अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
अयोध्याकाण्ड - सर्ग २: राज्याभिषेककी तैयारी तथा वसिष्ठजी और रघुनाथजीका संवाद
४४ अध्यात्मरामायण [ सर्गः २
| श्रुत्वैतद्गदितं रामो नारदं प्राह सस्मितम् ॥३५॥<br>शृणु नारद मे किञ्चिद्विद्यतेऽविदितं क्वचित् ।<br>प्रतिज्ञातं च यत्पूर्वं करिष्ये तन्न संशयः ॥३६॥<br>किन्तु कालानुरोधेन तत्तत्प्रारब्धसंक्षयात् ।<br>हरिष्ये सर्वभूभारं क्रमेणासुरमण्डलम् ॥३७॥<br>रावणस्य विनाशार्थं श्वो गन्ता दण्डकाननम् ।<br>चतुर्दश समास्तत्र ह्युषित्वा मुनिवेषधृक् ॥३८॥<br>सीतामिषेण तं दुष्टं सकुलं नाशयाम्यहम् ।<br>एवं रामे प्रतिज्ञाते नारदः प्रमुमोद ह ॥३९॥<br>प्रदक्षिणत्रयं कृत्वा दण्डवत्प्रणिपत्य तम् ।<br>अनुज्ञातश्च रामेण ययौ देवगतिं मुनिः ॥४०॥<br>संवादं पठति शृणोति संस्मरेद्वा<br>यो नित्यं मुनिवररामयोः स भक्त्या ।<br>सम्प्राप्नोत्यमरसुदुर्लभं विमोक्षं<br>कैवल्यं विरतिपुरःसरं क्रमेण ॥४१॥ | नारदजीके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसका-<br>कर कहा ॥३५॥ “नारदजी ! सुनिये, क्या कोई<br>ऐसी बात भी है जिसे मैं न जानता होऊँ ? मैंने<br>पहले जो कुछ प्रतिज्ञा की है वह मैं निस्सन्देह पूर्ण<br>करूँगा ॥३६॥ किन्तु कालक्रमसे जिन-जिनका प्रारब्ध<br>क्षीण होता जायगा उन-उन दैत्योंको ही मारकर मैं क्रमशः<br>पृथिवीका भार उतारूँगा ॥३७॥ रावणका वध करने<br>के लिये मैं कल दण्डकारण्यको जाऊँगा और वहाँ<br>चौदह वर्ष मुनिवेष धारण कर रहूँगा ॥ ३८ ॥ उस<br>दुष्टको सीता-हरणके मिषसे मैं कुटुम्बके सहित नष्ट<br>कर दूँगा।”<br>रामचन्द्रजीके इस प्रकार प्रतिज्ञा करनेपर नारदजी<br>अति प्रसन्न हुए ॥३९॥ तदनन्तर उन्होंने रामजीकी<br>तीन परिक्रमाएँ कीं और उन्हें दण्डवत्-प्रणाम कर उनकी<br>आज्ञा ले आकाश-मार्गसे देवलोकको चले गये ॥४०॥<br>जो मनुष्य नारद और रामचन्द्रजीके इस संवादको<br>नित्य भक्तिपूर्वक पढ़ता, सुनता या स्मरण करता है<br>वह वैराग्यपूर्वक क्रमशः देवताओंको दुर्लभ कैवल्य<br>मोक्षपद प्राप्त कर लेता है ॥४१॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीय सर्ग
राज्याभिषेककी तैयारी तथा वसिष्ठजी और रघुनाथजीका संवाद।
| श्रीमद्महादेव उवाच | |
|---|---|
| अथ राजा दशरथः कदाचिद्रहसि स्थितः ।<br>वसिष्ठं स्वकुलाचार्यमाहूयेदमभाषत ॥ १ ॥<br>भगवन् राममखिलाः प्रशंसन्ति मुहुर्मुहुः ।<br>पौराश्च निगमा वृद्धा मन्त्रिणश्च विशेषतः ॥ २ ॥<br>ततः सर्वगुणोपेतं रामं राजीवलोचनम् ।<br>ज्येष्ठं राज्येऽभिषेक्ष्यामि वृद्धोऽहं मुनिपुङ्गव ॥ ३ ॥<br>भरतो मातुलं द्रष्टुं गतः शत्रुघ्नसंयुतः ।<br>अभिषेक्ष्ये श्व एवाशु भवांस्तच्चानुमोदताम् ॥ ४ ॥<br>सम्भारः सम्भ्रियन्तां च गच्छ मन्त्रय राघवम् ।<br>उच्छ्रीयन्तां पताकाश्च नानावर्णाः समन्ततः ॥५॥ | श्रीमहादेवजी बोले-एक दिन एकान्तमें बैठे हुए<br>राजा दशरथने अपने कुल-पुरोहित वसिष्ठजीको<br>बुलाकर कहा ॥१॥ “भगवन् ! सभी पुरवासी; शास्त्रज्ञ,<br>बड़े-बूढ़े और मन्त्रिजन रामकी विशेषतया बारम्बार<br>प्रशंसा किया करते हैं ॥२॥ इसलिये हे मुनिश्रेष्ठ ! मेरा<br>विचार है कि मैं अपने सर्वगुणसम्पन्न ज्येष्ठ पुत्र कमल-<br>नयन रामको राज्यपदपर अभिषिक्त कर दूँ क्योंकि मैं<br>अब वृद्ध हो गया हूँ ॥३॥ इस समय भरत शत्रुघ्नके<br>साथ अपने मामाके यहाँ मिलने गया है, तथापि मैं<br>कल शीघ्र ही रामका राज्याभिषेक करना चाहता हूँ ।<br>इस विषयमें आप भी अपनी सम्मति दे दीजिये ॥४॥<br>हे मुनिश्रेष्ठ ! आप अभिषेककी सामग्री एकत्रित<br>कराइये और रघुनाथजीके पास जाकर उनको यथोचित<br>सम्मति दीजिये । इस समय नगरमें सब ओर रंग-बिरंगी |
सर्ग २ ] अयोध्याकाण्ड ४५
तोरणानि विचित्राणि स्वर्णमुक्तामयानि वै ।
आहूय मन्त्रिणं राजा सुमन्त्रं मन्त्रिसत्तमम् ॥ ६ ॥
आज्ञापयति यद्यत्त्वां मुनिस्तत्तत्समाजय ।
यौवराज्येऽभिषेक्ष्यामि श्वोभूते रघुनन्दनम् ॥ ७ ॥
तथेति हर्षात्स मुनिं किं करोमीत्यभाषत ।
तमुवाच महातेजा वसिष्ठो ज्ञानिनां वरः ॥ ८ ॥
श्वः प्रभाते मध्यकक्षे कन्यकाः स्वर्णभूषिताः ।
तिष्ठन्तु षोडश गजः स्वर्णरत्नादिभूषितः ॥ ९ ॥
चतुर्दन्तः समायातु ऐरावतकुलोद्भवः ।
नानातीर्थोदकैः पूर्णाः स्वर्णकुम्भाः सहस्रशः ॥ १० ॥
स्थाप्यन्तां नव चेयाघ्रचर्माणि त्रीणि चानय ।
श्वेतच्छत्रं रत्नदण्डं मुक्तामणिविराजितम् ॥ ११ ॥
दिव्यमाल्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च ।
मुनयः सत्कृतास्तत्र तिष्ठन्तु कुशपाणयः ॥ १२ ॥
नर्तक्यो वारमुख्याश्च गायका वेणुकास्तथा ।
नानावादित्रकुशला वादयन्तु नृपाङ्गणे ॥ १३ ॥
हस्त्यश्वरथपादाता वहिस्तिष्ठन्तु सायुधाः ।
नगरे यानि तिष्ठन्ति देवतायतनानि च ॥ १४ ॥
तेषु प्रवर्ततां पूजा नानाबलिभिरावृता ।
राजानः शीघ्रमायान्तु नानोपायनपाणयः ॥ १५ ॥
इत्यादिश्य मुनिः श्रीमान् सुमन्त्रं नृपमन्त्रिणम् ।
स्वयं जगाम भवनं राघवस्यातिशोभनम् ॥ १६ ॥
रथमारुह्य भगवान्वसिष्ठो मुनिसत्तमः ।
त्रीणि कक्ष्याण्यतिक्रम्य रथात्क्षितिमवातरत् ॥ १७ ॥
अन्तः प्रविश्य भवनं स्वाचार्यत्वादवारितः ।
गुरुमागतमाज्ञाय रामस्तूर्णं कृताञ्जलिः ॥ १८ ॥
प्रत्युद्गम्य नमस्कृत्य दण्डवद्भक्तिसंयुतः ।
स्वर्णपात्रेण पानीयमानिनायाशु जानकी ॥ १९ ॥
झण्डियाँ लगायी जानी चाहिये ॥ ५ ॥ तथा चित्र-विचित्र सुवर्ण और मोतियोंके तोरण (झालर) बाँधे जाने चाहिये।" उसी समय राजाने मन्त्रिश्रेष्ठ सुमन्त्रको बुलाकर आज्ञा दी कि मैं कल रघुनाथजीको युवराज-पदपर अभिषिक्त करूँगा, उसके लिये मुनिवर वसिष्ठजी जो-जो सामग्री बताएँ वह सब एकत्रित करो ॥ ६-७ ॥
राजा दशरथसे 'बहुत अच्छा' कह सुमन्त्रने हर्ष-पूर्वक मुनिवरसे कहा कि 'मैं क्या करूँ?' तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी वसिष्ठजीने उससे कहा—॥ ८ ॥ "कल प्रातःकाल मध्यद्वारपर सुवर्ण-भूषण-भूषित सोलहँ कन्याएँ खड़ी रहनी चाहिये; तथा सुवर्ण और रत्न आदिसे विभूषित ऐरावतके कुलमें उत्पन्न एक चार दाँतोंवाला हाथी रहना चाहिये, नाना तीर्थोंके जलसे पूर्ण हजारों सुवर्ण-कलश मँगवाये जायें ॥ ९-१० ॥ तीन नवीन व्याघ्र-चर्म लाकर रक्खो और मुक्ता-मणि-सुशोभित रत्नदण्डयुक्त एक श्वेत छत्र लाओ ॥ ११ ॥ अनेकों दिव्य मालाएँ, दिव्य वस्त्र और दिव्य आभूषण लाकर रखे जाने चाहिये तथा अभिषेक-स्थानपर भली प्रकार सम्मान किये हुए अनेकों मुनिजन हाथमें कुशा लिये हुए उपस्थित रहें ॥ १२ ॥ अनेकों नर्तकियाँ, मुख्य-मुख्य वारांगनाएँ, गायक, वेणुवादक तथा कुशल बाजे बजानेवाले महाराज दशरथके आँगनमें गाना-बजाना करें ॥ १३ ॥ अभिषेक-स्थानके बाहर हाथी, घोड़े, रथ और पदाति यह चतुरंगिणी सेना अस्त्र-शस्त्र-से सुसज्जित होकर खड़ी रहे। नगरमें जितने देवालय हैं उन सबमें नाना प्रकारकी बलि-सामग्रीसे देवोंकी पूजा की जाय तथा राजालोग शीघ्र ही नाना प्रकारकी भेंटें लेकर आवें" ॥ १४-१५ ॥
