आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
आल्हाखण्ड । २०४
कउनसो काज अकाज भयो महराज गयउ जहँ लाज गवाँई ॥
सुखको साज समाज करउ रघुराज सदा मम लाज बचाई ।
घबड़ानको आज न काज कछू हम ब्याहकरैं वछराजदुहाई ७१
सुनिकै बातैं मलखाने की राजा गयो सनाकाखाय ।
मलखे चलिभे फिरि महलनको मल्हना पास पहुंचे जाय ७२
चिट्ठी पढ़िकै पृथीराज की मलखे हाल दीन बतलाय ।
सुनिकै चिट्ठी पृथीराज की मल्हनागई तुरत कुँभिलाय ७३
तारा टूटे आसमान में थर थर धरा गई तब हाल ।
चील्हैं छाईं राजमहल में रोवन लागे श्वान श्रृगाल ७४
मल्हना बोली तब मलखे ते अशकुन बहुत परैं दिखलाय ।
छारो ब्रह्मा घरमें रहिहै टीका आप देउ लौटाय ७५
सुनिकै बातें ये मल्हना की मलखे बोले वचन रिसाय ।
ब्याह विधाता यह रचिराखा टीका कौन सकै लौटाय ७६
सदा न फूलै कहुँ वन तोरई माई सदा न सावन होय ।
सदा जवानी नहिं स्थिरहै माई सदा न वर्षा होय ७७
टीका फेरो जो दिल्ली का माता होउ जगत बदनाम ।
जातिके ओछे मोहवे वाले यह है देश-देश सरनाम ७८
होय नतैती जो दिल्ली में पूरण होयँ हमारे काम ।
भुन्ना नैनागढ़ माड़ो में हमपर कृपाकीन सियराम ७९
ये सब अशकुन हैं ताहर को माता कहां ज्ञान गा त्वार ।
अबै कबूतरी ना बुड्ढी भै ना बल खाय गई तलवार ८०
बार जो बाँका जा ब्रह्मा का हमरो मूड़ लियो कटवाय ।
बातें सुनिकै ये मलखे की मल्हना दीन्ह्यो बाँह गहाय ८१
ब्रह्माका विवाह । २०५
जस मनभावै मलखाने के तैसी करो बनाफरराय ॥
बड़ी खुशीभै मलखाने के फूले अंग न सके समाय ८२
बड़ी प्रशंसाकी मल्हना की मलखे बार बार शिरनाय ॥
शाखा चलिहै महरानी तब ईजति हमरी लियो बचाय ८३
वारु न बांका इनका जैहै ओ महरानी बात बनाय ॥
जहाँ पसीना इनका गिरिहै तहँ मैं देहौं खून बहाय ८४
करो तयारी अब जल्दी सों ताहर टीका देय चढ़ाय ॥
बातें सुनिकै मलखानेकी मल्हना हुकुम दीन फर्माय ८५
बाँदी लीपन चौका लागी छींक्यो एक पुरुषने आय ॥
मल्हना बोली तब मलखे ते अशकुन बहुत परै दिखराय ८६
टीका फेरो तुम दिल्ली का मानो कही बनाफरराय ॥
बातें सुनिकै ये मल्हना की बोला तुरत लहुरवाभाय ८७
टीका फिरिहै जो दिल्ली का होई देश हँसौंवा माय ॥
कीन तयारी जब माड़ो की तबहूं छींक भई थी आय ८८
तबहूं रोंक्यो महरानी तुम माड़ो फते कीन हम जाय ॥
शकुन हमारो फिरि वैसे भा शंका कौन गई मन आय ८६
सुनिकै बातें उदयसिंह की मल्हना ठीक लीन ठहराय ॥
ऊदन मलखे द्वउ मनिहैं ना अब अनहोनी परै दिखाय ६०
बड़ा लड़ैया दिल्ली वाला है सब राजन में शिरताज ॥
तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धुहौ स्वामी रामचन्द्र महराज ६१
परो साँकरो अब हमपर है राखन हार तुम्ही रघुराज ॥
हम सुनिराखा है विप्रन सों राख्यो सदा भक्तकी लाज ६२
गौतम नारी को तुम तारा केवट लीन्ह्यो हृदय लगाय ॥
मांस अहारी गृद्धै तारयो भीलिनिदर्श दिखायो जाय ६३
१० आल्हाखण्ड । २०६
सोई दशरथ के रघुरैया नैया तुही लगैया पार ॥
एक पूतकी मैं मैयाहौं ताकी कुशल किह्योकरतार ६४
सुमिरन करिकै रघुनन्दन को मल्हना करनलागि घरकाम ॥
मलखे ठाकुर त्यहिसमया में ताहर वेगि बुलावा धाम ६५
जितने वासी रहें मुहवे के आये सबै नारि नर द्वार ॥
सात सुहागिल त्यहि समयामें गावन लगीं मंगलाचार ६६
बड़ी भीर भै परिमालिक घर कहुँ तिलडरा भूमि ना जांय ॥
चूड़ामणि पण्डित तहँ आयो साइतिं तुरत दीन बतलाय ६७
नव पिचकारी भरिकेशरि रंग मारैं एक एक को धाय ॥
धूरि उड़ाई तहँ अबीर की महलन् गई लालरी छाय ६८
चौक पुराई गजमोतिन सों पीढ़ा तहाँ दीन धरवाय ॥
चौड़ा ताहर दउ ठाढ़े ये ब्रह्मा गये तहाँपर आय ६६
