, जो यूरोपियनों के लिए
होती हैं और एक जेल में रहने वाले सभी राजनीतिक क़ैदी उस वार्ड में इकट्ठा
रहने चाहिए। - स्नान के लिए सुविधाएँ मिलनी चाहिए।
- अच्छे कपड़े मिलने चाहिए।
354 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हमारी ये माँगें पूर्णतया उचित हैं पर जेल-अधिकारियों ने हमें एक दिन कहा
कि उच्च अधिकारियों ने हमारी माँगें मानने से इन्कार कर दिया है। इससे भी
अधिक यह कि ज़बरदस्ती खाना देने वाले हमारे साथ बड़ा बुरा सलूक करते हैं।
1 जून, 1929 को भगतसिंह ज़बरदस्ती खाना देने के पन्द्रह मिनट बाद तक पूरी
तरह बेसुध पड़े रहे। अतः हम यह निवेदन करते हैं कि बिना किसी ढील के यह
दुर्व्यवहार बन्द किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही हमें यू.पी. जेल कमेटी में पण्डित जगतनारायण और ख़ान
बहादुर हाफ़िज़ हिदायत हुसेन की सिफ़ारिश की तरफ़ इशारा करने की आज्ञा दी
जाये। उन्होंने यह सिफ़ारिश की है कि राजनीतिक क़ैदियों के साथ अच्छी क्लास
के क़ैदियों जैसा सलूक किया जाना चाहिए।
हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि हमारी माँगों की ओर ध्यान दिया जाये।
आपके,
भगतसिंह और बी.के. दत्त
नोट : राजनीतिक क़ैदियों से हमारा मतलब उन लोगों से है, जिन्हें
शासन-विरोधी कार्रवाइयों के कारण सज़ा हुई। उदाहरण के लिए, 1915-17 के
लाहौर षड्यन्त्र केस, काकोरी षड्यन्त्र केस व अन्य विद्रोही केसों में सज़ा पाये
लोग।
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पंजाब जेल जाँच समिति के अध्यक्ष को पत्र
6 सितम्बर, 1929
अध्यक्ष, पंजाब जेल जाँच समिति,
और भूख हड़ताल उपसमिति के सदस्यगण, शिमला
(द्वारा, अधीक्षक, बोर्स्टल इंस्टीट्यूट, लाहौर)
प्रिय महोदयो,
निम्न बातें हम आपके विचारार्थ रखने की अनुमति चाहते हैं –
(1) कि हमने भूख हड़ताल छोड़ी नहीं थी बल्कि सिर्फ़ सरकार के निर्णय
तक इसे स्थगित किया था। हमारा विचार है कि हमने यह बात आपसे स्पष्ट कह
दी थी और बार-बार फिर आपसे यह आग्रह किया था कि इसे जनता और साथ
ही सरकार के सामने स्पष्ट कर दिया जाये।
हमें बहुत हैरानी हुई कि 4 सितम्बर, 1929 के 'सिविल एण्ड मिलिट्री गजट'
में भूख हड़ताल उपसमिति के सदस्यों की ओर से दिये प्रेस-वक्तव्य में इस बात
का कोई ज़िक्र नहीं किया गया। फिर भी हमें उम्मीद है कि आप जल्द से जल्द
यह कर देंगे।
(2) हमने सिर्फ़ आश्वासन पर भूख हड़ताल स्थगित नहीं की थी कि आप
और जाँच समिति के बाक़ी सदस्य हमारे सन्तोष के अनुसार हमारी सारी माँगें मानते
हुए इसकी सिफारिश कर देंगे। हममें से एक ने तो आपसे कहा था कि सरकार
ने विगत समय में बहुत सारे मामलों में जाँच समिति की ऐसी सिफ़ारिशें नहीं मानी
थीं, क्योंकि इससे उनका लक्ष्य पूरा नहीं होता, उदाहरणस्वरूप सकीन समिति का
हवाला दिया गया था।
उन्हें संशय था कि आपकी समिति की सिफ़ारिशों के साथ भी यही व्यवहार
होगा।
