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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

१७८ औचित्यविचारचर्चा
किमुत मलयवातान्दोलितापाण्डुपत्रै-
रुपवनसहकारैर्दर्शितेष्वङ्कुरेषु ॥
नामौचित्यमुदाहर्तुमाह यथा कालिदासस्येति । इदमिति । असुल-
भस्य दुर्लभस्य, वस्तुनः प्रियाया इति भावः, प्रार्थनया कामनया हेतुना,
दुर्निवारोऽनिवार्य इति भावः, पञ्चबाणः कामः, प्रथममपि प्रारम्भ एव, मे
मम, मनश्चित्तं क्षिणोति शकलीकरोति, मलयवातेन मलयानिलेनान्दो-
लितानि कम्पितान्यापाण्डूनि पाण्डुरवर्णानि पत्राणि येषां तैरुपवनसहकारै-
रुपवनस्थिताम्रवृक्षैस्तद्वारेत्यर्थः, दर्शितेष्वसङ्ख्येयेष्वङ्कुरेषु किमुत ? इति
न जाने—इति तात्पर्यम् ।
नामौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथा कालिदास-
स्येति । इदमिति । अलभ्य वस्तु (प्रियतमा) की प्रार्थना (कामना) करने के
कारण दुर्निवार बने हुए इस पंचबाण (कामदेव) ने पहले से ही तो मेरे मन को
खंड-खंड कर रखा है, मलयानिल से आन्दोलित पीले पत्तोंवाले उपवनस्थित
आम्रवृक्षों के द्वारा अंकुरों के प्रदर्शन से न जाने अब क्या करने का विचार है ?
अत्र प्रारम्भ एव ममेदं मनः पञ्चबाणः सुदुर्लभवस्तुप्रार्थनादुर्निवारः
शकलीकरोति किमुत लीलोद्यानसहकारैर्मलयानिलान्दोलितबालपल्ल-
वैरङ्कुरेषु दर्शितेष्वित्युक्ते मदनस्य पञ्चबाणाभिधानमुचितमेव ।
अस्मिन्पद्ये, पूर्वमेव ममेदं मनः क्षिणोति मदनः प्रियतमायाः
कामनया दुर्निवारः सन्, शकलीकरोति सुरभितवातकम्पितप्रवालैरु-
पवनस्थाम्रवृक्षैरङ्कुरेषु दर्शितेषु किमुत ? इत्युक्ते कामदेवस्य 'पञ्चबाण'
इति नामोपादानं नितरां समुचितम् । अर्थात् हृदयभेदनरूपकर्मकारिणः
पञ्चबाण एव संज्ञोपयुक्तास्ति, यद्यत्रैव “अनङ्ग” इत्युच्येत न तर्हि समुचितं
स्यात्तस्मादत्र-कर्मोचितपञ्चबाणनाम्ना नाम्न औचित्यमत्यन्तं समुज्ज्वल-
मिति ज्ञेयम् ।
इस पद्य में “पहले ही मेरे इस मन को अलभ्य वस्तु (प्रियतमा) की
प्रार्थना (प्राप्तिकामना) से अपरिहार्य पंचबाण (कामदेव) ने तो खंडखंड
कर रखा है, अब मलयानिल के झोंके से डोलते हुए किसलय वाले उपवनस्थ सह-
कार (आम्र) वृक्षों के द्वारा नये-नये अंकुरों को दिखाकर न जाने क्या करना
चाहता है ? अर्थात् जब पांच ही बाण उसके पास थे तब तो मेरी ऐसी दशा हो
गयी थी, अब असंख्य बाणों वाला बनकर वह क्या कर देगा, इसका पता नहीं,

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १७९
इस तरह के कथन में कामदेव को पंचबाण के नाम से जो अभिहित किया गया
है उससे उसके नाम का औचित्य अत्यन्त परिस्फुट हो जाता है, क्योंकि हृदय-
भेदनरूप कर्म करने वाले काम को पंचबाण होना ही चाहिये । यहीं पर यदि
अनङ्ग कहा गया होता तो अनुचित होता, इसलिये यहाँ नामौचित्य का बड़ा ही
मार्मिक रूप उपस्थित हो जाता है ।
यथा वा मम बोद्धावदानलतायाम् —
तारुण्येन निपीतशैशवतया साऽनङ्गशृङ्गारिणी,
तन्वङ्ग्या सकलाङ्गसङ्गमसखी भङ्गीर्नवाऽङ्गीकृता ।
निःसंरम्भपराक्रमः पृथुतरारम्भाभियोगं विना,
साम्राज्ये जगतां यया विजयते देवो विलासायुधः ॥
नामौचित्यस्य द्वितीयमुदाहरणमुपस्थापयितुमाह—यथा वा ममेति ।
तारुण्येनेति । तारुण्येन यौवनेन, निपीतं कवलितं विनाशितमिति यावत्,
शैशवं बाल्यावस्था यस्यास्तस्या भावस्तत्ता तया हेतुना, तन्वङ्ग्या कृशा-
ङ्ग्याऽनङ्गशृङ्गारिणी कामव्यञ्जकशृङ्गारवती, सकलाङ्गसङ्गमसखी
सकलावयवसम्पर्किणी, सा तादृशी, नवा नूतना भङ्गिः क्रमोऽङ्गीकृता
स्वीकृता यथा तन्वङ्गीभङ्ग्या, निःसंरम्भोऽप्रत्नसिद्धः पराक्रमो यस्यैवं-
भूतो विलासो विभ्रम एवायुधं शस्त्रं यस्य, स देवः कामदेवः पृथुतरा-
म्भाभियोगं प्रभूततरारम्भसम्भारं विनैव, जगतां त्रैलोक्यस्य, साम्राज्ये,
विजयते सर्वोत्कृष्टतया जयं लभते ।
नामौचित्य का द्वितीय उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथा वा
ममेति । तारुण्येनेति । तारुण्य के द्वारा शैशव के समाप्त कर दिये जाने पर
कृशाङ्गी ने कामव्यञ्जकशृङ्गारवाली और सभी अंगों के साथ मित्रता रखने
वाली एक ऐसी भंगी को अपना लिया है जिससे अयत्नसिद्धपराक्रम वाले
विलासायुध ( कामदेव ) को बिना कुछ किये ही तीनों लोकों की विजय मिल
गयी है ।
अत्र '