को गनि वरणै परिमालिक कै लोहा छुये सोन ह्वैजाय ॥
पारस पाथर ज्यहिके घरमाँ त्यहिकी द्रव्यसकैको गाय १००
ऊदन बोले तहँ ताहर सों अब तुम टीका देउ चढ़ाय ॥
साँगा गाड़ दइ तब ताहरने औयहबोल्यो भुजा उठाय १०१
साँग उखारैं ब्रह्मा ठाकुर तौ हम टीका देई चढ़ाय ॥
रीति हमारे यह घरकी है साँचे हाल दीन बतलाय १०२
सात तेवा लोहे के नीचे तापर साँग गाड़ि हम दीन ॥
साँग उखारैं ब्रह्मा ठाकुर तौहमब्याहबहिन काकीन१०३
देखि तमाशा बहु ताह रका मल्हना बोली वचन रिसाय ॥
अशकुनकीन्योम्परेमहलन्मां टीका तुरत देउ लौटाय १०४
बिना बियाहे ब्रह्मा रहि हैं तौ नहिं होय हमारी हान ॥
अक्लि तुम्हारी को लैलीन्ही मानौं नहीं कही मलखान १०५
ब्रह्माका बिवाह । २०७ ११
सुनिकै बातें ये मल्हना की ऊदन बोले माथ नवाय ॥
टीका फेरागा दिल्ली का. तौमुँहकौन दिखावाजाय १०६
इतना कहिकै ऊदन ठाकुर तुरतै डारा सांग उखार ॥
ऊदन बोले फिरि ताहर सों नाहर दिल्ली के सरदार १०७
हम तो नौकर परिमालिक के तिन यह डारा सांग उखार ॥
ऐसे नौकर जिनके घरमाँ तिनसे कौन करै तलवार १०८
सुनिकै बातें ये ऊदन की ताहर मनै गयो शर्माय ॥
बीरा दीन्ह्यो ताहर ठाकुर ब्रह्मा बीरागये चबाय १०६
छींक तड़ाका मै सम्मुखमाँ मल्हना रोय उठी घबड़ाय ॥
ब्याह न करिहौं मैं ब्रह्मा का मानो कही बनाफरराय ११०
हमैं चाह है नहिं भौरिन कै ना कछु बहू केरि परवाह ॥
इकलौता यहु जीवै जग औ फिरि बनेरहै नरनाह १११
बहुतक अशकुन हम देखे हैं कैसे धरा जाय जिय धीर ॥
पुत्रघाव सों दशरथ मरिगे यासों और कौन जगपीर ११२
भला न देखें यहि ब्याहे में मानो कही वीर मलखान ॥
जो नहिं मानो मलखाने तुम हमरे जाय प्रानपर आन ११३
बातैं सुनिकै ये मल्हना की बोले फेरि बीर मलखान ॥
घरको आवो टीका फेरैं तौसब हँसिहैं देशजहान ११४
बिटिया आहिउ तुम ठाकुर की ठाकुर घरै बियाही माय ॥
नहिं क्यहु बनियाकी महतारी जो मन बारबार पछिताय ११५
हल्दी मिरचा हम बेचैं ना ना हम करैं वाणिज्य व्यापार ॥
हम तो लरिका हैं ठाकुर के औ दिनराति करैं तलवार ११६
धन्य सराहौं हम कुन्ती का आपन दीन्हे पुत्र पठाय ॥
युद्ध मचायो तिन कौरव ते औ यश रहा जगतमें छाय ११७
१२ आल्हखण्ड । २०८
बचे युधिष्ठिर समरभूमि ते पाँचो भाय कृष्ण महराज ॥
मैं ना रहिंगे त्यउ दुनिया माँ रहिगै एक जगतमें लाज ११८
जप तप होतै नहिं कलियुग में ना कछुदान पुण्य अधिकाय ॥
जो मरिजावैं समरभूमि में पावैं स्वर्गलोक को माय ११९
इतना कहिकै मलखे ठाकुर टीका तुरत दीन चढ़वाय ॥
चारो नेगिन को बुलवायो भूषण वस्त्र दीन पहिराय १२०
बहुधन दीन्ह्यो फिरि चौंड़ा को अपने हाथ बनाफरराय ॥
चूड़ामणि पंडित ते बोल्यो अबतुम लगन देउ बतलाय १२१
सुनिकै बातें मलखाने की पंडित बोला लगन विचार ॥
माघ महीना कृष्ण पक्ष में तेरसि तिथी शुक्रको बार १२२
नीकी साइति मलखाने है सो हम तुमका दीन बताय ॥
सुनिकै बातें ये पंडित की औ ताहरको दीन सुनाय १२३
यादि राखियो यह दिन भाई दिल्ही ब्याहकरब हम आय ॥
बातें सुनिकै ये मलखे की ताहर चलिभेशीशनवाय १२४
दर्गी सलामैं सौ तोपन की धुवना रहा सरग मड़राय ॥
अद्भुत शोभा भै मोहबे के घर घर ढोलक परै सुनाय १२५
चलै पिचका कहूँ केशरि के कहूँकहूँ अबिरगुलाल उड़ाय ॥
पान मोहोबे के जग जाहिर लाली पीकैं परै दिखाय १२६
कहूँ कहूँ छैला गैला ठाढ़े बेला हार परैं दिखराय ॥
कहूँ चमेला के तेला को रहे अलबेला जुलुफलगाय १२७
कहूँ कहूँ हेला मेला कैकै बुलबुल बुलबुल रहे लड़ाय ॥
उड़ै तमाखू कहूँ हुकन में गुड़गुड़गुड़गुड़रहेमचाय १२८
मारु मारुकै मोहरि बाजै कहूँ कहूँ हाव हाव करनाल ॥
