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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

२२ आल्हखण्ड । २१८
कहौ हकीकत सब दिल्ली कै द्वारे भली कीन तलवार =१
बातैं सुनिकै उदयसिंह की रूपन यथातथ्य गा गाय ॥
सुनिकै बातें ये रूपन की माहिल बोले वचन बनाय =२
यह नहिं चाहिये पृथीराज को जो अब रारि बढ़ावत जायँ ॥
कौन दुसरिहा है आल्हा का सम्मुख लड़ै समर में आय =३
जो मन पावै बघऊदन का राजै तुरत देयँ समुझाय ॥
नेग कराय देयँ द्वारे का सातो भाँवरि देयँ फिराय =४
भली भली कहि ऊदन बोले माहिल घोड़ी लीन मँगाय ॥
चढ़िकै घोड़ी माहिल ठाकुर दिल्ली शहर पहुँचे जाय ८५
को गति बरर्णै तहँ पिरथी कै भारी लाग राजदरबार ॥
खाँड़ेराय पिरथी का भाई धाँधू तासु पुत्र सरदार ८६
रहिमति सहिमति जिन्सीवाले औ रणधीर लहाउर क्यार ॥
भुर्रा सुगुलिया काबुल वाला टिहुनन घरे नाँगि तलवार =७
देवी मरहटा दक्षिण वाला आला समरथनी मैदान ॥
अंगद राजा ग्वालियर का जगनिकक्यारभुरंगताज्वान==
सातो लड़िका पृथीराज के तेऊ बैठि राजदरबार ॥
मोती जवाहर, गोपी, ताहर, सूरज, चन्दन ये सरदार =८
मर्दन, सर्दन, सातो लड़िका ये रणबाघ लड़ैया बाल ॥
सोने सिंहासन पिरथी सोहैं त्यहिमाँ जड़े जवाहरलाल ९०
औरो ठाकुर बहु बैठे हैं एकते एक शूर सरदार ॥
तहँही पहुँचे उरई वाला तुरतै कीन्ह्यो राम जुहार ६१
कियो खातिरी पृथीराजने अपने पास लीन बैठाय ॥
माहिल बोला तब पिरथी ते मानो कही पिथौरागाय ६२
काम न सरिहै लड़े भिड़ेते दूनों तरफ हानिहै आप ॥