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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 221

चारघरी भर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकीधार ५६
जौन शूरमाहो दिल्ली को द्वारे देवै नेग हमार ॥
ऐसे वैसे हम नेगी ना कम्मर बँधी ढाल तलवार ६०
शूर सराही हम ऊदन का मलखे सिरसा के सरदार ॥
का गति वरणैं हम आल्हा की जिनसों हारिगई तलवार ६१
तिनके नेगी हम रूपन हैं राजै खबरि जनावो जाय ॥
सुनिकै बातें ये रूपन की रहिगा द्वारपाल सन्नाय ६२
सोचिसमझिकै फिरि बोलनभा रूपन काह गये बौराय ॥
दहीके धोखे कहुँ भूले ना ओतैं जाय कपास चबाय ६३
एक तो ऊदन कै गिनती ना बावन चढ़ैं उदयसिंह आय ॥
ह्यॉपर मलखे सब घर घर हैं आल्हा कौनवस्तु हैं भाय ६४
है परिमालिक अस ठाकुर बहु जिनसे पोत तसीला जाय ॥
जूठनि खावै घर घर बारी सो का रारि मचावै आय ६५
पीकै दारू को आवा है की वश सन्निपात के भाय ॥
झूरिभांग जो तू खावा हो तौ हम औषधि देयँ बताय ६६
ज्ञान ठिकाने करि सागढ़ सों राजै काह सुनावैं जाय ॥
सुनिकै बातें करि डाँड़ेपर रूना बोला क्रोध बढ़ाय ६७
आयगयो तब परिमालिक कौ तहाँ यों कोऊ कहुँ देखि परैना।
जानत नाहिन रूपन को अरु नाहक दुष्ट बकै बहु बैना ॥
ताहर नाहर को गहि कै इकलो मलखान जिता बिन सैना।
का बड़िवात करै ललिते दिनही नहिं देखिपरै तब नैना ६८
बातें सुनिकै ये बारी की चलिभा द्वारपाल ततकाल ॥