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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

द्वितीय अध्याय

द्वितीय अध्याय

प्रथम खण्ड

प्रस्तावना

अस्मिंश्चतुर्थेऽध्याय एष वा- | इस (पूर्वोक्त) चौथे* अध्यायमें
(अतीताध्याय-) क्यार्थः—जगदुत्प- | यह वाक्यार्थ विवक्षित है—†
(विषयावलोकनम्) त्तिस्थितिप्रलयकृद- | जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय
संसारी सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सर्व- | करनेवाले असंसारी सर्वशक्तिमान्
वित्सर्वमिदं जगत्स्वतोन्यद्वस्त्व- | सर्वज्ञने अपनेसे भिन्न किसी अन्य
न्तरमनुपादायैव आकाशादि- | वस्तुको ग्रहण किये बिना ही इस
क्रमेण सृष्ट्वा स्वात्मप्रबोधनार्थं | सम्पूर्ण जगत्की आकाशादिक्रमसे
सर्वाणि च प्राणादिमच्छरीराणि | रचना कर अपनेको स्वयं ही
स्वयं प्रविवेश। प्रविश्य च स्व- | जाननेके लिये सम्पूर्ण प्राणादियुक्त
मात्मानं यथाभूतमिदं ब्रह्मास्मीति | शरीरमें स्वयं ही प्रवेश किया। और
साक्षात्प्रत्यबुध्यत। तस्मात्स एव | प्रवेश करके 'मैं यह ब्रह्म हूँ'
सर्वशरीरेष्वेक एवात्मा नान्य | इस प्रकार अपने यथार्थ स्वरूपका
इति। अन्योऽपि “सम आत्मा | साक्षात् बोध प्राप्त किया। अतः
ब्रह्मास्मीत्येवं विद्यात्” इति। | समस्त शरीरोंमें एकमात्र वही आत्मा
| है, उससे भिन्न नहीं। [ इसके
| सिवा ] “[ सम्पूर्ण भूतोंमें ] जो सम
| आत्मा ब्रह्म है वह मैं हूँ—ऐसा जाने'

* आरण्यकके क्रमसे यहाँ चौथी संख्या कही गयी है।
† पूर्व अध्यायमें आत्माकी एकता, लोक तथा लोकपालोंकी सृष्टि और
क्षुधा-पिपासासे संयोग आदि अनेक विषयोंका वर्णन है उनमें विवक्षित
अभिप्रायका प्रतिपादन किया जाता है।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
“आत्मा वा इदमेक एवाग्र | “निश्चय पहले एक आत्मा ही था”
आसीत्” (१।१।१) इति “ब्रह्म | तथा “[ उसने ] ब्रह्मको [ आकाशके
ततमम्” (१ । ३ । १३) इति | समान ] अतिशय व्याप्त [ जाना ]” ।
चोक्तम् । अन्यत्र च । | ऐसा भी कहा है और [ ऐसा
| ही ] अन्य उपनिषदोंमें भी
| कहा है।
सर्वगतस्य सर्वात्मनो बालाग्र- | पूर्व०-उस सर्वगत सर्वात्माके
[ प्रवेशश्रुति-विचारः ] मात्रमप्यप्रविष्टं | लिये तो बालका अग्रभाग भी अप्रविष्ट
नास्तीति कथं सी- | नहीं है; फिर वह चींटीके बिलप्रवेश-
मानं विदार्य प्रापद्यत पिपीलि- | के समान मूर्धसीमाको विदीर्णकर
केव सुषिरम् । | किस प्रकार मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट
| हुआ ?
नन्वत्यल्पमिदं चोद्यं बहु | सिद्धान्ती-तुम्हारा यह प्रश्न तो
| अल्प है । अभी तो उपर्युक्त कथनमें
चात्र चोदयितव्यम् । अकरणः | बहुत कुछ पूछनेयोग्य बातें हैं।
सन्नीक्षत । अनुपादाय किंचि- | ‘उसने इन्द्रियहीन होकर भी ईक्षण
| किया । किसी उपादानके बिना ही
ल्लोकानसृजत । अद्भ्यः पुरुषं | लोकोंकी रचना की। जलमेंसे पुरुष
समुद्धृत्यामूर्छयत् । तस्याभिध्या- | निकालकर उसे अवयवयोजनाद्वारा
| पुष्ट किया। अभिध्यानके द्वारा उसका
नान्मुखादि निर्भिन्नं मुखादि- | मुख प्रकट हुआ तथा मुखादिसे
भ्यश्चाग्न्यादयो लोकपालास्तेषां | अग्नि आदि लोकपाल प्रकट हुए ।
| उनका क्षुधा-पिपासादिसे संयोग
चाशनायापिपासादि संयोजनं त- | कराना, उनका आयतनके लिये
दायतनप्रार्थनं तदर्थं गवादि- | प्रार्थना करना, उसके लिये गौ आदि
ऐतरेयो० ३—

५८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

५८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
प्रदर्शनं तेषां यथायतनप्रवेशनं | दिखलाना, उन देवताओंका अपने-
| अपने अनुकूल आयतनोंमें प्रवेश
सृष्टस्यान्नस्य पलायनं वागादि- | करना, उत्पन्न हुए अन्नका भागना
| और उसे वाक् आदि इन्द्रियों-
भिस्तज्जिघृक्षा; एतत्सर्वं सीमा- | द्वारा ग्रहण करनेकी इच्छा करना-
| ये सब बातें भी सीमा विदीर्ण करने
विदारणप्रवेशसममेव । | और शरीरमें प्रवेश करनेके समान
| ही [ आश्चर्यजनक ] हैं।
अस्तु तर्हि सर्वमेवेदमनुप- | पूर्व०—अच्छा तो, इन सभी
| बातोंको अनुपपन्न ( असम्भव )
पन्नम् । | मान लो ।
न; अत्रात्मावबोधमात्रस्य | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है,
| क्योंकि श्रुतिको यहाँ केवल आत्मा-
विवक्षितत्वात्सर्वोऽयमर्थवाद इत्य- | वबोधमात्र कहना अभीष्ट होनेसे
| यह सब अर्थवाद है; अतः इसमें
दोषः। मायाविवद्वा महामायावी | कोई दोष नहीं है। अथवा मायावीके
| समान महामायावी सर्वज्ञ सर्व-
देवः सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सर्वमे- | शक्तिमान् प्रभुने इस सम्पूर्ण जगत्-
| की रचना की है, और इस रहस्यका
तच्चकार । सुखावबोधनप्रति- | सरलतासे ज्ञान प्राप्त करनेके लिये
| ही लौकिक रीतिसे यह आख्यायिका
पत्त्यर्थं लोकवदाख्यायिकादि- | आदिकी रचना की गयी है—इस
| प्रकार भी यह पक्ष युक्तियुक्त जान
प्रपञ्च इति युक्ततरः पक्षः। न | पड़ता है, क्योंकि केवल लोक-
| रचनाकी आख्यायिका आदिके
हि सृष्ट्याख्यायिकादिपरिज्ञा- | परिज्ञानसे कुछ भी फल नहीं
| मिलता। परन्तु आत्माके एकत्व और
नात्किंचित्फलमिष्यते । ऐका- | यथार्थ स्वरूपके ज्ञानसे-अमरत्वरूप
| फल [ प्राप्त होता है—यह ]
त्म्यस्वरूपपरिज्ञानात्तु अमृतत्वं | सभी उपनिषदोंमें प्रसिद्ध है।
फलं सर्वोपनिषत्प्रसिद्धम् । |

