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सर्वकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 108 में से

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पृष्ठ 74

६४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
च। न नित्यं गन्तृत्वं स्थातृत्वं ही होता है, नित्यगन्तृत्व अथवा
नित्यस्थातृत्व नहीं होता। इसी प्रकार
वा। तद्वत्। [आत्माका श्रोतृत्वादि भी पाक्षिक
ही सिद्ध होगा, नित्य नहीं]।
तथैवात्र काणादादयः पश्य- काणाद आदि अन्य मतावलम्बी
भी इस विषयमें ऐसा ही समझते हैं,
न्ति । पक्षप्राप्तेनैव श्रोतृत्वादिना क्योंकि इस विषयमें उनका कथन
है कि पक्षमें प्राप्त होनेवाले श्रोत-
त्वादिके कारण ही आत्मा श्रोता-
मन्ता इत्यादि कहा जाता है। वे
ज्ञानका संयोगजत्व (इन्द्रिय और
मनके संयोगसे उत्पन्न होना) और
अयोगपद्य (एक साथ न होना)
प्रतिपादन करते हैं। और मनको
एक साथ ज्ञान उत्पन्न न होनेमें वे 'मैं
अन्यमनस्क था, इसलिये न देख
सका' इत्यादि लिङ्ग प्रदर्शित करते हैं
और यह युक्तिसङ्गत भी है।
आत्मोच्यते श्रोता मन्तेत्यादि-
वचनात् । संयोगजत्वमयौगपद्यं
च ज्ञानस्य ह्याचक्षते । दर्शयन्ति
चान्यत्रमना अभूवं नादर्शमि-
त्यादि युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो
लिङ्गममिति च न्याय्यम् ।
भवत्वेवम्; किं तव नष्टं पूर्व०-ऐसा सिद्धान्त भले ही
रहे; किन्तु यदि ऐसा हो भी तो
तुम्हारी क्या हानि है ?
यद्येवं स्यात् ?
अस्त्वेवं तवेष्टं चेत् । श्रुत्य- सिद्धान्ती-यदि तुम्हें अभिमत
हो तो तुम्हारे लिये ऐसा भले ही
र्थस्तु न संभवति । हो; परन्तु यह श्रुतिका तात्पर्य तो
हो नहीं सकता ।
किं न श्रोता मन्तेत्यादि- पूर्व०-क्या श्रोता मन्ता इत्यादि
श्रुत्यर्थः ? श्रुतिका अर्थ नहीं है ?
न; न श्रोता न मन्तेत्यादि- सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि [श्रुति-
में तो] 'न श्रोता है न मन्ता
वचनात् । है' इत्यादि भी कहा है।