अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग २: वालीका वध और भगवान्के साथ उसका सम्भाषण
| सर्ग २ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १५९ |
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त्वज्जन्मकर्माणि च पादयुग्मं<br> व्रजत्वजस्रं तव मन्दिराणि ॥९२॥<br>अङ्गानि ते पादरजोविमिश्र-<br> तीर्थानि बिभ्रत्वहिशत्रुकेतो।<br>शिरस्त्वदीयं भवपद्मजाद्यै-<br> र्जुष्टं पदं राम नमत्वजस्रम् ॥९३॥ | और मेरे पैर सदा आपके मन्दिरोंकी यात्रा करते रहें ॥ ९२ ॥ हे गरुडध्वज ! मेरा शरीर आपकी चरण-रजसे युक्त तीर्थोदकको धारण करे और मेरा शिर निरन्तर आपके उन चरणोंमें प्रणाम किया करे जिनकी शिव और ब्रह्मा आदि देवगण भी सदैव सेवा करते हैं" ॥ ९३ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे<br>प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीय सर्ग
वालीका वध और भगवान्के साथ उसका सम्भाषण।
श्रीमहादेव उवाच|श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! इस प्रकार अपने संसर्गसे जिसके सब पाप दूर हो गये हैं उस सुग्रीवकी ओर देखते हुए श्रीरघुनाथजी कार्य सिद्ध करनेके लिये उसपर अपनी मोह उत्पन्न करनेवाली मायाका विस्तार करते हुए मुसका कर बोले—"मित्र ! तुमने मुझसे जो कुछ कहा है वह निस्सन्देह सब ठीक है ॥१-२॥ तथापि (यदि तुम राज्यादिसे उपराम हो जाओगे तो) लोग मेरेलिये कहेंगे कि रघुनाथजीने वानरराज सुग्रीवसे अग्निको साक्षी बनाकर मित्रता की; किन्तु उन्होंने उसका कौन-सा काम सिद्ध किया ? ॥ ३ ॥ इस प्रकार लोगोंमें मेरी निन्दा होगी इसमें सन्देह नहीं। अतः तुम्हारा कल्याण हो, तुम अभी जाकर वालीको युद्धके लिये ललकारो ॥ ४ ॥ मैं उसे एक ही वाणसे मारकर तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त कर दूँगा ।" तब सुग्रीव 'बहुत अच्छा' कह तुरन्त ही किष्किन्धापुरीके उपवनमें गया और अति घोर शब्दसे गरजकर वालीको युद्धके लिये पुकारा ।
इत्थं स्वात्मपरिष्वङ्गनिर्धूताशेषकल्मषम् ।|
रामः सुग्रीवमालोक्य सस्मितं वाक्यमब्रवीत् ॥१॥|
मायां मोहकरीं तस्मिन्वितन्वन् कार्यसिद्धये ।|
सखे त्वदुक्तं यत्तन्मां सत्यमेव न संशयः ॥ २ ॥|
किन्तु लोका वदिष्यन्ति मामेवं रघुनन्दनः ।|
कृतवान्किं कपीन्द्राय सख्यं कृत्वाऽग्निसाक्षिकम् ३|
इति लोकापवादो मे भविष्यति न संशयः ।|
तस्मादाह्वय भद्रं ते गत्वा युद्धाय वालिनम्॥ ४॥|
बाणेनैकेन तं हत्वा राज्ये त्वामभिषेचये ।|
तथेति गत्वा सुग्रीवः किष्किन्धोपवनं द्रुतम् ॥५॥|
कृत्वा शब्दं महानादं समाह्वयत वालिनम् ।|
तच्छ्रुत्वा भ्रातृनिनदं रोषताम्रविलोचनः ॥ ६॥|भाईका सिंहनाद सुनते ही वालीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह तत्काल अपने घरसे निकलकर वानरराज सुग्रीवके पास आया। उसके आते ही सुग्रीवने तुरन्त उसके वक्षःस्थलमें प्रहार किया ॥५–७॥ इसपर वालीने भी क्रोधातुर होकर सुग्रीवपर अपने दोनों घूँसोंसे प्रहार किया और सुग्रीवने वालीपर आक्रमण किया । इस प्रकार वे दोनों ही अति क्रोध-
निर्जगाम गृहाच्छीघ्रं सुग्रीवो यत्र वानरः ।|
तमापतन्तं सुग्रीवः शीघ्रं वक्षस्यताडयत् ॥ ७॥|
सुग्रीवमपि मुष्टिभ्यां जघान क्रोधमूर्च्छितः ।|
| १६० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
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वाली तमपि सुग्रीव एवं क्रुद्धौ परस्परम् ॥ ८ ॥
अयुद्धेतामेकरूपौ दृष्ट्वा रामोऽतिविस्मितः ।
न मुमोच तदा बाणं सुग्रीववधशङ्कया ॥ ९ ॥
ततो दुद्राव सुग्रीवो वमन् रक्तं भयाकुलः ।
वाली स्वभवनं यातः सुग्रीवो राममब्रवीत् ॥ १० ॥
किं मां घातयसे राम शत्रुगा भ्रातृरूपिणा ।
यदि मद्हनने वाञ्छा त्वमेव जहि मां विभो ॥ ११ ॥
एवं मे प्रत्ययं कृत्वा सत्यवादिन् रघूत्तम ।
उपेक्षसे किमर्थं मां शरणागतवत्सल ॥ १२ ॥
श्रुत्वा सुग्रीववचनं रामः साश्रुविलोचनः ।
आलिङ्ग्य मास्म भैषीस्त्वं दृष्ट्वा वामेकरूपिणौ ॥ १३ ॥
मित्रघातित्वमाशङ्क्य मुक्तवान्सायकं नहि ।
इदानीमेव ते चिह्नं करिष्ये भ्रमशान्तये ॥ १४ ॥
गत्वाऽऽह्वय पुनः शत्रुं हतं द्रक्ष्यसि वालिनम् ।
रामोऽहं त्वां शपे भ्रातर्हनिष्यामि रिपुं क्षणात् ॥ १५ ॥
इत्याश्वास्य स सुग्रीवं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
सुग्रीवस्य गले पुष्पमालामामुच्य पुष्पिताम् ॥ १६ ॥
प्रेषयस्व महाभाग सुग्रीवं वालिनं प्रति ।
लक्ष्मणस्तु तदा बद्ध्वा गच्छ गच्छेति सादरम् ॥ १७ ॥
प्रेषयामास सुग्रीवं सोऽपि गत्वा तथाऽकरोत् ।
पुनरप्यद्भुतं शब्दं कृत्वा वालिनमाह्वयत् ॥ १८ ॥
तच्छ्रुत्वा विस्मितो वाली क्रोधेन महता वृतः ।
बद्ध्वा परिकरं सम्यग्गमनायोपचक्रमे ॥ १९ ॥
गच्छन्तं वालिनं तारा गृहीत्वा निषिषेध तम् ।
पूर्वक एक-दूसरेसे लड़ने लगे। उन दोनोंका रूप ऐसा समान था कि श्रीरामचन्द्रजी उन्हें देखकर आश्चर्य-चकित हो गये (और उनमेंसे कौन वाली है तथा कौन सुग्रीव ? यह न पहचान सके)। अतः इस आशंकासे कि कहीं सुग्रीव न मारा जाय, बाण नहीं छोड़ा ॥ ८-९ ॥
