सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

112 / बन्दी जीवन
सहायता बिना हम देश के साधारण लोग कुछ भी करने में असमर्थ हैं, तब स्वभावतः
ही वे सिपाही स्वेच्छाचारी हो जाएँगे। किन्तु दूसरी तरफ हमने यह भी सोच
लिया था कि एक बार विप्लव में साथ देने के बाद जब तक कोई एक फैसला न
हो जायगा तब तक ये सिपाही लोग निश्चिन्त न रह सकेंगे, और फलतः अपने
स्वार्थ के लिए ही विप्लव सफल बनाने की ओर ध्यान देना होगा, और इस प्रकार
बाधित होकर उन्हें देश के शिक्षित और दृढ़चित्त विप्लव-नेताओं के अधीन रहना
पसंद होगा। इसके अलावा मेगज़ीन हाथ में आते ही जितना जल्द हो सकता,
हम अपने आदमियों को हथियारबन्द कर डालते और तब हम लोग भी बिलकुल
निहत्थे न रहते।
युद्ध-नीति से हम बिलकुल अनभिज्ञ थे, इस तरफ जैसी शिक्षा का प्रबन्ध
करना उचित था वह हमने किया नहीं था। कारण यह कि जर्मन-युद्ध इतनी जल्दी
छिड़ जायगा और इतनी जल्दी खुले तौर से विप्लव शुरू करना होगा, यह हम
पहले से समझ न सके थे। जो हो, रासबिहारी के पंजाब जाने पर मैंने और मेरे
एक बन्धु विनायकराव कापले ने Encyclopaedia Britannica (अंग्रेज़ी विश्व-
कोष) लेकर Strategy और Warfare (समरनीति) विषयक लेख पढ़ना
आरम्भ किया, और इससे पहले भी अनेक पत्रिकाओं आदि में इस विषय पर जो
लेख निकलते थे वह भी हम बराबर पढ़ते रहते थे। इस प्रकार ये सब पोथियाँ
पढ़कर हम युद्ध-कुशल सेनापति न हो सकेंगे, यह हम जानते थे; Encyclopae-
dia में भी पढ़ा था कि generals are made in the field of battle (युद्ध-
क्षेत्र में ही सेनानायक तैयार होते हैं) और इतिहास में इसके अनेक दृष्टान्त भी
देखे थे। आजकल के ज़माने में भी ऐसे दृष्टान्तों का अभाव नहीं है, रूस के अभी
उस दिन के विप्लव का इतिहास देखने से भी इसके प्रमाण मिलते हैं। अस्तु, जो
भी हो, हम लोगों ने जो किया था वही लिखे देता हूँ, उससे यदि हमारी कुछ
नादानी का परिचय मिले तो लज्जित नहीं हूँ।
स्टेशन और तारघर का हालचाल देख आने के लिए 21 फरवरी रविवार
को मैं बाइक पर चढ़कर काशी कैंटूनमेंट के स्टेशन पर शाम के समय आया था।
स्टेशन पर आकर सुना कि उस समय तक ट्रेन अथवा टेलीग्राफ़ का कुछ भी गोल-
माल नहीं हुआ। उसी स्टेशन पर उसी दिन शाम के वक़्त पलटन के एक हवलदार
के आने की बात थी। उसकी बाट जोहते-जोहते प्लेटफार्म पर घूमते-फिरते दिल
में आई कि अख़बार खरीद कर पढ़ूँ। पायोनियर खरीदकर देखा लाहौर में घर-
पकड़ आरम्भ हो गई है और यूरोपियन फ़ौज शहर में पिकेट कर रही है, अर्थात्
लड़ाई के समय की तरह सावधान होकर डेरे डालकर पड़ी है। समझ गया, काम
कुछ उलट-पुलट हो गया है। झट शहर में लौट आया। हमें अब सन्देह नहीं रहा
कि इस बार की विप्लव योजना भी छिन्न-भिन्न हो गई। किन्तु ठीक उसी दिन
सिंगापुर में विप्लव शुरू हो जाता है। सिंगापुर के साथ सीधे तौर पर हम लोगों
का कोई सम्बन्ध न था, यह इतिहास एक और परिच्छेद में बतलाया जायगा।

काशी अंचल की कहानी / 113
यदि सिगापुर भारत के अन्दर की कोई जगह होती तो भारत की अवस्था अत्यन्त
भयानक रूप धारण कर लेती, इसमें सन्देह नहीं । जिस समय सैकड़ों पल्टनें विदेश
के युद्ध-क्षेत्र में रोज ही भेजी जाती हों उस समय विप्लव शुरू हो जाने पर सचमुच
अधिकांश देशी पल्टनें हमारी ओर आ जातीं। हमारी यह आशा एकदम निर्मूल
या भ्रमपूर्ण न थी। सभी पल्टनों से हमें आशा का संवाद मिला हो, यह बात भी
न थी । एक तरफ जहाँ एक सिक्ख पल्टन के सिपाहियों ने हमारे दल के एक तरुण
युवक के मुंह से विप्लव नजदीक होने की खबर पाकर आग्रह और उत्साह के साथ
उसी रात पल्टन के मुखियों को बुलाकर गुप्त रूप से एक बैठक करके तय किया
था कि पहले वे जरूर कुछ न करेंगे, पर सचमुच विप्लव शुरू हो जाने पर वे निश्चय
ही विप्लव में साथ देंगे, वहाँ दूसरी तरफ एक ओर जगह की मुसलमान पल्टन ने
यह उत्तर दिया था कि "तुम क्या हमको बिलकुल बच्चा समझते हो ? अंग्रेजों
के साथ युद्ध करना क्या लड़को का खेल है ? तुम्हारी तरफ कोई नवाब या राजा-
महाराजा है ? जब नहीं है तो तुम्हें रुपये से मदद कौन देगा ? इसके अलावा
विप्लव शुरू होते ही वायरलेस टेलीग्राफी (बेतार के तार) पर उसी समय भारत
के चारों ओर खबर चली जायगी और थोड़े दिनों मे चारों ओर की फ़ौज
तुम्हारे ऊपर आ पडेगी। इस अवस्था में क्या तुम किसी तरह टिक सकोगे ?
तुम्हारे हाथ में अस्त्र-शस्त्र ही कितने हैं ? तुम्हारी सामरिक शिक्षा-दीक्षा ही क्या
है ? ये बाते क्या सोच देखी हैं ? हम लोग न बच्चे हैं न पागल, ऐसी बातें फिर
हमारे नज़दीक कहने मत आना, हाँ, अगर सचमुच विप्लव शुरू हो गया तो अवश्य
हम लोग भी देशवासियों के विरुद्ध न चलेंगे, किन्तु देखना, होगा कुछ भी नही,
इत्यादि ।"
उस समय सिक्ख लोगों में जैसी उत्तेजना और उत्साह देखा गया था, वैसा
उत्साह केवल पंजाबी मुसलमानों और पठानो मे ही कुछ हद तक देखा है। भारत
की अनेक जातियों के साथ मिल-जुलकर समझ सका हूँ कि सिक्खों के समान
मजबूत, समर्थ और भावुक जाति भारत मे कोई नही है। सिक्ख लोग जैसे सहज
रूप से जितने थोड़े समय में उत्तेजित हो उठते हैं वैसी सहजता से भारत की
और कोई जाति उत्तेजित नही हो उठती। रासबिहारी जब विप्लव का उद्योग व्यर्थ
हो जाने पर पंजाब छोड़कर फिर काशी की ओर लौट रहे थे तब ट्रेन में एक सिक्ख
सैनिक के साथ उनकी बातचीत हुई। साधारण बातें होते-होते प्रसंगवश भारत
की वर्तमान अवस्था की बात आई । इतने थोडे समय की बातचीत से ही वह
सिक्ख इतना उत्तेजित हो उठा कि रासबिहारी के साथियों को डर हुआ कि कहीं
कुछ अनर्थ न हो जाय क्योकि ट्रेन के कमरे मे और भी कई तरह के लोग हैं, यह
भूलकर उस सिक्ख ने उत्तेजित स्वर में कहना शुरू कर दिया था कि वह देश के
लिए जरूर प्राण देगा। जो हो, बड़ी मुश्किल से उन्होंने उस यात्रा में छुटकारा
पाया।
इस विषय में सब बंगालियों को दोष देते हैं। बंगाली भी बेशक बड़ी भावुक