राजमन्त्री सुमन्त्रको इस प्रकार आज्ञा दे श्रीमान् वसिष्ठजी स्वयं श्रीरघुनाथजीके परम सुन्दर महलमें गये ॥ १६ ॥ मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने रथपर चढ़कर रघुनाथजीके महलकी तीन पौरियाँ पार कीं और फिर पृथिवीपर उतर पड़े ॥ १७ ॥ तदनन्तर आचार्य होनेके कारण बिना रोक-टोकके वे भीतर चले गये। उस समय गुरुजीको आये देख रामचन्द्रजी तुरन्त हाथ जोड़कर खड़े हो गये और भक्तिपूर्वक दण्डवत्-प्रणाम किया। उसी समय सीताजी सुवर्णके पात्रमें जल ले आयीं ॥ १८-१९ ॥
| ४६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
|---|
| रत्नासने समावेश्य पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः । | तब रघुनाथजीने गुरुजीको रत्नसिंहासनपर बैठा- |
| तदपः शिरसा धृत्वा सीतया सह राघवः ॥२०॥ | कर उनके चरण धोये और सीताजीके सहित उस |
| धन्योऽस्मीत्यब्रवीद्रामस्तव पादाम्बुधारणात् । | चरणोदकको भक्तिपूर्वक अपने शिरपर रखकर कहा- |
| श्रीरामेणैवमुक्तस्तु प्रहसनमुनिरब्रवीत् ॥२१॥ | "हे मुने ! आपके चरणोदकको धारण कर आज मैं |
| त्वत्पादसलिलं धृत्वा धन्योऽभूद्गिरिजापतिः । | कृतकृत्य हो गया।" भगवान् रामके इस प्रकार कहने- |
| ब्रह्मापि मत्पिता ते हि पादतीर्थहताशुभः ॥२२॥ | पर मुनिवर वसिष्ठने हँसकर कहा ॥ २०-२१ ॥ "हे |
| इदानीं भाषसे यत्त्वं लोकानामुपदेशकूत् । | राम ! आपके पादोदकको मस्तकपर धारण कर पार्वती- |
| जानामि त्वां परात्मानं लक्ष्म्या संजातमीश्वरम् २३ | वल्लभ भगवान् शंकर धन्य-धन्य हो गये तथा मेरे |
| देवकार्यार्थसिद्धयर्थं भक्तानां भक्तिसिद्धये । | पिता ब्रह्माजी भी आपके पादतीर्थका सेवन करनेसे ही |
| रावणस्य वधार्थाय जातं जानामि राघव ॥२४॥ | निष्पाप हो गये हैं ॥ २२ ॥ इस समय केवल संसारको |
| तथापि देवकार्यार्थं गुह्यं नोद्घाटयाम्यहम् । | यह उपदेश करनेके लिये ही कि 'गुरुके साथ किस |
| यथा त्वं मायया सर्वं करोषि रघुनन्दन ॥२५॥ | प्रकार व्यवहार करना चाहिये' आप इस प्रकार |
| तथैवानुविधास्येऽहं शिष्यस्त्वं गुरुरप्यहम् । | सम्भाषण कर रहे हैं। मैं भली प्रकार जानता हूँ |
| गुरुर्गुरूणां त्वं देव पितॄणां त्वं पितामहः ॥२६॥ | आप लक्ष्मीके सहित प्रकट हुए साक्षात् परमात्मा विष्णु |
| अन्तर्यामी जगद्यात्रावाहकस्त्वमगोचरः । | हैं॥ २३ ॥ हे राघव ! मैं जानता हूँ आपने देवताओंका |
| शुद्धसत्त्वमयं देहं धृत्वा स्वाधीनसम्भवम् ॥२७॥ | कार्य सिद्ध करनेके लिये, भक्तोंको भक्ति प्रदान करनेके |
| मनुष्य इव लोकेऽस्मिन् भासि त्वं योगमायया । | लिये और रावणका वध करनेके लिये ही अवतार लिया |
| पौरोहित्यमहं जाने विगर्ह्यं दूष्यजीवनम् ॥२८॥ | है ॥ २४ ॥ तथापि देवताओंके कार्य-सिद्धिके लिये |