१८० औचित्यविचारचर्चा
अस्मिन्पद्ये "तारुण्यदूरीकृतबाल्यया कृशाङ्ग्या कामव्यञ्जकशृङ्गार-
शालिनी, सकलावयवकृतसख्या तादृशी काप्यभिनवैव भङ्गिः स्वीकृता
यया भङ्ग्यैवायतनसिद्धप्रभावो निरतिशयारम्भसाधनं विनैव त्रैलोक्य-
राज्ये देवो विलासायुधो जयति" इत्युक्ते कामस्य—"विलासायुध" इति
नामधेयमुपपन्नं सुयुक्तमेव । तन्वङ्गीभङ्ग्यैव सिद्धत्रैलोक्याधिपत्यविजि-
गीषायां समुपपन्नलोकत्रयविजयेच्छायां सत्यां, कामसायकादीनामुन्मादन-
शोषणश्चेत्यादिपञ्चबाणसायकादीनां नैरर्थक्याद्वृथात्वात् ।
इस पद्य में "यौवन के द्वारा बाल्यावस्था समाप्त कर दिये जाने पर कृशाङ्गी
ने कामव्यञ्जक शृंगार से युक्त, सभी अंगों से मित्रता रखने वाली, एक ऐसी
भङ्गी का आविष्कार कर लिया है जिससे अयत्नसिद्ध प्रभाव वाले भगवान्
[L12

उत्पन्न उस लोकत्रय-संहारक अग्नि ने कामदेव को जलाकर भस्मावशेष
कर डाला ।
अत्र "पश्यतो भगवतस्त्रिनेत्रस्य स्मरशरनिपातक्षोभे वर्ण्यमाने तन्नि-
कारोवशमाय 'संहर संहर प्रभो क्रोधम्'ति यावद्वचः खे देवानां चरति
तावद्भवनेत्रोद्भवः स वह्निर्मदनं भस्मराशिशेषकमकार्षीत्" इत्युक्ते
संहारावसरे रुद्रस्य भवाभिधानमनुचितमेव ॥ ३८ ॥
अस्मिन्पद्ये "तृतीयनेत्रेणावलोकयतो भगवतस्त्रिलोचनस्य स्मरशराणां
कामबाणानां निपातेन निपटनेन, यः क्षोभस्तस्मिन्वर्ण्यमाने तन्निकारो-
पशमाय स्मरशरनिपातजन्यक्रोधरूपपरिभवविनाशाय 'प्रभो ! क्रोधं
संहर संहर' इति देवानां वचो यावदाकाशे चरति तावदेव भवनेत्रो-
त्पन्नो वह्निः कामदेवं भस्मीकृतं चकार" इत्युक्ते संहारावसरे काम-
देवस्य संहारसमये रुद्रस्य हरस्य भवाभिधानं भवेतिनामधेयमनुचितम-
युक्तमेव । हरेति नाम समुचितं स्यात् यतो हि भवति जगदस्मादिति-
व्युत्पत्त्या भवस्य निष्पादकोऽर्थः सम्भवति । विनाशकालेऽत्र तस्य नाम्नो-
ऽनौचित्यं स्पष्टमेव । हरति विनाशयति जगदितिव्युत्पत्तियोगिहरेति नाम
नितरामौचित्यमावहेत्, तत्त्वत्र न प्रतिपादितमित्यनौचित्यं नाम्न इति
बोध्यम् । अत्र केचित् भवस्य न विनाशं प्रति साक्षात्सम्बन्धस्तस्य तु
वह्निसमुत्पादन एव गतार्थत्वमित्यत्र संहारावसरेऽपि वह्निजन्मरूपो-
त्पादनप्रसङ्गेन न भवेतिनाम्नो नैरर्थक्यमित्याभाषन्ते ।
मादृशास्तु—भवेतिनामधेयं नितरामेवात्रोपयुक्तं यतो ह्यनेन जगज्जन-
कवासनाधिवर्धकस्य कामकृतशरनिपातस्याक्षम्यापराधत्वं व्यज्यते, येन
च जगत्पितुरपि नेत्रात्सहजसुलभवात्सल्यमपेक्ष्य वह्नेरेवाभूतप्रादुर्भाव
इत्यभिप्रायाय विशेषावबोधो जायते, हरेति नामकरणेन नैवं समुपपद्येते-
त्युपयुक्तमेव भवनामकरणमित्यामनन्ति ।
वस्तुतस्तु साधारणतयाऽत्र संहारस्यैवावसर इति भवेत्यभिधान-
मनौचित्यं व्यञ्जयत्येवेति सुधियो विभावयन्तु ॥ ३८ ॥
इस पद्य में "तीसरे नेत्र से देखते हुए भगवान् त्रिलोचन के स्मरशरनिपात-
जन्य क्षोभ के वर्णन-क्रम में उसकी शान्ति के लिये 'हे ! प्रभो क्रोध शान्त कीजिये'
ऐसी देवताओं की वाणी जबतक आकाश में ही घूम रही थी, महादेव सुन भी