114 / बन्दी जीवन
जाति है, पर भाव के उन्माद में सिक्ख लोग घड़ीभर में जैसे एक असम्भव काण्ड
कर सकते हैं, वैसे भारत की और कोई जाति नहीं कर सकती । सिक्खों के
कहने और करने के बीच अन्तर बहुत थोड़ा रहता है। इसलिए मैं समझता हूँ कि
ऐसा कोई काम नहीं जिसे ये सिक्ख लोग उपयुक्त नेतृत्व में परिचालित होने पर
न कर सकें । सिक्ख समाज में आज केवल एक ही चीज़ का अभाव दीखता है और
उस अभाव को पूरा करने के लिए सिक्ख समाज इस प्रकार जाग्रत हो गया है कि
वह अभाव भी थोड़े ही दिनों में नहीं रहेगा । संसार की विचारधारा के साथ
रहने के लिए जैसी शिक्षा चाहिए सिक्ख समाज में वैसी शिक्षा का बिल्कुल अभाव
है और इस अभाव को दूर करने के लिए छोटे-छोटे सिक्ख जमींदार भी जैसी
आर्थिक सहायता करते हैं वैसा दृष्टान्त भारत की और किसी जाति में नहीं पाया
जाता । तो भी सिक्खों में संकीर्णता बड़ी है, इसलिए सिक्ख समाज के लिए वे
जो कुछ करते हैं उसका सौ में एक हिस्सा भी दूसरे समाजों के लिए नहीं कर
सकते । सिक्ख सम्प्रदाय में से बहुतों का विश्वास है कि यदि वे उपयुक्त-शक्ति
सामर्थ्य का उपार्जन कर लें तो फिर वे भारत में अपना साम्राज्य खड़ा कर
सकते हैं। जो हो, वे फिर एक साम्राज्य खड़ा कर सकें या न कर सकें, भविष्य
में यदि उनमें उपयुक्त शिक्षा का प्रचार न होगा तो भारत के भाग्य में बहुत
दुःख लिखे हैं, इसमें सन्देह नहीं ।
खैर, जाने दो इन बातों को, जो बात हम कह रहे थे उसे ही फिर कहें; कह
रहे थे कि किस तरह पंजाब की दुरवस्था की खबर हमने काशी में जान पाई थी ।
पायोनियर में यह कुसमाचार देखकर हमें बड़ी चोट लगी । हमें मालूम होने लगा
मानो हम भारतवासियों का कोई संकल्प भी अन्त तक नहीं रहता । हम जो
सोचेंगे, कुछ भी न होगा । अंग्रेज़ लोग जो करने की बात कहेंगे उसी में कृतकार्य
हो जाएँगे । न जाने विधाता का यह कैसा विधान है ।
भारतवासी का जीवन मानो केवल दूसरों के खेल की सामग्री है । उसको
अपनी मानो कोई साध, कोई वासना ही नहीं, या वह है भी तो मानो उसे पूर्ण
करने की शक्ति उसमें नहीं है । भारतवासी की सब चेष्टाओं का परिणाम मानो
केवल व्यर्थता से पूर्ण है, भारत का इतिहास भी वैसे एक विराट् व्यर्थता के कारण
उदास स्वर से भरा है। भारत के इतिहास की तरह भारत की विप्लव चेष्टा का
इतिहास भी एक सिरे से व्यर्थता का ही इतिहास है ।
: 2 :
रेलबे स्टेशन से मुरझाया हुआ घर वापस आया । घर में अनेक साथी मेरी
प्रतीक्षा में बैठे थे । मुहल्ले-मुहल्ले में कुछ युवकों के दल भी हमारे आदेश की
प्रतीक्षा में थे। उन्हें विप्लव की बात मालूम न थी,पर इतना तो सब जानते थे कि
शायद कोई भी भीषण काण्ड हो सकता है जिससे जान हथेली पर रखकर उन्हें

काशी अंचल की कहानी / 115-
उस कार्य में साथ देना होगा। साथियों ने सब सुना। विप्लव रुक गया यह
समझ लिया, तो भी दो-तीन दिन बड़ी उत्कण्ठा में कटे। जो हुआ सो एकदम
आशा के विपरीत रहा हो ऐसा भी नहीं, कारण यह कि इस व्यर्थता की आशंका
बड़े जोर से पहले ही दिल में उठी थी, इसलिए पायोनियर की खबर सुनकर हम
मानो मौन स्वर से बोल उठे—"यही तो कहते थे कि इतनी जल्दी क्या भारत का
भाग्य पलट जायगा !"—दो-तीन दिन में ही लाहौर में तांगे की दुर्घटना का
समाचार अखबार में पढ़ा, हममें से बहुतों ने सोचा कही भाग जानेवाले व्यक्ति
रासबिहारी ही न हों किसी-किसी ने कहा नहीं, रासबिहारी निश्चय ही वहां न
थे कारण कि रासबिहारी का भाग्य बड़ा उज्ज्वल है, उनका भाग्य ही उनकी
रक्षा करता है, इसीलिए विपत्तियों के मुंह में वे कभी नहीं पड़ सकते। इसके
सिवाय अखबार में तो साफ ही लिखा है कि तांगे के यात्री सिक्ख थे। इस प्रकार
रासबिहारी का भला-बुरा सोचते-सोचते हमारे दिन कटने लगे। क्योंकर और
कितने दिन तक रासबिहारी बेखटके काशी आ पहुंचेंगे इसी भावना में हम अस्थिर
होकर दिन गिनने लगे। पंजाब की दुर्बलता के कारण काशी के दल को भी
कही चोट न लगे इसी आशंका में हम कई आदमी घर पर बिलकुल न रहते थे,
केवल बीच-बीच में घर आकर खबर ले जाते थे कि पुलिस का उत्पात बढ़ रहा
है या घट रहा है। उस समय भी घर पर बराबर पुलिस का पहरा था। उनकी
आंखों में धूल डालकर ही सब काम करना होता था। काशी मे हम लोग इसी
प्रकार दिन काटने लगे।
इधर पंजाब से करतारसिंह और हरनामसिंह काबुल की ओर रवाना हुए।
राह में उन्हें न जाने क्या सूझी कि वे फिर सिपाहियों में विप्लव का प्रचार करने
के लिए छावनी में घुस पड़े। इस समय जगह-जगह सिपाहियों में धर-पकड़
आरंभ हो गई थी। इसलिए स्वभावतः उनके बीच एक आतंक-सा छाया देख
पड़ता था। इस अवस्था में सिपाहियों के बीच फिर प्रचार करने जाना करतार-
सिंह के लिए हरगिज उचित न था। फलतः सिपाहियों ने ही करतारसिंह को
पकड़वा दिया। उन्हें लाहौर लाया गया। जंजीरों में जकड़े हुए करतारसिंह की
तरुण मुखश्री में वीरत्व की ऐसी महिमा झलकती थी कि उस मूर्ति को देखकर
शत्रु-मित्र सभी एक साथ मुग्ध हो जाते थे। भाई परमानन्द ने अपनी 'आप बीती'
नामक पुस्तक में उस दृश्य का मर्मस्पर्शी भाषा में वर्णन किया है। ऊंचे दर्जे के
अंग्रेज राज्याधिकारी भी वीर को उपयुक्त मर्यादा देने मे प्रायः त्रुटि नहीं करते।
पिछले विप्लव युग की कहानी देखते हुए साधारण रूप से यह कहा जा सकता है
कि अंग्रेज राज्याधिकारी विप्लवियों के वीरत्व और गुणों पर बहुधा मुग्ध हो
उठा करते थे।
इधर एकाएक एक दिन सुना, रासूदा काशी आ गए। रासूदा से भेंट होने
पर पंजाब की सब अवस्था मालूम हो गई। एक तो पंजाब का समाचार बंगाल में
देना आवश्यक था, दूसरे मेरा काशी मे ठहरना किसी तरह अभीष्ट न था, इस-

116 / बन्दी जीवन

लिए दादा ने मुझसे एकदम काशी छोड़ देने को कहा। हमारा यह नियम था कि
धर-पकड़ आरम्भ होने पर तुरन्त ही हम पहले का बन्दोबस्त जड़ से बदल देते थे,
अर्थात् मनुष्य के मन का हम पूरी तरह कभी विश्वास न करते थे, क्योंकि हम
जानते थे मनुष्य अपने मन को आप ही ठीक-ठीक नहीं पहचानता, इसलिए किसी
के पकड़े जाने पर हम उसी क्षण सावधान हो जाते थे।
इसी समय काशी में पुलिस की निगरानी ऐसी कड़ी हो गई कि कोई भी नया
बंगाली पुलिस की नजर बचाकर आ ही न सकता था। बंगाली टोले के हर
मुहल्ले में पुलिस हरएक घर जाकर पता लगाती थी कि वहाँ कोई नया बंगाली
तो नहीं आया। चन्दननगर और बंगाल में रासबिहारी को पहचानने वाले खुफिया
पुलिस के जितने कारिन्दे थे सबको काशी के भिन्न-भिन्न स्टेशनों पर पहरे पर
नियुक्त किया गया था। चौबीस घण्टा ऐसा ही पहरा रहता था। इसके अलावा
काशी में जो लोग पुलिस की विष-दृष्टि में पड़ चुके थे उनके ऊपर भी जहाँ तक कड़ा
पहरा रखना पुलिस के लिए सम्भव था, उसमें पुलिस जरा भी कसर न छोड़ती
थी। जो भी बंगाली काशी में आते उन सभी का नाम-धाम पुलिस लिख लेती,
और फिर मकान पर जाकर पता लगाती कि उनकी बात सच है या नहीं। इस
प्रकार पुलिस काशी में रासबिहारी की टोह लेती थी। और ऐसी भीषण अवस्था
में भी रासबिहारी बेखटके काशी आ पहुँचे थे।
हम कुछ लोग पहले से ही सावधान थे। बहुत थोड़े समय ही घर पर टिकते
थे। अधिक समय जिस जगह रहते थे उसे दल के कुछ आदमियों को छोड़कर
कोई न जानता था। और रासूदा ही घर-घर जाकर रात को हमारा पता लेते थे।
क्योंकि रासबिहारी को काशी में कोई बहुत पहचानता न था। काशी में हमारा
खूब अच्छा दल था, इसीलिए रासबिहारी ऐसी अवस्था में काशी मे अनायास एक
महीने से ऊपर रह सके थे। रासबिहारी को पकड़ने के लिए ब्रिटिश गवर्नमेण्ट ने
कमर कस ली, और काशी के दल को बचाने के लिए रासबिहारी ने भी कमर
कस ली। काशी के युवक लोग चुपचाप घरों में बैठे और रासबिहारी ही घर-घर
जाकर पूछ-ताछ करने लगे। किसे किस उपाय से काशी से बाहर भेज दें। प्रत्येक
युवक के निकट जाकर रासबिहारी रोज़ यही बात ठीक करते। पहले मैं काशी
छोड़कर चला गया, फिर एक और मित्र ने भी काशी छोड़ दी। इसी तरह धीरे-
धीरे बहुत लोग काशी से खिसककर बंगाल आ गए। जो युक्तप्रदेश के थे वे
अपना शहर छोड़कर दूसरे शहर में जाकर रहे, जैसे काशी वाले लखनऊ गए
और लखनऊ वाले काशी आ गए।
मेरे बंगाल में खिसक आने के कुछ ही दिन बाद हमारे काशीवाले मकान की
खानातालाशी हुई, इसके थोड़े ही दिन बाद काशी के एक और युवक के घर की
खानातालाशी हुई, वे युवक उस समय काशी में ही थे, पर अपने घर पर न रहते
थे। तड़के तीन बजे पुलिस ने घर घेर लिया, पर सबेरे व्यर्थ मनोरथ होकर लौट
गई ! रासबिहारी के पास उस युवक ने सुना कि उनके घर की खाना-तलाशी