अन्तमें सुग्रीव भयातुर होकर रक्त वमन करता हुआ दौड़ा और वाली अपने घर चला गया। तब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ॥ १० ॥ "हे राम ! क्या आप इस भ्रातारूपी शत्रुसे मुझे मरवाना चाहते हैं। हे प्रभो ! यदि आपकी इच्छा मुझे मरवानेकी ही है तो आप स्वयं ही मार डालिये ॥ ११ ॥ हे सत्यवादी शरणागतवत्सल रघुनाथजी ! मुझे इस प्रकार विश्वास दिलाकर अब आप मेरी उपेक्षा क्यों करते हैं?" ॥ १२ ॥
सुग्रीवके ये वचन सुनकर रामचन्द्रजीने उसे हृदयसे लगा लिया और नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"भैया ! डरो मत, तुम दोनोंको एक रूप देखकर मैंने इस भयसे कि कहीं मित्रका वध न हो जाय, बाण नहीं छोड़ा। अब इस भ्रमको दूर करनेके लिये मैं तुम्हारे शरीरमें कोई चिह्न कर दूँगा ॥ १३-१४ ॥ एक बार तुम फिर जाकर अपने शत्रुको पुकारो। अबकी बार तुम वालीको अवश्य मरा हुआ देखोगे। भैया ! मैं राम तुम्हारी शपथ करके कहता हूँ कि इस बार मैं अवश्य एक क्षणमें ही तुम्हारे शत्रुको मार डालूँगा" ॥ १५ ॥
सुग्रीवको इस प्रकार ढाँढ़स बँधाकर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! सुग्रीवके गलेमें एक फूले हुए पुष्पोंकी माला डाल दो ॥ १६ ॥ और हे महाभाग ! इसे वालीसे लड़नेके लिये भेज दो।" तब लक्ष्मणजीने सुग्रीवके गलेमें पुष्पमाला बाँधकर उससे आदरपूर्वक 'भाई जाओ, जाओ' ऐसा कहकर भेज दिया। सुग्रीवने भी वहाँ पहुँचकर पहलेकी भाँति ही फिर बड़ा विचित्र शब्द करते हुए वालीको पुकारा ॥ १७-१८ ॥
सुग्रीवका शब्द सुनकर वालीको बड़ा विस्मय और साथ ही अत्यन्त क्रोध हुआ और वह अपनी कमर कसकर चलनेके लिये तैयार हो गया ॥ १९ ॥ जाते समय
| सर्ग २ ] | ·किष्किन्धाकाण्ड | १६१ |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न गन्तव्यं त्वयेदानीं शङ्का मेऽतीव जायते ॥२०॥<br><br>इदानीमेव ते भग्नः पुनरायाति सत्वरः।<br>सहायो बलवांस्तस्य कश्चिन्नूनं समागतः ॥२१॥<br><br>वाली तामाह हे सुभ्रु शङ्का ते व्येतु तद्गता ।<br>प्रिये करं परित्यज्य गच्छ गच्छामि तं रिपुम् ॥२२॥<br><br>हत्वा शीघ्रं समायास्ये सहायस्तस्य को भवेत् ।<br>सहायो यदि सुग्रीवस्ततो हत्वोभयं क्षणात् ॥२३॥<br><br>आयास्ये मा शुचः शूरः कथं तिष्ठेद्गृहे रिपुम्।<br>ज्ञात्वाऽप्याह्वयमानं हि हत्वाऽऽयास्यामि सुन्दरि ॥<br><br>तारोवाच<br>मत्तोऽन्यच्छृणु राजेन्द्र श्रुत्वा कुरु यथोचितम् ।<br>आह मामङ्गदः पुत्रो मृगयायां श्रुतं वचः ॥२५॥<br><br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् रामो दाशरथिः किल<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया भार्यया सह ॥२६॥<br><br>आगतो दण्डकारण्यं तत्र सीता हृता किल ।