औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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चाहिये। इन सबके विचार ग्रंथ-विस्तार के भय से नहीं किये गये हैं, इसलिए
अधिक कहना निरर्थक है। इसमें दूसरे काव्याङ्गों की बात जो कही गयी है
तदनुसार मैंने स्वयं ऊह करके वृत्त (छन्द) और वर्ण के औचित्यानौचित्य के
उदाहरण संस्कृत व्याख्या में दिखला दिये हैं। विज्ञ पाठक कहीं से उनका परिचय
प्राप्त कर लेंगे ॥ ३९ ॥
आसीत् प्रकाशेन्द्र इति प्रकाशः काश्मीरदेशे त्रिदशेश्वरश्रीः ।
अभूद् गृहे यस्य पवित्रसत्रमच्छिन्नमग्रासनमग्रजानाम् ॥ १ ॥
स्वपरिचयादिप्रदानाय ग्रन्थकर्ता महाकविः क्षेमेन्द्रः "आसीदित्या-
रभ्य किलायं कृतः" इत्यन्तं प्रतिपादयति—आसीदिति । काश्मीरदेशे,
प्रकाशेन्द्र-इति नाम्ना प्रकाशः प्रकाशते इति व्युत्पत्त्या प्रकाशमान इत्यर्थः,
त्रिदशेश्वरश्रीरिन्द्रतुल्यकान्तिः कश्चिद् ब्राह्मण इति शेष आसीदभूत्,
यस्य प्रकाशेन्द्रस्य गृहे, अच्छिन्नमत्रुटितं धारावाहिकरूपेण प्रवृत्तमित्यर्थः,
पवित्रसत्रं पूतयज्ञोऽग्रजानां ब्राह्मणानामग्रासनं प्रथम स्थानं
चाभूत् ॥ १ ॥
अपने परिचय और ग्रंथ-निर्माण के ऊपर प्रकाश डालने के अभिप्राय से
ग्रंथकर्ता महाकवि क्षेमेन्द्र कह रहे हैं—आसीदिति । काश्मीर देश में प्रकाशेन्द्र
नाम के इन्द्रतुल्य शोभाशाली एक ब्राह्मण थे, जिनके यहाँ धारावाहिक रूप
से पवित्र यज्ञानुष्ठान हुआ करते थे तथा ब्राह्मणों का बहुत आदर
होता था ॥ १ ॥
यः श्रीस्वयम्भूभवने विचित्रे लेप्यप्रतिष्ठापितमातृचक्रः ।
गोभूमिकृष्णाजिनवेश्मदाता तत्रैव काले तनुमुत्ससर्ज ॥ २ ॥
यः श्रीति । यः प्रकाशेन्द्रः, विचित्रेऽपूर्वे, श्रीस्वयम्भूभवने शोभाशीले
ब्रह्ममन्दिरे, लेप्ये भित्तौ, प्रतिष्ठापितं निर्मितमालिखितमिति यावत्,
मातृचक्रं देवीमूर्तियेन तादृशः, गवां भूमेः, कृष्णाजिनस्य कृष्णसारमृग-
चर्मणः, वेश्मनो गृहस्य च दाता सन्, काले समयप्राप्तौ, तत्रैव ब्रह्ममन्दिरे,
तनुं शरीरं, ससर्ज तत्याज ॥ २ ॥
यः श्रीति । जिन्होंने ब्रह्ममन्दिर में अनेक देवी-देवताओं के चित्र बनवाये,
तथा गाय, भूमि, कृष्णाजिन और गृह का दान करते हुए वहीं समयानुसार
मृत्युलाभ किया ॥ २ ॥