| इक्ष्वाकूणां कुले रामः परमात्मा जनिष्यते । | मैं इस गुप्त रहस्यको प्रकट नहीं करता। हे रघुनन्दन ! |
| इति ज्ञातं मया पूर्वं ब्रह्मणा कथितं पुरा ॥२९॥ | जिस प्रकार मायाके आश्रयसे आप सब कार्य करेंगे |
| ततोऽहमाशया राम तव सम्बन्धकाङ्क्षया । | उसी प्रकार मैं भी 'तुम शिष्य हो और मैं गुरु हूँ' इस |
| अकार्षं गर्हितमपि तवाचार्यत्वसिद्धये ॥३०॥ | सम्बन्धके अनुकूल व्यवहार करूँगा । किन्तु हे देव ! |
| ततो मनोरथो मेऽद्य फलितो रघुनन्दन । | वास्तवमें तो आप ही गुरुओंके गुरु और पितृगणोंके |
| त्वदधीना महामाया सर्वलोकैकमोहिनी ॥३१॥ | भी पितामह हैं ॥ २५-२६ ॥ आप अन्तर्यामी, |
| मां यथा मोहयेन्नैव तथा कुरु रघूद्वह । | जगद्व्यवहारके प्रवर्त्तक और मन-वाणीके अविषय हैं; |
| गुरुनिष्कृतिकामस्त्वं यदि देह्येतदेव मे ॥३२॥ | और स्वेच्छासे यह शुद्ध सत्त्वमय शरीर धारण कर इस |
| | लोकमें अपनी योगमायासे मनुष्यके समान प्रतीत होते |
| | हैं। मैं यह जानता हूँ कि पुरोहिताई अति निन्दनीय |
| | और दूषित जीविका है ॥ २७-२८ ॥ तो भी जब |
| | पूर्वकालमें ब्रह्माजीके कहनेसे मुझे यह मालूम हुआ कि |
| | इक्ष्वाकुवंशमें परमात्मा राम अवतार लेंगे ॥ २९ ॥ तब |
| | हे राम ! आपसे सम्बन्ध जोड़नेकी इच्छासे आपका |
| | आचार्य बननेके लिये इस निन्दनीय पदको भी मैंने |
| | स्वीकार कर लिया ॥ ३० ॥ हे रघुनन्दन ! आज मेरी |
| | इच्छा पूर्ण हो गयी । अब यदि आप गुरुऋणसे |
| | उऋण होना चाहते हैं तो मुझे यही दीजिये कि |
| | आपके अधीन रहनेवाली आपकी सर्वलोकविमोहिनी |
| | महामाया मुझे मोहित न करे ॥ ३१-३२ ॥ हे |
सर्ग २ ]
अयोध्याकाण्ड
४७
| प्रसङ्गात्सर्वमप्युक्तं न वाच्यं कुत्रचिन्मया ।<br>राज्ञा दशरथेनाहं प्रेषितोऽस्मि रघूद्वह ॥३३॥<br>त्वामामन्त्रयितुं राज्ये श्वोऽभिषेक्ष्यति राघव।<br>अद्य त्वं सीतया सार्धमुपवासं यथाविधि ॥३४॥<br>कृत्वा शुचिर्भूमिरायी भव राम जितेन्द्रियः ।<br>गच्छामि राजसान्निध्यं त्वं तु प्रातर्गमिष्यसि ॥३५॥ | रघुश्रेष्ठ ! इस समय प्रसंगवश मैने ये सब बातें आपसे कह दी हैं, मैं ऐसा और कहीं भी न कहूँगा । हे राघव ! महाराज दशरथने इस बातकी सूचना देनेके लिये कि कल वे आपको राजपद्पर अभिषिक्त करेंगे—मुझे आपके पास भेजा है । आज आप सीताके सहित विधिपूर्वक उपवास और शुद्धता तथा इन्द्रियजयपूर्वक पृथिवीपर शयन करें । अब मैं राजाके पास जाता हूँ, आप कल प्रातःकाल वहाँ पधारें"॥ ३३–३५॥ |
| इत्युक्त्वा रथमारुह्य ययौ राजगुरुर्द्रुतम् ।<br>रामोऽपि लक्ष्मणं दृष्ट्वा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥३६॥<br>सौमित्रे यौवराज्ये मे श्वोऽभिषेको भविष्यति ।<br>निमित्तमात्रमेवाहं कर्ता भोक्ता त्वमेव हि ॥३७॥<br>मम त्वं हि बहिःप्राणो नात्र कार्या विचारणा ।<br>ततो वसिष्ठेन यथा भाषितं तत्तथाकरोत् ॥३८॥ | ऐसा कह राजपुरोहित वसिष्ठजी रथपर चढ़कर तुरन्त ही चले गये । तब रामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीकी ओर देखकर हँसते हुए कहा—॥ ३६॥ "हे सुमित्रानन्दन ! कल मेरा युवराज-पदपर अभिषेक होगा, सो मैं तो केवल निमित्तमात्र ही होऊँगा, उसके कर्त्ता-भोक्ता तो तुम्हीं होगे ॥ ३७॥ क्योंकि मेरे बाह्यप्राण तो तुम्हीं हो—इसमें कोई विशेष सोच-विचारकी आवश्यकता नहीं है।" तदनन्तर वसिष्ठजी जैसा कह गये थे रघुनाथजीने वैसा ही किया ॥३८॥ |
