अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
अरण्यकाण्ड - सर्ग ५: शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध
१२० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५]
[चतुर्थ सर्ग (समाप्ति)]
संस्कृत:
मद्भक्ताय प्रदातव्यमाहूयापि प्रयत्नतः ॥५३॥
य इदं तु पठेन्नित्यं श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
अज्ञानपटलध्वान्तं विधूयपरिमूच्यते ॥५४॥
भक्तानां मम योगिनां सुविमल-
स्वान्तातिशान्तात्मनां
मत्सेवाभिरतात्मनां च विमल-
ज्ञानात्मनां सर्वदा ।
सङ्गं यः कुरुते सदोद्यतमति-
स्तत्सेवनानन्यधी-
र्मोक्षस्तस्य करे स्थितोऽहमर्निशं
दृश्यो भवे नान्यथा ॥५५॥
हिन्दी अनुवाद:
इसे सावधानीपूर्वक न कहना चाहिये और मेरे भक्तोंको (इस प्रकारका मौका न लगे तो) प्रयत्नपूर्वक बुलाकर भी यह रहस्य सुनाना चाहिये ॥ ५३ ॥
जो पुरुष इसे श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदैव पढ़ेगा वह अज्ञानान्धकार-रूप परदेको हटाकर मुक्त हो जायगा ॥ ५४ ॥
जो पुरुष मेरी सेवामें अनुरक्त-चित्त, निर्मल-हृदय, शान्तात्मा, विमलज्ञानसम्पन्न और मेरे परम भक्त योगिजनोंका संग अनन्य बुद्धिसे सर्वदा उनकी सेवामें तत्पर रहकर करता है, मुक्ति उसके सदैव करतलगत रहती है और मैं सर्वदा उसकी दृष्टिके सम्मुख विराजमान रहता हूँ । इसके अतिरिक्त और किसी उपायसे मेरा दर्शन नहीं हो सकता ॥ ५५ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चम सर्ग
शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध और शूर्पणखाका रावणके पास जाना ।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— |
|---|---|
| तस्मिन् काले महारण्ये राक्षसी कामरूपिणी ।<br>विचचार महासत्त्वा जनस्थाननिवासिनी ॥१॥ | हे पार्वति ! उस समय उस घोर वनमें जनस्थानकी रहनेवाली एक महाबलवती इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी वृमा करती थी ॥ १ ॥ |
| एकदा गौतमीतीरे पञ्चवट्याः समीपतः ।<br>पद्मवज्राङ्कुशाङ्कानि पदानि जगतीपतेः ॥२॥<br>दृष्ट्वा कामपरीतात्मा पादसौन्दर्यमोहिता ।<br>पश्यन्ती सा शनैरायाद्राघवस्य निवेशनम् ॥३॥ | एक दिन पञ्चवटीके पास गौतमी नदीके तीरपर जगत्पति श्रीरामचन्द्रजीके पद्म, वज्र और अंकुश आदिके चिह्नोंसे युक्त चरण-चिह्नोंको देखकर वह उनके सौन्दर्यसे मोहित होकर कामासक्त हुई उन्हें देखती-देखती धीरे-धीरे रघुनाथजीके आश्रममें चली आयी ॥ २-३ ॥ |
| तत्र सा तं रमानाथं सीतया सह संस्थितम् ।<br>कन्दर्पसदृशं रामं दृष्ट्वा कामविमोहिता ॥४॥<br>राक्षसी राघवं प्राह कस्य त्वं कः किमाश्रमे ।<br>युक्तो जटावल्कलाद्यैः साध्यं किं तेऽत्र मे वद ॥५॥ | वहाँ आकर कामदेवके समान अति सुन्दर लक्ष्मीपति श्रीरामचन्द्रजीको सीताजीके साथ बैठे देखकर वह कामातुरा राक्षसी रघुनाथजीसे बोली— "तुम किसके पुत्र हो ? तुम्हारा क्या नाम है ? इस आश्रममें जटा-वल्कलादि धारण कर क्यों रहते हो ? यहाँ रहकर तुम क्या प्राप्त करना चाहते हो ? सो मुझे बताओ ॥ ४-५ ॥ मैं राक्षसराज महात्मा रावणकी... |
