ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
ननु श्रोतृत्ववादिधर्मवानात्मा, | पूर्व०-आत्मा तो श्रोतृत्ववादि
अश्रोतृत्वादि च प्रसिद्धमात्म- | धर्मवाला है और आत्माके अश्रोतृत्व
नः। किमत्र विषमं पश्यसि ? | आदि धर्म भी [ श्रुतिमें] प्रसिद्ध
| हैं। फिर इसमें तुम्हें विषमता क्या
| दिखलायी देती है ?
यद्यपि तव न विषमं तथापि | सिद्धान्ती-यद्यपि तुझे कोई
| विषमता ज्ञात नहीं होती, तथापि
मम तु विषमं प्रतिभाति । | मुझे तो होती ही है । किस
| प्रकार कि जिस समय यह श्रोता
कथम् ? यदासौ श्रोता तदा | होता है उस समय मन्ता नहीं
| होता और जब मन्ता होता है तब
न मन्ता यदा मन्ता तदा न | श्रोता नहीं होता । ऐसा होनेके
श्रोता । तत्रैवं सति पक्षे श्रोता | कारण वह एक पक्षमें श्रोता और
| मन्ता है तो दूसरे पक्षमें न श्रोता
मन्ता पक्षे न श्रोता नापि | है और न मन्ता ही है । ऐसा ही
| अन्यत्र (विज्ञाता आदिके सम्बन्धमें)
मन्ता । तथान्यत्रापि च । | भी समझना चाहिये ।
यदैवं तदा श्रोतृत्ववादिधर्म- | जब कि ऐसी बात है तब
| आत्मा श्रोतृत्ववादि धर्मवाला है अथवा
वानात्मा अश्रोतृत्वादिधर्मवा- | अश्रोतृत्वादि धर्मवाला ? इस प्रकार
न्वेति संशयस्थाने कथं तव | संशयस्थान उपस्थित होनेपर तुझे
| विषमता क्यों नहीं दिखायी देती ?
न वैषम्यम् । यदा देवदत्तो | जिस समय देवदत्त चलता है उस
गच्छति तदा न स्थाता | समय वह चलनेवाला ही होता है
| ठहरनेवाला नहीं होता, तथा जिस
गन्तैव । यदा तिष्ठति तदा | समय वह ठहरता है उस समय
| वह ठहरनेवाला ही होता है, चलने-
न गन्ता स्थातैव । तदा अस्य | वाला नहीं होता । ऐसी अवस्थामें
पक्ष एव गन्तृत्वं स्थातृत्वं | इसका गन्तृत्व और स्थातृत्व पाक्षिक