१८२ औचित्यविचारचर्चा
=हों पाये थे तबतक 'भव' के तृतीय नेत्र से उत्पन्न उस प्रलयकारी वह्नि ने
कामदेव को जलाकर राख कर दिया" इस तरह के कथन में महादेव का "भव"
नाम का जो उपादान हुआ है वह बहुत ही अनुचित है, क्योंकि संहार करते समय
रुद्र "भव" न रहकर "हर" हो जाते हैं, इसलिये "हर" कहना ही उपयुक्त
होता, परन्तु वैसा न करके 'भव' जो कह दिया गया उससे नाम का अनौचित्य
ही पूर्णतः व्यक्त होता है।
यहाँ पर कुछ आलोचक यह कहकर इस अनौचित्याक्षेप का खंडन करते हैं
कि—"अवसर संहार का ही है, परन्तु पद्य के तृतीय चरण में अग्नि के जन्म
की बात अवसर प्राप्त है। शंकर के नेत्र से अग्नि का जन्म हो रहा है और वही
अग्नि मदन को जलाने में कृतकार्य होती है। यहाँ शंकर का काम केवल अग्नि
का उत्पादन मात्र है मदन-भस्म करने से उनका साक्षात् सम्बन्ध नहीं है। ऐसी
परिस्थिति में "भव" शब्द का कालिदासीय प्रयोग औचित्य की सीमा के भीतर
ही है।"
मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि कालिदास ने जानबूझकर "भव" शब्द का
ही प्रयोग यहाँ किया है। कारण—प्रायः उनका अभिप्राय यह था कि कामदेव
ने ऐसा अक्षम्य अपराध किया, जिससे भव (जगत्पिता) की आँख से भी वात्सल्य
नहीं बरस कर अग्निकण ही बरसने लगे, उसका जैसा भीषण फल होना चाहिये,
हुआ। इस तरह कविकुलगुरु कालिदास 'भव' इस प्रयोग के द्वारा कामदेवकृत
कर्म की अतिभीषणता, अथ च अक्षम्यता अभिव्यक्त करना चाहते हैं। इस
दृष्टिकोण से विचार करने पर 'भव' पदप्रयोग अनुचित नहीं प्रतीत होता, प्रत्युत
इस व्याख्या के अनुसार "हर" पद का प्रयोग ही समुचित नहीं होता, क्योंकि
जो सदा "हर" है वह तो साधारण अपराध पर भी सहारलीला रचा सकता
है, अतः इस पद के द्वारा काम के अपराध की वह गंभीरता व्यक्त नहीं होती
जिसकी अभिव्यक्ति कवि को अभीष्ट थी।
अस्तु, यह सब होते हुए भी संहार के अवसर पर साधारणतया "भव" पद
का प्रयोग अनुचित प्रतीत होता ही है, इसलिये नामानौचित्य के प्रसंग में की
गयी आलोचना भी उचित ही है।
एक बात और यहाँ ध्यान देने योग्य है कि "नाम्ना कर्मानुरूपेण"—इस
कारिका और उनकी वृत्ति के अनुसार किसी काव्य के नामकरण के सम्बन्ध में
औचित्यानौचित्य का विचार प्रस्तुत प्रतीत होता है, परन्तु यहाँ उदाहरण-

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १८३
उदाहरणों से व्यक्तिविशेष के अनेक नामों में से स्थल विशेष में किसी खास
नाम का औचित्यकारी दिग्दर्शन कराया गया है। ऐसा क्यों हुआ है—यह
विचारणीय है ३८ ॥
आशीर्वचनोंचित्यं दर्शयितुमाह—
पूर्णार्थदातुः काव्यस्य सन्तोषीतमनीषिणः ।
उचिताशीर्नृपस्येव भवत्यभ्युदयावहा ॥ ३९ ॥
सम्पूर्णसमर्पकस्य सन्तोषीतविदुषः काव्यस्य नृपतेरिवोचितमाशीः-
दमभ्युदयावहं भवति ।
नामौचित्यविवेचनात्परं प्राप्तावसरं सप्तविंशतितममाशीर्वादौचित्यं
परिभाषितुमाह— पूर्णार्थदातुरिति । पूर्णार्थदातुर्निराकाङ्क्षाभिधेयबोध-
कस्य, पक्षान्तरे यथेष्टधनप्रदायकस्य, ( अत एव ) सन्तोषितास्तुष्टीकृता
मनीषिणो विद्वांसो येन तस्य सन्तोषीतमनीषिणः पक्षद्वयेऽपि तुल्यमेतत्,
यतो ह्यर्थज्ञानेन धनोपलब्ध्या च विद्वांसस्तुष्टा भवन्त्येव । एवंभूतस्य,
नृपतेः राज्ञ इवोचिताशीः समुचिताशीर्वचनमभ्युदयावहा कल्याणप्रदा
भवति जायते ।
कारिकार्थमेव विशदयितुमाह—सम्पूर्णेति । यथा सम्पूर्णसमर्पकस्य
सर्वस्वदातुरत एव सन्तोषीतमनीषिणस्तुष्टीकृतविदुषः नृपतेर्भूतपतेरुचित-
मनुरूपमाशीःपदमाशीर्वादवचनमभ्युदयावहं कल्याणकारकं भवति तथैव
सम्पूर्णसमर्पकस्य निःशेषाथर्विबोधकस्यात एव सन्तोषीतमनीषिणः
सन्तुष्टीकृतविदुषः काव्यस्याप्युचितं समुचितमाशीःपदमभ्युदयावहं
कल्याणकारकं भवति जायते ।
नामौचित्य की विवेचना कर चुकने के बाद अभी अवसर प्राप्त होने पर
सत्ताइसवें आशीर्वचनोचित्य की परिभाषा की जा रही है – पूर्णार्थदातुरिति ।
यथेष्ट धन देने के कारण जिसने विद्वानों को सन्तुष्ट कर दिया है ऐसे राजा के
प्रति व्यवहृत आशीर्वचन की आकांक्षा शान्तिकारक अर्थ के प्रतिपादन से जिसने
विद्वानों को प्रसन्न कर दिया है वैसे काव्य के आशीर्वादसूचक वचन भी कल्याण-
कारक होते हैं ।
कारिका की ही व्याख्या करने के लिये कहा गया है--सम्पूर्णसमर्पकस्येति ।
जैसे सर्वस्वदान से विद्वानों को संतुष्ट कर देनेवाले राजा के प्रति व्यवहृत अनुरूप
आशीर्वचन कल्याणकारक होते हैं उसी तरह आकांक्षारहित सम्पूर्ण अर्थ के ज्ञान
द्वारा विद्वानों को प्रसन्न कर देने वाले काव्य का भी अनुरूप आशीर्वचनसूचक