<br>रावणेन सह भ्रात्रा मार्गमाणोऽथ जानकीम् ॥२७॥<br><br>आगतो ऋष्यमूकाद्रिं सुग्रीवेण समागतः ।<br>चकार तेन सुग्रीवः सख्यं चानलसाक्षिकम् ॥२८॥<br><br>प्रतिज्ञां कृतवान् रामः सुग्रीवाय सलक्ष्मणः।<br>वालिनं समरे हत्वा राजानं त्वां करोम्यहम् ॥२९॥<br><br>इति निश्चित्य तौ यातौ निश्चितं शृणु मद्वचः।<br>इदानीमेव ते भग्नः कथं पुनरुपागतः ॥३०॥<br><br>अतस्त्वं सर्वथा वैरं त्यक्त्वा सुग्रीवमानय ।<br>यौवराज्येऽभिषिञ्चाशु रामं त्वं शरणं व्रज ॥३१॥<br>२१ | उसकी स्त्री ताराने उसका हाथ पकड़कर रोका और कहा—"देव ! इस समय आप न जाइये, मेरे हृदयमें बड़ी शंका हो रही है ॥२०॥ यह अभी-अभी आपसे मार खाकर भागा था, तो भी तुरन्त ही लौट आया ! इससे मालूम होता है कि अवश्य ही इसे कोई बलवान् सहायक मिल गया है" ॥२१॥<br><br>वालीने कहा—"हे सुन्दर भृकुटिवाली ! तुम इस विषयमें कोई शंका न करो। हे प्रिये ! मेरा हाथ छोड़कर तुम घर लौट जाओ, मैं भी अभी जाकर उस शत्रुको मारकर लौट आता हूँ। उस (अभागे) को भला कौन सहायक मिलेगा ? और यदि कोई होगा भी, तो मैं एक क्षणमें ही दोनोंको मारकर आ जाऊँगा । हे सुन्दरि ! तुम किसी प्रकारकी चिन्ता न करो। (मैं इस समय रुक नहीं सकता) शत्रुको बाहरसे युद्धके लिये ललकारता हुआ जानकर कोई शूरवीर अपने घरमें कैसे ठहर सकता है ? अतः अब मैं उसे मारकर ही लौटूंगा” ॥ २२—२४॥<br><br>तारा बोली—हे राजेन्द्र ! आप मुझसे कुछ और भी वृत्तान्त सुन लीजिये । उसे सुनकर जो उचित समझें करें। मुझसे आपके पुत्र अंगदने मृगयाके समय (वनमें) सुनी हुई यह बात कही थी ॥ २५ ॥ कि अयोध्याधिपति दशरथनन्दन भगवान् रामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित दण्डकारण्यमें आये थे। वहाँ उनकी प्रिया सीताको रावण हर ले गया। अब वे अपने भाईके सहित जानकी-जीको ढूँढ़ते हुए ऋष्यमूक-पर्वतपर आकर सुग्रीवसे मिले हैं। वहाँ सुग्रीवने उनसे अग्निको साक्षी कर मित्रता जोड़ी है ॥ २६-२८ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीके सहित सुग्रीवसे यह प्रतिज्ञा की है कि मैं युद्धमें वाली-को मारकर तुम्हें राजा बना दूँँगा ॥ २९ ॥ इसी निश्चयको लेकर वे दोनों भी (उसके साथ) आये हैं; मेरी यह बात सच मानिये, नहीं तो अभी-अभी आपसे मार खाकर भागा हुआ वह कैसे लौट आता ? ॥ ३० ॥ इसलिये अब आप सर्वथा सुग्रीवसे वैरभाव छोड़कर उसे ले आइये और उसे तुरन्त युवराजपदपर अभिषिक्त कर श्रीरामकी शरणमें जाइये ॥ ३१ ॥ और हे कपिश्रेष्ठ ! मेरी, अंगदकी तथा इस राज्य और कुलकी रक्षा कीजिये । ऐसा कह- |