काशी अंचल की कहानी / 117
हुई है। कुछ दिन बाद विनायकराव कापले के घर की भी तलाशी हुई।
विनायक उस समय गगा स्नान करके लौट रहे थे। वे रहते थे भाडे के मकान
पर, किन्तु भोजन करते थे अपने ही मकान पर। मकान के नजदीक आने पर
विनायक ने सुना कि उनके मकान पर अनेक साहब लोग उनकी प्रतीक्षा कर रहे
हैं। यह बात सुनते ही विनायक भी अन्तर्धान हो गए। इस प्रकार पुलिस किसी
को भी न पा सकी। उस समय भी रासबिहारी काशी मे ही रहे।
जिस समय सरकार की तरफ का गवाह विभूति स्पेशल ट्राइब्यूनल की अदा-
लत मे इन सब बातो का विवरण करने लगा उस समय अदालत के जज भी आंखे
फाडकर केवल विभूति के मुंह की ओर ताकते रहे और कुछ देर के लिए नोट
लिखना भी भूल गए। सरकारी कौन्सल और हमारी ओर के वकील-बैरिस्टर
आदि भी वैसे ही आग्रह और अचम्भे के साथ निर्वाक् होकर रासबिहारी के
अद्भुत कामो की कहानी सुनने लग गए, और बीच-बीच म कोई-कोई हमारी
ओर मुंह करके धीरे से बोल उठते—"ओह, रासबिहारी की ऐसी हिम्मत है !"
हम भी उस समय आनन्द और गर्व से गद्गद् हो जाते थे। एक बार विभूति के
मुंह की ओर देखकर समझने की चेष्टा की थी कि विभूति क्या सोचता है। ख्याल
आता है कि मन मे उस समय इस बात का दुःख हुआ था कि विभूति क्यो
हमारे गर्व और आनन्द मे भाग नही लेता। इस समय ठीक याद नही आता कि
विभूति भी सचमुच ऐसी मुखबरी करने के बाद गर्व अनुभव करता था कि
नही।
इस प्रकार काशी के अनेक युवक बगाल मे आकर इकट्ठे हो गए। जिन
लोगो का पजाब से कोई सीधा सम्बन्ध न हुआ था, अर्थात् जिनका नाम-धाम
पजाब मे कोई न जानता था, वे काशी मे ही रहे। ऐसे युवको की संख्या कम न
थी, और इसीलिए ऐसे भीषण सकट के समय भी रासबिहारी बेखटके काशी मे
रह सके थे। जिन युवको को कोई विप्लवी रूप से नही जानता, जिन पर कोई
सन्देह भी नही करता, ऐसे लोगो की संख्या जिस विप्लव दल मे जितनी अधिक
हो उतना ही वह दल बलशाली और कार्यक्षम होता है।
काशी मे हम लोग इस प्रकार सतर्क हो गए, पर पजाब के नेताओ मे से
लगभग सभी एक-एक करके पकड लिए गए। डा० मथुरासिह आदि केवल दो-
तीन आदमी काबुल भाग जाने मे सफल हुए। पिंगले तब भी पकडे न गए थे।
पंजाब की गोलमाल के बाद पिंगले भी काशी की तरफ ही आए थे। राह मे वे
भी करतारसिंह की तरह मेरठ छावनी मे विप्लव फैलाने के लिए घुस पडे। इस
प्रकार मेरठ छावनी के एक मुसलमान दफादार के साथ उनकी बातचीत हुई।
उस दफादार ने पिंगले के नजदीक विप्लव की बात मे खूब उत्साह दिखाया और
पिंगले के साथ ही काशी आ गया। किन्तु रासबिहारी ने पिंगले को ऐसे काम
मे हाथ डालने के लिए खास तौर स रोका। उन्होने कहा अब सिपाहियो मे जाने
का काम नही, पर पिंगले निरुत्साह न हुए। अन्त मे दादा को भी इस काम मे

118 / बन्दी जीवन
स्वीकृति देनी पड़ी। पिंगले को सबस बड़े किस्म के दस बम देकर भेजा गया । ये
सब बम इतने बड़े थे कि इनमें से एक भी जिस जगह गिरता उस जगह और कोई
चिह्न तक न रहता। बारकों पर पड़ता तो अनेक बारकें एक ही साथ भूमिसत् हो
जाती । रोलट कमेटी की रिपोर्ट में इन्हीं बमों के सम्बन्ध में लिखा है—Suffi-
cient to annihilate half a regiment अर्थात् आधी रेजिमेंट को समूल
ध्वंस कर देने की शक्ति इन बमों में थी ।—अन्त में रासबिहारी का सन्देह ठीक
ही निकला। उस दफ़ादार ने पिंगले को अपनी छावनी मे ले जाकर बमों सहित
पकड़ा दिया । मेरठ के प्रायः दस-ग्यारह सिपाहियों ने भी बाद में फांसी के तख्ते
पर जीवन दिया ।
जिस समय पिंगले मेरठ गए उसी समय दादा ने मुझसे बंगाल मे कहला भेजा
कि मैं सीधा दिल्ली जाकर वहां के सभी ऊंचे अंग्रेज कर्मचारियों के बंगले इत्यादि
अच्छी तरह देख रखूं । उसी समय दिल्ली में एक बड़ा कांड करने की आयो-
जना चल रही थी । मुझे दादा से सलाह किए बिना दिल्ली जाना ठीक न जंचा
किन्तु पुलिस उस समय मुझे बुरी तरह खोजती थी। काशी जाना उस समय मेरे
लिए बड़ा विपत्तिकर था । पर तो भी मैं काशी आया। मै हमेशा से बेपरवाह
तबीयत का था। मैंने कभी कल्पना भी न की थी कि मुझ पर भी कभी विपत्ति
पड सकती है। अपनी इसी उच्छृंखल निर्भीकता के कारण ही अन्त में मैं पकड़ा
गया । रासबिहारी निर्भीक थे पर उच्छृंखल नहीं।
रात को मुगलसराय स्टेशन पर एक गुप्तचर के साथ मेरी भेंट हुई। किन्तु
मेरी मौसी संग मे थी, इसलिए भागने का कोई चारा न था। बगाल के एक
युवक भी मेरे संग थे और उनके माथ कुछ बम भी थे। उन युवक को सावधान
करके कह आया था कि मेरे साथ इकट्ठे एक गाड़ी में न चढ़ें और स्टेशन पर
मेरे पास से कुछ दूरी पर ही रहें। जो हो, स्टेशन पर कुछ गोलमाल नही हुआ।
मौसी से कह रक्खा था कि मै पकड़ा जाऊँ तो वे अमुक पता बताकर घर पहुंच
जाएं । काशी की ट्रेन प्लेटफार्म पर आई तो वह गुप्तचर मेरे साथ एक ही डिम्बे
में चढा, और न जाने क्यों, वह युवक भी मेरे ही डिब्बे मे आ चढ़े। उस गुप्तचर के
साथ मेरा परिचय था इसलिए उसने पूछा मेरे साथ की महिला कौन है। मुझे
मौसी के साथ निश्चिन्त होकर घर जाते देखकर मालूम हुआ कि गुप्तचर को कुछ
आश्वासन मिला, और शायद उसने सोचा कि बहुत दौड़-धूप करने की कुछ
आवश्यकता नही है। इसके अलावा मालूम होता है उसका सम्बन्ध काशी के खुफिया
विभाग के दारोगा यतीन्द्र मुखोपाध्याय के साथ था, इसलिए कोई गुप्त समाचार
मिलने पर यतीन्द्र के सिवाय और किसी के नजदीक वह प्रकट न करता। अन्दर
का मामला ऐसा ही रहा होगा। इसी से मालूम होता है उस यात्रा में मैं बच
सका । बहुत सवेरे घर आ पहुंचा, और घर पर बहुत थोड़ी देर टिककर फिर
बाहर निकल पड़ा। मेरा रंग-ढंग देखकर घर के सब लोग बड़े दुखी हुए । घर
में सबसे मैंने खुल्लमखुल्ला कह दिया कि किसी समय भी मैं पकड़ा जा सकता