१८४ औचित्यविचारचर्चा
पद का प्रयोग अत्यन्त कल्याणकारक होता है ।
यथाऽस्मदुपाध्यायगाङ्गकस्य---
स कोऽपि प्रेमार्द्रः प्रणयपरिपाकप्रचलितो
विलासोऽक्ष्णां देयात्सुखमनुपमं वो मृगदृशाम् ।
यदाकूतं दृष्ट्वा पिदधति सुखं तूणविवरे,
निरस्तव्यापारा भुवनजयिनः पञ्चविशिखाः ॥
आशीर्वचनौचित्यमुदाहर्तुमाह--यथाऽस्मदुपाध्यायगाङ्गकस्येति । स
कोऽपीति । प्रेमार्द्रः प्रेम्णा स्नेहेनार्द्रो विगलितप्रायः, प्रणयस्य प्रीतेः परि-
पाकेन परिणत्या, प्रचलितः, स कोप्यनिर्वचनीयः, मृगदृशां हरिणलोचना-
नामक्ष्णां, विलासो विभ्रमः, वो युष्मभ्यमनुपममुपमारहितमननु-
भूतपूर्वमित्यभिप्रायः, सुखमानन्दं देयात्, यदाकूतं यदभिप्रायं दृष्ट्वा
विलोक्यावगत्येति भावः, भुवनजयिनस्त्रिभुवनसम्मोहनस्य कामदेवस्य
पञ्चविशिखाः पञ्चसंख्यकाः सायका निरस्तव्यापारास्त्यक्तनिजकार्याः
सन्तस्तू णविवरे तूणीररूपबिले, मुखं पिदधति लज्जया मुखं गोपयन्तीति
तात्पर्यम् ।
आशीर्वचनौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथाऽस्म-
दुपाध्यायेति । स कोऽपीति । जिसके अभिप्राय को जानकर त्रिभुवनमोहन काम-
देव के पांचों बाण अपना व्यापार संवृत करके लज्जा से तूणीर रूप बिल में मुख
छिपा लेते हैं, उस प्रणय की परिणति से चलायमान, पवित्र-प्रेम से आर्द्र, मृगलोच-
नाओं की आँखों का अनिर्वचनीय विलास तुम्हें अपूर्व सुख प्रदान करे ।
अत्र "स कोऽप्यसामान्यार्द्रप्रणयविश्रान्तिप्रगल्भकुरङ्गदृशां निरुपमो
नयनविलासः, वो सुखं देयात्, यदभिप्रायमालोक्य भुवनजयिनः कामस्य
पञ्चसायकाः समाप्तव्यापारास्तूणीरविवरे लज्जयेव मुखं पिदधती"-
त्युक्ते सुखं वो देयादित्याशीःपदमुचितमेव प्रयानयनविभ्रमस्य सुखार्पण-
योग्यत्वात् ।
अस्मिन्पद्ये "सामान्येनासाधारणेन प्रेम्णाऽऽर्द्राणां द्रुतानां, प्रण-
यस्य प्रीतेर्विश्रान्त्या, प्रगल्भानां प्रौढानाञ्च कुरङ्गदृशां मृगलोचनानां,
स कोऽपि, निरुपमो विलक्षणो नयनविलासो वो युष्मभ्यं सुखं देयात्,
यदभिप्रायं तात्पर्यमालोक्य दृष्ट्वा, भुवनजयिनो जगद्विजेतुः कामस्य
पञ्चसायका बाणाः, समाप्तव्यापारा व्यापारशून्याः सन्तस्तूणीरविवरे
लज्जयेवाननं पिदधती"त्युक्ते "सुखं वो देयात्" इत्याशीःपदमुचितं

समुचितमेव। तत्र कारणमाह - प्रियेति। प्रियनयनविभ्रमस्य प्रेयसीनेत्र-
विलासस्य, सुखार्पणयोग्यत्वात्सुखप्रदानक्षमत्वात्।
इस पद्य में "असाधारण प्रेम से आर्द्र और प्रणय-विश्रान्ति से, प्रगल्भ मृग-
लोचनाओं की आँखों का वह अपूर्व विलास तुम्हें सुख प्रदान करे, जिसके
अभिप्राय को जानकर जगद्विजेता कामदेव के पांचों बाण कर्तव्यरहित हो
जाने के कारण लज्जा से तूणीररूप बिल में अपना मुँह छिपा लेते हैं" इस
तरह के कथन में "वः सुखं देयात् - तुम्हें सुख प्रदान करे" यह जो आशीर्वचन
प्रयुक्त हुआ है वह अत्यन्त समुचित है, क्योंकि प्रेयसी के नयन-विलास में सुख
पहुँचाने की क्षमता अवश्य होती है, इसलिये यह आशीर्वचनौचित्य का स्पष्ट
संकेत करता है।
यथा वा मम वात्स्यायनसूत्रसारे—
कामः कामं कमलवदनानेत्रपर्यन्तवासी
दासीभूतत्रिभुवनजनः प्रीतये जायतां वः।
दग्धस्यापि त्रिपुररिपुणा सर्व

