सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 245

समुचितमेव। तत्र कारणमाह - प्रियेति। प्रियनयनविभ्रमस्य प्रेयसीनेत्र-
विलासस्य, सुखार्पणयोग्यत्वात्सुखप्रदानक्षमत्वात्।
इस पद्य में "असाधारण प्रेम से आर्द्र और प्रणय-विश्रान्ति से, प्रगल्भ मृग-
लोचनाओं की आँखों का वह अपूर्व विलास तुम्हें सुख प्रदान करे, जिसके
अभिप्राय को जानकर जगद्विजेता कामदेव के पांचों बाण कर्तव्यरहित हो
जाने के कारण लज्जा से तूणीररूप बिल में अपना मुँह छिपा लेते हैं" इस
तरह के कथन में "वः सुखं देयात् - तुम्हें सुख प्रदान करे" यह जो आशीर्वचन
प्रयुक्त हुआ है वह अत्यन्त समुचित है, क्योंकि प्रेयसी के नयन-विलास में सुख
पहुँचाने की क्षमता अवश्य होती है, इसलिये यह आशीर्वचनौचित्य का स्पष्ट
संकेत करता है।
यथा वा मम वात्स्यायनसूत्रसारे—
कामः कामं कमलवदनानेत्रपर्यन्तवासी
दासीभूतत्रिभुवनजनः प्रीतये जायतां वः।
दग्धस्यापि त्रिपुररिपुणा सर्व