काशी अंचल की कहानी / 119

हूँ। मेरी ताई मेरे दोनों हाथ अपने दोनों हाथों में दबाकर बड़ी अनुनय के साथ
कहने लगीं, "तू क्यों डरता है शची, मैं कहती हूँ तुझे कुछ न होगा, तू घर पर ही
रह।" किन्तु मैंने किसी की कोई बात न सुनी। उस समय मालूम हुआ रात
खतम होकर भोर हुआ चाहता है, चार या साढ़े चार बजे होंगे, मैं घर छोड़कर
रासबिहारी के ठिकाने पर आ ठहरा। फिर दूसरे दिन सुबह के वक्त काशी से
चला गया, उसी दिन सवेरे ही हमारे घर की खानातलाशी हुई। हमारे घर के
सामने ही एक गुप्तचर रहता था। सभी गप्तचरों के मुंह से पुलिस ने मेरे घर आने
की खबर पाई थी, पर घर की तलाशी लेने पर मुझे न पाकर वे सब अत्यन्त
आश्चर्य करने लगे, यहाँ तक कि कई पुलिस वालों ने समझा मैं अभी भागा हूँ और
सड़कों पर दौड़-धूप भी की। पीछे कलकत्ते जाकर सुना कि पुलिस मुझे पकड़ने
आई तो पुलिस के सामने ही, कहते हैं, मैं छतों-छतों पर भागता हुआ गायब हो
गया, और वह सब देखती हुई भी कुछ न कर सकी।
राजपूताना के एक युवक के साथ मैं दिल्ली आ पहुँचा। अपने दल के ही
एक युवक के डेरे पर अतिथि हुआ। दिल्ली में जो करना था सो किया। दिल्ली में
ही पिंगले के साथ भेंट होने की बात थी। उस समय के होम मेम्बर सर रेजिनाल्ड
क्रैडक साहब तब दिल्ली में न थे, और एक-दो और कारण थे, जिससे दिल्ली में
कुछ किया नहीं गया।
दिल्ली में एक दिन बाइक पर घूमते-घूमते सांझ हो गई थी। रास्ते में जगह-
जगह लिखा था शाम को साढ़े छः बजे बत्ती जला लेना चाहिए। मैंने भी बाइक
की बत्ती जला ली। मेरी बत्ती कुछ खराब थी। मैं बाइक पर तेजी से जाते हुए
ज्योंही रास्ते के मोड़ से घूमा त्योंही देखा कि एक अंग्रेज घुड़सवार बड़े रोब से
घोड़ा दौड़ाये चला आता है। मुझे देखते ही मेरी ओर हाथ बढ़ाकर उसने अंगुली
से इशारा किया 'ठहरो', मैं भी झट बाइक से नीचे उतर पड़ा। घुड़सवार ने मेरे
नजदीक आकर प्रश्न किया, "बत्ती क्यों नहीं जलाई ?" तब देखा बाइक की
बत्ती बुझ गई है। मैंने कहा, "बत्ती अभी बुझ गई है हाथ लगाकर देखो अभी
गरम है।" "बत्ती जलाओ" कहकर अंग्रेज घुड़सवार ने घोड़ा छोड़ दिया। मैं कुछ
देर एकटक उस दर्पोन्मत्त अंग्रेज घुड़सवार की ओर देखता रह गया, और सोचने
लगा, "हाय रे ! कब हम भी घोड़े पर चढ़कर इस तरह माथा ऊंचा करके छाती
फुलाये घूमेंगे।"
मेरठ में पिंगले कृतकार्य हों या न हों, दिल्लो में हमें कुछ काम करना था।
इसी बीच समाचारपत्र में पढ़ा, मेरठ छावनी में पिंगले पकड़े गए। और ठीक इस
समय मैं भी बुरी तरह बीमार पड़ गया। लाचार मुझे दिल्ली छोड़नी पड़ी। इस
बीमारी में मैं पन्द्रह दिन तक एक साथ खाट पर पड़ा रहा। दूसरे सप्ताह निमो-
निया के लक्षण भी दिखाई दिए। उस समय जिन युवकों ने मेरी सेवा की थी उनके
यत्न की बात मैं जीवन-भर भूल नहीं सकता। मुझे उस समय उठने की भी ताक़त
न थी। उस समय वही युवकगण मेरा मल-मूत्र तक साफ करते थे।

120 / बन्दी जीवन
उधर पंजाब में लाहोर षड्यन्त्र के मामले की सुनवाई आरम्भ हो गई ।
लाहोर के मामले में शायद अनेक बातें सुनने लायक हैं। किन्तु मुझे इस विषय
में कुछ विशेष नहीं कहना है ।
इस प्रसंग में सबसे पहले यह बात ध्यान में आती है कि इस मामले में सौ
विप्लवियों में से प्रायः दस व्यक्ति विप्लव धर्म को तिलांजलि देकर अपने ही
बन्धुओं को विपत्ति के मुंह में डालने से भी नही चूके । इन सब मुखबिरों के विषय
में देश मे अनेक आलोचनाएँ हुई हैं। इन्हीं को देखकर ही बहुत लोगों की विप्ल-
वियों के विषय में बड़ी हीन धारणा हो गई है। पर एक बात याद रहे कि ईसा-
मसीह के शिष्यों में भी विश्वासघातकता का दृष्टांत पाया जाता है। मसीह-जैसे
महापुरुष के सम्पर्क में आने के बाद भी मनुष्य का अधःपतन हो जाता है। तब
अन्य स्थानों में ऐसा अधःपतन हो जाने में आश्चर्य ही क्या है ?¹ हमारा विश्वास
है कि विप्लव का काम जितना आगे बढ़ेगा विश्वासघातकता भी उसी परिमाण
में बढ़ेगी। इन सब षड्यन्त्र के मामलों में जैसे एक तरफ विश्वासघात के दृष्टांत
पाये जाते है, वैसे ही दूसरी तरफ वीरता की भी अद्भुत कीर्ति हम देख पाते हैं ।
जो हो, लाहोर षड्यन्त्र के मामले की केवल दो बातें मैं पाठकों को देता हूँ ।—
अदालत में विचार के समय ज्वालासिंह नामी एक सिक्ख ने अभियुक्तों के शिनाख्त
के विषय में एक उज्ज्र पेश किया। केवल इसी अपराध पर जेल के सुपरिण्टेण्डेण्ट
ने उन्हें तीस बेतों की सज़ा दी। आश्चर्य की बात है कि पजाब में कही भी इसका
ज़रा भी प्रतिवाद नहीं हुआ । करतारसिंह ने मुकद्दमे के समय अदालत में सब
बातें स्वीकार कर ली पर अंग्रेज़ जज ने पहले दिन उनकी किसी बात को दर्ज
नहीं किया । उन्होंने करतारसिंह को समझाकर कहा कि उनकी स्वीकारोक्ति से
उनका अपना Case बहुत खराब हो जायगा । इस पर भी करतारसिंह ने अपना
मत न बदला । उन्होंने सब घटनाओं का दायित्व स्वयं अपने ही सिर पर लिया ।
विवश होकर जज ने कहा, “करतारसिंह आज मैंने तुम्हारी कोई भी बात नहीं
सुनी तुम्हें एक दिन का और समय देता हूँ । अच्छी तरह सोच-विचारकर कल जो

  1. नागपुर के झण्डा सत्याग्रह में 1764 स्वयंसेवकों में से दो सौ से अधिक माफ़ी मांगकर
    छूट गये थे । यह भी न भूलना होगा कि इन स्वेच्छा-सेवकों को सारा देश एक आवाज़ से
    प्रोत्साहन और साधुवाद दे रहा था, चारो तरफ धन्य-धन्य की गूंज सुन पड़ती थी, इनके,
    सगे-सम्बन्धी इनकी वीरता पर अभिमान करते थे, यहाँ तक कि बहुतों की स्त्रियां और
    बहने 'युद्ध-क्षेत्र' में साथ उपस्थित थीं और जेल में साथ जाने तक को तैयार थीं । दूसरी
    तरफ यदि ये लोग सिर न झुकाते तो इन्हें औसतन केवल तीन मास की सादी या कड़ी
    क़ैद मिलती । षड्यन्त्र के अभियुक्तों के लिए प्रत्येक बात इससे ठीक उलटी थी । कहना
    पड़ता है भारतवासियों की रीढ़ की हड्डी अभी तक भी बहुत कमज़ोर है और वे गर्दन
    सीधी करके खड़ा होना नहीं जानते । आध्यात्मिकता की कितनी ही डींगें हांका करें,
    घटनाएं सिद्ध करती हैं कि चरित्र-बल में वे संसार की सब स्वतन्त्र जातियों से पीछे हैं।

काशी अंचल की कहानी / 121

कहना हो वह कहना।'" दूसरे दिन फिर करतारसिंह ने सब दायित्व अपने ही सिर
पर ले लिया। उनकी शान्त वीरता पर सब मुग्ध हो गये। भारत के इतिहास मे
करतारसिंह का नाम सदा अमर रहेगा। भारत के विप्लव युग को भी करतार-
सिंह ने स्मरणीय कर दिया।
इस षड्यन्त्र के मामले मे लाहौर डी० ए० वी० कालेज के भूतपूर्व अध्यापक
भाई परमानन्द भी पकड़े गए, उन्हे भी अन्त में आजन्म कालेपानी का दण्ड
मिला। लाहौर जेल में रहते समय वे करतारसिंह के पास की कोठरी ही मे बन्द
थे। उस समय प्रायः सभी राजनैतिक अपराधी एक ही बैरक मे बन्द रहते थे।
गत को वे सभी अपनी-अपनी कोठरी से एक-दूसरे के साथ गप-शप करते थे। कहते
है एक दिन भाई परमानन्द ने करतारसिंह से कहा "देखो यदि मालूम होता
कि अन्त मे मुझे भी यही दुर्गति भोगनी होगी तो मै भी तुम्हारे काम मे पूरा उद्यम
से योग देता !" भाई परमानन्द के एक ओर करतारसिंह थे और दूसरी ओर की
कोठरी मे एक और सिक्ख थे। वे अब भी बचे हुए है और इन्ही से मैने उक्त
घटना अण्डमन में सुनी थी।