१८६ औचित्यविचारचर्चा
अस्मिन्पद्ये स कामो युष्माकं प्रीतये भवतु यस्य हरभस्मीकृत-
विग्रहस्यापि सौन्दर्यं कज्जलस्येवातितरां याता पुनर्दिग्धमेवाञ्जनं यथाति-
तराम् स्पृहणीयतामायाति तथैव कामो दग्धीकृतोऽपि नितरामेव सौन्दर्य-
मासादयेदिति भावः। इत्युक्ते "प्रीतये जायताम्" इत्युचितं समुचितं,
यतो हि कामस्य प्रीत्यात्मकत्वात्प्रीतिरेवात्मा यस्य तस्य भावस्तत्त्वं
तस्मात् प्रीतिरूपत्वादिति भावः, प्रीत्यात्मनस्तस्य प्रीतिप्रदानमुचित-
मिति बोध्यम्।
इस पद्य में 'वह कामदेव तुम्हारे आनन्द के लिये हो दग्ध हो जाने पर
भी कज्जल के समान जिसकी शोभा और भी अधिक बढ़ गयी है' इस कथन
में "प्रीतये जायताम्" ऐसा जो कहा गया है वह अत्यन्त उचित है, क्योंकि काम-
देव के प्रीत्यात्मक होने के कारण उसका प्रीति प्रदान करना युक्तिसंगत ही है।
अतः यह भी आशीर्वचनोचित्य का द्योतक हुआ।
न तु यथाऽमरुकस्य—
आलोलामलकावलीं विलुलितां बिभ्रच्चलत्कुण्डलं,
किञ्चिन्मृष्टविशेषकं तनुतरैः स्वेदाम्भसां सीकरैः।
तन्वङ्ग्याः सुतरां रतान्तसमये वक्त्रं रतिव्यत्यये,
तत्त्वां पातु चिराय किं हरिहरस्कन्दादिभिर्देवैः ॥
आशीर्वचनानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह—न तु यथाऽमरुकस्येति।
आलोलामिति। रतिव्यत्यये विपरीतरतौ आलोलां कम्पनपरां, विलुलि-
तामितस्ततो विक्षिप्तामलकावलीं चिकुरनिकरं बिभ्रद्धारयत्तथा, चलती
लोलती कुण्डले यस्य तत्, तनुतरैरतिसूक्ष्मैः स्वेदाम्भसां स्वेदजलानां सीकरैः
कणैः, सुतराम् स्वभावत एव किञ्चिन्मनागेव, मृष्टो धौतो विशेषस्तिलकं
यस्मिन्नेवंभूतं, तन्वङ्ग्याः कृशाङ्ग्याः नायिकाया इति भावः, रतान्त-
समये निधुवनसमाप्तिकाले, यद्वक्त्रमाननं तत्त्वां, चिराय बहुकालं यावत्,
पातु रक्षतु, हरिहरस्कन्दादिभिर्विष्णुशिवकार्तिकेयप्रभृतिभिरन्यैर्देवतै-
र्देवैः किम् ? न किञ्चित् प्रयोजनमिति भावः।
आशीर्वचनानौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—न तु यथा-
ऽमरुकस्येति। आलोलामिति। विपरीतरति के समय इतस्ततो विक्षिप्त और कंपन-
शील घुंघराले बालों को धारण करता हुआ तथा डोलते हुए कुण्डलों से सुशोभित
शरीर के पसीनों की बूंदों से स्वभावत एव कुछ कुछ मिटे हुए टीके (तिलक) से

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १८७
युक्त, रतिसमाप्तिकालिक तन्वङ्गी का जो मुख है वह चिरकाल के लिये तुम्हारी
रक्षा करे। हरि, हर, स्कन्द आदि देवताओं से क्या प्रयोजन है ?
अत्र "तन्व्या रतिव्यत्यये लोलालकं चलत्कुण्डलं स्वेदसलिलेन
किञ्चिन्मृष्टतिलकं यन्मुखं तत्त्वां पातु, किं हरिहरस्कन्दादिभिर्देवैः"
इत्युक्ते पातु त्वामित्यनुचितम्, आनन्दयतु त्वामित्युचितं स्यात् ।
अस्मिन्पद्ये "विपरीतरतौ चञ्चलचूर्णकेशपाशयुक्तं, लोलत्कुण्ड-
लद्वयं स्वेदाम्बुना किञ्चिद्धौतविशेषकं, तन्व्याः कृशोदर्या यन्मुखं तत्त्वां
पातु रक्षतु हरिहरस्कन्दप्रभृतिभिर्देवैः किम् ? "इत्युक्ते "त्वां पातु" इत्यनु-
चितमनौचित्यद्योतकम्, "आनन्दयतु त्वाम्" इत्युचितमनुरूपं स्यात्,
यतो हि दयितामुखस्यानन्दप्रदान एव शक्तिमत्त्वात्, रक्षणे नितरामयो-
ग्यत्वात् ।
इस पद्य में "विपरीत रति के समय चंचल घुंघराले बालों से युक्त, डोलते
हुए कुण्डलों वाला, स्वेदकणों से कुछ-कुछ मिटे हुए तिलकवाला कृशोदरी
का जो कमनीय मुख है, वह तुम्हारी रक्षा करे। हरि, हर, कार्तिकेय आदि देव-
ताओं से क्या प्रयोजन है?" ऐसा कहने के क्रम में "त्वां पातु--तुम्हारी रक्षा
करे" ऐसा जो कहा गया वह नितान्त अनुचित है। "त्वामानन्दयतु--तुम्हें
आनन्द पहुँचावे" यह कहना उचित होता, परन्तु ऐसा न कह कर कवि ने वैसा जो
कह दिया उससे आशीर्वचनानौचित्य का भान हो जाता है, जो काव्य की स्पृह-
णीयता के ऊपर कुठाराघात करता हुआ सा प्रतीत होता है।
अन्येषु काव्याङ्गेष्वनयैव दिशा स्वयमौचित्यमुत्प्रेक्षणीयम् ।
तदुदाहरणान्यानन्त्यान्न प्रदर्शितानीत्यलमतिप्रसङ्गेन ॥ ३९ ॥
ग्रन्थसमाप्तिसूचनायाह - अन्येष्विति । अन्येष्वपरे वृत्तादिषु
काव्याङ्गेषु काव्योपादानेष्वनयाऽनेनैव, दिशा प्रकारेणौचित्यं सदृश-
विधानरूपं, स्वयमात्मनैवोत्प्रेक्षणीयम् । तदुदाहरणान्यवशिष्टकाव्याङ्गो-
चित्यौदाहरणान्यानन्त्यादपरिमितत्वाद् ग्रन्थविस्तरभयेन न प्रदर्शितानि ।
इत्यतिप्रसङ्गेन निरर्थकातिकथनेनालं निरर्थकम् । अथान्येष्विति यदुक्तं
तत्र वृत्तवर्णयोरौचित्यानौचित्ये स्वयमूहयित्वा दर्शयामि-
वृत्तौचित्यं यथा कालिदासस्य-
आलोके ते निपतति पुरा सा बलिव्याकुला वा,
मत्सादृश्यं विरहतनु वा भावगम्यं लिखन्ती ।

