बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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की भविष्यवाणी कर गए थे; अण्डमन में रहते समय ही यह सब बात मुझे लिख
भेजी गई थी; वह पत्र अब भी मेरे पास है। इसके सिवाय कलकत्ता हाईकोर्ट
के भूतपूर्व वकील "ब्रह्मविद् ऋषि ओ ब्रह्मविद्या" नामक ग्रंथ के लेखक श्रद्धेय
श्रीयुत ताराकिशोर शर्मा महाशय भी इस अवतार की बात का बहुत दिन से
प्रचार करते आते हैं। युगान्तर के प्रसिद्ध सम्पादक उपेन बाबू से भी कई साधुओं
ने इस प्रकार की अनेक बातें कही थीं। इन सबकी बातें पूरी तरह एक न होने
पर भी इन सबकी बातों का सारांश प्रायः एक ही था।
(4) दिल्ली के विप्लव दल का पुनर्गठन
दिल्ली के विप्लव दल के दो मुख्य कार्यकर्ता श्रीयुत अवधबिहारी और
श्रीयुत अमीरचन्द उत्तर भारत के अनेक विप्लवियों की अपेक्षा बहुत अंशों में
श्रेष्ठ थे। इनकी प्रकृति में धर्म-भाव अत्यन्त प्रबल था। धर्म और कर्म का इस
प्रकार एकत्र समावेश भारत के बहुत थोड़े विप्लवियों में देखने को मिला है।
अवधबिहारी की आयु जब केवल तेईस या चौबीस वर्ष की थी, तब से अथवा
उसके भी कुछ दिन पहले से ही वे इस विप्लव दल में योग देते थे। इस आयु में ही
उनकी प्रकृति में जैसा धर्म-भाव देखा गया था उससे कहना पड़ता है कि ऐसा
संस्कार लेकर ही उन्होंने जन्म लिया था। एक उर्दू कविता उन्हें बहुत प्रिय थी,
जिसे वे प्रायः दोहराया करते थे। वह कविता इतनी सुन्दर है कि उसे यहाँ उद्धृत
किये देता हूँ। कविता यह है—
"एहसान नाखुदा¹ का उठाये मेरी बला,
कश्ती खुदा पै छोड़ दूँ लंगर को तोड़ दूँ।"
सचमुच ठीक इसी प्रकार अगाध विश्वास हृदय में रखते हुए अवधबिहारी
ने अपनी जीवन नौका आरपार हीन महासागर के बीच ही छोड़ दी थी।
अवधबिहारी की अपेक्षा अमीरचन्द उम्र में बीस वर्ष बड़े थे। अमीरचन्द
शिक्षक का कार्य करते थे और बचपन से ही अवधबिहारी अमीरचन्द के पास,
पहले छात्र रूप में और फिर शिष्य रूप में तथा मित्र रूप में, उन्हीं की संगत में
पले और बड़े हुए थे। ये अमीरचन्द स्वामी रामतीर्थ के विशेष भक्त और शिष्य
थे। और इनके साथ स्वामीजी का साक्षात् परिचय भी था। स्वामीजी की वक्तृता
आदि का इन्होंने ही सबसे पहले प्रचार आरम्भ किया था।
इन्हीं के प्रभाव से दिल्ली के अन्यान्य कार्यकर्त्ताओं में भी ऐसा ही धर्म-भाव
अंकित हो गया था। इनमें से श्रीयुत लछमीनारायण और श्रीयुत गणेशीलाल
खास्ता का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
अमीरचन्द और अवधबिहारी के साथ मेरी वैसी घनिष्ठता न हुई'; कारण
कि वे पहले ही पकड़े गए थे। किन्तु इस बार प्रताप के साथ दिल्ली आकर
- नाखुदा = मल्लाह ।