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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 408 में से

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पृष्ठ 131

दिल्ली में / 129

कर्ता और नियन्ता हैं, तब सब प्रकार से उन्हीं के शरणागत होकर उन्हें स्मरण
करना और उनकी ध्यान-धारणा करना ही हमारा एकमात्र कार्य है। संसार के
सब कार्य करते रहने पर भी भारत की स्वाधीनता और भारत के सर्वांगीण मंगल
के लिए एक प्रार्थना करने के सिवाय और कुछ भी ये लोग नहीं करते—और ये
लोग कोई संन्यासी भी नही होते। इनके प्रायः सभी सिद्धान्त विप्लवियों के समान
हैं, और भारत के विप्लव प्रयासी दल के लोगों को ये खूब अच्छा भी मानते थे,
किन्तु कार्यक्षेत्र में और सब प्रकार से साधारण संसारियों की तरह होने पर
भी भारत की स्वाधीनता के लिए ये लोग एक प्रार्थना के सिवाय और कुछ भी
करना नहीं चाहते या नहीं करते। कह नहीं सकता इन लोगों में सचमुच कोई
मानसिक या चरित्रगत दुर्बलता है कि नही, क्योंकि इन लोगों के साथ अच्छी
तरह मिल-जुलने का सुयोग अथवा अवसर मुझे नहीं मिला। इस बार दिल्ली में
आने से पहले ही यद्यपि इस सम्प्रदाय की बात मैं सुन चुका था, तो भी इनमें से
किसी के भी साथ अब तक साक्षात् रूप से बातचीत और परिचय न हुआ था।
इस बार दिल्ली में रहते समय इनके दल के नायक के साथ केवल दो-तीन दिन
बात करने का सुयोग पाया। इन्हें सब लोग बालमुकुन्द उर्फ हनुमानजी कहते
थे। सुना था कि ये बीच-बीच में दिल्ली की आम सड़क पर पुकार उठते थे कि
भगवान् कल्किदेव का आविर्भाव हो गया है, पापी लोग सावधान हो जाओ, इस
समय सब लोग भगवान् के नाम का जप करो और पूर्ण रूप से सरल अन्तः-
करण के साथ उनके शरणागत हो जाओ, इस बार पापियों का और कोई निस्तार
नहीं है, समय रहते सब सावधान हो जाओ, और पिछले पाप कर्मों के लिए अनु-
तप्त होकर भगवान् कल्किदेव के शरणागत हो जाओ, इत्यादि-इत्यादि।
प्रताप के साथ इस बार दिल्ली में रहते समय मैने इन्ही बालमुकुन्दजी के
साथ बातचीत की थी। ये बिलकुल सीधे-सादे गरीब ब्राह्मण थे, लिखना-पढ़ना
कुछ भी नही जानते थे। अपने हाथ से ही रसोई करते और अपने जूठे बर्तन आदि
स्वयं साफ़ करते। इस दल के सभी लोग इन पर यथेष्ठ श्रद्धा-भक्ति रखते थे।
इनके इस दल में मध्यम दर्जे के शिक्षित श्रेणी के लोग कोई बहुत न थे। प्रायः ये
सभी अंग्रेज़ी से अनभिज्ञ और गोहत्या करनेवालो के परम शत्रु थे।
इनके नायक बालमुकुन्दजी अब देह त्याग कर चुके हैं, और आज मालूम
होता है पाँच-छः वर्ष से मध्यम श्रेणी के अंग्रेजी पढ़े लोग भी इनके दल में आकर
योग देने लगे है।
यह अवतार के आविर्भाव की बात दिल्ली के निष्कलंकियों के दल के सिवाय
और भी अनेक लोगों से सुनने में आई है। मेरे जेल से लौटने के बाद गोरखपुर
मे मेरे मामाजी के पास एक साधु आये थे। वे भी निष्कलंकी दल की तरह अनेक
बातें कह गए थे। पिछले युद्ध के समय अमेरिका जब जर्मनी के विरुद्ध अंग्रेजों के
पक्ष में नही मिला था, उस समय यही साधु आकर मामाजी से और मेरे मंझले
भाई से अमेरिका के अंग्रेजों से मिल जाने और अन्त में अंग्रेज़ों के पक्ष के जीतने