ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
कं पश्येत्" (बृ० उ० २।४। | ही हो जाता है वहाँ किससे किसे
१४, ४।५।१५) इत्येवमा- | देखे ?" इत्यादि ऐसे ही और भी
द्यपि च। | वाक्य यही बतलाते हैं।
यावदयमेवं यथोक्तमिममा- | जबतक यह जीव उपर्युक्त
त्मानं न वेत्ति तावदयं बाह्या- | आत्माको 'यह ऐसा है' इस प्रकार
नित्यदृष्टिलक्षणमुपाधिमात्मत्वे- | नहीं जानता तबतक यह बाह्य
नोपेत्य अविद्यया उपाधिधर्मा- | अनित्य दृष्टिरूप उपाधिको आत्म-
नात्मनो मन्यमानो ब्रह्मादिस्तम्ब- | भावसे प्राप्त होकर अविद्यावश
पर्यन्तेषु देवतिर्यङ्नरस्थानेषु पुनः | उपाधिके धर्मोको आत्माके धर्म
पुनरावर्तमानोऽविद्याकामकर्मव- | मानता हुआ ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब-
शात्संसरति। स एवं संसरन्न्- | पर्यन्त देवता, पशु-पक्षी और
पात्तदेहेन्द्रियसंघातं त्यजति। | मनुष्योंकी योनियोंमें पुनः पुनः चक्कर
त्यक्त्वान्यमुपादत्ते। पुनः पुन- | लगाता हुआ अविद्या, कामना और
रेवमेव नदीस्रोतोवज्जन्ममरण- | कर्मके अधीन हो [जन्म-मरणरूप]
प्रबन्धाविच्छेदेन वर्तमानः का- | संसारको प्राप्त होता रहता है। वह
भिरवस्थाभिर्वर्तत इत्येतमर्थं द- | इस प्रकार संसारको प्राप्त होता
र्शयन्त्याह श्रुतिर्वैराग्यहेतोः— | हुआ प्राप्त हुए देह और इन्द्रियके
| संघातको त्याग देता है और एकको
| त्यागकर दूसरेको ग्रहण कर लेता
| है। वह इसी प्रकार नदीके स्रोतके
| समान जन्म-मरणकी परम्पराका
| विच्छेद न होते हुए किन अवस्थाओं-
| में रहता है इसी बातको, [मनुष्योंके
| मनमें] वैराग्य उत्पन्न करानेके लिये
| दिखलाती हुई श्रुति कहती है—
पुरुषका पहला जन्म
पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति। यदेतद्रेतः