ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
प्रदर्शनं तेषां यथायतनप्रवेशनं | दिखलाना, उन देवताओंका अपने-
| अपने अनुकूल आयतनोंमें प्रवेश
सृष्टस्यान्नस्य पलायनं वागादि- | करना, उत्पन्न हुए अन्नका भागना
| और उसे वाक् आदि इन्द्रियों-
भिस्तज्जिघृक्षा; एतत्सर्वं सीमा- | द्वारा ग्रहण करनेकी इच्छा करना-
| ये सब बातें भी सीमा विदीर्ण करने
विदारणप्रवेशसममेव । | और शरीरमें प्रवेश करनेके समान
| ही [ आश्चर्यजनक ] हैं।
अस्तु तर्हि सर्वमेवेदमनुप- | पूर्व०—अच्छा तो, इन सभी
| बातोंको अनुपपन्न ( असम्भव )
पन्नम् । | मान लो ।
न; अत्रात्मावबोधमात्रस्य | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है,
| क्योंकि श्रुतिको यहाँ केवल आत्मा-
विवक्षितत्वात्सर्वोऽयमर्थवाद इत्य- | वबोधमात्र कहना अभीष्ट होनेसे
| यह सब अर्थवाद है; अतः इसमें
दोषः। मायाविवद्वा महामायावी | कोई दोष नहीं है। अथवा मायावीके
| समान महामायावी सर्वज्ञ सर्व-
देवः सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सर्वमे- | शक्तिमान् प्रभुने इस सम्पूर्ण जगत्-
| की रचना की है, और इस रहस्यका
तच्चकार । सुखावबोधनप्रति- | सरलतासे ज्ञान प्राप्त करनेके लिये
| ही लौकिक रीतिसे यह आख्यायिका
पत्त्यर्थं लोकवदाख्यायिकादि- | आदिकी रचना की गयी है—इस
| प्रकार भी यह पक्ष युक्तियुक्त जान
प्रपञ्च इति युक्ततरः पक्षः। न | पड़ता है, क्योंकि केवल लोक-
| रचनाकी आख्यायिका आदिके
हि सृष्ट्याख्यायिकादिपरिज्ञा- | परिज्ञानसे कुछ भी फल नहीं
| मिलता। परन्तु आत्माके एकत्व और
नात्किंचित्फलमिष्यते । ऐका- | यथार्थ स्वरूपके ज्ञानसे-अमरत्वरूप
| फल [ प्राप्त होता है—यह ]
त्म्यस्वरूपपरिज्ञानात्तु अमृतत्वं | सभी उपनिषदोंमें प्रसिद्ध है।
फलं सर्वोपनिषत्प्रसिद्धम् । |