| वसिष्ठोऽपि नृपं गत्वा कृतं सर्वं न्यवेदयत् ।<br>वसिष्ठस्य पुरो राज्ञा ह्युक्तं रामाभिषेचनम् ॥३९॥<br>यदा तदैव नगरे श्रुत्वा कश्चित्पुमान् जगौ ।<br>कौसल्यायै राममात्रे सुमित्रायै तथैव च ॥४०॥ | इधर वसिष्ठजीने भी राजा दशरथके पास आकर जो कुछ किया था सो सब सुना दिया । जिस समय महाराज दशरथ वसिष्ठजीसे रामचन्द्रजीके अभिषेकके विषयमें कह रहे थे उसी समय किसी पुरुषने यह समाचार सुनकर सम्पूर्ण नगरमें सुना दिया और राममाता कौसल्या तथा सुमित्राको भी यह सूचना दे दी ॥ ३९–४० ॥ |
| श्रुत्वा ते हर्षसम्पूर्णे ददतुर्हारमुत्तमम् ।<br>तस्मै ततः प्रीतमनाः कौसल्या पुत्रवत्सला ॥४१॥<br>लक्ष्मीं पर्यचरद्देवीं रामस्यार्थप्रसिद्धये ।<br>सत्यवादी दशरथः करोत्येव प्रतिश्रुतम् ॥४२॥<br>कैकेयीवशगः किन्तु कामुकः किं करिष्यति ।<br>इति व्याकुलचित्ता सा दुर्गां देवीमपूजयत् ॥४३॥ | उन दोनोंने सुनते ही अति हर्ष-पूर्ण हो उसे एक अत्युत्तम हार दिया । तदुपरान्त पुत्रवत्सला कौसल्याने रामचन्द्रजीकी इष्ट-सिद्धिके लिये लक्ष्मीदेवीका पूजन किया 'राजा दशरथ सत्य-वादी हैं और उनके विषयमें यह प्रसिद्ध है कि वे अपनी प्रतिज्ञाका पालन करते हैं ॥ ४१--४२ ॥ किन्तु वे कामी और कैकेयीके वशीभूत हैं; ऐसी अवस्था में क्या वे इस प्रतिज्ञाको पूर्ण कर सकेंगे ?' इस प्रकारकी चिन्तासे व्याकुल होकर वह दुर्गादेवीका पूजन करने लगीं ॥ ४३ ॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे देवा देवीं वाणीमचोदयन् ।<br>गच्छ देवि भुवो लोकमयोध्यायां प्रयत्नतः ॥४४॥<br>रामाभिषेकविघ्नार्थं यतस्व ब्रह्मवाक्यतः । | इसी समय देवताओंने सरस्वतीदेवीसे आग्रह किया कि "हे देवि ! तुम युक्तिपूर्वक भूलोकमें अयोध्यापुरीमें जाओ ॥ ४४ ॥ और वहाँ ब्रह्माजीकी आज्ञासे रामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न उपस्थित |
| ४८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मन्थरां प्रविशस्त्वादौ कैकेयीं च ततः परम् ॥४५॥<br>ततो विघ्ने समुत्पन्ने पुनरेहि दिवं शुभे ।<br>तथेत्युक्त्वा तथा चक्रे प्रविवेशाथ मन्थराम् ॥४६॥ | करो। प्रथम तो तुम मन्थरामें प्रवेश करना और फिर कैकेयीमें ॥ ४५ ॥ हे शुभे ! इस प्रकार विघ्न उपस्थित हो जानेपर तुम फिर स्वर्गलोकको लौट आना ।' इसपर सरस्वतीने 'बहुत अच्छा' कहकर वैसा ही किया और प्रथम मन्थरामें प्रवेश किया ॥ ४६ ॥ |
| सापि कुब्जा त्रिवक्रा तु प्रासादाग्रमथारुहत् ।<br>नगरं परितो दृष्ट्वा सर्वतः समलङ्कृतम् ॥४७॥<br>नानातोरणसम्बाधं पताकाभिरलङ्कृतम् ।<br>सर्वोत्सवसमायुक्तं विस्मिता पुनरागमत् ॥४८॥ | तब तीन स्थानसे टेढ़ी वह कुबड़ी मन्थरा महलकी अट्टालिकापर चढ़ी और उसने देखा कि नगर सब ओरसे सजाया गया है ॥ ४७ ॥ उसमें नाना प्रकारकी बन्दनवारें बँधी हुई हैं, चित्र-विचित्र पताकाएं सुशोभित हो रही हैं और सब ओर उत्सव हो रहे हैं । यह देखकर वह अत्यन्त विस्मिता हो नीचे उतर आयी ॥ ४८ ॥ |
