ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 80, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें७० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
मपोह्य न त्वममनुष्य इत्युक्त्वो- | उसके आत्मत्वका निषेध बतलाकर
परराम । स तं मुग्धः प्रत्याह | 'तू अमनुष्य नहीं है', ऐसा कहकर
भवान्मां बोधयितुं प्रवृत्तस्तूष्णीं | चुप हो गया । तब उस मूर्खने
बभूव किं न बोधयतीति ? तादृ- | उससे कहा-'आप मुझे समझानेके
ग्वेव तद्भवतो वचनम् । नास्य- | लिये प्रवृत्त होकर अब चुप हो गये,
मनुष्य इत्युक्तेऽपि मनुष्यत्वमा- | समझाते क्यों नहीं हैं ?' उसीके
त्मनो न प्रतिपद्यते यः स कथं | समान आपके ये वचन हैं । जो
मनुष्योऽसीत्युक्तोऽपि मनुष्यत्व- | पुरुष 'तू अमनुष्य नहीं है' ऐसा
मात्मनः प्रतिपद्येत ? | कहनेपर अपना मनुष्यत्व नहीं
तस्माद्यथाशास्त्रोपदेश एवा- | समझता वह 'तू मनुष्य है' ऐसा
त्मावबोधविधिर्नान्यः । न ह्यग्ने- | कहनेपर भी अपना मनुष्यत्व कैसे
र्दाह्यं तृणाद्यन्येन केनचिद्दग्धुं | समझ सकेगा ?
शक्यम् । अत एव शास्त्रमात्म- | अतः जैसा शास्त्रका उपदेश है
स्वरूपं बोधयितुं प्रवृत्तं सद- | उसके अनुसार ही आत्मसाक्षात्कार-
मनुष्यत्वप्रतिषेधेनैव "नेति | की विधि है, उससे भिन्न नहीं ।
नेति" (बृ० उ० ३।९।२६) | अग्निसे दग्ध होनेवाले तृण आदि
इत्युक्त्वोपरराम। तथा "अनन्त- | किसी अन्य वस्तुसे नहीं जलाये
रमबाह्यम्" (बृ० उ० २।५। | जा सकते । अतएव शास्त्र आत्म-
१९, ३।८।८) "अयमात्मा | स्वरूपका बोध करानेके लिये प्रवृत्त
ब्रह्म सर्वानुभूः" (बृ० उ० २।५। | होकर अमनुष्यत्वके प्रतिषेधके
१९) इत्यनुशासनम् । "तत्त्व- | समान “नेति-नेति” ऐसा कहकर
मसि" (छा० उ० ६।८-१६) | चुप हो गया है । इसी तरह
“यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन | "अन्तर्बाह्यभावसे रहित" “यह
| आत्मा सबका अनुभव करनेवाला
| ब्रह्म है" इत्यादि भी शास्त्रका
| उपदेश है । तथा “वह तू है”
| “जहाँ इसके लिये सब कुछ आत्मा