औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १९१
ऽवनतेन प्रणतेन विनयानेति भावः, येन, नितरामत्यन्तं विशेषोन्नतिर-
त्यभ्युदयः, प्राप्ता लब्धा, एवमेव यस्य प्रतापानलः प्रतापाग्निशाशा
दिशोऽविरतं सततं, शीतलतां शैत्यं, नयति प्रापयतर्थादवानतस्योन्नत्या-
श्रयणमनलस्य च शैत्यकरणं साधारणतो विरुद्धमिवाभाति परन्तुस्मिन्
राजनीयानेव विशषाऽस्ति यदुभयमपि सिद्ध्यति यच्च समुचितमेवेति
भावः, तस्य प्रसिद्धस्य श्रीमदनन्तराजनृपतेः काले समयेऽयं ग्रन्थः किलेति
निश्चयेन कृतः समाप्तिं नीतः ॥ ५ ॥
यस्यासिरिति। जिसकी तलवार विध्वंसकार्य में न लगकर निर्माणकार्य में
लगी हुयी थी, देशों को जीत-जीत कर सभी प्रसिद्ध सदाचारी और विद्वानों का
एक परिवार ही बना डाला था, तथा विनय से अवनत होकर जिसने अपनी पूरी
उन्नति की थी, एवं जिसके प्रतापालन से ( विघ्नबाधा-समाप्ति के द्वारा ) सभी
दिशायें शीतलता का अनुभव करती थी उस राजा श्रीमदनन्तराज के समय में
यह ग्रन्थ समाप्त हुआ ॥ ५ ॥
इति श्रीप्रकाशेन्द्रात्मजव्यासदासापराख्यश्रीक्षेमेन्द्रकृता
'औचित्यविचारचर्चा' समाप्ता ।