जवाब में आपने कहा था कि हमारे पास आने से पहले आपने स्थानीय सरकार
से बात कर ली थी, और आप हमें आश्वासन देने की स्थिति में थे कि सरकार
इस मामले में ऐसा नहीं करेगी।
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इस स्पष्ट और महत्त्वपूर्ण आश्वासन पर ही, पूरे नौ घण्टे की बहस के बाद,
हमने भूख हड़ताल स्थगित करना स्वीकार किया था।
इसके अतिरिक्त, आपने हमें विश्वास दिलाया था कि हमारी दृढ़ इच्छा के
अनुसार साथी यतीन्द्रनाथ दास को, उनके स्वास्थ्य की नाजुक स्थिति को देखते
हुए रिहा कर दिया जायेगा।
दूसरे यह कि विचाराधीन कैदियों के रूप में हमारी माँगें, जिनमें सबसे
महत्त्वपूर्ण हम सभी को (समेत साथी भगतसिंह और साथी दत्त) एक साथ आम
बैरक में रखने की माँग, सरकार एक या दो दिन में ही मान लेगी।
पर हमारी आशंकाएँ सही सिद्ध हुईं, जब उपसमिति की तगड़ी व एकमत
सिफ़ारिशों के बावजूद सरकार ने न तो साथी दास को रिहा करना स्वीकार किया
और न ही साथी भगतसिंह और साथी दत्त को हमारे साथ रखना।
अतः इस तथ्य के तत्काल प्रमाण मिल गये हैं कि सरकार को आपकी
सिफ़ारिशों की कोई परवाह नहीं और हमें उम्मीद है, आप हमें यह कहने के लिए
क्षमा करेंगे कि सरकार यही चाहती थी कि हमारी भूख हड़ताल तुड़वाने के लिए
जन-नेता होने के आपके सम्माननीय पद का इस्तेमाल करे। हम और भी बता दें
कि भूख हड़ताल स्थगित करने से पहले हमने बहुत ध्यान से इस बात पर विचार
किया था कि जाँच समिति के वायदे पर कहाँ तक भरोसा किया जा सकता है?
इस सम्बन्ध में साथी भगतसिंह और साथी दत्त की सलाह थी कि वर्तमान अवसर
पर इसकी परीक्षा हो जायेगी। अब हम देख रहे हैं कि सरकार ने, जबकि आपकी
दो बहुत साधारण सिफ़ारिशों की ओर भी ध्यान नहीं दिया, हमें तुरन्त भूख हड़ताल
आरम्भ करने के लिए विवश किया है।
(3) साथी दास की अवस्था बेहद चिन्ताजनक है और यदि सरकार यह
सोचती है कि उनके देहान्त के बाद हम अपने कर्त्तव्य से पीछे हट जायेंगे तो यह
उसकी घातक ग़लती है। हम सभी यह बता रहे हैं कि हम सब उन्हीं के रास्ते पर
चलने के लिए तैयार हैं। फिर भी निरन्तर संघर्ष को ध्यान में रखते हुए सुविधा के
लिए हम स्वयं को दो गुटों में बाँट रहे हैं, जिनमें से पहला गुट फ़ौरन भूख हड़ताल
शुरू कर रहा है।
यह निश्चय किया गया है कि जब पहले गुट के सदस्य का देहान्त हो जाये
तो दूसरे गुट में से एक सदस्य आगे आयेगा।
हमने यह निर्णय इसकी पूरी गम्भीरता को देखते हुए लिया है। अपने साथी
दास के पद-चिह्नों पर चलने के सिवाय हमारे समक्ष और कोई भी सम्मानजनक
व सरल रास्ता नहीं बचा है।
हम अपने कॉज़ (Cause) को वाजिब व बाइज़्ज़त समझते हैं, जिन्हें ऐसे गम्भीर
क़दम उठाने पर मजबूर करने की बजाय कोई भी सरकार मान लेती। हम फिर बता
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दें कि हम यह संघर्ष इस हद निश्चय के साथ कर रहे हैं कि वाजिब व पवित्र
लक्ष्य के लिए मृत्यूपर्यन्त संघर्ष करने के सिवाय और कोई भी चीज़ सम्माननीय