3
दिल्ली में
(1) प्रताप की कहानी
राजपूताना के जिस युवक के साथ मै दिल्ली गया उसका नाम था प्रताप-
सिंह । ये राजपूताना के चारण वंश के थे । चारण लोग राजपूतो मे पूज्य माने
जाते है । प्रताप के पिता का नाम था सरदार केशरीसिंह । वे उदयपुर के राणा
के विशेष प्रिय थे और अब मुझे ठीक याद नही, या तो प्रताप के पिता या उनके '
दादा उदयपुर के राणा के मन्त्री पद तक पहुंचे थे । उनकी जागीर मेवाड के
अन्तर्गत शाहपुरी राज्य में थी ।
एक दिन था, जब यही राजपूताना वीरो का लीला-निकेतन कहा जाता था,
एक दिन इसी राजपूताना में भीष्म के समान महापुरुषों का भी आविर्भाव हुआ
था, बंगाल की कल्पना दृष्टि में शायद आज भी राजपूताना उसी अतीत युग की
शूरता, वीरता और उदारता की प्रतिमूर्ति-रूप ही प्रतीत होता है, किन्तु पौराणिक
युग का वह गौरवमण्डित राजपूताना आज नहीं है । तथापि राजपूताना के आज
बिलकुल अधःपतित हो जाने पर भी उस अतीत युग के संस्कार आज भी प्रत्येक
राजपूतानावासी के हृदय में अंकित हैं । प्रताप-परिवार की कहानी देखकर यह
बात मेरे मन में स्वतः जाग उठती है ।
यह परिवार राजपूताना के गण्य-मान्य समृद्ध ज़मीदारों में गिना जाता था,
किन्तु स्वदेश-प्रीति और तेजस्विता की खातिर इन्हें अपना घर-बार बरबाद करना
पड़ा ।
सबसे पहले दिल्ली षड्यन्त्र के मामले के सम्बन्ध में प्रताप और प्रताप के
बहनोई पकड़े गए । किन्तु उनके विरुद्ध कोई विशेष प्रमाण न रहने से उस बार
उनका छुटकारा हो गया । इसके कुछ ही दिन बाद कोटा में ही एक और राज-
नैतिक मामले में प्रताप के पिता सरदार केशरीसिंहजी को आजन्म कालेपानी का
दण्ड हुआ और, प्रताप के एक सगे चचा के नाम भी वारण्ट निकला, सम्भवतः
आज भी वे पकड़े नहीं गए । केशरीसिंहजी का स्वास्थ्य अच्छा न रहने से उन्हें
अण्डमन नहीं जाना पड़ा, देश की जेलों में ही रहना पड़ा ।¹

  1. बाद में जुलाई सन् 1919 में उन्हें छोड़ दिया गया था पर उनके भाई का वारंट अभी
    तक नहीं हटाया गया ।

दिल्ली में / 123

इस मामले के फलस्वरूप सरदार केशरीसिंहजी की और उनके छोटे भाई की
समूची सम्पत्ति तो ज़ब्त हुई ही, इसके अलावा उनके जो भाई राजनीति के पास
फटकते भी न थे, उनकी भी सारी सम्पत्ति ज़ब्त हो गई। इस तरह वे समृद्ध-
सम्पन्न जागीरदार की अवस्था से एकदम रास्ते के भिखारी हो गए। प्रताप की
माता के दुःखों की उस समय सीमा न थी, आज एक सम्बन्धी के पास रहतीं तो
कल दूसरे सम्बन्धी के घर जाकर अतिथि बनतीं। अन्त में अपने पिता के घर
जाकर किसी तरह दिन काटती रहीं, प्रताप के मामा के घर की हालत भी विशेष
अच्छी न थी। विधाता जब किसी के प्रति निर्दय होते हैं तब उनकी निष्ठुरता के
निकट संसार की सब निष्ठुरता फीकी पड़ जाती है और वे जिनको वीर बनाकर
उठाते हैं, उनके वीरत्व के निकट भगवान् की निष्ठुरता भी हार मानने को बाध्य
होती है। इसी से इतनी विपत्ति में पड़कर भी प्रतापसिंह बराबर विप्लव दल में
काम करते रहे। काम करने-करने में भी अन्तर है, केवल कर्त्तव्य ज्ञान से काम
करना एक बात है, और काम करके आनन्द पाना दूसरी बात; हमारा विचार है
कि काम करके आनन्द पाया जाय यही हमारा कर्त्तव्य है; अर्थात् जैसा काम करके
मन में किसी तरह का अनुताप-परिताप न हो, जैसा काम करने से मन में और
प्राण में ग्लानि की कोई सूचना भी न हो और सबसे बढ़कर जैसा काम करने से
मनुष्य साक्षात् रूप से आनन्द भी पाये, हमारा विचार है वैसा काम ही मनुष्य का
कर्त्तव्य है और जो करके मनुष्य आनन्द तो पाये ही नहीं, प्रत्युत उससे क्लेश का
आभास हो वह काम करना मनुष्य को उचित नहीं। वैसी स्थिति में मानना होगा
कि अनधिकार चेष्टा की जा रही है, क्योंकि वैसी स्थिति में आनन्द अथवा तृप्ति
कुछ भी नहीं होती। अर्थात् लज्जा की खातिर, लोक-निन्दा के भय से कर्त्तव्य-
कार्य में योग देना एक बात है, और कर्त्तव्य-कार्य करके सचमुच आनन्द पाना दूसरी
बात। प्रताप ने जो अपनी पारिवारिक अवस्था के भीषण संकट-काल में भी इस
प्रकार विप्लव कार्य में योग दिया था उससे उनके दिल के किसी कोने में किसी
तरह की ग्लानि अथवा संकोच तो था ही नहीं, वरन् विपत्ति की ऐसी कराल
मूर्ति आँखों से देखकर भी वे पिता के अभिप्रेत प्रिय कार्य में फिर भी अपने को
लगा सके, इससे उनका दिल आनन्द और गर्व से फूल उठता था। ऐसे बहुत
सज्जन देखे गये हैं जो केवल कर्त्तव्य की खातिर अथवा बन्धुत्व को निभाने के लिए
ही इस विप्लव कार्य मे योग देते थे, इसी से उनके कार्य में वैसा उत्साह न देखा
जाता था और इसीलिए वे अधिकांश समय मुरझाये से रहते थे। ऐसा भाव देख-
कर हम उन्हें अधिक दिन यह विडम्बना न भोगने देते, और शीघ्र ही निर्विवाद
रूप से आनन्द भोगने का अवसर दे देते थे, जिससे वे छुटकारा पाकर शान्ति से
दम ले सकें। किन्तु जब-जब ऐसा नहीं किया गया है, जब-जब प्रकृति और प्रवृत्ति
के विरुद्ध आचरण किया गया है, तब-तब प्रकृति देवी ने अपना पूरा बदला चुकाया
है। प्रताप वैसे कर्त्तव्य की खातिर ही उस कार्य में योग न देते थे। उन जैसे युवक
मैंने बहुत ही कम देखे हैं। प्रताप केवल स्वयं ही आनन्द में रहते हों सो नहीं,

124 / बन्दी जीवन
उनके संग में जो रहते थे वे भी आनन्द पाते थे । तो भी बीच-बीच में प्रताप का
मन माता-पिता के लिए अधीर न होता हो सो नहीं, हमारा तो विचार है कि
जिसका मन ऐसी अवस्था में माता-पिता के लिए अधीर न होता हो उसका
विश्वास करना उचित नहीं है। माया-मोह का एकदम अभाव होना एक बात है,
और माया-मोह में लिप्त न होना दूसरी बात । मनुष्य की दृष्टि से मैं तो उन्हीं को
श्रेष्ठ कहूँगा जिनके स्वभाव में माया-मोह की पूरी सत्ता है किन्तु जो माया-मोह
में लिप्त नहीं होते। इसी से प्रताप को जब दुःखी देखता तब मेरे प्राणों में बड़ी
ही व्यथा होती । किन्तु कार्य-क्षेत्र में जब देखता प्रताप किसी से भी पीछे नहीं है
तब फिर वैसा ही आनन्द भी प्रतीत होता ।
भले-बुरे का द्वंद्व भी प्रताप के अंतःकरण में चरम अवस्था तक जा पहुँचा
था। प्रताप के पकड़े जाने पर पुलिस बहुत दिन तक अनेक प्रकार के प्रलोभन
दिखाकर उन्हें सब गुप्त बातें प्रकट कर देने के लिए विशेष तंग करती रही। पुलिस
प्रताप से कहती कि सब गुप्त बातें कह देने पर केवल प्रताप को ही नहीं वरन्
उसके पिता को भी छोड़ दिया जायगा; यही नहीं उसके चाचा पर से भी
मुकद्दमा उठा लिया जायगा, उनकी सब सम्पत्ति फिर लौटा दी जायगी, और इस
सबके अलावा और भी कुछ पुरस्कार दिया जायगा। प्रताप की माता ने कितना
कष्ट पाया है, प्रताप के भी दण्डित हो जाने से माता की अवस्था कैसी शोचनीय
हो जायगी और इस आघात को वे कैसे सह सकेंगी, यह सब बातें पुलिस अपनी
स्वभावसिद्ध चतुराई के साथ बार-बार समझाती थी। पुलिस की ये सब बातें
बिल्कुल निर्मूल हों सो भी तो न था। पहले-पहल तो वे पुलिस के साथ ज्यादा
देर ठीक तरह बात ही न करते थे । पीछे उन लोगों के साथ बात करना प्रताप
को मानो कुछ-कुछ भला लगने लगा। एक दिन पुलिसवालों के साथ प्रताप की
क़रीब तीन-चार घंटे बातचीत हुई। हम सब पास की निर्जन कोठरी में बैठे-बैठे
दम थामकर ज़मीन-आसमान की बातें सोचने लगे, सन्देह हुआ कि अब की बार
प्रताप फूट पड़ेगा । पीछे मुकद्दमा आरम्भ होने पर जब हम सबको प्रायः दिनभर
इकट्ठा रहने का सुयोग मिला तब मालूम हुआ कि सच ही प्रताप का मन बहुत
विचलित हो गया था। यहां तक कि अन्त में एक दिन प्रताप ने पुलिस से कह
दिया कि वे एक दिन और सब बातों पर विचार कर लें फिर कहना होगा तो
कह देंगे। किन्तु अगले दिन जब पुलिस प्रताप से मिलने आई, प्रताप बोले, "देखिए
बहुत सोचा-विचारा अन्त में तय किया है कि कोई बात नहीं खोलूँगा। अभी तक
तो केवल मेरी ही माता कष्ट पा रही हैं, किन्तु यदि मैं गुप्त बातें प्रकट कर दूं तो
और भी कितने लोगों की माताएँ ठीक मेरी माता के समान दुःख पाएँगी, एक माँ
के बदले और कितनी माताओं को तब हाहाकार करना होगा।"-मन के एक
बार नीचे फिसल पड़ने पर उसे फिर अपनी जगह लौटा लाना कितना कठिन कार्य
है, यह चिन्ताशील व्यक्ति ही समझ सकते हैं ।
नहीं मालूम, आज भारत में कितने ऐसे पिता हैं, जो सरदार केशरीसिंहजी