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
स्मृतिषु च गीताद्यासु “समं | तथा “सम्पूर्ण भूतोंमें समान भावसे
सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्” | स्थित परमेश्वरको” इत्यादि वाक्यों-
( गीता १३।२७) इत्यादिना । | द्वारा गीता आदि स्मृतियोंमें भी
| [ यही बात कही गयी है । ]
ननु त्रय आत्मानः । भोक्ता | पूर्व०—आत्मा तो तीन हैं;
[आत्मैकत्त्वे विचारः] कर्ता संसारी जीव | उनमें एक तो सम्पूर्ण लोक और
एकः सर्वलोक- | शास्त्रमें प्रसिद्ध कर्ता भोक्ता संसारी-
शास्त्रप्रसिद्धः । अनेकप्राणिकर्म- | जीव है । नगर और प्रासादादिके
फलोपभोगयोग्यानेकाधिष्ठानव- | निर्माणके लिङ्गसे जिस प्रकार
ल्लोकदेहनिर्माणेण लिङ्गेन यथा- | तत्सम्बन्धी कौशलके ज्ञानवाले उनके
शास्त्रप्रदर्शितेन पुरप्रासादादि- | रचयिता तक्षा (कारीगर) आदिका
निर्माणलिङ्गेन तद्विषयकौशलज्ञान- | ज्ञान होता है उसी प्रकार अनेक
वांस्तत्कर्ता तक्षादिरिवेश्वरः सर्वज्ञो | प्राणियोंके कर्मफलके उपभोगयोग्य
जगतः कर्त्ता द्वितीयश्चेतन आ- | अनेकों अधिष्ठानोंवाले लोक और
त्मा अवगम्यते । “यतो वाचो | देहकी रचनाके शास्त्रप्रदर्शित
निवर्तन्ते” ( तै० उ० २।४। | लिङ्गसे दूसरे चेतन आत्मा—जगत्-
१) “नेति नेति” ( बृ० उ० | कर्ता सर्वज्ञ ईश्वरका ज्ञान होता है ।
३।९।२६) इत्यादिशास्त्र- | तथा तीसरा आत्मा “जहाँसे वाणी
प्रसिद्ध औपनिषदः पुरुषस्तृ- | लौट आती है” एवं “यह नहीं,
तीयः । एवमेते त्रय आत्मानोऽ- | यह नहीं” इत्यादि शास्त्रसे प्रसिद्ध
न्योन्यविलक्षणाः । तत्र कथमेक | औपनिषद पुरुष है । इस प्रकार ये
एव आत्मा अद्वितीयः असंसा- | तीनों आत्मा एक दूसरेसे विलक्षण
रीति ज्ञातुं शक्यते ? | हैं; अतः यह कैसे जाना जा सकता
| है कि आत्मा एक, अद्वितीय और
| असंसारी ही है ?

६० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

६० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
तत्र जीव एव तावत्कथं | सिद्धान्ती-इन तीनोंमें पहले
ज्ञायते ? | जीवका ही ज्ञान कैसे होता है ?
नन्वेवं ज्ञायते श्रोता मन्ता | पूर्व०-इस प्रकार ज्ञान होता है
द्रष्टा आदेष्टा आघोष्टा विज्ञाता | कि 'वह श्रवण करनेवाला, मनन करनेवाला, द्रष्टा, आज्ञा करनेवाला, शब्द उच्चारण करनेवाला, विज्ञाता^२
प्रज्ञातेति । | और प्रज्ञाता^३ है।'
ननु विप्रतिषिद्धं ज्ञायते यः | सिद्धान्ती-परन्तु, जिसका
श्रवणादिकर्तृत्वेनामतो मन्ता- | श्रवणादिके कर्तारूपसे ज्ञान होता है उसे 'अमत और मनन करनेवाला,
विज्ञातो विज्ञातेति च । तथा | अविज्ञात और विशेष रूपसे जानने-
“न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न | वाला' इस प्रकार कहना तथा “मति-के मनन करनेवालेका मनन न करो,
विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः” | विज्ञातिके विज्ञाताको न जानो”
(बृ०उ० ३।४।२) इत्यादि च। | इत्यादि श्रुतिवचन भी विरुद्ध होगा ।
सत्यं विप्रतिषिद्धम्, यदि | पूर्व०-यदि उसे सुखादिके
प्रत्यक्षेण ज्ञायेत सुखादिवत् । | समान प्रत्यक्षरूपसे जाना जाय तो
प्रत्यक्षज्ञानं च निवार्यते “न | अवश्य विरुद्ध होगा । किन्तु “मतिके मनन करनेवालेका मनन न करो”
मतेर्मन्तारम् मन्वीथाः” (बृ० | इत्यादि वाक्यसे उसके प्रत्यक्षज्ञानका
उ० ३।४।२) इत्यादिना । | निवारण किया गया है। उसका
ज्ञायते तु श्रवणादिलिङ्गेन; | ज्ञान तो श्रवणादि लिङ्गसे होता है;
तत्र कुतो विप्रतिषेधः । | फिर इसमें विरोध कहाँ है ?
ननु श्रवणादिलिङ्गेनापि कथं | सिद्धान्ती-श्रवणादि लिङ्गसे भी आत्माका ज्ञान किस प्रकार हो
ज्ञायते ? यावता यदा शृणोत्या- | सकता है ? क्योंकि जब और जिस समय आत्मा सुननेयोग्य शब्दको
त्मा श्रोतव्यं शब्दम्, तदा तस्य | सुनता है उस समय श्रवणक्रियाके
१. सिद्धान्तीकी यह उक्ति पहले आत्मामें बतलाये हुए कर्तृत्व-भोक्तृत्व
आदि धर्मोंका प्रतिषेध करनेके लिये है।
२. विशेष जाननेवाला । ३. सबसे अधिक जाननेवाला ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
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श्रवणक्रिययैव वर्तमानत्वा- | साथ ही वर्तमान रहनेके कारण
न्मननविज्ञानक्रिये न संभवतः | उसके लिये अपनेमें अथवा अन्यत्र
आत्मनि परत्र वा । तथान्यत्रापि | मनन या विज्ञानरूप क्रियाएँ संभव
| नहीं हैं । [ इस प्रकार विजातीय
मननादिक्रियासु । श्रवणादि- | क्रियाओंकी समकालीनताका निषेध
| करके अब सजातीय क्रियाओंका
क्रियाश्च स्वविषयेष्वेव । न हि | निषेध करते हैं- ] इसी प्रकार
| अन्यत्र मनन आदि क्रियाओंमें भी
मन्तव्यादन्यत्र मन्तुर्मननक्रिया | समझना चाहिये । श्रवणादि क्रियाएँ
| भी अपने विषयोंमें ही प्रवृत्त हो
संभवति । | सकती हैं [ आश्रयमें नहीं ] । मनन
| करनेवालेकी मननक्रिया मन्तव्यसे
| भिन्न स्थानमें सम्भव नहीं है ।
ननु मनसा सर्वमेव मन्तव्यम् । | पूर्व०-मनसे तो सभीका मनन
| किया जाता है ।
सत्यमेवं तथापि सर्वमपि | सिद्धान्ती-यह ठीक है; परन्तु.
मन्तव्यं मन्तारमन्तरेण न मन्तुं | जो कुछ मनन किया जाता है वह
| सब मननकर्ताके बिना नहीं किया
शक्यम् । | जा सकता ।
यद्येवं किं स्यात् ? | पूर्व०-यदि ऐसा हो भी तो
| इससे क्या होगा ?
इदमत्र स्यात् ; सर्वस्य योऽयं | सिद्धान्ती-इससे यहाँ यह
मन्ता स मन्तैवेति न स मन्तव्यः | होगा कि जो इस सबका मनन करने-
| वाला है वह मनन करनेवाला ही
स्यात् । न च द्वितीयो मन्तुर्म- | रहेगा, मन्तव्य नहीं होगा । तथा
| उस मनन करनेवालेका कोई दूसरा
न्तास्ति । यदा स आत्मनैव | मननकर्ता भी नहीं है । यदि उसे