| १६२ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
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पाहि मामङ्गदं राज्यं कुलं च हरिपुङ्गव ।
इत्युक्त्वाश्रुमुखी तारा पादयोः प्रणिपत्य तम् ॥३२॥
हस्ताभ्यां चरणौ धृत्वा रुरोद भयविह्वला ।
तामालिङ्ग्य तदा वाली सस्नेहमिदमब्रवीत् ॥३३॥
स्त्रीस्वभावाद्विभेषि त्वं प्रिये नास्ति भयं मम ।
रामो यदि समायातो लक्ष्मणेन समं प्रभुः ॥३४॥
तदा रामेण मे स्नेहो भविष्यति न संशयः ।
रामो नारायणः साक्षादवतीर्णोऽखिलप्रभुः ॥३५॥
भूभारहरणार्थाय श्रुतं पूर्वं मयाऽनघे ।
स्वपक्षः परपक्षो वा नास्ति तस्य परात्मनः ॥३६॥
आनेष्यामि गृहं साध्वि नत्वा तच्चरणाम्बुजम् ।
भजतोऽनुभजत्येष भक्तिगम्यः सुरेश्वरः ॥३७॥
यदि स्वयं समायाति सुग्रीवो हन्मि तं क्षणात् ।
यदुक्तं यौवराज्याय सुग्रीवस्याभिषेचनम् ॥३८॥
कथमाहूयमानोऽहं युद्धाय रिपुणा प्रिये ।
शूरोऽहं सर्वलोकानां सम्मतः शुभलक्षणे ॥३९॥
भीतभीतमिदं वाक्यं कथं वाली वदेत्प्रिये ।
तस्माच्छोकं परित्यज्य तिष्ठ सुन्दरि वेश्मनि॥४०॥
एवमाश्वास्य तारां तां शोचन्तीमश्रुलोचनाम् ।
गतो वाली समुद्युक्तः सुग्रीवस्य वधाय सः ॥४१॥
दृष्ट्वा वालिनमायान्तं सुग्रीवो भीमविक्रमः ।
उत्पपात गले बद्धपुष्पमालः मतङ्गजवत् ॥४२॥
मुष्टिभ्यां ताडयामास वालिनं सोऽपि तं तथा ।
अहन्वाली च सुग्रीवं सुग्रीवो वालिनं तथा ॥४३॥
रामं विलोकयन्नेव सुग्रीवो युयुधे युधि ।
इत्येवं युध्यमानौ तौ दृष्ट्वा रामः प्रतापवान्॥४४॥
बाणमादाय तूणीरादैन्द्रे धनुषि सन्दधे ।
आकृष्य कर्णपर्यन्तमदृश्यो वृक्षखण्डगः ॥४५॥
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कर तारा वालीके चरणोंमें गिर पड़ी। उस समय उसके मुखपर आँसुओंकी धाराएँ बह रही थीं ॥ ३२ ॥ वह भयसे अधीर होकर अपने हाथोंसे उसके दोनों चरण पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगी।
तब वालीने उसका प्रेमपूर्वक आलिंगन कर इस प्रकार कहा ॥ ३३ ॥ "प्रिये! तुम अपने स्त्री-स्वभावसे व्यर्थ डरती हो, मुझे तो भयका कोई भी कारण दिखलायी नहीं देता। यदि लक्ष्मणके सहित प्रभु राम यहाँ आये हैं तो इसमें कोई सन्देह नहीं, कि उनसे मेरा प्रेम हो जायगा। हे अनघे ! राम तो साक्षात् सर्वेश्वर श्रीनारायण हैं, उन्होंने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही अवतार लिया है—यह बात मैंने पहलेसे ही सुन रखी है। वे तो प्रकृति आदिसे परे सबके आत्मारूप हैं उनका कोई अपना या पराया पक्ष नहीं है ॥ ३४-३६ ॥ हे साध्वि ! मैं उनके चरणकमलोंमें प्रणाम कर उन्हें घर ले आऊँगा। वे देव-देवेश्वर भक्तिसे प्राप्त होते हैं और जो कोई उनका भजन करता है उसीके अनुकूल हो जाते हैं ॥ ३७ ॥ और यदि अकेला सुग्रीव ही आया है तो उसे मैं एक क्षणमें मार डालूँगा। इसके सिवा, तुमने जो उसे युवराजपदपर अभिषिक्त करनेकी बात कही, सो हे शुभलक्षणे प्रिये ! मैं सम्पूर्ण लोकोंमें माननीय शूरवीर हूँ। भला शत्रुद्वारा युद्धके लिये पुकारे जानेपर वाली उससे ऐसा अत्यन्त भयपूर्ण वाक्य कैसे कह सकता है ? अतः हे सुन्दरि ! तुम निश्चिन्त होकर घर बैठो" ॥ ३८-४० ॥
इस प्रकार शोकसे आँसू बहाती हुई ताराको धीरज बँधा, वाली सुग्रीवको मारनेपर उतारू होकर चला ॥ ४१ ॥ वालीको आता देख प्रचण्ड पराक्रमी सुग्रीव गलेमें पुष्पमाला पहने हुए मत्त गजराजके समान उछलने लगा ॥ ४२ ॥ फिर सुग्रीवने अपने घूँसोंसे वालीपर और वालीने सुग्रीवपर प्रहार किया। इसी प्रकार परस्पर बारम्बार वाली सुग्रीवपर और सुग्रीव वालीपर मुष्टिकाघात करने लगे ॥ ४३ ॥ युद्ध करते समय सुग्रीवकी दृष्टि रामकी ओर ही लगी हुई थी।
परमप्रतापी श्रीरघुनाथजीने उन दोनोंको इस प्रकार लड़ते देख अपने तरकशसे एक बाण निकाल कर अपने ऐन्द्र धनुषपर चढ़ाया और एक वृक्षकी ओटमें छि-
सर्ग २ ] किष्किन्धाकाण्ड १६३
| निरीक्ष्य वालिनं सम्यग्लक्ष्यं तद्हृदयं हरिः ।<br>उत्ससर्जाशनिसमं महावेगं महाबलः ॥४६॥<br>बिभेद स शरो वक्षो वालिनः कम्पयन्महीम् ।<br>उत्पपात महाशब्दं मुञ्चन्स निपपात ह ॥४७॥<br>तदा मुहूर्त्तं निःसंज्ञो भूत्वा चेतनामपाप सः ।<br>ततो वाली ददर्शग्रे रामं राजीवलोचनम् ।<br>धनुरालम्ब्य वामेन हस्तेनान्येन सायकम् ॥४८॥<br>बिभ्राणं चीरवसनं जटामुकुटधारिणम् ।<br>विशालवक्षसं भ्राजद्वनमालाविभूषितम् ॥४९॥<br>पीनचार्व्वायतभुजं नवदूर्वादलच्छविम् ।<br>सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां च पार्श्वयोः परिसेवितम्॥५०॥ | छिपे धनुषको कर्णपर्यन्त तानकर महाबलवान् श्रीहरिने वालीको देख उसके हृदयको ठीक लक्ष्य करके वह वज्रके समान कठोर और महावेगशाली बाण छोड़ दिया ॥ ४४–४६ ॥ उस बाणने वालीके वक्षःस्थलको वेध डाला । बाणके लगते ही वाली बड़ा घोर शब्द करता हुआ उछलकर पृथिवीपर गिर पड़ा । उसके गिरते समय पृथिवी डगमगा उठी ॥ ४७ ॥ उस समय एक मुहूर्त्तके लिये वह संज्ञाशून्य हो गया; पीछे जब उसे चेत हुआ तो उसने अपने सामने कमलनयन श्रीरघुनाथजीको खड़े देखा । वे बायें हाथसे धनुषका सहारा लेकर दाहिनेमें बाण लिये हुए थे तथा शरीरमें चीरवस्त्र और शिरपर जटाओंका मुकुट धारण किये थे। उनका विशाल वक्षःस्थल मनोहर वनमालासे विभूषित था ॥ ४८-४९ ॥ भुजाएँ स्थूल, सुन्दर और लम्बी-लम्बी थीं, शरीरकी कान्ति नवीन दूर्वादलके समान श्यामवर्ण थी तथा उनके दोनों ओर सुग्रीव और लक्ष्मण उनकी सेवामें खड़े थे ॥ ५० ॥ |