| सर्ग ५] | अरण्यकाण्ड | १२१ |
|---|
| अहं शूर्पणखा नाम राक्षसी कामरूपिणी ।<br>भगिनी राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य महात्मनः ॥ ६ ॥<br>खरेण सहिता भ्रात्रा वसाम्यत्रैव कानने ।<br>राज्ञा दत्तं च मे सर्वं मुनिभक्षा वसाम्यहम् ॥ ७ ॥<br>त्वां तु वेदितुमिच्छामि वद मे वदतां वर ।<br>तामाह रामनामाहमयोध्याधिपतेः सुतः ॥ ८ ॥<br>एषा मे सुन्दरी भार्या सीता जनकनन्दिनी ।<br>स तु भ्राता कनीयान्मे लक्ष्मणोऽतीव सुन्दरः ॥ ९ ॥<br>किं कृत्यं ते मया ब्रूहि कार्यं भुवनसुन्दरि ।<br>इति रामवचः श्रुत्वा कामार्ता साऽब्रवीदिदम् ॥ १० ॥<br>एहि राम मया सार्धं रमस्व गिरिकानने ।<br>कामार्ताऽहं न शक्नोमि त्यक्तुं त्वां कमलेक्षणम् ॥ ११ ॥ | वहिन कामरूपिणी राक्षसी शूर्पणखा हूँ ॥ ६ ॥ मैं अपने भाई खरके साथ इसी वनमें रहती हूँ । राजाने मुझे इस सम्पूर्ण वनका अधिकार सौंप दिया है, अतः मैं मुनियोंको खाती हुई यहाँ रहती हूँ ॥ ७ ॥ हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती हूँ, अतः तुम मुझे अपना नाम-धाम आदि बताओ । तब भगवान्ने उससे कहा— "मैं अयोध्यापति राजा दशरथका राम नामक पुत्र हूँ ॥ ८ ॥ यह सुन्दरी मेरी भार्या जनकनन्दिनी सीता है तथा वह अति सुन्दर कुमार मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है ॥ ९ ॥ हे त्रिभुवनसुन्दरि ! बताओ, मैं तुम्हारा क्या कार्य करूँ ?" रामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर कामातुरा शूर्पणखा बोली—॥ १० ॥ "राम ! चलो (किसी) गिरि-गुहामें चलकर मेरे साथ रमण करो। इस समय मैं कामातुरा हूँ, अतः आप कमलनयनको छोड़ नहीं सकती" ॥ ११ ॥ |
| रामः सीतां कटाक्षेण पश्यन् सस्मितमब्रवीत् ।<br>भार्या ममैषा कल्याणी विद्यते ह्यनपायिनी ॥ १२ ॥<br>त्वं तु सापत्न्यदुःखेन कथं स्थास्यसि सुन्दरि ।<br>बहिरास्ते मम भ्राता लक्ष्मणोऽतीव सुन्दरः ॥ १३ ॥<br>तवानुरूपो भविता पतिस्तेनैव सञ्चर ।<br>इत्युक्ता लक्ष्मणं प्राह पतिर्मे भव सुन्दर ॥ १४ ॥<br>भ्रातुराज्ञां पुरस्कृत्य सङ्गच्छाद्योऽद्य माचिरम् । | तब रामचन्द्रजीने नेत्रोंसे सीताजीकी ओर संकेत करके मुसकाकर कहा— "हे सुन्दरि ! मेरी तो यह मंगलमयी भार्या जीवित है ॥ १२ ॥ इसके रहते हुए तुम जन्मभर सौतकी डाहसे जलती हुई किस प्रकार सुखपूर्वक रह सकोगी ? बाहर मेरा अत्यन्त सुन्दर छोटा भाई लक्ष्मण विराजमान है ॥ १३ ॥ वह तुम्हारा योग्य पति होगा, तुम उसीके साथ (वन-पर्वतादिमें) विहार करो।" रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर शूर्पणखाने लक्ष्मणजीसे जाकर कहा— "हे सुन्दर ! तुम मेरे पति हो जाओ ॥ १४ ॥ तथा अपने भाईकी आज्ञा मानकर चलो, आज हम और तुम परस्पर संगमन करें, देरी न करो।" |
