आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हाखण्ड । २०६
सोई दशरथ के रघुरैया नैया तुही लगैया पार ॥
एक पूतकी मैं मैयाहौं ताकी कुशल किह्योकरतार ६४
सुमिरन करिकै रघुनन्दन को मल्हना करनलागि घरकाम ॥
मलखे ठाकुर त्यहिसमया में ताहर वेगि बुलावा धाम ६५
जितने वासी रहें मुहवे के आये सबै नारि नर द्वार ॥
सात सुहागिल त्यहि समयामें गावन लगीं मंगलाचार ६६
बड़ी भीर भै परिमालिक घर कहुँ तिलडरा भूमि ना जांय ॥
चूड़ामणि पण्डित तहँ आयो साइतिं तुरत दीन बतलाय ६७
नव पिचकारी भरिकेशरि रंग मारैं एक एक को धाय ॥
धूरि उड़ाई तहँ अबीर की महलन् गई लालरी छाय ६८
चौक पुराई गजमोतिन सों पीढ़ा तहाँ दीन धरवाय ॥
चौड़ा ताहर दउ ठाढ़े ये ब्रह्मा गये तहाँपर आय ६६
को गनि वरणै परिमालिक कै लोहा छुये सोन ह्वैजाय ॥
पारस पाथर ज्यहिके घरमाँ त्यहिकी द्रव्यसकैको गाय १००
ऊदन बोले तहँ ताहर सों अब तुम टीका देउ चढ़ाय ॥
साँगा गाड़ दइ तब ताहरने औयहबोल्यो भुजा उठाय १०१
साँग उखारैं ब्रह्मा ठाकुर तौ हम टीका देई चढ़ाय ॥
रीति हमारे यह घरकी है साँचे हाल दीन बतलाय १०२
सात तेवा लोहे के नीचे तापर साँग गाड़ि हम दीन ॥
साँग उखारैं ब्रह्मा ठाकुर तौहमब्याहबहिन काकीन१०३
देखि तमाशा बहु ताह रका मल्हना बोली वचन रिसाय ॥
अशकुनकीन्योम्परेमहलन्मां टीका तुरत देउ लौटाय १०४
बिना बियाहे ब्रह्मा रहि हैं तौ नहिं होय हमारी हान ॥
अक्लि तुम्हारी को लैलीन्ही मानौं नहीं कही मलखान १०५