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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १८३
उदाहरणों से व्यक्तिविशेष के अनेक नामों में से स्थल विशेष में किसी खास
नाम का औचित्यकारी दिग्दर्शन कराया गया है। ऐसा क्यों हुआ है—यह
विचारणीय है ३८ ॥
आशीर्वचनोंचित्यं दर्शयितुमाह—
पूर्णार्थदातुः काव्यस्य सन्तोषीतमनीषिणः ।
उचिताशीर्नृपस्येव भवत्यभ्युदयावहा ॥ ३९ ॥
सम्पूर्णसमर्पकस्य सन्तोषीतविदुषः काव्यस्य नृपतेरिवोचितमाशीः-
दमभ्युदयावहं भवति ।
नामौचित्यविवेचनात्परं प्राप्तावसरं सप्तविंशतितममाशीर्वादौचित्यं
परिभाषितुमाह— पूर्णार्थदातुरिति । पूर्णार्थदातुर्निराकाङ्क्षाभिधेयबोध-
कस्य, पक्षान्तरे यथेष्टधनप्रदायकस्य, ( अत एव ) सन्तोषितास्तुष्टीकृता
मनीषिणो विद्वांसो येन तस्य सन्तोषीतमनीषिणः पक्षद्वयेऽपि तुल्यमेतत्,
यतो ह्यर्थज्ञानेन धनोपलब्ध्या च विद्वांसस्तुष्टा भवन्त्येव । एवंभूतस्य,
नृपतेः राज्ञ इवोचिताशीः समुचिताशीर्वचनमभ्युदयावहा कल्याणप्रदा
भवति जायते ।
कारिकार्थमेव विशदयितुमाह—सम्पूर्णेति । यथा सम्पूर्णसमर्पकस्य
सर्वस्वदातुरत एव सन्तोषीतमनीषिणस्तुष्टीकृतविदुषः नृपतेर्भूतपतेरुचित-
मनुरूपमाशीःपदमाशीर्वादवचनमभ्युदयावहं कल्याणकारकं भवति तथैव
सम्पूर्णसमर्पकस्य निःशेषाथर्विबोधकस्यात एव सन्तोषीतमनीषिणः
सन्तुष्टीकृतविदुषः काव्यस्याप्युचितं समुचितमाशीःपदमभ्युदयावहं
कल्याणकारकं भवति जायते ।
नामौचित्य की विवेचना कर चुकने के बाद अभी अवसर प्राप्त होने पर
सत्ताइसवें आशीर्वचनोचित्य की परिभाषा की जा रही है – पूर्णार्थदातुरिति ।
यथेष्ट धन देने के कारण जिसने विद्वानों को सन्तुष्ट कर दिया है ऐसे राजा के
प्रति व्यवहृत आशीर्वचन की आकांक्षा शान्तिकारक अर्थ के प्रतिपादन से जिसने
विद्वानों को प्रसन्न कर दिया है वैसे काव्य के आशीर्वादसूचक वचन भी कल्याण-
कारक होते हैं ।
कारिका की ही व्याख्या करने के लिये कहा गया है--सम्पूर्णसमर्पकस्येति ।
जैसे सर्वस्वदान से विद्वानों को संतुष्ट कर देनेवाले राजा के प्रति व्यवहृत अनुरूप
आशीर्वचन कल्याणकारक होते हैं उसी तरह आकांक्षारहित सम्पूर्ण अर्थ के ज्ञान
द्वारा विद्वानों को प्रसन्न कर देने वाले काव्य का भी अनुरूप आशीर्वचनसूचक