६२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

६२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

[वाम भाग / संस्कृत मूल]
मन्तव्यस्तदा येन च मन्तव्यः
आत्मा आत्मना यश्च मन्तव्य
आत्मा तौ द्वौ प्रसज्येयाताम् ।
एक एवात्मा द्विधा मन्तृमन्तव्य-
त्वेन द्विशकलीभवेद्वंशादिवत् ।
उभयथाप्यनुपपत्तिरेव । यथा
प्रदोपयोः प्रकाश्यप्रकाशकत्वा-
नुपपत्तिः समत्वात्तद्वत् ।
न च मन्तुर्मन्तव्ये मननव्या-
पारशून्यः कालोऽस्त्यात्ममन-
नाय । यदापि लिङ्गेनात्मानं
मनुते मन्ता; तदापि पूर्ववदेव
लिङ्गेन मन्तव्य आत्मा यश्च
तस्य मन्ता तौ द्वौ प्रसज्येया-
ताम् । एक एव वा द्विधेति-
पूर्वोक्तदोषः । न प्रत्यक्षेण
नाप्यनुमानेन ज्ञायते चेत् कथ-
मुच्यते “स म आत्मेति विद्यात्”
(कौषी० ३।९) इति ? कथं
वा श्रोता मन्तेत्यादि ?

[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]
आत्माद्वारा ही मन्तव्य माना जाय
तो जिस आत्मासे आत्मा मनन
किया जाता है और जिस आत्माका
मनन किया जाता है उनके दो होने-
का प्रसंग उपस्थित हो जायगा ।
अथवा बाँस आदिके समान एक ही
आत्मा मन्ता और मन्तव्यरूपसे दो
भागोंमें विभक्त माना जायगा। किन्तु
उपर्युक्त दोनों प्रकारसे अनुपपत्ति
ही है। जैसे कि समानरूप होनेके
कारण दो दीपकोंका परस्पर प्रकाश्य-
प्रकाशकत्व नहीं बन सकता, उसी
प्रकार [ यहाँ समझना चाहिये ] ।
इसके सिवा मन्ताको अपना
मनन करनेके लिये मन्तव्य पदार्थों-
का मनन करनेके व्यापारसे रहित
कोई काल भी नहीं है। जिस समय
भी किसी लिङ्गके द्वारा मन्ता अपना
मनन करता है उस समय भी पहले-
हीके समान लिङ्गसे मन्तव्य आत्मा
और जो कोई उसका मनन करने-
वाला है वे दो सिद्ध होते हैं; अथवा
एक ही दो भागोंमें विभक्त है-इस
प्रकार पूर्वोक्त दोष उपस्थित हो
जाता है। और यदि वह न प्रत्यक्ष-
से जाना जाता है और न अनुमानसे
तो ऐसा क्यों कहते हैं कि “वह
मेरा आत्मा है-ऐसा जाने” और
क्यों उसे श्रोता-मन्ता इत्यादि
बतलाते हैं ?

