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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 222

ब्रह्मका विवाह । २१७ २१
हाथ जोरिकै महराजा को सब बारीके कहे हवाल ६९
सुनिकै बातें द्वारपाल की यहु महराज पिथौराराय ॥
सूरज लड़का को बुलवायो औ सबहाल कह्यो समुझाय ७०
पकरिकै लावो त्यहि बारी को हमको बेगि दिखावो आय ॥
सुनिकै बातें महराजा की सूरज चलिभा शीशनवाय ७१
दीख दुआरेपर बारी को नाहर घोड़े पर असवार ॥
शंका जाके कछु नाहीं है हाथ म लिये नाँगि तलवार ७२
हुकुम लगावा द्वारपाल को फाटक बंद लेउ करवाय ॥
फिरि लयलकारा रजपूतन को लावो पकरि शूरमाँ जाय ७३
हुकुम पायकै तब सूरज को तुरतै चले सिपाही धाय ॥
ऍंड़ लगायो हरनागर के टापन क्षत्री दीन गिराय ७४
बहुतन मार्यो रूपनबारी हाहाकार शब्द गा छाय ॥
देखि तमाशा सूरज ठाकुर मनमाँ बार बार पछिताय ७५
रूपनबारी के मुर्चा माँ कोऊ शूर न रोँकै पायँ ॥
उड़न बछेड़ा हरनागर ने बहुतक क्षत्री दीन गिराय ७६
फिरि फिरि मारै औ ललकारै बारी बड़ा लड़ैया ज्वान ॥
देखि तमाशा यहुबारी का ताहर समरधनी चौहान ७७
सूरज ताहर दुउ शहजादे रूपन पास पहुंचे जाय ॥
ऍंड़ लगायो हरनागर के फाटकपार निकरिगा साय ७८
मारो मारो हल्ला कैकै क्षत्री सबै चले बिरझाय ॥
नेग लेब अब हम भौरिन में गरई हाँक दीन गुहराय ७९
इतना कहिकै ऍड़ लगायो फौजन तुरत पहुंचा आय ॥
जैसे फागुन फगुई खेलैं लोहू छीटन गयो अन्हाय ८०
तैसे दीख्यो जब रूपन का बोल्यो उदयसिंह सरदार ॥