३८८ | औचित्यविचारचर्चा

पृच्छन्ती वा मधुरवचनां सारिकां पञ्जरस्थां,
कञ्चिद् भर्तुः स्मरसि रसिके त्वं हि तस्य प्रियेति ॥
अनौचित्यं यथा कस्यचिदज्ञातकवेः—
हा नृप हा बुध हा कविबन्धो,
विप्रसहस्रसमाश्रय ! देव ! ।
मुग्ध विदग्ध सभान्तररत्न,
कासि गतः क्व वयञ्च तवैते ॥
उक्तपद्यद्वये "प्रावृट्प्रवासकथने मन्दाक्रान्ता विराजते" इति निय-
मात्प्रवासकथने मन्दाक्रान्ताया एवौचित्यं न तु दोधकस्येति, पूर्वत्र वृत्त-
स्यौचित्यं परत्र चानौचित्यमिति बोध्यम् । इदमत्राकूतं यत् न खलु
सर्वाणि वृत्तानि सर्वत्रोपयुक्तानि भवन्त्येष वृत्तस्वभावः । अत एव यद्
वृत्तं यद्वस्तुतत्त्वाख्याने समर्थं तत्र तत्प्रयोग औचित्यमावहति, तदन्यथा-
प्रयोगोऽनौचित्यमत एव प्रकृतेऽपि प्रवासकथनरूपविषयप्रतिपादने
मन्दाक्रान्तैव युक्ता न दोधकमिति ।
वर्णौचित्यं यथा भवभूतेः—
झणज्झणितकङ्कणक्वणितकिङ्किणीकं धनु-
र्ध्वनद्, गुरुगुणाटनीकृतकरालकोलाहलम् ।
वितत्य किरतोः शरानविरतस्फुरच्चूडयो-
र्विचित्रमभिवर्धते भुवनभीममायोधनम् ॥
अनौचित्यं यथा कस्यचिदज्ञातकवेः—
उद्वर्तयति उल्लोटयति शयने कर्ह्यपि मोट्टयति ।
नो परिघट्टयति हृदयेन स्फोटयति लज्जया खट्टयति धृतेः ॥
अत्र प्रथमं भीषणसङ्ग्रामोचिताया धनुषां झणत्कृतेः, शस्त्रास्त्राणां
खटत्कृतेश्च सूचनार्थं प्रयुक्तो वर्णविन्यास औचित्यमातनोति । परत्र च
शृङ्गाररसाभिव्यञ्जकवर्णविन्यासमपहायानुप्रासार्थं टकारा आयोजिता
यैश्च शृङ्गाररसोद्बोधे महानन्तरायः समुत्पन्नः । अत एवात्रानौचित्यं
सम्पन्नम् । एवमेवान्यत्राप्यूह्यम् ।
ग्रंथ-समाप्ति की सूचना देने के लिये कहा गया है—अन्येष्विति । उपर्युक्त
पद, वाक्य, प्रबन्धार्थ आदि सत्ताइसों औचित्य की तरह दूसरे (वृत्त = छन्द और
वर्ण = अक्षर आदि ) काव्याङ्गों में भी स्वयं औचित्यानौचित्य का ऊह करना

संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेता १८९
चाहिये। इन सबके विचार ग्रंथ-विस्तार के भय से नहीं किये गये हैं, इसलिए
अधिक कहना निरर्थक है। इसमें दूसरे काव्याङ्गों की बात जो कही गयी है
तदनुसार मैंने स्वयं ऊह करके वृत्त (छन्द) और वर्ण के औचित्यानौचित्य के
उदाहरण संस्कृत व्याख्या में दिखला दिये हैं। विज्ञ पाठक कहीं से उनका परिचय
प्राप्त कर लेंगे ॥ ३९ ॥
आसीत् प्रकाशेन्द्र इति प्रकाशः काश्मीरदेशे त्रिदशेश्वरश्रीः ।
अभूद् गृहे यस्य पवित्रसत्रमच्छिन्नमग्रासनमग्रजानाम् ॥ १ ॥
स्वपरिचयादिप्रदानाय ग्रन्थकर्ता महाकविः क्षेमेन्द्रः "आसीदित्या-
रभ्य किलायं कृतः" इत्यन्तं प्रतिपादयति—आसीदिति । काश्मीरदेशे,
प्रकाशेन्द्र-इति नाम्ना प्रकाशः प्रकाशते इति व्युत्पत्त्या प्रकाशमान इत्यर्थः,
त्रिदशेश्वरश्रीरिन्द्रतुल्यकान्तिः कश्चिद् ब्राह्मण इति शेष आसीदभूत्,
यस्य प्रकाशेन्द्रस्य गृहे, अच्छिन्नमत्रुटितं धारावाहिकरूपेण प्रवृत्तमित्यर्थः,
पवित्रसत्रं पूतयज्ञोऽग्रजानां ब्राह्मणानामग्रासनं प्रथम स्थानं
चाभूत् ॥ १ ॥
अपने परिचय और ग्रंथ-निर्माण के ऊपर प्रकाश डालने के अभिप्राय से
ग्रंथकर्ता महाकवि क्षेमेन्द्र कह रहे हैं—आसीदिति । काश्मीर देश में प्रकाशेन्द्र
नाम के इन्द्रतुल्य शोभाशाली एक ब्राह्मण थे, जिनके यहाँ धारावाहिक रूप
से पवित्र यज्ञानुष्ठान हुआ करते थे तथा ब्राह्मणों का बहुत आदर
होता था ॥ १ ॥
यः श्रीस्वयम्भूभवने विचित्रे लेप्यप्रतिष्ठापितमातृचक्रः ।
गोभूमिकृष्णाजिनवेश्मदाता तत्रैव काले तनुमुत्ससर्ज ॥ २ ॥
यः श्रीति । यः प्रकाशेन्द्रः, विचित्रेऽपूर्वे, श्रीस्वयम्भूभवने शोभाशीले
ब्रह्ममन्दिरे, लेप्ये भित्तौ, प्रतिष्ठापितं निर्मितमालिखितमिति यावत्,
मातृचक्रं देवीमूर्तियेन तादृशः, गवां भूमेः, कृष्णाजिनस्य कृष्णसारमृग-
चर्मणः, वेश्मनो गृहस्य च दाता सन्, काले समयप्राप्तौ, तत्रैव ब्रह्ममन्दिरे,
तनुं शरीरं, ससर्ज तत्याज ॥ २ ॥
यः श्रीति । जिन्होंने ब्रह्ममन्दिर में अनेक देवी-देवताओं के चित्र बनवाये,
तथा गाय, भूमि, कृष्णाजिन और गृह का दान करते हुए वहीं समयानुसार
मृत्युलाभ किया ॥ २ ॥

३९० औचित्यविचारचर्चा
तस्यात्मजः सर्वमनीषिशिष्य श्रीव्यासदासापरपुण्यनामा ।
क्षेमेन्द्र इत्यक्षयकाव्यकीर्तिश्चक्रे नवौचित्यविचारचर्चाम् ॥ ३ ॥
तस्यात्मज इति । तस्य प्रकाशेन्द्रस्यात्मजः पुत्रः, सर्वमनीषिशिष्यः
सकलविद्वदन्तवासी, श्रीव्यासदासत्यपरं द्वितीयं, पुण्यं पवित्रं, नामाभिधानं
यस्य स व्यासदासापनामक इति भावः । अक्षयाऽविनाशिनी काव्यकीर्तिः
काव्यनिर्माणजन्ययशो यस्य स क्षेमेन्द्र इति क्षेमेन्द्र नाम्ना रचितकाव्य-
प्रबन्ध इत्यर्थः, नवा नूतनामौचित्यविचारचर्चामौचित्यविचारचर्चानामकं
प्रस्तुतं ग्रन्थं चक्र कृतवान् ॥ ३ ॥
तस्यात्मज इति । उन्हीं प्रकाशेन्द्र का पुत्र सभी प्रसिद्ध विद्वानों का अन्ते-
वासी व्यासदासापरनामक श्री क्षेमेन्द्र नाम से काव्यसर्जन करके अक्षयकीर्ति
प्राप्त करने वाले विद्वान् ने "औचित्यविचारचर्चा" नामक नये ग्रंथ का निर्माण
किया ॥ ३

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १९१
ऽवनतेन प्रणतेन विनयानेति भावः, येन, नितरामत्यन्तं विशेषोन्नतिर-
त्यभ्युदयः, प्राप्ता लब्धा, एवमेव यस्य प्रतापानलः प्रतापाग्निशाशा
दिशोऽविरतं सततं, शीतलतां शैत्यं, नयति प्रापयतर्थादवानतस्योन्नत्या-
श्रयणमनलस्य च शैत्यकरणं साधारणतो विरुद्धमिवाभाति परन्तुस्मिन्
राजनीयानेव विशषाऽस्ति यदुभयमपि सिद्ध्यति यच्च समुचितमेवेति
भावः, तस्य प्रसिद्धस्य श्रीमदनन्तराजनृपतेः काले समयेऽयं ग्रन्थः किलेति
निश्चयेन कृतः समाप्तिं नीतः ॥ ५ ॥
यस्यासिरिति। जिसकी तलवार विध्वंसकार्य में न लगकर निर्माणकार्य में
लगी हुयी थी, देशों को जीत-जीत कर सभी प्रसिद्ध सदाचारी और विद्वानों का
एक परिवार ही बना डाला था, तथा विनय से अवनत होकर जिसने अपनी पूरी
उन्नति की थी, एवं जिसके प्रतापालन से ( विघ्नबाधा-समाप्ति के द्वारा ) सभी
दिशायें शीतलता का अनुभव करती थी उस राजा श्रीमदनन्तराज के समय में
यह ग्रन्थ समाप्त हुआ ॥ ५ ॥
इति श्रीप्रकाशेन्द्रात्मजव्यासदासापराख्यश्रीक्षेमेन्द्रकृता
'औचित्यविचारचर्चा' समाप्ता ।