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
ननु श्रोतृत्ववादिधर्मवानात्मा, | पूर्व०-आत्मा तो श्रोतृत्ववादि
अश्रोतृत्वादि च प्रसिद्धमात्म- | धर्मवाला है और आत्माके अश्रोतृत्व
नः। किमत्र विषमं पश्यसि ? | आदि धर्म भी [ श्रुतिमें] प्रसिद्ध
| हैं। फिर इसमें तुम्हें विषमता क्या
| दिखलायी देती है ?
यद्यपि तव न विषमं तथापि | सिद्धान्ती-यद्यपि तुझे कोई
| विषमता ज्ञात नहीं होती, तथापि
मम तु विषमं प्रतिभाति । | मुझे तो होती ही है । किस
| प्रकार कि जिस समय यह श्रोता
कथम् ? यदासौ श्रोता तदा | होता है उस समय मन्ता नहीं
| होता और जब मन्ता होता है तब
न मन्ता यदा मन्ता तदा न | श्रोता नहीं होता । ऐसा होनेके
श्रोता । तत्रैवं सति पक्षे श्रोता | कारण वह एक पक्षमें श्रोता और
| मन्ता है तो दूसरे पक्षमें न श्रोता
मन्ता पक्षे न श्रोता नापि | है और न मन्ता ही है । ऐसा ही
| अन्यत्र (विज्ञाता आदिके सम्बन्धमें)
मन्ता । तथान्यत्रापि च । | भी समझना चाहिये ।
यदैवं तदा श्रोतृत्ववादिधर्म- | जब कि ऐसी बात है तब
| आत्मा श्रोतृत्ववादि धर्मवाला है अथवा
वानात्मा अश्रोतृत्वादिधर्मवा- | अश्रोतृत्वादि धर्मवाला ? इस प्रकार
न्वेति संशयस्थाने कथं तव | संशयस्थान उपस्थित होनेपर तुझे
| विषमता क्यों नहीं दिखायी देती ?
न वैषम्यम् । यदा देवदत्तो | जिस समय देवदत्त चलता है उस
गच्छति तदा न स्थाता | समय वह चलनेवाला ही होता है
| ठहरनेवाला नहीं होता, तथा जिस
गन्तैव । यदा तिष्ठति तदा | समय वह ठहरता है उस समय
| वह ठहरनेवाला ही होता है, चलने-
न गन्ता स्थातैव । तदा अस्य | वाला नहीं होता । ऐसी अवस्थामें
पक्ष एव गन्तृत्वं स्थातृत्वं | इसका गन्तृत्व और स्थातृत्व पाक्षिक

६४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

६४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
च। न नित्यं गन्तृत्वं स्थातृत्वं ही होता है, नित्यगन्तृत्व अथवा
नित्यस्थातृत्व नहीं होता। इसी प्रकार
वा। तद्वत्। [आत्माका श्रोतृत्वादि भी पाक्षिक
ही सिद्ध होगा, नित्य नहीं]।
तथैवात्र काणादादयः पश्य- काणाद आदि अन्य मतावलम्बी
भी इस विषयमें ऐसा ही समझते हैं,
न्ति । पक्षप्राप्तेनैव श्रोतृत्वादिना क्योंकि इस विषयमें उनका कथन
है कि पक्षमें प्राप्त होनेवाले श्रोत-
त्वादिके कारण ही आत्मा श्रोता-
मन्ता इत्यादि कहा जाता है। वे
ज्ञानका संयोगजत्व (इन्द्रिय और
मनके संयोगसे उत्पन्न होना) और
अयोगपद्य (एक साथ न होना)
प्रतिपादन करते हैं। और मनको
एक साथ ज्ञान उत्पन्न न होनेमें वे 'मैं
अन्यमनस्क था, इसलिये न देख
सका' इत्यादि लिङ्ग प्रदर्शित करते हैं
और यह युक्तिसङ्गत भी है।
आत्मोच्यते श्रोता मन्तेत्यादि-
वचनात् । संयोगजत्वमयौगपद्यं
च ज्ञानस्य ह्याचक्षते । दर्शयन्ति
चान्यत्रमना अभूवं नादर्शमि-
त्यादि युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो
लिङ्गममिति च न्याय्यम् ।
भवत्वेवम्; किं तव नष्टं पूर्व०-ऐसा सिद्धान्त भले ही
रहे; किन्तु यदि ऐसा हो भी तो
तुम्हारी क्या हानि है ?
यद्येवं स्यात् ?
अस्त्वेवं तवेष्टं चेत् । श्रुत्य- सिद्धान्ती-यदि तुम्हें अभिमत
हो तो तुम्हारे लिये ऐसा भले ही
र्थस्तु न संभवति । हो; परन्तु यह श्रुतिका तात्पर्य तो
हो नहीं सकता ।
किं न श्रोता मन्तेत्यादि- पूर्व०-क्या श्रोता मन्ता इत्यादि
श्रुत्यर्थः ? श्रुतिका अर्थ नहीं है ?
न; न श्रोता न मन्तेत्यादि- सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि [श्रुति-
में तो] 'न श्रोता है न मन्ता
वचनात् । है' इत्यादि भी कहा है।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
ननु पाक्षिकत्वेन प्रत्युक्तं | पूर्व०-परन्तु इस विरोधको तो
त्वया । | तुमने पाक्षिक बतलाकर खण्डित
| कर दिया है ।
.न; नित्यमेव श्रोतृत्वाद्यभ्यु- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि आत्मा-
पगमात् । “न हि श्रोतुः श्रुते- | का श्रोतृत्व आदि तो नित्य ही माना
र्विपरिलोपो विद्यते” ( बृ० उ० | गया है, जैसा कि “श्रोताकी श्रुति-
४ । ३ । २७) इत्यादिश्रुतेः । | का लोप कभी नहीं होता ” इत्यादि
| श्रुतिसे सिद्ध होता है ।
एवं तर्हि नित्यमेव श्रोतृ- | पूर्व०-ऐसी दशामें तो आत्माका
त्वाद्यभ्युपगमे प्रत्यक्षविरुद्धा | नित्य श्रोतृत्वादि माननेपर प्रत्यक्ष-
युगपज्ज्ञानोत्पत्तिरज्ञानाभावश्चा- | विरुद्ध अनेक ज्ञानोंका एक साथ
त्मनः कल्पितः स्यात् । तच्चा- | उत्पन्न होना और आत्मामें अज्ञानका
निष्टमिति । | अभाव ये दो बातें माननी पड़ेंगी ।
| किन्तु यह किसीको अभीष्ट नहीं है ।
नोभयदोषोपपत्तिः। आत्मनः | सिद्धान्ती-इन दोनों दोषोंकी
| सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि
श्रुत्यादिश्रोतृत्वादिधर्मवत्त्वश्रुतेः। | श्रुतिके कथनानुसार आत्मा श्रुति
आंनत्यानां मूर्तानां च चक्षुरा- | आदिके श्रोतृत्वारि धर्मवाला है*
| जिस प्रकार अग्निका प्रज्वलित
दीनां दृष्टचाद्यनित्यमेव संयोग- | होना, तृणादिके संयोगसे होनेके
वियोगधर्मिणाम्, यथाग्नेर्ज्वलनं | कारण, अनित्य है; उसी प्रकार
| संयोग-वियोगधर्मी, मूर्त्त एवं अनित्य
तृणादिसंयोगजत्वात्तद्वत् । न तु | चक्षु आदिके धर्म दृष्टि आदि
नित्यस्यामूर्त्तस्यासंयोगवियोगध- | अनित्य ही हैं । किन्तु जो नित्य,
| अमूर्त्त और संयोग-वियोग-धर्मसे