| इत्याह राक्षसी घोरा लक्ष्मणं काममोहिता ॥ १५ ॥<br>तामाह लक्ष्मणः साध्वि दासोऽहं तस्य धीमतः ।<br>दासी भविष्यसि त्वं तु ततो दुःखतरं नु किम् ॥ १६ ॥<br>तमेव गच्छ भद्रं ते स तु राजाऽखिलेश्वरः ।<br>तच्छ्रुत्वा पुनरप्यागाद्राघवं दुष्टमानसा ॥ १७ ॥ | उस काममोहिता राक्षसीने जब लक्ष्मणजीसे इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥ तो वे उससे बोले, "साध्वि ! मैं तो उन बुद्धिमान् भगवान् रामका दास हूँ । मुझे अपना पति बनानेसे तुम्हें भी उनकी दासी बनना पड़ेगा । तुम्हारे लिये इससे अधिक दुःखकी और क्या बात होगी ? ॥ १६ ॥ तुम्हारा कल्याण हो, तुम उन्हींके पास जाओ, वे महाराज सबके स्वामी हैं।" यह सुनकर वह दुष्टचित्ता राक्षसी फिर रघुनाथजीके पास आयी ॥ १७ ॥ और क्रोधपूर्वक |
१६
| १२२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
|---|
| क्रोधाद्राम किमर्थं मां भ्रामयस्यानवस्थितः ।<br>इदानीमेव तां सीतां भक्षयामि तवाग्रतः ॥१८॥ | बोली—"हे राम ! तुम बड़े चञ्चलचित्त हो, मुझे क्यों इधर-उधर घुमा रहे हो ? मैं अभी तुम्हारे सामने ही इस सीताको खाये जाती हूँ" ॥१८॥ |
| इत्युक्त्वा विकटाकारा जानकीमनुधावति ।<br>ततो रामाज्ञया खड्गमादाय परिगृह्य ताम् ॥१९॥<br>चिच्छेद नासां कर्णौ च लक्ष्मणो लघुविक्रमः ।<br>ततो घोरध्वनिं कृत्वा रुधिराक्तवपुर्द्रुतम् ॥२०॥<br>क्रन्दमाना पपाताग्रे खरस्य परुषाक्षरा ।<br>किमेतदिति तामाह खरः खरतराक्षरः ॥२१॥<br>केनैवं कारितासि त्वं मृत्योर्वक्त्रानुवर्तिना ।<br>वद मे तं वधिष्यामि कालकल्पमपि क्षणात् ॥२२॥ | ऐसा कह वह विकट रूप धारण कर जानकीजीकी ओर दौड़ी। तब लक्ष्मणजीने रामचन्द्रजीकी आज्ञासे उसे पकड़कर बड़ी फुर्तीसे खड्ग लेकर उसके नाक-कान काट डाले। तदनन्तर वह घोर शब्द करती हुई रुधिरमें लथपथ हो बड़ी शीघ्रतासे जाकर गिरी और कठोर शब्द करती खरके सामने गिर पड़ी। उसे देखकर तीक्ष्ण ध्वनिवाले खरने कहा—"यह क्या बात है ॥१९-२१॥ अरी, मृत्युके मुखमें जानेवाले किस दुष्टने तेरी यह दशा की है ? तू बतला तो सही, वह कालके समान भी बली क्यों न हो, मैं उसे क्षणभरमें ही मार डालूँगा" ॥२२॥ |
| तमाह राक्षसी रामः सीतालक्ष्मणसंयुतः ।<br>दण्डकं निर्भयं कुर्वन्नास्ते गोदावरीतटे ॥२३॥<br>मामेवं कृतवांस्तस्य भ्राता तेनैव चोदितः ।<br>यदि त्वं कुलजातोऽसि वीरोऽसि जहि तौ रिपू ॥२४॥<br>तयोस्तु रुधिरं पास्ये भक्षयैतौ सुदुर्मदौ ।<br>नो चेत्प्राणान्परित्यज्य यास्यामि यमसादनम् ॥२५॥ | तब राक्षसी शूर्पणखाने उससे कहा—"यहाँ सीता और लक्ष्मणके सहित राम दण्डकारण्यको निर्भय करता हुआ गोदावरीके तटपर रहता है ॥२३॥ उसीकी प्रेरणासे उसके भाई लक्ष्मणने मेरी यह गति की है। यदि तुम बड़े कुलीन और वीर हो तो उन दोनों शत्रुओंको मार डालो ॥२४॥ तुम उन दोनों मदोन्मत्तोंको खा जाओ और मैं उन दोनोंका रुधिर पीऊँगी। नहीं तो अपने प्राणोंको छोड़कर यमलोकको चली जाऊँगी" ॥२५॥ |
