आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ आल्हखण्ड । २०८
बचे युधिष्ठिर समरभूमि ते पाँचो भाय कृष्ण महराज ॥
मैं ना रहिंगे त्यउ दुनिया माँ रहिगै एक जगतमें लाज ११८
जप तप होतै नहिं कलियुग में ना कछुदान पुण्य अधिकाय ॥
जो मरिजावैं समरभूमि में पावैं स्वर्गलोक को माय ११९
इतना कहिकै मलखे ठाकुर टीका तुरत दीन चढ़वाय ॥
चारो नेगिन को बुलवायो भूषण वस्त्र दीन पहिराय १२०
बहुधन दीन्ह्यो फिरि चौंड़ा को अपने हाथ बनाफरराय ॥
चूड़ामणि पंडित ते बोल्यो अबतुम लगन देउ बतलाय १२१
सुनिकै बातें मलखाने की पंडित बोला लगन विचार ॥
माघ महीना कृष्ण पक्ष में तेरसि तिथी शुक्रको बार १२२
नीकी साइति मलखाने है सो हम तुमका दीन बताय ॥
सुनिकै बातें ये पंडित की औ ताहरको दीन सुनाय १२३
यादि राखियो यह दिन भाई दिल्ही ब्याहकरब हम आय ॥
बातें सुनिकै ये मलखे की ताहर चलिभेशीशनवाय १२४
दर्गी सलामैं सौ तोपन की धुवना रहा सरग मड़राय ॥
अद्भुत शोभा भै मोहबे के घर घर ढोलक परै सुनाय १२५
चलै पिचका कहूँ केशरि के कहूँकहूँ अबिरगुलाल उड़ाय ॥
पान मोहोबे के जग जाहिर लाली पीकैं परै दिखाय १२६
कहूँ कहूँ छैला गैला ठाढ़े बेला हार परैं दिखराय ॥
कहूँ चमेला के तेला को रहे अलबेला जुलुफलगाय १२७
कहूँ कहूँ हेला मेला कैकै बुलबुल बुलबुल रहे लड़ाय ॥
उड़ै तमाखू कहूँ हुकन में गुड़गुड़गुड़गुड़रहेमचाय १२८
मारु मारुकै मोहरि बाजै कहूँ कहूँ हाव हाव करनाल ॥
तहूँ पँतरह बालक बदलैं कहूँकहूँ लड़ैंमल्ल जसकाल १२६