  • अर्थात् वह श्रुतिका श्रोता, मतिका मन्ता तथा विज्ञाता आदि
    रूपसे प्रसिद्ध है ।

६६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

६६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

र्मिणः संयोगजदृष्ट्याद्यनित्यधर्म- | रहित है उस ( आत्मा ) का संयोग-
वत्त्वं संभवति । तथा च श्रुतिः | जनित दृष्टि आदि अनित्य धर्मोंसे
“न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो | युक्त होना सम्भव नहीं है । ऐसी
विद्यते” ( बृ० उ० ४।३।२३ ) | ही “द्रष्टाकी दृष्टिका लोप नहीं
इत्याद्या । एवं तर्हि द्वे दृष्टी चक्षु- | होता” इत्यादि श्रुति भी है । इस
षोऽनित्या दृष्टिर्नित्या चात्मनः । | प्रकार दो दृष्टि सिद्ध होती हैं—
तथा च द्वे श्रुती श्रोत्रस्यानित्या | ( १ ) नेत्रकी अनित्य दृष्टि और ( २ )
नित्या चात्मस्वरूपस्य । तथा | आत्माकी नित्य दृष्टि । इसी प्रकार दो
द्वे मती विज्ञाती बाह्याबाह्ये एवं | श्रुति हैं—श्रोत्रकी अनित्य श्रुति और
ह्येव । तथा चेयं श्रुतिरूपपन्ना | आत्माकी नित्य श्रुति । तथा इसी
भवति “दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता” | प्रकार बाह्य और अबाह्यरूपसे दो मति
इत्याद्या । | और दो विज्ञाति हैं। ऐसी अवस्थामें
लोकेऽपि प्रसिद्धं चक्षुषस्ति- | ही “दृष्टिका द्रष्टा है, श्रुतिका श्रोता
मिरागमापाययोर्नष्टा दृष्टिर्जाता | है” इत्यादि श्रुति सार्थक हो
दृष्टिरिति चक्षुर्दृष्टेरनित्यत्वम्; | सकती है ।
तथा च श्रुतिमत्यादीनामात्म- | लोकमें भी तिमिर रोगकी उत्पत्ति
दृष्ट्यादीनां च नित्यत्वं प्रसिद्ध- | और विनाशसे ‘दृष्टि नष्ट हो गयी,
मेव लोके । वदति हि उद्घृतचक्षुः | दृष्टि उत्पन्न हो गयी’ इस प्रकार
स्वप्नेऽद्य मया भ्राता दृष्ट इति । | नेत्रकी दृष्टिका अनित्यत्व प्रसिद्ध ही
| है । इसी प्रकार श्रुति-मति इत्यादि-
| का [ अनित्यत्व माना गया है; ] और
| आत्माकी दृष्टि आदिका नित्यत्व तो
| लोकमें प्रसिद्ध ही है । जिसके नेत्र
| निकाल लिये गये हैं वह पुरुष भी
| ऐसा कहता ही है कि ‘आज
| स्वप्नमें मैंने अपने भाईको देखा था।’

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७

तथावगतबाधिर्यः स्वप्ने श्रुतो मन्त्रो- | तथा जिसका बहिरापन सबको
ऽद्येत्यादि । यदि चक्षुःसंयोग- | ज्ञात है वह भी ‘मैंने स्वप्नमें मन्त्र
जैवात्मनो नित्या दृष्टिस्तन्नाशे | सुना' इत्यादि कहता ही है। यदि
नश्येत् । तदोद्धृतचक्षुः स्वप्ने | आत्माकी नित्य दृष्टि नेत्रेन्द्रियके
नीलपीतादि न पश्येत् । “न हि | संयोगसे ही उत्पन्न होनेवाली हो
द्रष्टुर्दृष्टेः” (बृ० उ० ४ । ३ । | तो वह उसका नाश होनेपर नष्ट
२३) इत्याद्या च श्रुतिरनुपपन्ना | हो जाय। उस अवस्था में जिसके
स्यात् । “तच्चक्षुः पुरुषो येन | नेत्र निकाल लिये गये हैं वह
स्वप्ने पश्यति” इत्याद्या च | पुरुष स्वप्नमें नीला-पीला आदि
श्रुतिः । | नहीं देख सकेगा और तब "द्रष्टाकी
नित्या आत्मनो दृष्टिर्बाह्या- | दृष्टिका लोप नहीं होता" इत्यादि
नित्यदृष्टेर्ग्राहिका । बाह्यदृष्टेश्चोत्- | श्रुति और "वह नेत्र है, जिसके द्वारा
पजनापायाद्यनित्यधर्मवत्त्वात्तद्- | पुरुष स्वप्नमें देखता है" इत्यादि
ग्राहिकाया आत्मदृष्टेस्तद्वद्भा- | श्रुति भी निरर्थक हो जायगी।
सत्वमनित्यत्वादि भ्रान्तिनिमित्तं | आत्माकी नित्य दृष्टि बाह्य अनित्य
लोकस्येति युक्तम् । यथा भ्रम- | दृष्टिको ग्रहण करनेवाली है। बाह्य
णादिधर्मवदलातादिवस्तुविषय- | दृष्टि उत्पत्ति-विनाशादि अनित्य
दृष्टिरपि भ्रमतीव तद्वत् । तथा | धर्मोंवाली है; अतः लोगोंको जो
उसे ग्रहण करनेवाली आत्म- | दृष्टिका उसीके समान भासित
होना और अनित्य होना आदि प्रतीत | होता है वह भ्रान्तिके कारण है-
ऐसा मानना ठीक ही है। जिस | प्रकार भ्रमण आदि धर्मवाली अलात-
चक्र आदि वस्तुओंसे सम्बन्धित | दृष्टि भी भ्रमती-सी जान पड़ती है,
उसी प्रकार