उपसंहारः
( १ )
वेदेन्दुखाक्षिमित ( २०१४ ) विक्रमवत्सरान्ते,
मासे तपस्यतिशुभे विमले दले च ।
मारे तिथौ विबुधमोदकृते प्रयत्नाद्
व्याख्यामिमामिह विधातुमहं प्रवृत्तः ॥
( २ )
व्याख्योपयोगिशुभसाधनमन्तरापि,
सा पूर्णतामुपगताऽचिरकाल एव ।
सन्तोषकृद् यदि भवेत् सुधियां तदेव,
स्यादेष धीधनविहीनजनः कृतार्थः ॥
( ३ )
नवानीनामविख्यातो ग्रामः कश्चित्मदाश्रयः ।
वर्तते मिथिलाभूमौ विद्वद्वन्द्वविराजितः ॥
( ४ )
तत्र मैथिल-भूदेव-तदन्वयसमुद्भवः ।
व्रजमोहनामास्ति विदुषामाश्रयो बुधः ॥
( ५ )
वैद्यकेन दृढः कायः काव्येन सरसं मनः ।
पूता वाक् शब्दशास्त्रेण यस्य सम्यग् विराजते ॥
( ६ )
तस्यैव प्रथमायास-परिणामोऽयमेधते ।
विद्वांसोऽत्र मतिं कुर्युहँसवंशावतंसवत् ॥
इति दरभंगामण्डलान्तर्गत 'नवानी'ग्रामवास्तव्यमैथिलब्राह्मण-
वंशावतंस-व्याकरणसाहित्यायुर्वेदाचार्याचार्य श्रीमोहन-
झाशास्त्रिणा कृता 'औचित्यविचारचर्चा: 'प्रभा'
नामिका संस्कृत-हिन्दीव्याख्या समाप्ता ।
●
समाप्तश्चायं ग्रन्थः
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कतिपय परीक्षोपयोगी प्रकाशन
१ रघुवंशमहाकाव्यम प्र० सर्ग । 'चन्द्रकला' सं० हि० व्या०-शेषराजशर्मा २-५०
२ रघुवंशमहाकाव्यम् । 'विमला' संस्कृत-हिन्दीव्याख्या । श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी
द्वितीय २-५०, तृतीय ३-००, ४-५ ५ ००, ६-७ ६-००, १३-१४ ५-००
३ हितोपदेश : मित्रलाभ । 'चन्द्रकला' सं० हि० टीका-श्रीशेषराजशर्मा ६-५०
४ लघुसिद्धान्तकौमुदी । 'शिवारूय' सं० हि० टीका-गोमतीप्रसादशास्त्री १०-००
५ तर्कसंग्रह-पदकृत्य । हिन्दीटीकासहित-श्रीशेषराजशर्मा 'रेग्मी' ३-००
६ कुमारसम्भव । 'विमला' संस्कृत-हिन्दीटीका-पं० श्रीकृष्णमणित्रिपाठी
१-२ सर्ग ५-५० तृ० सर्ग २-२५ च० सर्ग २-२५ पञ्चमसर्ग २-५०
७ स्वप्नवासवदत्ता । 'चन्द्रकला' सं० हि० टीका-श्रीशेषराजशर्मा 'रेग्मी' ८-००
८ नीतिशतकम् । 'विमला' संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम्-कृष्णमणित्रिपाठी ३-५०
९ छन्दोमञ्जरी । ( प्रमाणिक-संस्करण ) । 'सुषमा'-'सफला' संस्कृत-
हिन्दी व्याख्या युक्त । व्याख्याकार-डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी ५-००
१० काव्यमीमांसा । 'विमला' संस्कृत-हिन्दी टीका । १-५ अध्याय ४-५०
११ पञ्चतन्त्र । अपरीक्षितकारक । 'विमला' सं० हि० टीका । कृष्णमणित्रिपाठी ४-००
१२ संस्कृत व्याकरणम् । (अनु० खण्ड-निबन्धखण्ड सहित)-पं० रामचन्द्रझा ८-००
१३ सांख्यकारिका । 'सांख्यप्रकाश' सं० हि० टीका । श्रीकृष्णमणित्रिपाठी ५-००
१४ वेदान्तसार । 'भावबोधिनी' सं० हि० टीका-श्रीरामशरणत्रिपाठी ६-००
१५ मेघदूत । 'चन्द्रकला' सं० हि० टीका-श्रीशेषराजशर्मा 'रेग्मी' १४-००
१६ अनुवादचन्द्रिका । ( सर्वांगपूर्ण संस्करण ) । डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी १०-००
१७ दशरूपक । 'चन्द्रकला' हि० टीका सहित-डॉ० भोलाशंकर व्यास १८-००
१८ साहित्यदर्पण । 'शशिकला' हिन्दीटीका १-६ परि० ३०-००, ७-१० परि १५-००
१९ काव्यप्रकाश । 'चन्द्रकला' हिन्दी टीका-डॉ० सत्यव्रत सिंह ३०-००
२० भट्टिमहाकाव्य । सान्वय संस्कृत-हिन्दीव्याख्यासहित । श्रीगोपालशास्त्री
'दर्शनकेशरी' १-४ सर्ग ८-००, ५-८ सर्ग १०-०० एवं १४-२२ १०-००
२१ नैषधमहाकाव्य । 'चन्द्रकला' संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित । श्रीशेषराजशर्मा
प्र० सर्ग ६-०० १-३ सर्ग १२-०० १-५ सर्ग १८-०० १-६ सर्ग ३०-००
२२ किराताजुंनीयम् । 'विजया' संस्कृत-हिन्दी व्याख्या, परीक्षोपयोगि संस्करण ।
डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी । द्वि० सर्ग २-०० ३-६ सर्ग ७-००
२३ दशकुमार-पूर्वपीठिका । परीक्षापयोगि 'विमला' संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित
व्याख्याकार-पं० श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी ६-००
२४ प्रस्तावरत्नाकर । परीक्षोपयोगि निबन्धसंग्रह । डॉ० ब्रह्मानन्दत्रिपाठी ७-५०
२५ सवृत्तिरष्टाध्यायीसूत्रपाठः । सम्पा० श्रीगोपालशास्त्री 'दर्शनकेशरी' ६-०

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