| तच्छ्रुत्वा त्वरितं प्रागात्खरः क्रोधेन मूर्च्छितः ।<br>चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् ॥२६॥<br>चोदयामास रामस्य समीपं वधकाङ्क्षया ।<br>खरश्च त्रिशिराश्चैव दूषणश्चैव राक्षसः ॥२७॥<br>सर्वे रामं ययुः शीघ्रं नानाप्रहरणोद्यताः ।<br>श्रुत्वा कोलाहलं तेषां रामः सौमित्रिमब्रवीत् ॥२८॥ | शूर्पणखाका यह कथन सुनकर खर क्रोधसे अधीर हो तुरन्त (युद्धके लिये) चला और रामको मारनेके लिये उसने बड़े पराक्रमी चौदह सहस्र राक्षस उनके पास भेजे। राक्षसराज खर, दूषण और त्रिशिरा—ये सभी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर रामके पास आये। उनका कोलाहल सुन श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—॥२६-२८॥ |
| श्रूयते विपुलः शब्दो नूनमायान्ति राक्षसाः ।<br>भविष्यति महद्युद्धं नूनमद्य मया सह ॥२९॥<br>सीतां नीत्वा गुहां गत्वा तत्र तिष्ठ महाबल ।<br>हन्तुमिच्छाम्यहं सर्वान् राक्षसान् घोररूपिणः ॥३०॥ | "लक्ष्मण ! देखो, बड़ा कोलाहल सुनायी पड़ रहा है, मालूम होता है निश्चय ही राक्षसगण आ रहे हैं; अवश्य ही आज मेरे साथ उनका घोर युद्ध होगा ॥२९॥ अतः हे महाबल ! तुम सीताको लेकर किसी पर्वतकी कन्दरामें चले जाओ। आज मैं इन समस्त घोररूप राक्षसोंका वध करना चाहता हूँ ॥३०॥ |
सर्ग ५ ] । अरण्यकाण्ड । १२३
| अत्र किञ्चिन्न वक्तव्यं शापितोऽसि ममोपरि।<br>तथेति सीतामादाय लक्ष्मणो गह्वरं ययौ ॥३१॥ | तुम्हें मेरी सौगन्ध है, इस विषयमें तुम और कुछ न कहना।” तब लक्ष्मणजी 'जो आज्ञा' कह सीताजीको लेकर एक गिरिगुहामें चले गये ॥ ३१ ॥ |
| रामः परिकरं बद्ध्वा धनुरादाय निष्ठुरम् ।<br>तूणीरावक्षयशरौ बद्ध्वायत्तोऽभवत्प्रभुः ॥३२॥ | तब श्रीरामचन्द्रजीने अपनी कमर कसी और कठोर धनुष तथा दो अक्षय बाणवाले तरकश बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ ३२ ॥ |
| तत आगत्य रक्षांसि रामस्योपरि चिक्षिपुः ।<br>आयुधानि विचित्राणि पाषाणान्पादपानपि ॥३३॥ | तदनन्तर राक्षसगण वहाँ आकर रामके ऊपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र, पत्थर और वृक्षादिकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥ |
| तानि चिच्छेद रामोऽपि लीलया तिलशः क्षणात् ।<br>ततो बाणसहस्रेण हत्वा तान् सर्वराक्षसान् ॥३४॥<br>खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ।<br>जघान प्रहरार्धेन सर्वानैव रघूत्तमः ॥३५॥ | श्रीरामचन्द्रजीने एक क्षणमात्रमें लीलासे ही उन अस्त्र-शस्त्रादिको तिल-तिल करके काट डाला । फिर सहस्रों बाणोंसे उन सम्पूर्ण राक्षसोंको मारकर खर, दूषण और त्रिशिराको भी मार डाला । इस प्रकार रघुवंशियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने आधे पहरमें ही उन समस्त राक्षसोंका संहार कर दिया ॥ ३४-३५॥ |
| लक्ष्मणोऽपि गुहामध्यात्सीतामादाय राघवे ।<br>समर्प्य राक्षसान्दृष्ट्वा हतान्विस्मयमाययौ ॥३६॥ | तब श्रीलक्ष्मणजीने गुहामेंसे सीताजीको लाकर श्रीरघुनाथजीको सौंप दिया । उस समय सम्पूर्ण राक्षसोंको मरे हुए देख वे बड़े विस्मित हुए ॥ ३६ ॥ |
| सीता रामं समालिङ्ग्य प्रसन्नमुखपङ्कजा ।<br>शस्त्रव्रणानि चाङ्गेषु ममार्ज जनकात्मजा ॥३७॥ | जनकनन्दिनी श्रीसीताजीने प्रसन्नमुखसे श्रीरामचन्द्रजीका आलिंगन किया और उनके शरीरमें हुए घावोंपर हाथ फेरने लगीं ॥ ३७ ॥ |
| साऽपि दुद्राव दृष्ट्वा तान्हतान् राक्षसपुङ्गवान् ।<br>लङ्कां गत्वा सभामध्ये क्रोशन्ती पादसन्निधौ ॥३८॥<br>रावणस्य पपातोर्व्यां भगिनी तस्य रक्षसः ।<br>दृष्ट्वा तां रावणः प्राह भगिनीं भयविह्वलाम् ॥३९॥ | उन सम्पूर्ण श्रेष्ठ राक्षसोंको मरे देख राक्षसराज रावणकी बहिन शूर्पणखा दौड़ती हुई लंकामें पहुँची और राजसभामें पहुँचकर रोती हुई रावणके पैरोंके समीप पृथ्वीपर गिर पड़ी। अपनी बहिनको इस प्रकार भयभीत देखकर रावण बोला-॥३८-३९॥ “अरी |
| उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्से त्वं विरूपकरणं तव ।<br>कृतं शक्रेण वा भद्रे यमेन वरुणेन वा ॥४०॥<br>कुबेरेणाथवा ब्रूहि भस्मीकुर्यां क्षणेन तम् । | वत्से ! उठ, खड़ी हो । बता तो सही तुझे किसने विरूपा किया है ? हे भद्रे ! यह इन्द्रका काम है, अथवा यम, वरुण और कुबेरमेंसे किसीने किया है ? बता, एक क्षणमें ही मैं उसे भस्म कर डालूँगा।” |
| राक्षसी तमुवाचेदं त्वं प्रमत्तो विमूढधीः ॥४१॥<br>पानासक्तः स्त्रीविजितः षण्ढः सर्वत्र लक्ष्यसे ।<br>चारचक्षुर्विहीनस्त्वं कथं राजा भविष्यसि ॥४२॥ | तब राक्षसी शूर्पणखाने उससे कहा-"तुम बड़े ही उन्मत्त और मूढबुद्धि हो ॥ ४०-४१ ॥ तुम मद्यपानमें आसक्त, स्त्रीके वशीभूत और सब प्रकार नपुंसक-जैसे दिखायी पड़ते हो । तुम्हारे चर (खुफिया पुलिस) रूप नेत्र नहीं है; फिर तुम राजा |
| १२४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५ |
|---|
खरश्च निहतः सङ्ख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा ।<br>चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां महात्मनाम् ॥४३॥<br>निहतानि क्षणेनैव रामेणासुरशत्रुणा ।<br>जनस्थानमशेषेण मुनीनां निर्भयं कृतम् ।<br>न जानासि विमूढस्त्वमत एव मयोच्यते ॥४४॥ | कैसे रह सकोगे ? ॥४२॥ युद्धमें खर मारा गया तथा दूषण और त्रिशिरा आदि चौदह सहस्र मुख्य-मुख्य राक्षसोंको असुरशत्रु रामने एक क्षणमें ही मार डाला और सारे जनस्थानको मुनीश्वरोंके लिये सर्वथा निर्भय कर दिया । इतना उत्पात हो जानेपर भी तुम्हें अभीतक कुछ पता ही नहीं है इसीलिये मैं कहती हूँ कि 'तुम मूढ़ हो' ॥४३-४४॥