दिल्ली में / 125
की तरह सब जान-बूझकर अपने को और अपनी सन्तान को इस प्रकार देश के
कार्य में बलि दे सकेंगे। भारत का दुर्भाग्य है कि प्रताप-सा युवक आज इस जगत्
में नहीं है। बरेली जेल में अंग्रेज़ों का दण्ड भोगते-भोगते उसका नश्वर शरीर उस
दिव्य आत्मा का साथ न निबाह सका। इसी प्रताप के साथ मैं दिल्ली गया था
और कई दिन तक इकट्ठे काम करने का अवसर पाया था। उस समय प्रताप की
आयु लगभग बाईस बरस की रही होगी। दिल्ली में, हमने इस यात्रा में कितना
काम किया यह दूसरे परिच्छेद में लिखा जायगा।
(2) मुसलमान विप्लवदल की कहानी
पहले ही कह चुके हैं कि पंजाब का विप्लवायोजन विफल हो जाने के बाद
मुसलमान विप्लव संघ के साथ हमारे दल का पहले-पहल परिचय हुआ। इस
बार दिल्ली में रहते समय इस विप्लव दल के साथ हमें और भी घनिष्ठ परिचय
करने का अवकाश मिला।
इस मुसलमान विप्लव दल के विषय में हमारे देशवासी एकदम कुछ भी
नही जानते; कारण, कि इनका काम-काज प्रकट रूप से कुछ भी दिखाई नहीं
दिया। गत तुर्की इटैलियन युद्ध के समय से ही भारत मे इस विप्लवदल का
सूत्रपात हुआ है। उसी युद्ध के समय, शायद 1911 ई० में, भारत के मुसलमानों
ने युद्ध में घायलों की सेवा-सुश्रूषा करने के लिए तुर्की में एक दल (Medical
Mission) भेजा। उस दल में अधिकतर मुसलमान लोग ही थे। पंजाब के
'ज़मींदार' पत्र के सम्पादक श्रीयुत ज़फ़रअलीखाँ भी उस दल में थे।
इस दल ने तुर्की के सुलतान और अन्यान्य स्वदेश-प्रेमी मुसलमान सेनापतियों
और राजकर्मचारियो के निकट विशेष सम्मान और आदर पाया। मेरे एक मुसल-
मान बन्धु मुझसे कहते थे कि उसी आदर की अधिकता से उनका माथा गर्म
हो गया था। जिन्हें भारत में पग-पग पर लांछन और अपमान सहना होता था,
उन्हें जब तुर्की में राजा के अतिथि रूप में राजसम्मान के साथ समग्र तुर्की में
भ्रमण करने का सुयोग मिला तब उनका माथा गर्म होना ही चाहिए था।
भारत की आबहवा में रहकर इतने दिन तक मुसलमान समाज में किसी चेतना के
लक्षण दिखाई नही दिए, किन्तु जब इसी मुसलमान दल के लोग तुर्की की स्वाधीन
आबहवा के स्पर्श में आए और जब उन्होंने देखा कि आज भी उनके स्वधर्मी
लोगो ने यूरोपवालों के देश में भी अपना आधिपत्य बराबर बना रखा है, और
ऐसे एक स्वधर्मावलम्बी राज्य के बाल-वृद्ध-वानता तक, प्रत्येक व्यक्ति ने
जब भारतीय मुसलमान दल को आदर के साथ अपनाया, तब उनकी कितने ही
समय की मोह-निद्रा मानो पल-भर में उड़ गई, सहसा भारतीय मुसलमानों ने
अपने को पहचान लिया। तुर्की इटैलियन युद्ध के फलस्वरूप भारतीय मुसलमान
समाज में साधारण रूप से एक जागृति के लक्षण दिखाई दिए थे। काशी में देखा,
धुनिये-जुलाहे और गाडीवान तक रोज़ तुर्की का संवाद जानने के लिए व्यस्त रहते
थे। स्वधर्मी लोगों की समवेदना किसी मुसलमान को कष्ट के साथ अर्जन नहीं

126 / बन्दी जीवन
करनी पड़ती, यह तो उसका जन्मगत संस्कार होता है । इस साधारण जागृति
के सिवाय, तुर्की में मैडिकल मिशन भेजने के बाद भारत के मुसलमानों में भी
विप्लव का कार्य आरम्भ हो जाता है । रोलट रिपोर्ट में लिखा है कि अंग्रेजों के
तुर्की इटैलियन युद्ध के समय तुर्की को सहायता न देने के कारण भारतवर्ष के
मुसलमानों में असन्तोष का भाव फैल गया । पर हमारे विचार में यह बात गलत
है । अंग्रेज तुर्की की सहायता करते तो भी मुसलमानों में यह जागरण अवश्यं-
भावी था, क्योंकि असल बात तो यह थी कि बाहर के आघात से, बाहर के
संस्पर्श में आने से एक अपने को भूली हुई जाति जाग गई .? अंग्रेजों के साथ उस
जाति का क्या सम्बन्ध था, यह दूसरी बात है ।
जो हो, इस मैडिकल मिशन के अनेक युवक तुर्की के संस्पर्श में आने से
विप्लव धर्म में दीक्षित हो गए और भारत में आकर उन्होंने मुसलमान सम्प्रदाय
के बीच विप्लव का कार्य आरम्भ कर दिया । और तुर्की की गवर्नमेंट ने इन
मुसलमानो में से किसी-किसी को अथवा इनके पसन्द के व्यक्तियों को भारतवर्ष
में तुर्की राजदूत (Consul) नियुक्त कर दिया था । देश के जनसाधारण को
इन बातों का कुछ भी पता न मिल सका, किन्तु भारत सरकार इन सब बातों के
अलावा और भी बहुत कुछ जानती है ।
किन्तु मुसलमान विप्लव दल पहले से ही बाहर की मुसलमान शक्तियों की
ओर ही विशेष लक्ष्य रखता था । इनको सब आशा-प्रतीक्षा इसीलिए भारत के
बाहर ही केन्द्रित थी । मुसलमान विप्लव दल के जिन सज्जन के साथ दिल्ली में
मेरी बातचीत हुई थी उनके नजदीक सुना था कि इस विप्लव दल ने इसी बीच
काबुल से भारत पर आक्रमण करने के लिए अनेक बार अनुरोध किया था ।
मैंने उस दिन उनके इस कार्य का घोर प्रतिवाद किया था । उन्होंने मुझे यह
समझाने का यत्न किया कि बाहर की किसी राजशक्ति की सहायता के बिना
भारत की विप्लव चेष्टा सार्थक न होगी मैंने भी उन्हें यह समझाने की चेष्टा की
कि बाहर की सहायता चाहने का यह अर्थ न होना चाहिए कि बाहर की कोई
राजशक्ति आकर भारत में दखल कर ले । उन्होंने मुझे बड़े यत्न से यह समझाना
चाहा कि काबुल वाले भारत में आकर यहाँ स्थायी रूप से कभी न रहेंगे । हमें
स्वाधीन कराकर ही चले जाएंगे । भारत के बहुत-से मुसलमानों की ऐसी ही
धारणा है ।
किन्तु इन्हीं मुसलमान लोगों ने बीच-बीच में कई बार हमारी धन से सहायता
की थी । उनके साथ बातचीत करके जहाँ तक समझ सका हूँ उससे जान पड़ता
है कि मुसलमानों का यह विप्लव दल सारे देश में एक साथ ही कार्य करता था ।
उनका यह विप्लव दल पंजाब के सीमान्त प्रदेश से लेकर सुदूर ब्रह्म देश तक फैल
गया था । किन्तु हमारे बंगाल के विप्लव दल में दलबन्दी का अन्त न था । पर
सौभाग्य से बंगाल के बाहर उत्तर भारत में एकमात्र हमारा दल ही था, इसी से
इधर दलबन्दी का कोई विशेष अवकाश न था ।