| विलोक्य शनकैः प्राह वाली रामं विगर्हयन् ।<br>किं मयाऽपकृतं राम तव येन हतोऽस्म्यहम् ॥५१॥<br>राजधर्ममविज्ञाय गर्हितं कर्म ते कृतम् ।<br>वृक्षखण्डे तिरोभूत्वा त्यजता मयि सायकम्॥५२॥<br>यशः किं लप्स्यसे राम चोरवत्कृतसङ्गरः ।<br>यदि क्षत्रियदायादो मनोर्व्वंशसमुद्भवः ॥५३॥<br>युद्धं कृत्वा समक्षं मे प्राप्स्यसे तत्फलं तदा ।<br>सुग्रीवेण कृतं किं ते मया वा न कृतं किमु ॥५४॥<br>रावणेन हृता भार्या तव राम महावने ।<br>सुग्रीवं शरणं यातस्तदर्थमिति शुश्रुम ॥५५॥<br>बत राम न जानीषे मद्बलं लोकविश्रुतम् ।<br>रावणं संकुलं बद्ध्वा ससीतं लङ्कया सह ॥५६॥<br>आनयामि मुहूर्त्तार्द्धाद्यदि चेच्छामि राघव । | रामचन्द्रजीको देखकर वालीने कुछ तिरस्कार करते हुए मन्दस्वरमें कहा—“हे राम ! मैंने आपका क्या बिगाड़ा था, जो आपने मुझे मारा ॥ ५१ ॥ राजनीति को न जाननेके कारण ही आपने ऐसा निन्दनीय कार्य किया है। इस प्रकार वृक्षकी आड़में छिपकर मुझपर बाण छोड़ते हुए चोरके समान युद्ध करनेसे आपको क्या यश मिलेगा ? यदि आप क्षत्रियकुमार हैं और आपका जन्म मनुजीके पवित्र वंशमें हुआ है, तो मेरे सामने आकर युद्ध किया होता, तब आपको उसका (यश अथवा स्वर्गरूप) कोई फल भी मिलता । हे राम ! सुग्रीवने आपके साथ ऐसा कौन-सा उपकार किया था और मैंने क्या नहीं किया ? ॥ ५२-५४ ॥ मैंने तो यही सुना है कि दण्डकारण्यमें रावण आपकी भार्याको हर ले गया था; उसे पानेके लिये ही आपने सुग्रीवकी शरण ली है ॥ ५५ ॥ किन्तु खेद है कि आपने मेरा विश्वविख्यात बल नहीं सुना । हे राघव ! मैं यदि चाहूँ तो आधे मुहूर्त्तमें ही रावणको कुलसहित बाँधकर |
| १६४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
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धर्मिष्ठ इति लोकेऽस्मिन् कथ्यसे रघुनन्दन ॥५७॥
वानरं व्याधवद्धत्वा धर्मं कं लप्स्यसे वद ।
अभक्ष्यं वानरं मांसं हत्वा मां किं करिष्यसि ॥५८॥
इत्येवं बहु भाषन्तं वालिनं राघवोऽब्रवीत् ।
धर्मस्य गोप्ता लोकेऽस्मिंश्चरामि सशरासनः॥५९॥
अधर्मकारिणं हत्वा सद्धर्मं पालयाम्यहम् ।
दुहिता भगिनी भ्रातृभार्या चैव तथा स्नुषा ॥६०॥
समा यो रमते तासामेकामपि विमूढधीः ।
पातकी स तु विज्ञेयः स वध्यो राजभिः सदा॥६१॥
त्वं तु भ्रातुः कनिष्ठस्य भार्यायां रमसे बलात् ।
अतो मया धर्मविदा हतोऽसि वनगोचर ॥६२॥