रावण उवाच | **रावण बोला—**अरी तू बता तो, वह राम कौन है ? उसने किसलिये और किस प्रकार इन राक्षसोंको मारा ? तू सब बात विस्तारपूर्वक कह, मैं उसका मूलोच्छेद कर डालूँगा ॥४५॥
को वा रामः किमर्थं वा कथं तेनासुरा हताः ।<br>सम्यक्कथय मे तेषां मूलघातं करोम्यहम् ॥४५॥ |
शूर्पणखोवाच | **शूर्पणखा बोली—**एक दिन जनस्थानसे मैं गौतमीके किनारे जा रही थी, वहाँ पूर्वकालमें मुनिजनोंसे सेवित एक पञ्चवटी नामक आश्रम है ॥४६॥ उस आश्रममें मैंने जटा-वल्कलादिसे सुशोभित धनुर्बाणधारी कमलनयन शोभाधाम रामको देखा ॥४७॥ उसका छोटा भाई लक्ष्मण भी उसीके समान रूपवान् है तथा उसकी विशाललोचना भार्या भी रूपमें साक्षात् दूसरी लक्ष्मी-जैसी ही है ॥४८॥ हे राजन् ! देव, गन्धर्व, नाग और मनुष्य आदिमेंसे किसीकी भी स्त्री ऐसी रूपवती न देखी है और न सुनी है । वह शुभलक्षणा अपनी कान्तिसे सम्पूर्ण वनको प्रकाशित कर रही थी ॥४९॥ हे अनघ ! उसे तुम्हारी पत्नी बनानेके लिये मैंने लानेका प्रयत्न किया था, इसीसे रामके भाई लक्ष्मणने मेरी नाक काट डाली ॥५०॥ फिर रामकी प्रेरणासे महाबली लक्ष्मणने मेरे कान भी काट लिये । तब मैं अत्यन्त दुःखसे रोती हुई खरके पास गयी ॥५१॥ उसने भी अपने राक्षस-सेनापतियोंके साथ तुरन्त जाकर रामसे युद्ध ठाना; किन्तु उस बलशाली रामने एक क्षणमें ही वे समस्त भीमविक्रम राक्षस नष्ट कर दिये । हे प्रभो ! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यदि रामके मनमें आ जाय तो वह निस्सन्देह आधे निमेषमें ही सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म कर सकता है । किन्तु यदि उसकी स्त्री सीता तुम्हारी भार्या हो जाय तो तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा ॥५२–५४॥
जनस्थानादहं याता कदाचिद्गौतमीतटे ।<br>तत्र पञ्चवटी नाम पुरा मुनिजनाश्रया ॥४६॥<br>तत्राश्रमे मया दृष्टो रामो राजीवलोचनः ।<br>धनुर्बाणधरः श्रीमान् जटावल्कलमण्डितः ॥४७॥<br>कनीयाननुजस्तस्य लक्ष्मणोऽपि तथाविधः ।<br>तस्य भार्या विशालाक्षी रूपिणी श्रीरिवापरा ॥४८॥<br>देवगन्धर्वनागानां मनुष्याणां तथाविधा ।<br>न दृष्टा न श्रुता राजन्द्योतयन्ती वनं शुभा ॥४९॥<br>आनेतुमहमद्युक्ता तां भार्यार्थं तदानघ ।<br>लक्ष्मणो नाम तद्भ्राता चिच्छेद मम नासिकाम्॥५०॥<br>कर्णौ च नोदितस्तेन रामेण स महाबलः ।<br>ततोऽहमतिदुःखेन रुदती खरमन्वगाम् ॥५१॥<br>सोऽपि रामं समासाद्य युद्धं राक्षसयूथपैः ।<br>ततः क्षणेन रामेण तेनैव बलशालिना ॥५२॥<br>सर्वे तेन विनष्टा वै राक्षसा भीमविक्रमाः ।<br>यदि रामो मनः कुर्यात्त्रैलोक्यं निमिषार्धतः ॥५३॥<br>भस्मीकुर्यान्न सन्देह इति भाति मम प्रभो ।<br>यदि सा तव भार्या स्यात्सफलं तव जीवितम् ॥५४॥ |