तहूँ पँतरह बालक बदलैं कहूँकहूँ लड़ैंमल्ल जसकाल १२६
ब्रह्माका विवाह । २०६ १३
पटा बनेटी बाना कहूँ कहूँ कहूँकहूँ गदका को घमसान ॥
बाढ़ि घरावैं कहूँ कहूँ क्षत्री कहूँकहूँ हँनैं निशाना जवान १३०
देखि तमाशा चौंड़ा ताहर मनमें बड़े खुशी है जायें ॥
कूच कराये दउ मोहबे ते दिल्लीशहरगये नगच्याय १३१
ह्यौंसुधि पाई माहिल ठाकुर दिल्ली अटे अगाड़ी जाय ॥
माथनवायो जब माहिल ने खातिर कीन पिथौराराय १३२
सोने कि चौकी में बैठारयो राजा दिल्लीके महराज ॥
बोले पिरथी फिर माहिल ते तुम्हरोकौन करी हमकाज १३३
बोले माहिल फिर पिरथी ते मानो कही सत्य महराज ॥
ब्याहजो कीन्ह्यो तुम मोहबे में खोई सबै अपनी लाज १३४
जाति बनाफरकी ओछी है है सब जातिन केरि उतार ॥
इतना कहतै चौंड़ा ताहर दोऊ आयगये दरबार १३५
सूरति दीख्यो जब ताहर की गरई हाँक दीन ललकार ॥
हमजो वरजा तुमको ताहर ना तुम मानी कही हमार १३६
सुनिकै बातें ये राजा की ताहर हाथजोरि शिरनाय ॥
कही हकीकति सब मलखे की ताहर बारवार समुझाय १३७
माहिल बोले फिर राजा ते नाहर दिल्ली के सरदार ॥
टीका फेरो तुम जल्दी सों इतनी मानो कही हमार १३८
इतना सुनिकै चौंड़ा चलिभा ताहर बोले बचन उदार ॥
बड़े लड़ैया मोहबे वाले जिनके बाँट परी तलवार १३६
ब्याहन आवैं जब तुम्हरे घर तब तुम मूड़ लिह्यो कटवाय ॥
टीका फिरिहै अब दादा ना तुमते सत्यदीन बतलाय १४०
यह मन भाय गई माहिल के तुरतै कीन्ह्यो रामजुहार ॥
बिदा माँगिकै पृथीराज सों चलिभा उरई का सरदार १४१
२४
१४ आल्हखण्ड । २१०
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १४२
माथनवावों पितु अपने को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥
रामरमा मिलि दर्शन देबो इच्छा गही मोरि भगवन्त १४३
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना-
रायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलानिवासिमिश्रवंशोद्भव
बुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतब्रह्माटीकावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥१॥
सवैया ॥
भो रघुनाथ अनाथन नाथ सनाथ करो अब तो भगवाना।
और न आश निराशकरो नहिं देखिचुक सब ठौर ठिकाना ॥
मात पिता अरु भ्रातको नात सबै तुमहीं यहही मनजाना।
गात सुखात सबै दिन जात नहीं लखितें कछु भूखबखाना १
सुमिरन ॥
दोउ पद ध्यावों रघुनन्दन के बन्दनकरों जोरि द्वउहाथ॥
नहीं सहायक कउ काको है स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १
बिना तुम्हारे को परमारथ अन्त में देइ कौन को साथ ॥
ओ जगतारण भवभय हारण तुम्हीं सदा हमारे नाथ २
को अस दुनियामाँ पैदा भा जो तरिगयो बिना तव नाम॥
माता भ्राता अरु ताता ना अन्तम आवै अपने काम ३
तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धु हौ सीतापती चराचर नाथ॥
गालत हमरी द्विज देही का जावै समय हाथ बेहाथ ४
शिव औ ब्रह्मा कोउ पायो ना गाय कै पार तुम्हारी गाथ ॥
त्यहि को गावों कस मानुष मैं स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ५
ब्रह्माका विवाह । २११ १५
छूटि सुमिरनी गै रघुबर कै सुनिये ब्रह्मा केर विवाह ॥
फौजें सजिहैं आल्हा ऊदन करि हैं समर केर उत्साह ६
अथ कथाप्रसंग ॥
माहिल चलिभे जब दिल्ली ते मलहना महल पहुंचे आय ॥
बड़ी खुशाली भै मलहना के हमरे बूत कही ना जाय १
मलहना बोली फिरि माहिल ते भैया उरई के सरदार ॥
टीका चढ़िगा है दिल्ली का ब्रह्मा भाने जौन तुम्हार २
बहुतक अशकुन त्यहिसमयाभे जियरा धीर धरा ना जाय ॥
मैं समझायों भल मलखे को पैना मन्यो बनाफरराय ३