६८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

६८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
च श्रुतिः "ध्यायतीव लेलायतीव"
(बृ० उ० ४ । ३ । ७) इति ।
तस्मादात्मदृष्टेर्नित्यत्वान्न यौग-
पद्यमयौगपद्यं वास्ति ।
बाह्यानित्यदृष्ट्युपाधिवशात्तु
लोकस्य तार्किकाणां चागम-
संप्रदायवर्जितत्वाद् अनित्या आ-
त्मनो दृष्टिरिति भ्रान्तिरूपपन्नैव ।
जीवेश्वरपरमात्मभेदकल्पना चै-
तन्निमित्तैव । तथा च अस्ति
नास्तीत्याद्याश्च यावन्तो वाङ्मन-
सयोर्भेदा यत्रैकं भवन्ति, तद्वि-
षयायां नित्याया दृष्टेर्निर्विशेषा-
याः-अस्ति नास्ति, एकं नाना, गुण-
वदगुणम्, जानाति न जानाति,
क्रियावदक्रियम्, फलवदफलम्,
सबीजं निर्बीजम्, सुखं दुःखम्,
मध्यममध्यम्, शून्यमशून्यम्,
परोऽहमन्य इति वा सर्ववाकप्रत्य-
यागोचरे स्वरूपे यो विकल्पयितु-
मिच्छति; स नूनं खमपि चर्म-
चाहिये ] । ऐसा ही "ध्यायतीव
लेलायतीव" आदि श्रुति भी कहती
है। अतः नित्य होनेके कारण
आत्मदृष्टिका यौगपद्य ( अनेक
दृष्टियोंका एक साथ होना ) अथवा
अयौगपद्य नहीं है।
बाह्य अनित्य दृष्टिरूप उपाधिके
कारण लोकको और तार्किक पुरुषों-
को वैदिक सम्प्रदायसे रहित होनेके
कारण ऐसी भ्रान्ति होना उचित
ही है कि आत्माकी दृष्टि अनित्य
है। जीव, ईश्वर और परमात्माके
भेदकी कल्पना भी इसी निमित्तसे
है। इसी प्रकार अस्ति ( है )
नास्ति ( नहीं है ) आदि जितने
भी वाणी और मनके भेद हैं वे सब
जहाँ एक हो जाते हैं उसे विषय
करनेवाली नित्य निर्विशेष दृष्टिके
सम्पूर्ण वाक्प्रतीतियोंके अविषय
स्वरूपमें जो है-नहीं है, एक-
अनेक, सगुण-निर्गुण, जानता है-
नहीं जानता, सक्रिय-निष्क्रिय,
सफल-निष्फल, सबीज-निर्बीज,
सुख-दुःख, मध्य-अमध्य, शून्य-
अशून्य, अथवा पर-अहं एवं अन्य-
की कल्पना करना चाहता है वह
निश्चय ही आकाशको भी चमड़ेके

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९


[वाम स्तम्भ (मूल संस्कृत)]

वद्वेष्टयितुमिच्छति, सोपानमिव
च पद्भ्यामारोढुम्, जले खे च
मीनानां वयसां च पदं दिदृक्षते।
"नेति नेति" (बृ० उ० ३।९।
२६) "यतो वाचो निवर्तन्ते"
(तै० उ० २।४।१) इत्या-
दिश्रुतिभ्यः । "को अद्धा वेद"¹
(ऋ० सं० १। ३०। ६)
इत्यादिमन्त्रवर्णात् ।
कथं तर्हि तस्य स म आत्मेति
वेदनम्। ब्रूहि केन प्रकारेण तमहं
स म आत्मेति विद्याम् ।
अत्राख्यायिकामाचक्षते—क-
श्चित्किल मनुष्यो मुग्धः कैश्चि-
दुक्तः कस्मिंश्चिदपराधे सति
धिक्त्वां नासि मनुष्य इति ।
स मुग्धतया आत्मनो मनुष्यत्वं
प्रत्याययितुं कांचिदुपेत्याह ब्रवीतु
भवान्कोऽहमस्मीति । स तस्य
मुग्धतां ज्ञात्वाह । क्रमेण बोध-
यिष्यामीति । स्थावराद्यात्मभाव-


[दक्षिण स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद)]

समान लपेटना चाहता है और
अपने पैरोंसे उसपर सीढ़ियोंके
समान आरूढ़ होनेको उद्यत है ।
वह मानो जल और आकाशमें मछली
तथा पक्षियोंके चरणचिह्न देखनेको
उत्सुक है; जैसा कि "नेति नेति"
"यतो वाचो निवर्तन्ते" इत्यादि
श्रुतियों और "को अद्धा वेद"
इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है।
पूर्व०—तो फिर उसे 'वह मेरा
आत्मा है' इस प्रकार कैसे जाना
जाता है ? बतलाओ उसे मैं किस
प्रकारसे 'वह मेरा आत्मा है' इस
प्रकार जानूँगा ?
सिद्धान्ती—इस विषयमें एक
आख्यायिका कहते हैं, किसी मूढ
मनुष्यसे किसीने, उससे कोई
अपराध बन जानेपर, कहा—'तुझे
धिक्कार है, तू मनुष्य नहीं है।'
उसने मूढतावश अपना मनुष्यत्व
निश्चित करानेके लिये किसीके पास
जाकर कहा—'आप बतलाइये, मैं
कौन हूँ ?' वह उसकी मूर्खता
समझकर उससे बोला—'धीरे-धीरे
बतलाऊँगा।' और फिर स्थावरादिमें


[पाद-टिप्पणी]

१. उसे साक्षात् कौन जानता है ?

७० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

७० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
मपोह्य न त्वममनुष्य इत्युक्त्वो- | उसके आत्मत्वका निषेध बतलाकर
परराम । स तं मुग्धः प्रत्याह | 'तू अमनुष्य नहीं है', ऐसा कहकर
भवान्मां बोधयितुं प्रवृत्तस्तूष्णीं | चुप हो गया । तब उस मूर्खने
बभूव किं न बोधयतीति ? तादृ- | उससे कहा-'आप मुझे समझानेके
ग्वेव तद्भवतो वचनम् । नास्य- | लिये प्रवृत्त होकर अब चुप हो गये,
मनुष्य इत्युक्तेऽपि मनुष्यत्वमा- | समझाते क्यों नहीं हैं ?' उसीके
त्मनो न प्रतिपद्यते यः स कथं | समान आपके ये वचन हैं । जो
मनुष्योऽसीत्युक्तोऽपि मनुष्यत्व- | पुरुष 'तू अमनुष्य नहीं है' ऐसा
मात्मनः प्रतिपद्येत ? | कहनेपर अपना मनुष्यत्व नहीं
तस्माद्यथाशास्त्रोपदेश एवा- | समझता वह 'तू मनुष्य है' ऐसा
त्मावबोधविधिर्नान्यः । न ह्यग्ने- | कहनेपर भी अपना मनुष्यत्व कैसे
र्दाह्यं तृणाद्यन्येन केनचिद्दग्धुं | समझ सकेगा ?
शक्यम् । अत एव शास्त्रमात्म- | अतः जैसा शास्त्रका उपदेश है
स्वरूपं बोधयितुं प्रवृत्तं सद- | उसके अनुसार ही आत्मसाक्षात्कार-
मनुष्यत्वप्रतिषेधेनैव "नेति | की विधि है, उससे भिन्न नहीं ।
नेति" (बृ० उ० ३।९।२६) | अग्निसे दग्ध होनेवाले तृण आदि
इत्युक्त्वोपरराम। तथा "अनन्त- | किसी अन्य वस्तुसे नहीं जलाये
रमबाह्यम्" (बृ० उ० २।५। | जा सकते । अतएव शास्त्र आत्म-
१९, ३।८।८) "अयमात्मा | स्वरूपका बोध करानेके लिये प्रवृत्त
ब्रह्म सर्वानुभूः" (बृ० उ० २।५। | होकर अमनुष्यत्वके प्रतिषेधके
१९) इत्यनुशासनम् । "तत्त्व- | समान “नेति-नेति” ऐसा कहकर
मसि" (छा० उ० ६।८-१६) | चुप हो गया है । इसी तरह
“यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन | "अन्तर्बाह्यभावसे रहित" “यह
| आत्मा सबका अनुभव करनेवाला
| ब्रह्म है" इत्यादि भी शास्त्रका
| उपदेश है । तथा “वह तू है”
| “जहाँ इसके लिये सब कुछ आत्मा