दिल्ली में / 127
हमारे दल से मुसलमान दल का यही भेद था कि हम लोग स्वाधीन भारत
के जिस रूप की कल्पना करते थे, उसमें हिन्दुओं के स्वावलम्बन की बात भले
रही हो, हिन्दुओं की प्रधानता का कोई विचार न था, एवं हमारी कार्य-प्रणाली
में मुसलमानों को अलग रखने का ख्याल दूर रहा, हम तो उन्हें दल में खींचने की
ही चेष्टा करते थे। हमारे बुलाने पर मुसलमान यदि नहीं आते थे तो उसका
कारण यह था कि मुसलमान लोग भारतवर्ष से हिन्दुओं की तरह प्रेम न करते
थे। मुसलमानों के साथ मिलने-जुलने से हमारी यह धारणा हुई है कि हमारे देश
के मुसलमान लोगोंका तुर्की, मिश्र, अरब, फारिस अथवा काबुल की ओर जितना
खिचाव है, भारत की ओर उतना नहीं है। वे तुर्की के गौरव में अपने को जितना
गौरवान्वित मानते हैं, भारतवासियों के, हिन्दुओं के गौरव में अपने को उतना
गौरवान्वित नहीं मानते। मुसलमानों के मन के भाव बहुत कुछ ऐसे थे इसी
कारण उनका विप्लव दल भी एक स्वतन्त्र रूप से गठित हुआ था। नवीन तुर्की
के आदर्श से अनुप्राणित होकर भारत के अनेक मुसलमान विप्लववादियों ने भी
विश्व-इस्लामिक (Pan-Islamic) आदर्श को ग्रहण किया था, इसीलिए भारत
के मुसलमान विप्लव दल को केवल भारतीय विप्लव दल न कहकर भारत का
मुसलमान विप्लव दल कहना संगत है। हमारे इन दोनों विप्लव दलों के
सिवाय दिल्ली में और भी एक दल था और सम्भवतः अब भी है। यह दल कोई
गुप्त समिति न थी। इस विषय की आलोचना आगे की गई है।
(3) दिल्ली के निष्कलंकी दल की कहानी
इन्द्रप्रस्थ, हस्तिनापुर अथवा दिल्ली हिन्दुओं के मन पर कैसा मोहजाल डाल
देती है ! काल के चक्कर मे पड़कर कितने भिन्न-भिन्न राजवंश, कितनी देश-
देशान्तर की जातियाँ आकर दिल्ली के कितने नये-नये रूपों की सृष्टि कर गईं,
कितनी जातियों के उत्थान और पतन के बीच दिल्ली का इतिहास गठित हुआ है,
और दिल्ली के इतिहास की तरंग के साथ मानो भारत का इतिहास भी तरंगित
होता रहा है। हिन्दुओं की गौरवमंडित दिल्ली विदेशी विधर्मियों के पैरों तले
आकर आर्य-कीर्ति को लांछित करने लगी, फिर इसी दिल्ली में ही युग-युग में
भिन्न-भिन्न राजशक्तियों की परीक्षा चलने लगी, कितने संघर्ष, कितने राष्ट्र-
विप्लव, कितने विरोधों के बीच दिल्ली का आधुनिक इतिहास गठित होता है।
इसी से दिल्ली के इतिहास का अर्थ हो जाता है, भारत साम्राज्य का इतिहास।
और इस क्षात्र-शक्ति के संघर्ष के इतिहास में जहाँ दिल्ली का इतिहास गठित
होता है, वहाँ इसी दिल्ली में ही अनेक साधु-सम्प्रदायों का भी आविर्भाव होता
है। मुसलमान आधिपत्य के समय जैसे दिल्ली के निकट सतनामी सम्प्रदाय का
आविर्भाव हुआ था वैसे ही अंग्रेजों के इस आधिपत्य के समय इसी दिल्ली में
निष्कलंकी दल का आविर्भाव हुआ है। सतनामी सम्प्रदाय के समान यह दल भी
बहुत ही क्षुद्र है। आज प्रायः तीस साल से यह दल दिल्ली में है। इन तीस वर्षों

128 / बन्दी जीवन
में ये लोग भारत की स्वाधीनता के लिए समस्त पृथ्वी पर सत्ययुग को लाने के
लिए भगवान् के निकट नित्य प्रार्थना करते आए हैं। वे विश्वास करते हैं कि
कलियुग समाप्त हो गया है और कल्किदेव के आविर्भाव का समय हो गया है।
आजकल ये लोग प्रचार करते हैं कि कल्किदेव ने जन्म ले लिया है और शीघ्र ही
प्रकट होंगे। किन्तु इस शीघ्र का अर्थ क्या है अर्थात् ठीक कितने दिन में कल्किदेव
दिखाई देंगे, यह ये लोग नहीं कह सकते। ये लोग कहते हैं कि जब श्री भगवान ने
रामचन्द्र रूप में जन्म लिया था तब सारे भारत में केवल बारह ऋषि जानते थे
कि श्रीराम भगवान् के ही अवतार हैं; और लोग यह बात जानते भी न थे और
उस समय विश्वास भी न करते थे। इसी प्रकार वर्तमान काल में भी ऐसे लोग
बहुत नहीं हैं जो यह जानते हों कि भगवान् का अवतार हुआ है। ये लोग कहते हैं
कि वर्तमान युग में भारतवर्ष में अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया है, उनमें से अनेक
अपने असल रूप को नहीं जानते। जिस दिन उन महापुरुषों के सम्राट् अपने को
प्रकाशित करेंगे, उसी दिन ये सब अपनी शक्ति-सामर्थ्य की बात और अपने पूर्व
जन्म की बात जान सकेंगे। इन महापुरुषों में से कई बड़े ही शक्तिशाली हैं, एवं
इनमें से कोई-कोई ऐसे भी हैं जो समझते हैं कि वे ही शायद भगवान् के अवतार हैं।
ये लोग कहते हैं कि इस बार भगवान् ने ब्राह्मण के घर में जन्म लिया है, इसी से
वे सभी के पूज्य होंगे। अन्यान्य युगों में क्षत्रिय आदि के घर जन्म लिया था इसी
कारण उन्हें भगवान् का अवतार होते हुए भी ब्राह्मणों के चरणों में झुकना पड़ता
था, इस बार वे ब्राह्मण के घर में जन्म ग्रहण कर सबसे पूजा ग्रहण करेंगे और
ब्राह्मण के घर में जन्म लेने के कारण ही इस युग में उनका आचरण ऐसा होगा
कि देश-विदेश में ऐसा कोई न होगा जो उनके किसी भी कार्य पर अँगुली उठा
सके। अन्यान्य युगों के अवतार-पुरुषों का आचरण ऐसा नहीं हुआ कि उनके चरित्र
में कोई दोष न दिखाया जा सके, किन्तु इस बार उनका आचरण ठीक भगवान्
की ही तरह निष्कलंक होगा। ये लोग विश्वास करते हैं कि कल्किदेव खड्गधारी
होने पर भी किसी के विरुद्ध अस्त्र धारण न करेंगे। ये लोग कहते हैं कि भारत की
स्वाधीनता के लिए इस बार हिन्दुओं को अस्त्र ग्रहण न करने होंगे; कारण कि
भारत के जो शत्रु हैं, जो पापी लोग हैं, जिनकी प्रकृति खल और असुर भावों से
पूर्ण है, वे सभी आपस में ही मार-काट करके नष्ट हो जाएँगे और उनमें से जो
बचे रहेंगे वे भी रोग, महामारी और दुर्भिक्ष में मर जाएँगे। इस तरह इस बार
पृथ्वी पाप-भार से मुक्त हो जाएगी और इस प्रकार जो सत् प्रकृति के पुरुष हैं,
वे ही बच जाएँगे और पृथ्वी पर सत्ययुग का आविर्भाव होगा। वे कहते हैं कि
सत्ययुग का कार्य आरम्भ हो गया है एवं और कुछ बरसों के अन्दर ही संसार से
पाप का लोप हो जायगा।
इनकी साधना की पद्धति होती थी, लगातार कल्किदेव का नाम जपना और
उनके निकट भारत के और जगत् के मंगल के लिए सामूहिक रूप से और व्यक्ति-
गत रूप से नित्य प्रार्थना करना। ये कहते हैं भगवान् ही जब जगत् के एकमात्र

दिल्ली में / 129

कर्ता और नियन्ता हैं, तब सब प्रकार से उन्हीं के शरणागत होकर उन्हें स्मरण
करना और उनकी ध्यान-धारणा करना ही हमारा एकमात्र कार्य है। संसार के
सब कार्य करते रहने पर भी भारत की स्वाधीनता और भारत के सर्वांगीण मंगल
के लिए एक प्रार्थना करने के सिवाय और कुछ भी ये लोग नहीं करते—और ये
लोग कोई संन्यासी भी नही होते। इनके प्रायः सभी सिद्धान्त विप्लवियों के समान
हैं, और भारत के विप्लव प्रयासी दल के लोगों को ये खूब अच्छा भी मानते थे,
किन्तु कार्यक्षेत्र में और सब प्रकार से साधारण संसारियों की तरह होने पर
भी भारत की स्वाधीनता के लिए ये लोग एक प्रार्थना के सिवाय और कुछ भी
करना नहीं चाहते या नहीं करते। कह नहीं सकता इन लोगों में सचमुच कोई
मानसिक या चरित्रगत दुर्बलता है कि नही, क्योंकि इन लोगों के साथ अच्छी
तरह मिल-जुलने का सुयोग अथवा अवसर मुझे नहीं मिला। इस बार दिल्ली में
आने से पहले ही यद्यपि इस सम्प्रदाय की बात मैं सुन चुका था, तो भी इनमें से
किसी के भी साथ अब तक साक्षात् रूप से बातचीत और परिचय न हुआ था।
इस बार दिल्ली में रहते समय इनके दल के नायक के साथ केवल दो-तीन दिन
बात करने का सुयोग पाया। इन्हें सब लोग बालमुकुन्द उर्फ हनुमानजी कहते
थे। सुना था कि ये बीच-बीच में दिल्ली की आम सड़क पर पुकार उठते थे कि
भगवान् कल्किदेव का आविर्भाव हो गया है, पापी लोग सावधान हो जाओ, इस
समय सब लोग भगवान् के नाम का जप करो और पूर्ण रूप से सरल अन्तः-
करण के साथ उनके शरणागत हो जाओ, इस बार पापियों का और कोई निस्तार
नहीं है, समय रहते सब सावधान हो जाओ, और पिछले पाप कर्मों के लिए अनु-
तप्त होकर भगवान् कल्किदेव के शरणागत हो जाओ, इत्यादि-इत्यादि।
प्रताप के साथ इस बार दिल्ली में रहते समय मैने इन्ही बालमुकुन्दजी के
साथ बातचीत की थी। ये बिलकुल सीधे-सादे गरीब ब्राह्मण थे, लिखना-पढ़ना
कुछ भी नही जानते थे। अपने हाथ से ही रसोई करते और अपने जूठे बर्तन आदि
स्वयं साफ़ करते। इस दल के सभी लोग इन पर यथेष्ठ श्रद्धा-भक्ति रखते थे।
इनके इस दल में मध्यम दर्जे के शिक्षित श्रेणी के लोग कोई बहुत न थे। प्रायः ये
सभी अंग्रेज़ी से अनभिज्ञ और गोहत्या करनेवालो के परम शत्रु थे।
इनके नायक बालमुकुन्दजी अब देह त्याग कर चुके हैं, और आज मालूम
होता है पाँच-छः वर्ष से मध्यम श्रेणी के अंग्रेजी पढ़े लोग भी इनके दल में आकर
योग देने लगे है।
यह अवतार के आविर्भाव की बात दिल्ली के निष्कलंकियों के दल के सिवाय
और भी अनेक लोगों से सुनने में आई है। मेरे जेल से लौटने के बाद गोरखपुर
मे मेरे मामाजी के पास एक साधु आये थे। वे भी निष्कलंकी दल की तरह अनेक
बातें कह गए थे। पिछले युद्ध के समय अमेरिका जब जर्मनी के विरुद्ध अंग्रेजों के
पक्ष में नही मिला था, उस समय यही साधु आकर मामाजी से और मेरे मंझले
भाई से अमेरिका के अंग्रेजों से मिल जाने और अन्त में अंग्रेज़ों के पक्ष के जीतने

