आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] ३६ आल्हखण्ड । २२२
करो तयारी अब द्वारे की मानो कही बनाफरराय १२६
मलखे बोले परिमालिक ते दूनो हाथ जोरि शिरनाय ॥
हुकुम जो पावैं महराजा को ह्योते कूच देयँ करवाय १३०
बातें सुनिकै मलखाने की राजा हुकुम दीन फरमाये ॥
बाजे डंका अहलंका के हाहाकारी शब्द सुनाय १३१
रथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़नपर असवार ॥
जितनी फौजें परिमालिक की सबियाँ वेगि भई तय्यार १३२
मनियादेवन को सुमिरन करि गजपर बैठि रजापरिमाल ॥
मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हावहाव करनाल १३३
गर्द उड़ानी तब पिरथी माँ लोपे अन्धकारसों भान ॥
मारू तुरही बाजन लागीं घूमनलागे लालनिशान १३४
आगे पलकी भै ब्रह्माकै पाछे चले सिपाही ज्वान ॥
घोड़ी कबूतरी के ऊपरमाँ दहिने चला वीरमलखान १३५
बँयें बेंदुला को चढ़वैया नाहर लिये नाँगि तलवार ॥
पाग बैंजनी शिरपर सोहै तापर कलँगी करै बहार १३६
गर्द न समझैक्यहु डशमनको क्षत्री उदयसिंह सरदार ॥
शोभा वरणै को आल्हा की साँचो धर्मरूप अवतार १३७
भा खलभट्टा औ हल्ला अति दिल्ली पास गये नगच्याय ॥
चन्दन बेटा को बोलवायो यहु महराज पिथौराराय १३८
भई तयारी अगवानी की दिल्ली सजन लागि सरदार ॥
रथ औ हाथिन में बहु बैठे छैला घोड़न भे असवार १३६
बड़ी सजाई भे ठकुरनक छैला चलिभे बाँधि कतार ॥
भाला बल्छी फरसा बाँधे कोऊ लिये ढाल तलवार १४०
दगी सलामी दुहुँ तरफन ते धुँवना छायगयो असमान ॥