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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 256 में से

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पृष्ठ 242

१८२ औचित्यविचारचर्चा
=हों पाये थे तबतक 'भव' के तृतीय नेत्र से उत्पन्न उस प्रलयकारी वह्नि ने
कामदेव को जलाकर राख कर दिया" इस तरह के कथन में महादेव का "भव"
नाम का जो उपादान हुआ है वह बहुत ही अनुचित है, क्योंकि संहार करते समय
रुद्र "भव" न रहकर "हर" हो जाते हैं, इसलिये "हर" कहना ही उपयुक्त
होता, परन्तु वैसा न करके 'भव' जो कह दिया गया उससे नाम का अनौचित्य
ही पूर्णतः व्यक्त होता है।
यहाँ पर कुछ आलोचक यह कहकर इस अनौचित्याक्षेप का खंडन करते हैं
कि—"अवसर संहार का ही है, परन्तु पद्य के तृतीय चरण में अग्नि के जन्म
की बात अवसर प्राप्त है। शंकर के नेत्र से अग्नि का जन्म हो रहा है और वही
अग्नि मदन को जलाने में कृतकार्य होती है। यहाँ शंकर का काम केवल अग्नि
का उत्पादन मात्र है मदन-भस्म करने से उनका साक्षात् सम्बन्ध नहीं है। ऐसी
परिस्थिति में "भव" शब्द का कालिदासीय प्रयोग औचित्य की सीमा के भीतर
ही है।"
मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि कालिदास ने जानबूझकर "भव" शब्द का
ही प्रयोग यहाँ किया है। कारण—प्रायः उनका अभिप्राय यह था कि कामदेव
ने ऐसा अक्षम्य अपराध किया, जिससे भव (जगत्पिता) की आँख से भी वात्सल्य
नहीं बरस कर अग्निकण ही बरसने लगे, उसका जैसा भीषण फल होना चाहिये,
हुआ। इस तरह कविकुलगुरु कालिदास 'भव' इस प्रयोग के द्वारा कामदेवकृत
कर्म की अतिभीषणता, अथ च अक्षम्यता अभिव्यक्त करना चाहते हैं। इस
दृष्टिकोण से विचार करने पर 'भव' पदप्रयोग अनुचित नहीं प्रतीत होता, प्रत्युत
इस व्याख्या के अनुसार "हर" पद का प्रयोग ही समुचित नहीं होता, क्योंकि
जो सदा "हर" है वह तो साधारण अपराध पर भी सहारलीला रचा सकता
है, अतः इस पद के द्वारा काम के अपराध की वह गंभीरता व्यक्त नहीं होती
जिसकी अभिव्यक्ति कवि को अभीष्ट थी।
अस्तु, यह सब होते हुए भी संहार के अवसर पर साधारणतया "भव" पद
का प्रयोग अनुचित प्रतीत होता ही है, इसलिये नामानौचित्य के प्रसंग में की
गयी आलोचना भी उचित ही है।
एक बात और यहाँ ध्यान देने योग्य है कि "नाम्ना कर्मानुरूपेण"—इस
कारिका और उनकी वृत्ति के अनुसार किसी काव्य के नामकरण के सम्बन्ध में
औचित्यानौचित्य का विचार प्रस्तुत प्रतीत होता है, परन्तु यहाँ उदाहरण-