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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 408 में से

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पृष्ठ 129

दिल्ली में / 127
हमारे दल से मुसलमान दल का यही भेद था कि हम लोग स्वाधीन भारत
के जिस रूप की कल्पना करते थे, उसमें हिन्दुओं के स्वावलम्बन की बात भले
रही हो, हिन्दुओं की प्रधानता का कोई विचार न था, एवं हमारी कार्य-प्रणाली
में मुसलमानों को अलग रखने का ख्याल दूर रहा, हम तो उन्हें दल में खींचने की
ही चेष्टा करते थे। हमारे बुलाने पर मुसलमान यदि नहीं आते थे तो उसका
कारण यह था कि मुसलमान लोग भारतवर्ष से हिन्दुओं की तरह प्रेम न करते
थे। मुसलमानों के साथ मिलने-जुलने से हमारी यह धारणा हुई है कि हमारे देश
के मुसलमान लोगोंका तुर्की, मिश्र, अरब, फारिस अथवा काबुल की ओर जितना
खिचाव है, भारत की ओर उतना नहीं है। वे तुर्की के गौरव में अपने को जितना
गौरवान्वित मानते हैं, भारतवासियों के, हिन्दुओं के गौरव में अपने को उतना
गौरवान्वित नहीं मानते। मुसलमानों के मन के भाव बहुत कुछ ऐसे थे इसी
कारण उनका विप्लव दल भी एक स्वतन्त्र रूप से गठित हुआ था। नवीन तुर्की
के आदर्श से अनुप्राणित होकर भारत के अनेक मुसलमान विप्लववादियों ने भी
विश्व-इस्लामिक (Pan-Islamic) आदर्श को ग्रहण किया था, इसीलिए भारत
के मुसलमान विप्लव दल को केवल भारतीय विप्लव दल न कहकर भारत का
मुसलमान विप्लव दल कहना संगत है। हमारे इन दोनों विप्लव दलों के
सिवाय दिल्ली में और भी एक दल था और सम्भवतः अब भी है। यह दल कोई
गुप्त समिति न थी। इस विषय की आलोचना आगे की गई है।
(3) दिल्ली के निष्कलंकी दल की कहानी
इन्द्रप्रस्थ, हस्तिनापुर अथवा दिल्ली हिन्दुओं के मन पर कैसा मोहजाल डाल
देती है ! काल के चक्कर मे पड़कर कितने भिन्न-भिन्न राजवंश, कितनी देश-
देशान्तर की जातियाँ आकर दिल्ली के कितने नये-नये रूपों की सृष्टि कर गईं,
कितनी जातियों के उत्थान और पतन के बीच दिल्ली का इतिहास गठित हुआ है,
और दिल्ली के इतिहास की तरंग के साथ मानो भारत का इतिहास भी तरंगित
होता रहा है। हिन्दुओं की गौरवमंडित दिल्ली विदेशी विधर्मियों के पैरों तले
आकर आर्य-कीर्ति को लांछित करने लगी, फिर इसी दिल्ली में ही युग-युग में
भिन्न-भिन्न राजशक्तियों की परीक्षा चलने लगी, कितने संघर्ष, कितने राष्ट्र-
विप्लव, कितने विरोधों के बीच दिल्ली का आधुनिक इतिहास गठित होता है।
इसी से दिल्ली के इतिहास का अर्थ हो जाता है, भारत साम्राज्य का इतिहास।
और इस क्षात्र-शक्ति के संघर्ष के इतिहास में जहाँ दिल्ली का इतिहास गठित
होता है, वहाँ इसी दिल्ली में ही अनेक साधु-सम्प्रदायों का भी आविर्भाव होता
है। मुसलमान आधिपत्य के समय जैसे दिल्ली के निकट सतनामी सम्प्रदाय का
आविर्भाव हुआ था वैसे ही अंग्रेजों के इस आधिपत्य के समय इसी दिल्ली में
निष्कलंकी दल का आविर्भाव हुआ है। सतनामी सम्प्रदाय के समान यह दल भी
बहुत ही क्षुद्र है। आज प्रायः तीस साल से यह दल दिल्ली में है। इन तीस वर्षों