त्यही समैया ते भैया अब रहि रहि मोर प्राण घबड़ायँ ॥
माह महीना जब ते आवा तब ते भूख नींद गै भाय ४
कलनहिं पावैं हम पलँगा में औ घरदीखे नित्त डेरायँ ॥
बिरमा द्यावलिके लड़िका सब हमको शत्रु रूप दिखरायँ ५
पै अब करतब कछु सूझैना साँचे हाल दीन बतलाय ॥
बातें सुनिकै ये मलहना की माहिल बोले बचन बनाय ६
काम हमारो रहै पिरथी ते हम दरबार मँझावा जाय ॥
सुनी हकीकति तहँ पिरथी की बहिनी सांच देयँ बतलाय ७
जाति बनाफर की ओछी है पिरथी बार बार पछितायँ ॥
ब्याहन अइहैं हमरे घरमाँ सबके मूड लेब कटवाय ८
चलिकै ब्रह्मा इकलो आवै तौ बिनब्याधि ब्याह है जाय ॥
चन्द्रवंश में उइ पैदा हैं नहिं कछुउजुरु हमारे भाय ६
हम समुझावा तब पिरथी को ऐसै करब मोहोबे जाय ॥
भाने हमरो ब्रह्माठाकुर औ बहनोई चँदेलोराय १०
बड़ी खुशाली भै पिरथी के फूले अंग न सक्यो समाय ॥
१६ आल्हखण्ड । २१२
भलो आपनो जो तुम चाहौ इकलो ब्रह्मा देउ पठाय ११
हमहूं जैबे त्यहि संगैमाँ तुम्हरे काज सिद्ध हैजायँ ॥
सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना बोली मन हर्षाय १२
कहा तुम्हारो हम टारब ना भैया उरई के सरदार ॥
इकलो ब्रह्मा तुम लै जावो जामें होय नहीं तहँ मार १३
माहिल बोले फिरि मल्हनाते बहिनी मानो कही हमार ॥
चोरी चोरा काम निकालो नाकछु रीतिभांति की ब्यार १४
यह मन भायगई मल्हना के चुप्पे पलकी लीन मँगाय ॥
ब्रह्माठाकुर को बुलवायो औ पलकीमों दीन बिठाय १५
लैकै पलकी माहिल चलिभे ऊदन अटा तहाँ पर आय ॥
हाल जानिकै सब माहिल को चुप्पै धावन लीन बुलाय १६
लिखिकै चिट्ठी मलखाने को ऊदन तुरतै दीन पठाय ॥
चिट्ठी पढ़िकै मलखाने ने औ सुलखेको लीन बुलाय १७
कहि समुझायो सब सुलखेको सोऊ चला बेगिही धाय ॥
जायकै पकरयो सो माहिलको तुरतै कैद लीन करवाय १८
लैकै पलकी औ माहिल को सिरसागढ़ै पहुँचा आय ॥
बाँधि जँजीरन फिरि माहिलको फाटक पास दीन बैठाय १६
ऊदन चलिभे फिरि महलनको मल्हनै शीश झुकावा जाय ॥
हाथ जोरिकै ऊदन बोले माता साँच देयँ बतलाय २०
माहिल मामा की बातन में इकलो ब्रह्मा दियो पठाय ॥
कुशल न होइहै तहँ ब्रह्माकी साँची बात कहैं हम माय २१
इतना कहिकै ऊदन चलिभे दशहरिपुरै पहुँचे आय ॥
कही हकीकति सब आल्हासों ऊदन बार बार समुझाय २२
चिट्ठी लिखिकै मलखाने ने औ परिमालै दीन जनाय ॥
ब्रह्माका विवाह । २१३ १७
नेवता पठवो सब राजन को यहँहीं कुँवाँ बियाहैं माय २३
धायकै चिट्ठी मलखाने की सोई कीन रजापरिमाल ॥
गायके नेवता परिमालिक का आये सबै तहाँ नरपाल २४
तम्बू गड़िगे महराजन के झण्डा आसमान फहरायँ ॥
सुनवाँ बोली हाँ ऊदन ते तुम सुनिलेउलहुरवाभाय २५
ब्याह नगीचे है ब्रह्माका ना मोहबे का भयो तयार ॥
काह तुम्हारे मनमाँ ब्यापी देवर बेंदुल के असवार २६
सुनिकै बातें ये भौजी की बोले उदयसिंह सरदार ॥
हम नहिं जावैं अब मोहबे का भौजी मानों कही हमार २७
सुनिकै बातें ये ऊदन की सुनवाँ कहे बचन मुसुकाय ॥
दूध पियायो मल्हना रानी सेयो तुम्हें बनाफरराय २८
तुम्हें न चाहिये अस बघऊदन धोखा देउ समय पर आय ॥
धोखो दीन्हो माहिल मामा मलखे कैद लीन करवाय २६
कुशल आपने सब लड़काकी चाहैं सदा लहुरवा भाय ॥
को जगरक्षक है जननी सम ऊदन काह गये बौराय ३०
करो तयारी अब भैया सँग मानो कही बनाफरराय ॥
इतना सुनिकै ऊदन चलिभे आल्है खबरिजनायोजाय ३१
बातें सुनिकै बघऊदन की आल्हा लश्करलियोसजाय ॥
बैठे हाथी आल्हा ठाकुर मनमें सुमिरि शारदामाय ३२
चढ़ा बेंदुला की पीढ़ी पर नाहर उदयसिंह सरदार ॥
दशहरिपुरवा ते चलिकै फिरि पहुंचे मोहबे के दरबार ३३
खातिर कीन्ह्यो परिमालिक ने दोऊ भाय बैठि शिरनाय ॥
