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सर्वकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 108 में से

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पृष्ठ 71

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
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श्रवणक्रिययैव वर्तमानत्वा- | साथ ही वर्तमान रहनेके कारण
न्मननविज्ञानक्रिये न संभवतः | उसके लिये अपनेमें अथवा अन्यत्र
आत्मनि परत्र वा । तथान्यत्रापि | मनन या विज्ञानरूप क्रियाएँ संभव
| नहीं हैं । [ इस प्रकार विजातीय
मननादिक्रियासु । श्रवणादि- | क्रियाओंकी समकालीनताका निषेध
| करके अब सजातीय क्रियाओंका
क्रियाश्च स्वविषयेष्वेव । न हि | निषेध करते हैं- ] इसी प्रकार
| अन्यत्र मनन आदि क्रियाओंमें भी
मन्तव्यादन्यत्र मन्तुर्मननक्रिया | समझना चाहिये । श्रवणादि क्रियाएँ
| भी अपने विषयोंमें ही प्रवृत्त हो
संभवति । | सकती हैं [ आश्रयमें नहीं ] । मनन
| करनेवालेकी मननक्रिया मन्तव्यसे
| भिन्न स्थानमें सम्भव नहीं है ।
ननु मनसा सर्वमेव मन्तव्यम् । | पूर्व०-मनसे तो सभीका मनन
| किया जाता है ।
सत्यमेवं तथापि सर्वमपि | सिद्धान्ती-यह ठीक है; परन्तु.
मन्तव्यं मन्तारमन्तरेण न मन्तुं | जो कुछ मनन किया जाता है वह
| सब मननकर्ताके बिना नहीं किया
शक्यम् । | जा सकता ।
यद्येवं किं स्यात् ? | पूर्व०-यदि ऐसा हो भी तो
| इससे क्या होगा ?
इदमत्र स्यात् ; सर्वस्य योऽयं | सिद्धान्ती-इससे यहाँ यह
मन्ता स मन्तैवेति न स मन्तव्यः | होगा कि जो इस सबका मनन करने-
| वाला है वह मनन करनेवाला ही
स्यात् । न च द्वितीयो मन्तुर्म- | रहेगा, मन्तव्य नहीं होगा । तथा
| उस मनन करनेवालेका कोई दूसरा
न्तास्ति । यदा स आत्मनैव | मननकर्ता भी नहीं है । यदि उसे