| धात्रीं पप्रच्छ मात: किं नगरं समलङ्कृतम् ।<br>नानोत्सवसमायुक्ता कौसल्या चातिहर्षिता ॥४९॥<br>ददाति विप्रमुख्येभ्यो वस्त्राणि विविधानि च ।<br>तामुवाच तदा धात्री रामचन्द्राभिषेचनम् ॥५०॥<br>श्वो भविष्यति तेनाद्य सर्वतोऽलङ्कृतं पुरम् ।<br>तच्छ्रुत्वा त्वरितं गत्वा कैकेयीं वाक्यमब्रवीत् ॥५१॥ | और धायसे पूछा--- "मैया ! आज नगर क्यों सजाया गया है और महारानी कौसल्या भी नाना प्रकारसे उत्सव मनाती हुई अत्यन्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको विविध वस्त्राभूषण क्यों दे रही हैं ?" तब धायने उससे कहा- "कल श्रीरामजीका राज्याभिषेक होगा, इसलिये आज सब ओरसे नगर सजाया गया है ।" यह सुनते ही उसने तुरन्त ही कैकेयीके पास जाकर कहा ॥ ४९-५१ ॥ |
| पर्यङ्कस्थां विशालाक्षीमेकान्ते पर्यवस्थिताम् ।<br>किं शेषे दुर्भगे मूढे महद्भयमुपस्थितम् ॥५२॥<br>न जानीषेऽतिसौन्दर्यमानिनी मत्तगामिनी ॥५३॥<br>रामस्यानुग्रहाद्राज्ञः श्वोऽभिषेको भविष्यति । | विशालाक्षी कैकेयी उस समय एकान्तमें पलंगपर बैठी थी, उससे मन्थरा बोली--- "अयि अभागिनि मूढ़े ! कैसे सो रही हो, तुम्हारे लिये बड़ा भारी संकट उपस्थित हुआ है ॥ ५२ ॥ हे मत्तवाली चालवाली ! तुम्हें अपनी सुन्दरताका बड़ा घमण्ड है, इसलिये तुम्हें किसी बातका पता ही नहीं रहता ॥ ५३ ॥ देखो, महाराजकी कृपासे कल रामका राज्याभिषेक होनेवाला है ।" |
| तच्छ्रुत्वा सहसोत्थाय कैकेयी प्रियवादिनी ॥५४॥<br>तस्यै दिव्यं ददौ स्वर्णनूपुरं रत्नभूषितम् ।<br>हर्षस्थाने किमिति मे कथ्यते भयमागतम् ॥५५॥<br>भरतादधिको रामः प्रियकृन्मे प्रियंवदः ।<br>कौसल्यां मां समं पश्यन् सदा शुश्रूषते हि माम् ५६<br>रामाद्भयं किमापन्नं तव मूढे वदस्व मे । | यह सुनकर प्रियवादिनी कैकेयी सहसा उठ खड़ी हुई ॥ ५४ ॥ और उसे अति दिव्य रत्नजटित सुवर्णनूपुर देकर कहा, "अरी ! यह तो बड़े आनन्दकी बात है, इसमें तू संकट उपस्थित हुआ कैसे बतलाती है ? ॥ ५५ ॥ राम तो भरतकी अपेक्षा मेरा अधिक प्रिय करनेवाला और मधुरभाषी है, वह तो कौसल्या तथा मुझे समान भावसे देखता हुआ सदा ही मेरी सेवा किया करता है ॥ ५६ ॥ अरी मूर्खे ! तू यह तो बता कि तुझे रामसे क्या भय उपस्थित हुआ है ?" |
| तच्छ्रुत्वा विषसादाथ कुब्जाऽकारणवैरिणी ॥५७॥<br>शृणु मद्बचनं देवि यथार्थं ते महद्भयम् । | यह सुनकर बिना कारण वैर करनेवाली मन्थरा विषाद करने लगी ॥ ५७ ॥ और बोली, "देवि ! |
सर्ग २ ]
अयोध्याकाण्ड
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| त्वां तोषयन् सदा राजा प्रियवाक्यान भापते ॥५८॥<br>कामुकोऽतथ्यवादी च त्वां वाचा परितोषयन् ।<br>कार्यं करोति तस्या वै राममातुः सुपुष्कलम् ॥५९॥<br>मनस्येतन्निधायैव प्रेषयामास ते सुतम् ।<br>भरतं मातुलकुले प्रेषयामास सानुजम् ॥६०॥<br>सुमित्रायाः समीचीनं भविष्यति न संशयः ।<br>लक्ष्मणो राममन्वेति राज्यं सोऽनुभविष्यति ॥६१॥<br>भरतो राघवस्याग्रे किङ्करो वा भविष्यति ।<br>विवास्यते वा नगरात्प्राणैर्वा हाप्यतेऽचिरात् ॥६२॥<br>त्वं तु दासीव कौसल्यां नित्यं परिचरिष्यसि ।<br>ततोऽपि मरणं श्रेयो यत्सपल्याः पराभवः ॥६३॥<br>अतः शीघ्रं यतस्वाद्य भरतस्याभिषेचने ।<br>रामस्य वनवासार्थं वर्षाणि नव पञ्च च ॥६४॥