भई तयारी फिर सिरसा की सबकोउ अटे तहाँपर जाय ३४
गई पालकी तहँ मल्हना की सिरसा भीर भई अधिकाय ॥
१८ आल्हाखण्ड । २१४
आल्हा दीख्यो जब माहिल को मनमें गई दया तब आय ३५
फिरि ललकार्यो मलखाने को यहुका कीन लहुरवा भाय ॥
जल्दी छोड़ो तुम मामा को हमसों विपति दीखि ना जाय ३६
सुनिकै बातें ये आल्हा की मलखे तुरतै दीन छुड़ाय ॥
कुँवाँ बियाहउ ब्रह्मा ठाकुर पलकी चढ़यो गणेश मनाय ३७
भई तयारी फिरि विवाह की सबियाँ क्षत्री भये तयार ॥
हम ना जैबे अब दिल्ली को बोला उरई का सरदार ३८
बातैं सुनिकै ये माहिल की बोला उदयसिंह त्यहिबार ॥
तुम ना जैहौ जो दिल्ली को तौ को करिहै काम हमार ३६
बाँधि जंजीरन हम लैजैहैं मामा उरई के सरदार ॥
बातैं सुनिकै ये ऊदन की माहिल तुरत भये तय्यार ४०
हाथी सजिकै आगे चलि भे पाछे चले घोड़ असवार ॥
पैदल सेना त्यहि पाछे सों तोपैं चलिभइँ पांच हजार ४१
आगे हाथी परिमालिक का पाछे सबै शूर सरदार ॥
पाग बैजनी शिरपर बाँधे ऊदन बेंदुलपर असवार ४२
कूच कराये सिरसागढ़ सों दिल्लीशहर गये नगच्याय ॥
दिल्ली केरे फिरि डाँड़ेपर तम्बू तुरत दीन गड़वाय ४३
ध्वजपताका एकमिल व्हैगै नभमाँ गई लालरी छाय ॥
लागि कचहरी परिमालिककी शोभा कही बून ना जाय ४४
आल्हा बोले चूड़ामणि सों पंडित साइति देउ बताय ॥
लैके पत्रा पंडित बोले मानो कही बनाफरराय ४५
भौनलगन की अब बिरिया है ऐपनबारी देउ पठाय ॥
बातैं सुनिकै चूड़ामणि की मलखे रूपना लीन बुलाय ४६
ऐपनबारी बारी लैके दिल्ली तुरत देउ पहुंचाय ॥
ब्रह्माका बिवाह । २१५ १६
बातें सुनिकै मलखाने की रूपना हाथजोरि शिर नाय ४७
उत्तर दीन्ह्यो मलखाने को मानो कही बनाफरराय ॥
नैनागढ़ भुन्नागढ़ नाहीं ह्याँपर बसै पिथौराराय ४८
लौटब मुशकिल है दिल्ली ते पिरथी मूड़ लेइ कटवाय ॥
औरो बारी हैं मोहेबे के तिनका आप देयँ पठवाय ४६
बातें सुनिकै ये रुपना की बोले उदयसिंह सरदार ॥
तेहा राखो रजपूती का बाँधो सदा ढाल तलवार ५०
जौन गोसइयाँ पैदा कीन्ह्यो सोई सदा बचावनहार ॥
बातें सुनिकै उदयसिंह की रूपन बोला बचन उदार ५१
घोड़ा पावैं हरनागर को औ मलखे कि ढाल तलवार ॥
ऐपनवारी हम लै जावैं लावैं नहीं नेकहू बार ५२
सुनिकै बातें ये रूपन की मलखे दीन ढाल तलवार ॥
ऐपनवारी रूपन लैकै हरनागर पर भयो सवार ५३
माथनाय कै सब क्षत्रिन को तुरतै कूच दीन करवाय ॥
पिरथी केरे फिर फाटकपर रूपन तुरत पहूंचा जाय ५४
तब ललकारा दरबानी ने बारी बड़ो के असवार ॥
कहाँते आयो औ कहँ जैहो ताहर समरथ रावरे क्यार ५५
सुनिकै बातें द्वारपाल्जादे रूपन पास बचन ततकाल ॥
आई बरातें हैं मोहेंबे के फाटकपार निकसजापरिमाल ५६
ब्याहन आये हैं ब्रह्माको रूपनवारी नाम हमार ॥
ऐपनवारी हम लाये हैं चाहिये नेग म्हार अब द्वार ५७
सुनिकै बातें ये रूपन की बोला द्वारपाल त्यहिबार ॥
नेगु तुम्हारो का द्वारे का बोलो घोड़े के असवार ५८
सुनिकै बातें द्वारपाल की रूपन कहा बचन ललकार ॥
चारघरी भर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकीधार ५६
जौन शूरमाहो दिल्ली को द्वारे देवै नेग हमार ॥
ऐसे वैसे हम नेगी ना कम्मर बँधी ढाल तलवार ६०
शूर सराही हम ऊदन का मलखे सिरसा के सरदार ॥
का गति वरणैं हम आल्हा की जिनसों हारिगई तलवार ६१
तिनके नेगी हम रूपन हैं राजै खबरि जनावो जाय ॥
सुनिकै बातें ये रूपन की रहिगा द्वारपाल सन्नाय ६२
सोचिसमझिकै फिरि बोलनभा रूपन काह गये बौराय ॥
दहीके धोखे कहुँ भूले ना ओतैं जाय कपास चबाय ६३
एक तो ऊदन कै गिनती ना बावन चढ़ैं उदयसिंह आय ॥
ह्यॉपर मलखे सब घर घर हैं आल्हा कौनवस्तु हैं भाय ६४