व शानदार नहीं हो सकती।
अन्त में हम यह महसूस करते हैं कि हम अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं कर रहे होंगे,
यदि सरकार के सामने हमारे लक्ष्य को दिये समर्थन के लिए आपकी सच्ची हार्दिक
दिलचस्पी और भारी कष्ट के प्रति आपका हार्दिक आभार न मानें।
सच्चे दिल से, हम हैं आपके,
लाहौर षड्यन्त्र केस के भूख हड़ताली
शुक्रवार, 6 सितम्बर, 1929
प्रातः दस बजे
358 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
विद्यार्थियों के नाम पत्र
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त की ओर से जेल से भेजा गया यह पत्र 19
अक्टूबर, 1929 को पंजाब छात्र संघ, लाहौर के दूसरे अधिवेशन में पढ़कर सुनाया
गया था। अधिवेशन के सभापति थे सुभाषचन्द्र बोस। – स.
इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठायें।
आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी महत्त्वपूर्ण काम है। आने वाले लाहौर
अधिवेशन में कांग्रेस देश की आज़ादी के लिए ज़बरदस्त लड़ाई की उद्घोषणा करने
वाली है। राष्ट्रीय इतिहास के इन कठिन क्षणों में नौजवानों के कन्धों पर बहुत बड़ी
ज़िम्मेदारी आ पड़ेगी। यह सच है कि स्वतन्त्रता के इस युद्ध में अग्रिम मोर्चों पर
विद्यार्थियों ने मौत से टक्कर ली है। क्या परीक्षा की इस घड़ी में वे उसी प्रकार
की दृढ़ता और आत्मविश्वास का परिचय देने से हिचकिचायेंगे?
नौजवानों को क्रान्ति का यह सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है,
फ़ैक्टरी-कारख़ानों के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोंपड़ियों में रहने
वाले करोड़ों लोगों में इस क्रान्ति की अलख जगानी है जिससे आज़ादी आयेगी और
तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।
पंजाब वैसे ही राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ माना जाता है। इसकी भी
ज़िम्मेदारी युवक वर्ग पर ही है। आज वे देश के प्रति अपनी असीम श्रद्धा और
शहीद यतीन्द्रनाथ दास के महान बलिदान से प्रेरणा लेकर यह सिद्ध कर दें कि
स्वतन्त्रता के इस संघर्ष में वे दृढ़ता से टक्कर ले सकते हैं।
22 अक्टूबर, 1929 के ट्रिब्यून (लाहौर) में प्रकाशित
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 359
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद क्या है?
सम्पादक, मॉडर्न रिव्यू के नाम पत्र
लाहौर के स्पेशल मजिस्ट्रेट की अदालत में “इन्क़लाब ज़िन्दाबाद” नारा लगाने
के जुर्म में छात्रों की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ गुजराँवाला में नौजवान भारत सभा ने
एक प्रस्ताव पारित किया। ‘मॉडर्न रिव्यू’ के सम्पादक रामानन्द चट्टोपाध्याय ने इस
ख़बर के आधार पर “इन्क़लाब ज़िन्दाबाद” के नारे की आलोचना की। भगतसिंह
और बी.के. दत्त ने ‘मॉडर्न रिव्यू’ के सम्पादक को उनके उस सम्पादकीय का
निम्नलिखित उत्तर दिया था। — स.
