ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
च श्रुतिः "ध्यायतीव लेलायतीव"
(बृ० उ० ४ । ३ । ७) इति ।
तस्मादात्मदृष्टेर्नित्यत्वान्न यौग-
पद्यमयौगपद्यं वास्ति ।
बाह्यानित्यदृष्ट्युपाधिवशात्तु
लोकस्य तार्किकाणां चागम-
संप्रदायवर्जितत्वाद् अनित्या आ-
त्मनो दृष्टिरिति भ्रान्तिरूपपन्नैव ।
जीवेश्वरपरमात्मभेदकल्पना चै-
तन्निमित्तैव । तथा च अस्ति
नास्तीत्याद्याश्च यावन्तो वाङ्मन-
सयोर्भेदा यत्रैकं भवन्ति, तद्वि-
षयायां नित्याया दृष्टेर्निर्विशेषा-
याः-अस्ति नास्ति, एकं नाना, गुण-
वदगुणम्, जानाति न जानाति,
क्रियावदक्रियम्, फलवदफलम्,
सबीजं निर्बीजम्, सुखं दुःखम्,
मध्यममध्यम्, शून्यमशून्यम्,
परोऽहमन्य इति वा सर्ववाकप्रत्य-
यागोचरे स्वरूपे यो विकल्पयितु-
मिच्छति; स नूनं खमपि चर्म-
चाहिये ] । ऐसा ही "ध्यायतीव
लेलायतीव" आदि श्रुति भी कहती
है। अतः नित्य होनेके कारण
आत्मदृष्टिका यौगपद्य ( अनेक
दृष्टियोंका एक साथ होना ) अथवा
अयौगपद्य नहीं है।
बाह्य अनित्य दृष्टिरूप उपाधिके
कारण लोकको और तार्किक पुरुषों-
को वैदिक सम्प्रदायसे रहित होनेके
कारण ऐसी भ्रान्ति होना उचित
ही है कि आत्माकी दृष्टि अनित्य
है। जीव, ईश्वर और परमात्माके
भेदकी कल्पना भी इसी निमित्तसे
है। इसी प्रकार अस्ति ( है )
नास्ति ( नहीं है ) आदि जितने
भी वाणी और मनके भेद हैं वे सब
जहाँ एक हो जाते हैं उसे विषय
करनेवाली नित्य निर्विशेष दृष्टिके
सम्पूर्ण वाक्प्रतीतियोंके अविषय
स्वरूपमें जो है-नहीं है, एक-
अनेक, सगुण-निर्गुण, जानता है-
नहीं जानता, सक्रिय-निष्क्रिय,
सफल-निष्फल, सबीज-निर्बीज,
सुख-दुःख, मध्य-अमध्य, शून्य-
अशून्य, अथवा पर-अहं एवं अन्य-
की कल्पना करना चाहता है वह
निश्चय ही आकाशको भी चमड़ेके