है परिमालिक अस ठाकुर बहु जिनसे पोत तसीला जाय ॥
जूठनि खावै घर घर बारी सो का रारि मचावै आय ६५
पीकै दारू को आवा है की वश सन्निपात के भाय ॥
झूरिभांग जो तू खावा हो तौ हम औषधि देयँ बताय ६६
ज्ञान ठिकाने करि सागढ़ सों राजै काह सुनावैं जाय ॥
सुनिकै बातें करि डाँड़ेपर रूना बोला क्रोध बढ़ाय ६७
आयगयो तब परिमालिक कौ तहाँ यों कोऊ कहुँ देखि परैना।
जानत नाहिन रूपन को अरु नाहक दुष्ट बकै बहु बैना ॥
ताहर नाहर को गहि कै इकलो मलखान जिता बिन सैना।
का बड़िवात करै ललिते दिनही नहिं देखिपरै तब नैना ६८
बातें सुनिकै ये बारी की चलिभा द्वारपाल ततकाल ॥
ब्रह्मका विवाह । २१७ २१
हाथ जोरिकै महराजा को सब बारीके कहे हवाल ६९
सुनिकै बातें द्वारपाल की यहु महराज पिथौराराय ॥
सूरज लड़का को बुलवायो औ सबहाल कह्यो समुझाय ७०
पकरिकै लावो त्यहि बारी को हमको बेगि दिखावो आय ॥
सुनिकै बातें महराजा की सूरज चलिभा शीशनवाय ७१
दीख दुआरेपर बारी को नाहर घोड़े पर असवार ॥
शंका जाके कछु नाहीं है हाथ म लिये नाँगि तलवार ७२
हुकुम लगावा द्वारपाल को फाटक बंद लेउ करवाय ॥
फिरि लयलकारा रजपूतन को लावो पकरि शूरमाँ जाय ७३
हुकुम पायकै तब सूरज को तुरतै चले सिपाही धाय ॥
ऍंड़ लगायो हरनागर के टापन क्षत्री दीन गिराय ७४
बहुतन मार्यो रूपनबारी हाहाकार शब्द गा छाय ॥
देखि तमाशा सूरज ठाकुर मनमाँ बार बार पछिताय ७५
रूपनबारी के मुर्चा माँ कोऊ शूर न रोँकै पायँ ॥
उड़न बछेड़ा हरनागर ने बहुतक क्षत्री दीन गिराय ७६
फिरि फिरि मारै औ ललकारै बारी बड़ा लड़ैया ज्वान ॥
देखि तमाशा यहुबारी का ताहर समरधनी चौहान ७७
सूरज ताहर दुउ शहजादे रूपन पास पहुंचे जाय ॥
ऍंड़ लगायो हरनागर के फाटकपार निकरिगा साय ७८
मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री सबै चले बिरझाय ॥
नेग लेब अब हम भौरिन में गरई हाँक दीन गुहराय ७९
इतना कहिकै ऍड़ लगायो फौजन तुरत पहुंचा आय ॥
जैसे फागुन फगुई खेलैं लोहू छीटन गयो अन्हाय ८०
तैसे दीख्यो जब रूपन का बोल्यो उदयसिंह सरदार ॥
२२ आल्हखण्ड । २१८
कहौ हकीकत सब दिल्ली कै द्वारे भली कीन तलवार =१
बातैं सुनिकै उदयसिंह की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥
सुनिकै बातें ये रूपन की माहिल बोले वचन बनाय =२
यह नहिं चाहिये पृथीराज को जो अब रारि बढ़ावत जायँ ॥
कौन दुसरिहा है आल्हा का सम्मुख लड़ै समर में आय =३
जो मन पावै बघऊदन का राजै तुरत देयँ समुझाय ॥
नेग कराय देयँ द्वारे का सातो भाँवरि देयँ फिराय =४
भली भली कहि ऊदन बोले माहिल घोड़ी लीन मँगाय ॥
चढ़िकै घोड़ी माहिल ठाकुर दिल्ली शहर पहुँचे जाय ८५
को गति बरर्णै तहँ पिरथी कै भारी लाग राजदरबार ॥
खाँड़ेराय पिरथी का भाई धाँधू तासु पुत्र सरदार ८६
रहिमति सहिमति जिन्सीवाले औ रणधीर लहाउर क्यार ॥
भुर्रा सुगुलिया काबुल वाला टिहुनन घरे नाँगि तलवार =७
देवी मरहटा दक्षिण वाला आला समरथनी मैदान ॥
अंगद राजा ग्वालियर का जगनिकक्यारभुरंगताज्वान==
सातो लड़िका पृथीराज के तेऊ बैठि राजदरबार ॥
मोती जवाहर, गोपी, ताहर, सूरज, चन्दन ये सरदार =८
मर्दन, सर्दन, सातो लड़िका ये रणबाघ लड़ैया बाल ॥
सोने सिंहासन पिरथी सोहैं त्यहिमाँ जड़े जवाहरलाल ९०
औरो ठाकुर बहु बैठे हैं एकते एक शूर सरदार ॥
तहँही पहुँचे उरई वाला तुरतै कीन्ह्यो राम जुहार ६१
कियो खातिरी पृथीराजने अपने पास लीन बैठाय ॥
माहिल बोला तब पिरथी ते मानो कही पिथौरागाय ६२
काम न सरिहै लड़े भिड़ेते दूनों तरफ हानिहै आप ॥
[Header] ब्रह्माका बिवाह । २१६ २३
जहर घुरावो तुम शरबत में औ लशकरमें देउ पठाय ६३