<br>ततो रूढोऽभये पुत्रस्तव राज्ञि भविष्यति ।<br>उपायं ते प्रवक्ष्यामि पूर्वमेव सुनिश्चितम् ॥६५॥<br>पुरा देवासुरे युद्धे राजा दशरथः स्वयम् ।<br>इन्द्रेण याचितो धन्वी सहाय्यार्थं महारथः ॥६६॥<br>जगाम सेनया सार्धं त्वया सह शुभानने ।<br>युद्धं प्रकुर्वतस्तस्य राक्षसैः सह धन्विनः ॥६७॥<br>तदाक्षकीलो न्यपतच्छिन्नस्तस्य न वेद सः ।<br>त्वं तु हस्तं समावेश्य कीलरन्ध्रेऽतिधैर्यतः ॥६८॥<br>स्थितवत्यसितापाङ्गि पतिप्राणपरीप्सया ।<br>ततो हत्वाऽसुरान्सर्वान् ददर्श त्वामरिन्दमः ॥६९॥<br>आश्चर्यं परमं लेभे त्वामालिङ्ग्य मुदान्वितः ।<br>वृणीष्व यत्ते मनसि वाञ्छितं वरदोस्म्यहम् ॥७०॥<br>वरद्वयं वृणीष्व त्वमेवं राजाऽवदत्स्वयम् ।<br>त्वयोक्तो वरदो राजन्यदि दत्तं वरद्वयम् ॥७१॥ | मेरी बात सुनो, वास्तवमें तुम्हारे लिये बड़ा संकट उपस्थित हुआ है । राजा तुम्हें सन्तुष्ट करनेके लिये ही सदा चिकनी-चुपड़ी बातें बना दिया करते हैं ॥ ५८ ॥ वे बड़े कामी और मिथ्यावादी हैं; तुम्हें इस प्रकार केवल बातोंसे ही बहलाकर रामकी माताका ही पूरा-पूरा कार्य किया करते हैं ॥ ५९ ॥ अपने मनमें यही ठानकर उन्होंने छोटे भाई शत्रुघ्नके सहित तुम्हारे पुत्र भरतको ननिहाल भेज दिया है ॥ ६० ॥ इसमें सुमित्राके लिये तो निस्सन्देह सब कुछ ठीक ही होगा, क्योंकि लक्ष्मण रामके अनुगामी हैं इसलिये वे तो राज्य ही भोगेंगे ॥ ६१ ॥ किन्तु भरतको या तो रामका दास होकर रहना पड़ेगा या उन्हें शीघ्र ही नगरसे निकाल दिया जायगा अथवा उनका प्राणाघात किया जायगा ॥ ६२ ॥ और तुम्हें दासीके समान सदा कौसल्याकी सेवा करनी पड़ेगी । इस प्रकार सौतसे अपमानित होकर रहनेकी अपेक्षा तो मरना ही अच्छा है ॥ ६३ ॥ इसलिये अब तुम शीघ्र ही भरतके राज्याभिषेक और रामके चौदह वर्षतक वनवासके लिये प्रयत्न करो ॥ ६४ ॥ हे रानी ! ऐसा होनेपर तुम्हारे पुत्र भरत निर्भय और निष्कण्टक हो जायेंगे। इसके लिये मैंने जो पहलेसे ही सोच रक्खा है वह उपाय तुम्हें बताती हूँ ॥ ६५ ॥ पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके समय स्वयं इन्द्रने धनुर्धर महारथी राजा दशरथसे सहायताके लिये प्रार्थना की थी ॥ ६६ ॥ हे सुमुखि ! उस समय सेनाके सहित वे तुम्हें साथ लेकर वहाँ गये थे। जिस समय धनुर्धर महाराज दशरथ राक्षसोंसे युद्ध करनेमें निमग्न थे उस समय उनके बिना जाने रथकी धुरीकी कील निकलकर गिर गयी, तब अत्यन्त धैर्यपूर्वक तुमने अपना हाथ उस कीलके छिद्रमें लगा दिया ॥ ६७-६८ ॥ और हे कृष्णाक्षि ! पतिकी प्राणरक्षाके लिये तुम बहुत देरतक इसी स्थितिमें रही। तदनन्तर समस्त दैत्योंको मार चुकनेपर शत्रुदमन महाराज दशरथने तुम्हें देखा ॥ ६९ ॥ तुम्हें ऐसी स्थितिमें देखकर उन्हें अति आश्चर्य हुआ और अति प्रसन्नतासे तुम्हें गले लगाकर वे बोले- "मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ, तुम्हें जो इच्छा हो सो माँग लो ॥ ७० ॥ इस समय तुम. दो वर माँग सकती हो ।" राजाके इस प्रकार कहनेपर तुमने कहा- "राजन् ! यदि आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे दो |