सर्ग ५ ]
अरण्यकाण्ड
१२५
| अतो यतस्व राजेन्द्र यथा ते वल्लभा भवेत् ।<br>सीता राजीवपत्राक्षी सर्वलोकैकसुन्दरी ॥५५॥<br>साक्षाद्रामस्य पुरतः स्थातुं त्वं न क्षमः प्रभो ।<br>मायया मोहयित्वा तु प्राप्स्यसे तां रघूत्तमम् ॥५६॥ | अतः हे राजेन्द्र ! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे सम्पूर्ण लोकोंमें एकमात्र सुन्दरी कमलनयनी सीता तुम्हारी प्राणप्रिया हो जाय ॥५५॥ हे प्रभो ! तुम रामके सामने साक्षात् न ठहर सकोगे, इसलिये उन रघुश्रेष्ठको किसी प्रकार मायाजालसे मोहित कर तुम उसे प्राप्त कर सकते हो ॥५६॥ |
| श्रुत्वा तत्सूक्तवाक्यैश्च दानमानादिभिस्तथा ।<br>आश्वास्य भगिनीं राजा प्रविवेश स्वकं गृहम् ।<br>तत्र चिन्तापरो भूत्वा निद्रां रात्रौ न लब्धवान् ५७ | यह सुनकर राक्षसराज रावणने सुन्दर वाक्यों और दान-मानादिसे बहिन शूर्पणखाको धैर्य बँधाकर अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया, किन्तु वहाँ चिन्ताके कारण उसे रात्रिको नींद नहीं आयी ॥५७॥ वह सोचने लगा— |
| एकेन रामेण कथं मनुष्य-<br>मात्रेण नष्टः सबलः खरो मे ।<br>भ्राता कथं मे बलवीर्यदर्प-<br>युतो विनष्टो वत राघवेण ॥५८॥ | ‘बड़े आश्चर्यकी बात है, अकेले मनुष्यमात्र रघुवंशी रामने बल-वीर्य और साहससम्पन्न मेरे भाई खरको दल-बलके सहित कैसे मार डाला ? ॥५८॥ |
| यद्वा न रामो मनुजः परेशो<br>मां हन्तुकामः सबलं बलौघैः ।<br>सम्प्राथितोऽयं द्रुहिणेन पूर्वं<br>मनुष्यरूपोऽद्य रघोः कुलेऽभूत् ॥५९॥ | अथवा यह राम मनुष्य नहीं हैं, साक्षात् परमात्माने ही पूर्वकालमें की हुई ब्रह्माकी प्रार्थनासे मेरी बल-वीर्य-सम्पन्न सेनाके सहित मुझे मारनेके लिये इस समय रघुवंशमें मनुष्यरूपसे अवतार लिया है ॥५९॥ |
| वध्यो यदि स्यां परमात्मनाहं<br>वैकुण्ठराज्यं परिपालयेहम् ।<br>नो चेदिदं राक्षसराज्यमेव<br>भोक्ष्ये चिरं राममतो व्रजामि ॥६०॥ | किन्तु मुझे रामके पास अवश्य चलना चाहिये, क्योंकि यदि उन परमात्माद्वारा मैं मारा गया तब तो मैं वैकुण्ठका राज्य भोगूँगा नहीं तो चिरकालपर्यन्त राक्षसोंका राज्य तो भोगूँगा ही' ॥६०॥ |
| इत्थं विचिन्त्याखिलराक्षसेन्द्रो<br>रामं विदित्वा परमेश्वरं हरिम् ।<br>विरोधयुद्धचैव हरिं प्रयामि<br>द्रुतं न भक्त्या भगवान्प्रसीदेत् ॥६१॥ | सम्पूर्ण राक्षसोंके स्वामी रावणने इस प्रकार विचारकर भगवान् रामको साक्षात् परमात्मा हरि जानकर यह निश्चय किया कि मैं विरोध-बुद्धिसे ही उनके पास जाऊँगा क्योंकि भक्तिके द्वारा भगवान् (मुझसे) शीघ्र प्रसन्न नहीं हो सकते ॥६१॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥५॥