बिना बयारी जूना टूटे औ बिन औषधि बहै बलाय ॥
यहै तयारी अब करिदारो तौ सबकाम सिद्ध है जाय ६४
साम दाम औ दण्ड भेद सों क्षत्री करें आपनो काम ॥
छल बल क्षत्री का धर्म है तुमको कौन करै बदनाम ६५
बातें सुनिकै ये माहिल की भा मन बड़ा खुशी नरनाह ॥
स्याबासि स्याबासि उरई वाले हमका नीकि दीन सलाह ६६
बिदा मांगिकै पृथीराज सों तम्बुन फेरि पहुंचा आय ॥
हाल बतायो परिमालिक को चेउँ न करी पिथौराराय ६७
जैसे पियासा पानी पावै सूखे धान परै जस नीर ॥
बातें सुनिकै ये माहिल की तैसे आय गयो मनधीर ६८
घड़ा मँगायो ह्वाँ पिरथी ने तामें जहर दीन डरवाय ॥
चारो नेगिन को बुलवायो सूरज पूत लीन बुलवाय ६६
कह्यो हकीकति सब सूरज सों पिरथी बार बार समुझाय ॥
तुरत कहारन को बुलवायो सूरज घड़ा लीन उठवाय १००
माथनायकै फिरि पिरथी को मनमें श्रीगणेश पद ध्याय ॥
सूरज चलिभा फिरि दिल्ली सों लश्कर तुरत पहुंचा आय १०१
जहँना तम्बू परिमालिक का बहिँगी तहाँ दीन धरवाय ॥
माथ नायकै परिमालिक को आपो बैठिगयो तहँ जाय १०२
मलखे बैठे हैं दहिने पर बायें बैठ उदयसिंहराय ॥
बैठ बराबर आल्हा ठाकुर शोभाकही बूत ना जाय १०३
सूरज बोले तहँ राजा सों शरबंत आप देउ बँटवाय ॥
करो तयारी फिरि द्वारे की साइति आयगईनगच्याय १०४
देवा बोला महराजा सों मानो कही चँदेलो राय ॥
२४ आल्हखण्ड । २२०
पहिले शरबत माहिल पीवैं पाछे सब को देउ बताय १०५
इतना सुनिकै सूरज चलिभे तुरतै काने जनो चढ़ाय ॥
माहिल बोले तब देबाते क्षत्री काह गये बौराय १०६
पान बड़ेको पानी छोटे यहहै रीति सदा की भाय ॥
भाय लहुरवा शरबत पीवै औरो पियैं बनाफरराय १०७
माघ महीना दिन शरदी के हमरो शरबत पियै बलाय ॥
शिरमें पीड़ा ऐसे होवै औ फिरिसन्निपातहै जाय १०८
बातैं सुनिकै ये माहिल की देवा कुत्ता लीन बुलाय ॥
पीतै शरबत कुत्ता मरिगा तब सब गये तहां सन्नाय १०६
जितना शरबत रहै बहिंगिनमें सो सब खन्दक दीन डराय ॥
भागिकै सूरज दिल्ली आये औ दरबार पहुंचे आय ११०
खबरि जनाई सब राजा को नेगी चले यहां ते धाय ॥
भागत नेगिन ऊदन देखा पकरा तुरत सबनको जाय १११
दया आयगै तब आल्हा के तुरतै नेगी दीन छुड़ाय ॥
नेगी चलिभे सब दिल्ली को औ दरबार पहुंचे आय ११२
कही हकीकति सब पिरथी ते नेगिन बार बार शिरनाय ॥
माहिल बोले परिमालिक ते मानो कही चँदेलेराय ११३
यह नहिं करतब है पिरथी कै लरिकन घाटि कीन ह्याँ आय ॥
रक्षक ज्यहिको है परमेश्वर त्याहिकोबार न बाँका जाय ११४
पै रिस हमरे अस आई है सबियाँ दिल्ली डेरैं खुदाय ॥
काह बतावैं हम जीजा ते तुम सुनिलेउ लहुरवाभाय ११५
शङ्का हमपर है देवा की साँचे हाल देयँ बतलाय ॥
हम नहिं जानत यह करतबरहैं मानो कही बनाफरराय ११६
बड़ी पियारी मल्हना बहिनी औ नित खातिर करै हमारि ॥
[Header] ब्रह्माका विवाह । २२१ २५
सगो भानजो ब्रह्मा हमरो तासौं कौनि हमारी रारि ११७
सुनिकै बातें ये माहिल की बोले उदयसिंह त्यहिबार ॥
अब तुम जावो फिरि दिल्लीको मामा उरई के सरदार ११८
शंका तुमपर नहिं काहूकी मामा मानो कही हमारि ॥
रक्षक ज्यहिकी जगदम्बा है त्यहिकोसकै कौनजगमारि ११९
सुनिकै बातें ये ऊदन की माहिल घोड़ी लीन मँगाय ॥
चढ़िकै घोड़ी माहिल ठाकुर फिरि दरबार पहुंचे जाय १२०
बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो माहिल बैठिगयो शिरनाय ॥
माहिल बोले फिरि राजा ते मानो कही पिथौराराय १२१
खंभ गड़ावो दरवाजे पर तिनपर कलश देउ धरवाय ॥
जाँरा भौंरा दोनों हाथी तिनके आगे देउ छुड़ाय १२२
प्यायकै दारू तिन हाथिन को तुरतै मस्त देउ करवाय ॥
द्वारे आवैं जब परिमालिक तबयह बोल्योवचनसुनाय १२३