सम्पादक महोदय,
मॉडर्न रिव्यू।
आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसम्बर, 1929 के अंक में एक टिप्पणी
‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ शीर्षक से लिखी है और इस नारे को निरर्थक ठहराने की
चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी सम्पादक
की रचना में दोष निकालना तथा उसका प्रतिवाद करना, जिसे प्रत्येक भारतीय
सम्मान की दृष्टि से देखता है, हमारे लिए एक बड़ी धृष्टता होगी। तो भी इस
प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि इस नारे से हमारा क्या
अभिप्राय है।
यह आवश्यक है, क्योंकि इस देश में इस समय इस नारे को सब लोगों तक
पहुँचाने का कार्य हमारे हिस्से में आया है। इस नारे की रचना हमने नहीं की है।
यही नारा रूस के क्रान्तिकारी आन्दोलन में प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध समाजवादी
लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने अपने उपन्यासों ‘बोस्टन’ और ‘आईल’ में यही नारा
कुछ अराजकतावादी क्रान्तिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है। इसका अर्थ क्या
है? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सशस्त्र संघर्ष सदैव जारी रहे और कोई
भी व्यवस्था अल्प समय के लिए भी स्थायी न रह सके, दूसरे शब्दों में — देश
और समाज में अराजकता फैली रहे।
360 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना
प्राप्त हो चुकी है, जो सम्भव है भाषा के नियमों एवं कोष के आधार पर इसके
शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाये, परन्तु इसके साथ ही इस नारे
से उन विचारों को पृथक नहीं किया जा सकता, जो इसके साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे
समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ के द्योतक हैं, जो एक सीमा तक उनमें उत्पन्न
हो गये हैं तथा एक सीमा तक उनमें निहित हैं।
उदाहरण के लिए हम यतीन्द्रनाथ ज़िन्दाबाद का नारा लगाते हैं। इससे हमारा
तात्पर्य यह होता है कि उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उस अथक उत्साह को
सदा-सदा के लिए बनाये रखें, जिसने इस महानतम बलिदानी को उस आदर्श के
लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बलिदान करने की प्रेरणा दी। यह नारा
लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिए ऐसे
ही अचूक उत्साह को अपनायें। यही वह भावना है, जिसकी हम प्रशंसा करते हैं।
इसी प्रकार हमें 'इन्क़लाब' शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना
चाहिए। इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के
आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विभिन्न विशेषताएँ जोड़ी जाती हैं।
क्रान्तिकारियों की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है। हमने इस बात को ट्रिब्यूनल
के सम्मुख अपने वक्तव्य में स्पष्ट करने का प्रयास किया था।
इस वक्तव्य में हमने कहा था कि क्रान्ति (इन्क़लाब) का अर्थ अनिवार्य
रूप में सशस्त्र आन्दोलन नहीं होता। बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रान्ति को
सफल बनाने के साधन-मात्र हो सकते हैं। इसमें भी सन्देह नहीं है कि कुछ
आन्दोलनों में बम एवं पिस्तौल एक महत्त्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परन्तु केवल
इसी कारण से बम और पिस्तौल क्रान्ति के पर्यायवाची नहीं हो जाते। विद्रोह को
क्रान्ति नहीं कहा जा सकता, यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का अन्तिम
परिणाम क्रान्ति हो।
इस वाक्य में क्रान्ति शब्द का अर्थ 'प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं
आकांक्षा' है। लोग साधारणतया जीवन की परम्परागत दशाओं के साथ चिपक जाते