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
कं पश्येत्" (बृ० उ० २।४। | ही हो जाता है वहाँ किससे किसे
१४, ४।५।१५) इत्येवमा- | देखे ?" इत्यादि ऐसे ही और भी
द्यपि च। | वाक्य यही बतलाते हैं।
यावदयमेवं यथोक्तमिममा- | जबतक यह जीव उपर्युक्त
त्मानं न वेत्ति तावदयं बाह्या- | आत्माको 'यह ऐसा है' इस प्रकार
नित्यदृष्टिलक्षणमुपाधिमात्मत्वे- | नहीं जानता तबतक यह बाह्य
नोपेत्य अविद्यया उपाधिधर्मा- | अनित्य दृष्टिरूप उपाधिको आत्म-
नात्मनो मन्यमानो ब्रह्मादिस्तम्ब- | भावसे प्राप्त होकर अविद्यावश
पर्यन्तेषु देवतिर्यङ्नरस्थानेषु पुनः | उपाधिके धर्मोको आत्माके धर्म
पुनरावर्तमानोऽविद्याकामकर्मव- | मानता हुआ ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब-
शात्संसरति। स एवं संसरन्न्- | पर्यन्त देवता, पशु-पक्षी और
पात्तदेहेन्द्रियसंघातं त्यजति। | मनुष्योंकी योनियोंमें पुनः पुनः चक्कर
त्यक्त्वान्यमुपादत्ते। पुनः पुन- | लगाता हुआ अविद्या, कामना और
रेवमेव नदीस्रोतोवज्जन्ममरण- | कर्मके अधीन हो [जन्म-मरणरूप]
प्रबन्धाविच्छेदेन वर्तमानः का- | संसारको प्राप्त होता रहता है। वह
भिरवस्थाभिर्वर्तत इत्येतमर्थं द- | इस प्रकार संसारको प्राप्त होता
र्शयन्त्याह श्रुतिर्वैराग्यहेतोः— | हुआ प्राप्त हुए देह और इन्द्रियके
| संघातको त्याग देता है और एकको
| त्यागकर दूसरेको ग्रहण कर लेता
| है। वह इसी प्रकार नदीके स्रोतके
| समान जन्म-मरणकी परम्पराका
| विच्छेद न होते हुए किन अवस्थाओं-
| में रहता है इसी बातको, [मनुष्योंके
| मनमें] वैराग्य उत्पन्न करानेके लिये
| दिखलाती हुई श्रुति कहती है—
पुरुषका पहला जन्म
पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति। यदेतद्रेतः

७२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

७२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः संभूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति ।
तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनञ्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥१॥
सबसे पहले यह पुरुषशरीरमें ही गर्भरूपसे रहता है। यह जो
प्रसिद्ध रेतस् (वीर्य) है वह पुरुषके सम्पूर्ण अंगोंसे उत्पन्न हुआ तेज
(सार) है। पुरुष इस आत्मभूत तेजको अपने [ शरीर ] में ही पोषण
करता है। फिर जिस समय वह इसे स्त्रीमें सींचता है तब इसे [ गर्भ-
रूपसे ] उत्पन्न करता है। यह इसका पहला जन्म है ॥ १ ॥

[संस्कृत-भाष्य]
अयमेवाविद्याकामकर्माभिमा-
नवान् यज्ञादिकर्म कृत्वास्माल्लो-
काद् धूमादिक्रमेण चन्द्रमसं
प्राप्य क्षीणकर्मा वृष्ट्यादिक्रमे-
णेमं लोकं प्राप्य अन्नभूतः
पुरुषाग्नौ हुतः। तस्मिन्पुरुषे ह
वा अयं संसारी रसादिक्रमेण
आदितः प्रथमतः रेतोरूपेण
गर्भो भवतीत्येतदाह यदेतत्पु-
रुषे रेतस्तेन रूपेणेति।
तच्चैतद्रेतोऽन्नमयस्य पिण्डस्य
सर्वेभ्योऽङ्गेभ्योऽवयवेभ्यो रसा-
दिलक्षणेभ्यस्तेजः साररूपं शरी-
रस्य संभूतं परिनिष्पन्नं तत्पुरुष-

[हिन्दी-अनुवाद]
अविद्या, काम और कर्मजनित
अभिमानवाला यह जीव ही यज्ञादि
कर्म करके इस लोकसे धूमादि
क्रमसे चन्द्रलोकको प्राप्त हो कर्मोंके
क्षीण होनेपर वृष्टि आदि क्रमसे
इस लोकको प्राप्त होनेपर अन्नरूप-
से पुरुषरूप अग्निमें हवन किया
जाता है। उस पुरुषमें यह संसारी
जीव रसादि क्रमसे सबसे पहले
शुक्लरूपसे गर्भ होता है। इसी
बातको 'यह जो पुरुषमें रेतस् है
तद्रूपसे [गर्भ होता है]' इस
वाक्यसे कहा है।
वह यह रेतस् (शुक्र) अन्नमय
पिण्डके रसादिरूप सम्पूर्ण अङ्ग
यानी अवयवोंसे तेज-शरीरका
सारभूत निष्पन्न हुआ है। वह
पुरुषका आत्मभूत होनेके कारण