हाथी पछारो म्वरे द्वार में तुरतै भाँवरि देयँ डराय ॥
कुल की हमरे यह रीती है मानो कही चँदेलेराय १२४
अवती बचिहैं नहिं द्वारे पर मानो कही पिथौराराय ॥
इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुंचे आय १२५
भई तयारी ह्वाँ दिल्ली में द्वारे खम्भ दीन गड़वाय ॥
जो कुछ माहिल बतलावाथा सो सब सामा दीन कराय १२६
गाड़ो छावा गा जल्दी सों जल्दी चौक भई तय्यार ॥
अई सुहागिल बहु दिल्ली की गावनलगीं मंगलाचार १२७
देखिकै सूरति ह्वाँ माहिल की मलखे कहे वचन यहिबार ॥
खवरि बनावो सब दिल्ली की मामा उरई के सरदार १२८
सुनिकै बातें ये मलखे की माहिल बोले वचन बनाय ॥
[Header] ३६ आल्हखण्ड । २२२
करो तयारी अब द्वारे की मानो कही बनाफरराय १२६
मलखे बोले परिमालिक ते दूनो हाथ जोरि शिरनाय ॥
हुकुम जो पावैं महराजा को ह्योते कूच देयँ करवाय १३०
बातें सुनिकै मलखाने की राजा हुकुम दीन फरमाये ॥
बाजे डंका अहलंका के हाहाकारी शब्द सुनाय १३१
रथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़नपर असवार ॥
जितनी फौजें परिमालिक की सबियाँ वेगि भई तय्यार १३२
मनियादेवन को सुमिरन करि गजपर बैठि रजापरिमाल ॥
मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हावहाव करनाल १३३
गर्द उड़ानी तब पिरथी माँ लोपे अन्धकारसों भान ॥
मारू तुरही बाजन लागीं घूमनलागे लालनिशान १३४
आगे पलकी भै ब्रह्माकै पाछे चले सिपाही ज्वान ॥
घोड़ी कबूतरी के ऊपरमाँ दहिने चला वीरमलखान १३५
बँयें बेंदुला को चढ़वैया नाहर लिये नाँगि तलवार ॥
पाग बैंजनी शिरपर सोहै तापर कलँगी करै बहार १३६
गर्द न समझैक्यहु डशमनको क्षत्री उदयसिंह सरदार ॥
शोभा वरणै को आल्हा की साँचो धर्मरूप अवतार १३७
भा खलभट्टा औ हल्ला अति दिल्ली पास गये नगच्याय ॥
चन्दन बेटा को बोलवायो यहु महराज पिथौराराय १३८
भई तयारी अगवानी की दिल्ली सजन लागि सरदार ॥
रथ औ हाथिन में बहु बैठे छैला घोड़न भे असवार १३६
बड़ी सजाई भे ठकुरनक छैला चलिभे बाँधि कतार ॥
भाला बल्छी फरसा बाँधे कोऊ लिये ढाल तलवार १४०
दगी सलामी दुहुँ तरफन ते धुँवना छायगयो असमान ॥
ब्रह्माका विवाह । २२३ २६
आतशबाजी की शोभा अति भाला तारा के अनुमान १--
कउँधालपकनि खड्गचमकनि हूकनि गुड़गुड़दीन मचाय ॥
पैग पैग पर दूनों चलि चलि रुकिरुकिपैगपैगपर जायँ १४२
को गति बरणै महराजन कै मानो देव भूमिगे आय ॥
दो बिचवानी दउ दिशि घूमें रुकिरुकिपैगपैगपर जायँ १४३
उठै सुगन्धैं तहँ अतरन की बेला और चमेला हार ॥
का गति बरणों मैं निवारि की क्षत्री किये फूल श्रृंगार १४४
नीली पीली जंगाली औ लाली पगड़िनकेरि कतार ॥
मुँदरी छल्ला मोहनमाला क्यहुगरपरामोतिनकाहार १४५
देखें तमाशा जे नारी नर तिनका लागै नीकि बहार ॥
शाल दुशाले नीले पीले चमकैं इन्द्रधनुष अनुहार १४६
बाल सूर्य्यसम मूंगा चमकैं दमकैं तहाँ जवाहरलाल ॥
जब अगवानी पूरण हैगै गावन लगीं द्वारपरबाल १४७
संगम हैगा दुहुँ तरफा ते दूनों तरफ भये सतकार ॥
दूनों मिलिकै संगम हैकै पहुँचे पृथीराज के द्वार १४८
जौरा भौंरा हाथी ठाढ़े ताहर बोले बचन पुकार ॥
जौन शूरमा हों मोहबे के द्वारे हाथी देयँ पछार १४६
सुनिकै बातें ये ताहर की चलिभा उदयसिंह झन्नाय ॥
जावत देख्यो उदयसिंह को मलख्यो चला तुरत ठन्नाय १५०
को गति बरणै दोउ बीरन की मानो चले कृष्ण बलराम ॥
ऊदन सुमिरयो श्रीशारद को मलखेलीनशिवाशिवनाम १५१
ऊदन चलिभा जौरा दिशिको मलखे भौंरा की दिशिजाय ॥
पूँछ पकरिकै तिन हाथिन कै जैसे सिंह घसीटै गाय १५२
तैसे ऊदन मलखे ठाकुर दोऊ नाग घसीटैं धाय ॥