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| ५० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्वय्येव तिष्ठतु चिरं न्यासभूतं ममानघ ।<br>यदा मेऽवसरो भूयात्तदा देहि वरद्वयम् ॥७२॥<br>तथेत्युक्त्वा स्वयं राजा मन्दिरं व्रज सुव्रते ।<br>त्वत्तः श्रुतं मया पूर्वमिदानीं स्मृतिमागतम् ॥७३॥ | वर देना चाहते हैं ॥ ७१ ॥ तो हे अनघ ! मेरी यह धरोहर बहुत समयतक आप ही रखिये, जिस समय इनका अवसर आवे उस समय आप ये दोनों वर मुझे दे दीजियेगा' ॥ ७२ ॥ तब राजाने 'बहुत अच्छा' कहकर तुमसे कहा 'हे सुव्रते ! अब घर चलो।' महारानीजी ! यह सम्पूर्ण वृत्तान्त पहले तुम्हींसे मैंने सुना था, इस समय मुझे यह स्मरण हो आया है ॥ ७३ ॥ |
| अतः शीघ्रं प्रविश्याद्य क्रोधागारं रुषान्विता ।<br>विमुच्य सर्वाभरणं सर्वतो विनिकीर्य च ।<br>भूमावेव शयाना त्वं तूष्णीमतिष्ठ भामिनि ॥७४॥<br>यावत्सत्यं प्रतिज्ञाय राजाऽभीष्टं करोति ते ।<br>श्रुत्वा त्रिवक्रयोक्तं तत्तदा केकयनन्दिनी ॥७५॥<br>तथ्यमेवाखिलं मेने दुःसङ्गाहितविभ्रमा ।<br>तामाह कैकेयी दुष्टा कुतस्ते बुद्धिरीदृशी ॥७६॥ | अतः हे भामिनि ! अब तुम शीघ्र ही रोषपूर्वक कोपभवनमें जाओ और अपने समस्त आभूषण उतारकर इधर-उधर बिखेर दो तथा जबतक सत्य प्रतिज्ञापूर्वक राजा तुम्हारा अभीष्ट कार्य करनेको तत्पर न हों तबतक चुपचाप पृथिवीपर पड़ी रहो ।”<br>त्रिवक्रा मन्थराकी ये बातें सुनकर दुःसंगवश बुद्धि भ्रष्ट हो जानेके कारण दुष्टा कैकेयीने उस समय उसका कथन सर्वथा ठीक मान लिया और उससे कहा—"तुझमें ऐसी बुद्धि कहाँसे आ गयी ? ॥७४—७६॥ |
| एवं त्वां बुद्धिसम्पन्नां न जाने वक्रसुन्दरि ।<br>भरतो यदि राजा मे भविष्यति सुतः प्रियः ॥७७॥<br>ग्रामानू शतं प्रदास्यामि मम त्वं प्राणवल्लभा ।<br>इत्युक्त्वा कोपभवनं प्रविश्य सहसा रुषा ॥७८॥<br>विमुच्य सर्वाभरणं परिकीर्य समन्ततः ।<br>भूमौ शयाना मलिना मलिनाम्बरधारिणी ॥७९॥<br>प्रोवाच शृणु मे कुब्जे यावद्रामो वनं व्रजेत् ।<br>प्राणांस्त्यक्ष्येऽथ वा वक्रे शयिष्ये तावदेव हि ॥८०॥ | अरी बाँकी सुन्दरी ! मैं तुझे इतनी बुद्धिमती नहीं जानती थी ! यदि मेरा प्रिय पुत्र भरत राजा हो गया तो मैं तुझे सौ गाँव दूँगी; तू तो मुझे प्राणोंके समान प्यारी है ।” ऐसा कहकर कैकेयीने रोषपूर्वक कोपभवनमें प्रवेश किया ॥ ७७-७८ ॥ और अपने सब वस्त्राभूषण उतारकर इधर-उधर बिखेर दिये तथा मैले-कुचैले वस्त्र पहनकर अति मलिन दशामें पृथिवीमें पड़कर बोली, “अरी कुब्जे ! सुन, जबतक राम वनको न जायेंगे, प्राण भले ही छूट जायें, मैं इसी प्रकार पड़ी रहूँगी ” ॥ ७९-८० ॥ |
| निश्चयं कुरु कल्याणि कल्याणं ते भविष्यति ।<br>इत्युक्त्वा प्रययौ कुब्जा गृहं साऽपि तथाऽकरोत् ॥ | तब कुब्जा यह समझाकर कि 'हे कल्याणि ! तुम निःसन्देह ऐसा ही करना, इससे अवश्य तुम्हारा कल्याण होगा'—अपने घर चली गयी और कैकेयीने भी वैसा ही किया ॥ ८१ ॥ |
| धीरोऽत्यन्तदयान्वितोऽपि सुगुणा-<br> चारान्वितो वाऽथवा<br>नीतिज्ञो विधिवाददेशिकपरो<br> विद्याविवेकोऽथवा । | सच है, कोई पुरुष अत्यन्त धैर्यवान्, दयालु, सद्गुणी, सदाचारी, नीतिज्ञ, कर्त्तव्यनिष्ठ और गुरुका भक्त, अथवा विद्या-विवेक-सम्पन्न भी क्यों न हो यदि निरन्तर अत्यन्त पाप-बुद्धि दुष्ट पुरुषोंका संग करेगा तो अवश्य ही क्रमशः उन्हींकी |