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
स्वात्मभूतत्वादात्मा । तमात्मानं | ‘आत्मा’ है । शुकरूपसे गर्भीभूत
रेतोरूपेण गर्भीभूतमात्मन्येव | हुए उस आत्माको पुरुष अपने
स्वशरीर एवात्मानं बिभर्ति | शरीरमें ही धारण ( पोषण )
धारयति । | करता है ।
तद्रेतो यदा यस्मिन्काले | जिस समय भार्या ऋतुमती
भार्यार्तुमती तस्यां योषाग्नौ स्त्रियां | होती है उस समय पिता उस
सिञ्चत्युपगच्छन्, अथ तदैनदेत- | शुक्रको स्त्रीरूप अग्नि—अर्थात्
द्रेत आत्मनो गर्भभूतं जनयति | स्त्री [ की योनि ] में उससे संयोग
पिता । तदस्य पुरुषस्य स्थाना- | करके सींचता है उस समय वह
न्निर्गमनं रेतःसेककाले रेतोरूपे- | इस शुक्रको अपने गर्भरूपसे उत्पन्न
णास्य संसारिणः प्रथमं जन्म | करता है । इस प्रकार रेतःसिञ्चन-
प्रथमावस्थाभिव्यक्तिः। तदेतदुक्तं | कालमें रेतोरूपसे अपने स्थानसे
पुरस्तात् “असावात्मामुमात्मा- | निकलना ही इस संसारी पुरुषका
नम्” इत्यादिना ॥ १ ॥ | प्रथम जन्म अर्थात् प्रथमावस्थाकी
अभिव्यक्ति है । यही बात “असा-
वात्मा अमुमात्मानम्” इत्यादि वाक्य-
से पहले कही गयी है ॥ १ ॥

तत्स्त्रिया आत्मभूतं गच्छति । यथा स्वमङ्गं
तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । सास्यैतमात्मानमत्रगतं
भावयति ॥ २ ॥
जिस प्रकार [ स्तनादि ] अपने अंग होते हैं उसी प्रकार वह वीर्य
स्त्रीके आत्मभाव ( तादात्म्य ) को प्राप्त हो जाता है । अतः वह उसे
पीडा नहीं पहुँचाता । अपने उदरमें गये हुए उस ( पति ) के इस
आत्माका वह पोषण करती है ॥ २ ॥

७४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २

७४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
तद्रेतो यस्यां स्त्रियां सिक्तं | वह वीर्य जिस स्त्रीमें सींचा
| जाता है उस स्त्रीके आत्मभाव
सत्तस्या आत्मभूयमात्माव्यति- | अर्थात् पिताके शरीरके समान उसके
| शरीरसे अभिन्नताको प्राप्त हो जाता
रेकतां यथा पितुरेवं गच्छति | है । जिस प्रकार अपने अङ्ग स्तनादि
प्राप्नोति यथा स्वमङ्गं स्तनादि | (देहसे पृथक् नहीं) होते हैं उसी
| प्रकार यह भी हो जाता है । इसीलिये
तथा तद्वदेव । तस्माद्धेतोरनां | यह गर्भ पिटक (आन्तरिक व्रणरूप
| ग्रन्थि) आदिके समान उस माता-
मातरं स गर्भो न हिनस्ति | को कष्ट नहीं देता । क्योंकि वह
| स्तनादि अपने अङ्गके समान शरीर-
पिटकादिवत् । यस्मात्स्तनादि- | से अभेदको प्राप्त हो जाता है इसलिये
स्वाङ्गवदात्मभूयं गतं तस्मान्न | वह [किसी प्रकारका] कष्ट यानी
| बाधा नहीं पहुँचाता—यह इसका
हिनस्ति न बाधत इत्यर्थः । | तात्पर्य है ।
सा अन्तर्वत्न्येतमस्य भर्तुरा- | वह गर्भिणी इस अपने पतिके
त्मानमत्रात्मन उदरे गतं प्रविष्टं | आत्माको यहाँ—अपने उदरमें प्रविष्ट
बुद्ध्वा भावयति वर्धयति परि- | हुआ जानकर गर्भके विरोधी
पालयति गर्भस्तरुद्धाशनादिपरि- | भोजनादिको त्यागकर अनुकूल
हारमनुकूलाशनाद्युपयोगं च | भोजनादिका उपयोग करती हुई
कुर्वती ॥ २ ॥ | उसका पालन करती है ॥ २ ॥
पुरुषका दूसरा जन्म
सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं
बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦
यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां
लोकानां सन्तत्या । एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य
द्वितीयं जन्म ॥ ३ ॥
वह [ गर्भभूत पतिके आत्माका ] पालन करनेवाली [ गर्भिणी स्त्री
अपने पतिद्वारा ] पालनीया होती है। गर्भिणी स्त्री उस गर्भका पोषण
करती है। तथा वह ( पिता ) गर्भरूपसे उत्पन्न हुए उस कुमारको
प्रसवके अनन्तर पहले [ जातकर्मार्दि संस्कारोंसे ] ही संस्कृत करता
है। वह जो जन्मके अनन्तर कुमारका संस्कार करता है सो इस
प्रकार इन लोकों ( पुत्र-पौत्रादि ) की वृद्धिसे वह अपना ही संस्कार
करता है, क्योंकि इसी प्रकार इन लोकोंकी वृद्धि होती है—यही इसका
दूसरा जन्म है ॥ ३ ॥

सा भावयित्री वर्धयित्री भर्तु- | गर्भभूत पतिके आत्माकी वृद्धि
रात्मनो गर्भभूतस्य भावयितव्या | करनेवाली वह स्त्री अपने स्वामीद्वारा
वर्धयितव्या रक्षयितव्या च | वर्द्धयितव्या—पालनीया होती है,
भर्त्रा भवति । न ह्युपकार- | क्योंकि लोकमें उपकार-प्रत्युपकारके
प्रत्युपकारमन्तरेण लोके कस्य- | बिना किसीके साथ किसीका सम्बन्ध
चित्केनचित्सम्बन्ध उपपद्यते । | होना सम्भव नहीं है। जन्म होनेसे
तं गर्भं स्त्री यथोक्तेन गर्भधारण- | पूर्व उस गर्भको वह स्त्री गर्भधारणकी
विधानेन बिभर्ति धारयत्यग्रे | यथोक्त विधिसे धारण-पोषण करती
प्राग्जन्मनः । स पिता अग्र एव | है। तथा वह पिता [जन्म होनेके बाद]
पूर्वमेव जातमात्रं जन्मनोऽध्यूर्ध्वं | पहले ही जन्म लेते ही उस कुमारका
जन्मनो जातं कुमारं जातकमां- | जन्मके अनन्तर जातकर्मादिद्वारा
दिना पिता भावयति । स | संस्कार करता है। वह पिता जो जन्म-
पिता यद्यस्मात्कुमारं जन्मनो- | के अनन्तर उस सद्योजात कुमारका