हैं और परिवर्तन के विचार-मात्र से ही काँपने लगते हैं। यही एक अकर्मण्यता की
भावना है, जिसके स्थान पर क्रान्तिकारी भावना जाग्रत करने की आवश्यकता है।
दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अकर्मण्यता का वातावरण निर्मित हो जाता
है और रूढ़िवादी शक्तियाँ मानव समाज को कुमार्ग पर ले जाती हैं। ये परिस्थितियाँ
मानव समाज की उन्नति में गतिरोध का कारण बन जाती हैं।
क्रान्ति की इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थायी तौर पर ओतप्रोत
रहनी चाहिए, जिससे कि रूढ़िवादी शक्तियाँ मानव समाज की प्रगति की दौड़ में
बाधा डालने के लिए संगठित न हो सकें। यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 361
सदैव न रहे और वह नयी व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे, जिससे कि
एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके। यह है हमारा वह अभिप्राय
जिसको हृदय में रखकर हम ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ का नारा ऊँचा करते हैं।
22 दिसम्बर, 1929 भगतसिंह – बी.के. दत्त
362 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
गृह मन्त्री, भारत सरकार को तार
ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध क्रान्तिकारियों ने जेल में भी प्रतिदिन संघर्ष जारी
रखा। जेलों में सुधार के लिए जो भूख हड़ताल शुरू की गयी, वह कई मंज़िलों से
गुज़री। यतीन्द्रनाथ दास शहीद हुए, सरकार ने कुछ वायदे किये। एक बार भूख
हड़ताल छोड़ी गयी, और फिर शुरू कर दी गयी, क्योंकि सरकार के वायदे झूठे
साबित हुए थे। जनता के सामने सरकार की असलियत लाना उस अभियान का हिस्सा
था। फिर शुरू हुई भूख हड़ताल में सरकार ने कई बेहूदा ढंग अपनाये, लेकिन
क्रान्तिकारी दृढ़ता से अपने विश्वासों पर स्थिर रहे। भगतसिंह और उनके साथी सभी
कष्टों को हँसकर झेलने के सिद्धान्त पर चलते रहे।
20 जनवरी, 1930
प्रति,
गृहमन्त्री, भारत
भगतसिंह और अन्य क़ैदियों की ओर से।
समिति के इस आश्वासन पर कि राजनीतिक क़ैदियों के साथ व्यवहार का
प्रश्न हमारे सन्तोष के अनुसार शीघ्र ही अन्तिम रूप में हल किया जा रहा है, हमने
अपनी भूख हड़ताल स्थगित कर दी थी। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के भूख
हड़ताल सम्बन्धी प्रस्तावों की प्रतियाँ जेल-अधिकारियों ने रोक ली हैं। कांग्रेस
प्रतिनिधि मण्डल को क़ैदियों से मिलने की अनुमति देने से इन्कार कर दिया गया
है। षड्यन्त्र केस से सम्बन्धित विचाराधीन व्यक्तियों पर पुलिस-अधिकारियों की
आज्ञा से 23, 24 अक्टूबर, 1929 को बुरी तरह हमले किये गये।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 363
तीसरे इण्टरनेशनल, मास्को के अध्यक्ष को तार
24 जनवरी, 1930 को लेनिन-दिवस के अवसर पर लाहौर षड्यन्त्र केस के
विचाराधीन कैदी अपनी गरदनों में लाल रूमाल बाँधकर अदालत में आये। वे
काकोरी-गीत गा रहे थे। मजिस्ट्रेट के आने पर उन्होंने ‘समाजवादी क्रान्ति –
ज़िन्दाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद – मुर्दाबाद’ के नारे लगाये। फिर भगतसिंह ने
निम्नलिखित तार तीसरी इण्टरनेशनल, मास्को के अध्यक्ष के नाम प्रेषित करने के
लिए मजिस्ट्रेट को दिया –
“लेनिन-दिवस के अवसर पर हम सोवियत रूस में हो रहे महान अनुभव और
साथी लेनिन की सफलता को आगे बढ़ाने के लिए अपनी दिली मुबारक़बाद भेजते
हैं। हम अपने को विश्व-क्रान्तिकारी आन्दोलन से जोड़ना चाहते हैं। मज़दूर-राज की
जीत हो। सरमायादारी का नाश हो।
साम्राज्यवाद – मुर्दाबाद!!”
विचाराधीन कैदी,
24 जनवरी, 1930 लाहौर षड्यन्त्र केस
(ट्रिब्यून, लाहौर 26 जनवरी, 1930 में प्रकाशित)
364 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़