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सर्वकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

१४ आल्हखण्ड । २१०
खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १४२
माथनवावों पितु अपने को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥
रामरमा मिलि दर्शन देबो इच्छा गही मोरि भगवन्त १४३
इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना-
रायणजीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलानिवासिमिश्रवंशोद्भव
बुधकृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतब्रह्माटीकावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥१॥
सवैया ॥
भो रघुनाथ अनाथन नाथ सनाथ करो अब तो भगवाना।
और न आश निराशकरो नहिं देखिचुक सब ठौर ठिकाना ॥
मात पिता अरु भ्रातको नात सबै तुमहीं यहही मनजाना।
गात सुखात सबै दिन जात नहीं लखितें कछु भूखबखाना १
सुमिरन ॥
दोउ पद ध्यावों रघुनन्दन के बन्दनकरों जोरि द्वउहाथ॥
नहीं सहायक कउ काको है स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १
बिना तुम्हारे को परमारथ अन्त में देइ कौन को साथ ॥
ओ जगतारण भवभय हारण तुम्हीं सदा हमारे नाथ २
को अस दुनियामाँ पैदा भा जो तरिगयो बिना तव नाम॥
माता भ्राता अरु ताता ना अन्तम आवै अपने काम ३
तुम्ही गोसइयाँ दीनबन्धु हौ सीतापती चराचर नाथ॥
गालत हमरी द्विज देही का जावै समय हाथ बेहाथ ४
शिव औ ब्रह्मा कोउ पायो ना गाय कै पार तुम्हारी गाथ ॥
त्यहि को गावों कस मानुष मैं स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ५