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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

ब्रह्माका विवाह । २११ १५
छूटि सुमिरनी गै रघुबर कै सुनिये ब्रह्मा केर विवाह ॥
फौजें सजिहैं आल्हा ऊदन करि हैं समर केर उत्साह ६
अथ कथाप्रसंग ॥
माहिल चलिभे जब दिल्ली ते मलहना महल पहुंचे आय ॥
बड़ी खुशाली भै मलहना के हमरे बूत कही ना जाय १
मलहना बोली फिरि माहिल ते भैया उरई के सरदार ॥
टीका चढ़िगा है दिल्ली का ब्रह्मा भाने जौन तुम्हार २
बहुतक अशकुन त्यहिसमयाभे जियरा धीर धरा ना जाय ॥
मैं समझायों भल मलखे को पैना मन्यो बनाफरराय ३
त्यही समैया ते भैया अब रहि रहि मोर प्राण घबड़ायँ ॥
माह महीना जब ते आवा तब ते भूख नींद गै भाय ४
कलनहिं पावैं हम पलँगा में औ घरदीखे नित्त डेरायँ ॥
बिरमा द्यावलिके लड़िका सब हमको शत्रु रूप दिखरायँ ५
पै अब करतब कछु सूझैना साँचे हाल दीन बतलाय ॥
बातें सुनिकै ये मलहना की माहिल बोले बचन बनाय ६
काम हमारो रहै पिरथी ते हम दरबार मँझावा जाय ॥
सुनी हकीकति तहँ पिरथी की बहिनी सांच देयँ बतलाय ७
जाति बनाफर की ओछी है पिरथी बार बार पछितायँ ॥
ब्याहन अइहैं हमरे घरमाँ सबके मूड लेब कटवाय ८
चलिकै ब्रह्मा इकलो आवै तौ बिनब्याधि ब्याह है जाय ॥
चन्द्रवंश में उइ पैदा हैं नहिं कछुउजुरु हमारे भाय ६
हम समुझावा तब पिरथी को ऐसै करब मोहोबे जाय ॥
भाने हमरो ब्रह्माठाकुर औ बहनोई चँदेलोराय १०
बड़ी खुशाली भै पिरथी के फूले अंग न सक्यो समाय ॥