130 / बन्दी जीवन
की भविष्यवाणी कर गए थे; अण्डमन में रहते समय ही यह सब बात मुझे लिख
भेजी गई थी; वह पत्र अब भी मेरे पास है। इसके सिवाय कलकत्ता हाईकोर्ट
के भूतपूर्व वकील "ब्रह्मविद् ऋषि ओ ब्रह्मविद्या" नामक ग्रंथ के लेखक श्रद्धेय
श्रीयुत ताराकिशोर शर्मा महाशय भी इस अवतार की बात का बहुत दिन से
प्रचार करते आते हैं। युगान्तर के प्रसिद्ध सम्पादक उपेन बाबू से भी कई साधुओं
ने इस प्रकार की अनेक बातें कही थीं। इन सबकी बातें पूरी तरह एक न होने
पर भी इन सबकी बातों का सारांश प्रायः एक ही था।
(4) दिल्ली के विप्लव दल का पुनर्गठन
दिल्ली के विप्लव दल के दो मुख्य कार्यकर्ता श्रीयुत अवधबिहारी और
श्रीयुत अमीरचन्द उत्तर भारत के अनेक विप्लवियों की अपेक्षा बहुत अंशों में
श्रेष्ठ थे। इनकी प्रकृति में धर्म-भाव अत्यन्त प्रबल था। धर्म और कर्म का इस
प्रकार एकत्र समावेश भारत के बहुत थोड़े विप्लवियों में देखने को मिला है।
अवधबिहारी की आयु जब केवल तेईस या चौबीस वर्ष की थी, तब से अथवा
उसके भी कुछ दिन पहले से ही वे इस विप्लव दल में योग देते थे। इस आयु में ही
उनकी प्रकृति में जैसा धर्म-भाव देखा गया था उससे कहना पड़ता है कि ऐसा
संस्कार लेकर ही उन्होंने जन्म लिया था। एक उर्दू कविता उन्हें बहुत प्रिय थी,
जिसे वे प्रायः दोहराया करते थे। वह कविता इतनी सुन्दर है कि उसे यहाँ उद्धृत
किये देता हूँ। कविता यह है—
"एहसान नाखुदा¹ का उठाये मेरी बला,
कश्ती खुदा पै छोड़ दूँ लंगर को तोड़ दूँ।"
सचमुच ठीक इसी प्रकार अगाध विश्वास हृदय में रखते हुए अवधबिहारी
ने अपनी जीवन नौका आरपार हीन महासागर के बीच ही छोड़ दी थी।
अवधबिहारी की अपेक्षा अमीरचन्द उम्र में बीस वर्ष बड़े थे। अमीरचन्द
शिक्षक का कार्य करते थे और बचपन से ही अवधबिहारी अमीरचन्द के पास,
पहले छात्र रूप में और फिर शिष्य रूप में तथा मित्र रूप में, उन्हीं की संगत में
पले और बड़े हुए थे। ये अमीरचन्द स्वामी रामतीर्थ के विशेष भक्त और शिष्य
थे। और इनके साथ स्वामीजी का साक्षात् परिचय भी था। स्वामीजी की वक्तृता
आदि का इन्होंने ही सबसे पहले प्रचार आरम्भ किया था।
इन्हीं के प्रभाव से दिल्ली के अन्यान्य कार्यकर्त्ताओं में भी ऐसा ही धर्म-भाव
अंकित हो गया था। इनमें से श्रीयुत लछमीनारायण और श्रीयुत गणेशीलाल
खास्ता का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
अमीरचन्द और अवधबिहारी के साथ मेरी वैसी घनिष्ठता न हुई'; कारण
कि वे पहले ही पकड़े गए थे। किन्तु इस बार प्रताप के साथ दिल्ली आकर

  1. नाखुदा = मल्लाह ।

दिल्ली में / 131
लछमीनारायण और खास्ताजी के साथ खूब घनिष्ठ रूप से मिलने का अवसर
'पाया ।
दिल्ली के निष्कलंकियों की बात अवधबिहारी आदि सभी जानते थे; किन्तु
इनमें से लछमीनारायण निष्कलंकियों के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे, मैं जिस
समय की कहानी कह रहा हूँ उस समय लछमीनारायण वैद्यक पढ़ते थे और निष्क-
लंकियों की तरह अंग्रेज़ी के नज़दीक न फटकते थे ।
अवधबिहारी और अमीरचन्द के पकड़े जाने पर दिल्ली के विप्लव दल का
कार्यभार लछमीनारायण और गणेशीलाल पर आ पड़ा । गणेशीलाल फ़ारसी के
बड़े पण्डित थे और बड़ी अच्छी कविता लिख सकते थे । लाला हरदयाल खास्ता
जी का बहुत-सी कविताएँ अपनी 'गदर' पत्रिका में उद्धृत कर देते थे; और
हमारे मुकद्दमे में केवल इस किस्म की जातीय भावपूर्ण कविता लिखने के अपराध
में ही उन्हें सात बरस की कड़ी क़ैद की सजा हुई थी । खास्ताजी भी अंग्रेज़ी
लिखना-पढ़ना कुछ न जानते थे, किन्तु फ़ारसी भाषा के सहारे जितना ज्ञान पाया
जा सकता है वह सब उन्होंने पाया था । खास्ताजी का दर्शनशास्त्र से विशेष प्रेम
था, उनकी प्रकृति में ज्ञान की प्रवृत्ति ही विशेष पुष्ट हुई थी ।
मैं इस बार प्रताप के साथ दिल्ली आने के पहले और भी कई बार दिल्ली
आया था, और तब से ही देखता था कि अवधबिहारी आदि की गिरफ़्तारी के
बाद से दिल्ली में हमारा काम प्रायः कुछ भी आगे नहीं बढ़ रहा था । लछमी और
खास्ताजी का उत्साह धीरे-धीरे मन्द-सा होता जाता था। दिल्ली षड्यन्त्र के
मामले की सुनाई खतम होने के बाद पहले-पहल लछमी और सबकी अपेक्षा अधिक
उत्साही थे, और अनेक विपत्तियों के बीच में भी हमारे साथ मिलते-जुलते थे ।
पहले-पहल वे विपत्ति की परवाह न करके दल के अनेक कार्य करते थे, किन्तु
थोड़े ही दिन में उनका उत्साह मन्द हो गया । धीरे-धीरे अवस्था ऐसी हो गई कि
लक्ष्मी अब लोक-संग्रह की वैसी चेष्टा न करते थे, और आधी इच्छा से जिन सब
लोगों का उन्होंने संग्रह किया था वे भी वैसे उत्साही न होते थे । किन्तु इस समय
लछमीनारायण के मन में एक और भाव क्रमशः बढ़ने लगा । दिल्ली के निष्क-
लंकियों के साथ घनिष्ठता होने के कारण उनमें यह परिवर्त्तन हुआ । उनके मत
में कोई परिवर्त्तन न होने पर भी क्रमशः वे कार्य में निश्चेष्ट होते जाते, और
अधिकांश समय भगवान् का नाम जपने और उनकी आराधना में ही गँवा देते ।
इस तरह धीरे-धीरे वे हमारे काम की अवहेलना करने लगे। वे स्वयं जिस प्रकार
निष्कलंकियों के प्रति अगाध विश्वास रखते थे उसी प्रकार जिन कुछ कार्यकर्त्ताओं
का संग्रह किया था उन्हें भी इसी निष्कलंकी दल के विश्वासी भक्त बना डालने
लगे । फलतः हमारे कार्य में उनका वैसा उत्साह न रहा । अन्त में हमने सुना कि
लछमीनारायण खाली प्रार्थना करने के सिवाय हाथ से या क़लम से और कुछ भी
न करेंगे, और उनके अनुयायी भी उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करेंगे ।
इन सब कारणों से अनेक प्रकार से विप्लव की चेष्टा विफल होने के बाद हम