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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 408 में से

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पृष्ठ 133

दिल्ली में / 131
लछमीनारायण और खास्ताजी के साथ खूब घनिष्ठ रूप से मिलने का अवसर
'पाया ।
दिल्ली के निष्कलंकियों की बात अवधबिहारी आदि सभी जानते थे; किन्तु
इनमें से लछमीनारायण निष्कलंकियों के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे, मैं जिस
समय की कहानी कह रहा हूँ उस समय लछमीनारायण वैद्यक पढ़ते थे और निष्क-
लंकियों की तरह अंग्रेज़ी के नज़दीक न फटकते थे ।
अवधबिहारी और अमीरचन्द के पकड़े जाने पर दिल्ली के विप्लव दल का
कार्यभार लछमीनारायण और गणेशीलाल पर आ पड़ा । गणेशीलाल फ़ारसी के
बड़े पण्डित थे और बड़ी अच्छी कविता लिख सकते थे । लाला हरदयाल खास्ता
जी का बहुत-सी कविताएँ अपनी 'गदर' पत्रिका में उद्धृत कर देते थे; और
हमारे मुकद्दमे में केवल इस किस्म की जातीय भावपूर्ण कविता लिखने के अपराध
में ही उन्हें सात बरस की कड़ी क़ैद की सजा हुई थी । खास्ताजी भी अंग्रेज़ी
लिखना-पढ़ना कुछ न जानते थे, किन्तु फ़ारसी भाषा के सहारे जितना ज्ञान पाया
जा सकता है वह सब उन्होंने पाया था । खास्ताजी का दर्शनशास्त्र से विशेष प्रेम
था, उनकी प्रकृति में ज्ञान की प्रवृत्ति ही विशेष पुष्ट हुई थी ।
मैं इस बार प्रताप के साथ दिल्ली आने के पहले और भी कई बार दिल्ली
आया था, और तब से ही देखता था कि अवधबिहारी आदि की गिरफ़्तारी के
बाद से दिल्ली में हमारा काम प्रायः कुछ भी आगे नहीं बढ़ रहा था । लछमी और
खास्ताजी का उत्साह धीरे-धीरे मन्द-सा होता जाता था। दिल्ली षड्यन्त्र के
मामले की सुनाई खतम होने के बाद पहले-पहल लछमी और सबकी अपेक्षा अधिक
उत्साही थे, और अनेक विपत्तियों के बीच में भी हमारे साथ मिलते-जुलते थे ।
पहले-पहल वे विपत्ति की परवाह न करके दल के अनेक कार्य करते थे, किन्तु
थोड़े ही दिन में उनका उत्साह मन्द हो गया । धीरे-धीरे अवस्था ऐसी हो गई कि
लक्ष्मी अब लोक-संग्रह की वैसी चेष्टा न करते थे, और आधी इच्छा से जिन सब
लोगों का उन्होंने संग्रह किया था वे भी वैसे उत्साही न होते थे । किन्तु इस समय
लछमीनारायण के मन में एक और भाव क्रमशः बढ़ने लगा । दिल्ली के निष्क-
लंकियों के साथ घनिष्ठता होने के कारण उनमें यह परिवर्त्तन हुआ । उनके मत
में कोई परिवर्त्तन न होने पर भी क्रमशः वे कार्य में निश्चेष्ट होते जाते, और
अधिकांश समय भगवान् का नाम जपने और उनकी आराधना में ही गँवा देते ।
इस तरह धीरे-धीरे वे हमारे काम की अवहेलना करने लगे। वे स्वयं जिस प्रकार
निष्कलंकियों के प्रति अगाध विश्वास रखते थे उसी प्रकार जिन कुछ कार्यकर्त्ताओं
का संग्रह किया था उन्हें भी इसी निष्कलंकी दल के विश्वासी भक्त बना डालने
लगे । फलतः हमारे कार्य में उनका वैसा उत्साह न रहा । अन्त में हमने सुना कि
लछमीनारायण खाली प्रार्थना करने के सिवाय हाथ से या क़लम से और कुछ भी
न करेंगे, और उनके अनुयायी भी उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करेंगे ।
इन सब कारणों से अनेक प्रकार से विप्लव की चेष्टा विफल होने के बाद हम