त्वं कपित्वान्न जानीषे महान्तो विचरन्ति यत् ।
लोकं पुनानाः सञ्चारैस्तस्मान्नातिभाषयेत् ॥६३॥
तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्तो ज्ञात्वा रामं रमापतिम् ।
वाली प्रणम्य रभसाद्रामं वचनमब्रवीत् ॥६४॥
राम राम महाभाग जाने त्वां परमेश्वरम् ।
अजानता मया किञ्चिदुक्तं तत्क्षन्तुमर्हसि ॥६५॥
साक्षात्त्वच्छरघातेन विशेषेण तवाग्रतः ।
त्यजाम्यसूनन्महायोगािदुर्लभं तव दर्शनम् ॥६६॥
यन्नाम विवशो गृह्णन् म्रियमाणः परं पदम् ।
याति साक्षात्स एवाद्य मुमूर्षोर्मे पुरः स्थितः ॥६७॥
देव जानामि पुरुषं त्वां श्रियं जानकीं शुभाम् ।
रावणस्य वधार्थाय जातं त्वां ब्रह्मणार्यितम् ॥६८॥
सीताजी और लंकाके सहित ले आऊँ। और हे रघुनन्दन ! आप तो संसारमें बड़े धर्मात्मा कहे जाते हैं॥ ५६-५७ ॥
बताइये, एक वानरको व्याधके समान मारकर आपको क्या पुण्य मिलेगा ? वानरका मांस तो अभक्ष्य है फिर मुझे मारकर आप क्या करेंगे ?' ॥ ५८ ॥
वालीके इस प्रकार बहुत कुछ कहनेपर रघुनाथजीने कहा—"मैं धर्मकी रक्षा करनेके लिये ही लोकमें धनुष धारण कर विचरता हूँ ॥ ५९ ॥ और अधर्म करनेवालोंको मारकर सद्धर्मका पालन करता हूँ। पुत्री, बहिन, (छोटे) भाईकी स्त्री और पुत्रवधू ये चारों समान हैं। जो मूढ़ इनमेंसे किसी एकके साथ भी रमण करता है उसे महापापी जानना चाहिये; राजाको उचित है कि उसे अवश्य मार डाले ॥ ६०-६१ ॥
अरे वनचर ! तू बलात्कारसे अपने छोटे भाईकी स्त्रीके साथ रमण करता था इसीलिये मुझ धर्मज्ञने तुझे मारा है ॥ ६२ ॥ तू वानर ही तो है; तुझे इस बातका पता नहीं है कि महापुरुष सदैव अपने आचरणोंसे लोकोंको पवित्र करते हुए विचरा करते हैं। इसलिये उनसे इस प्रकार बढ़-बढ़कर बातें न करनी चाहिये" ॥ ६३ ॥
भगवान्के ये वचन सुनकर वाली उन्हें साक्षात् लक्ष्मीपति श्रीनारायण जानकर भयभीत हो गया और उन्हें शीघ्रतासे प्रणाम करके बोला—॥ ६४ ॥ "हे राम ! हे राम ! हे महाभाग ! मैं जान गया, आप साक्षात् परमेश्वर हैं। अज्ञानवश मैं जो कुछ कह गया हूँ उसे आप क्षमा करें ॥ ६५ ॥
हे प्रभो ! आपका दर्शन तो बड़े-बड़े योगियोंको भी अत्यन्त दुर्लभ है; बड़े भाग्यकी बात है कि मैं आपहीके बाणसे विद्ध होकर फिर आपहीके सामने प्राण छोड़ रहा हूँ ॥ ६६ ॥
मरते समय विवश होकर भी जिनका नाम लेनेसे पुरुष परम-पद प्राप्त कर लेता है, वही आप आज इस अन्तिम घड़ीपर साक्षात् मेरे सामने विराजमान हैं ॥ ६७ ॥
हे देव ! मैं यह जानता हूँ कि आप साक्षात् परमपुरुष नारायण हैं और जानकीजी लक्ष्मी हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे रावणका वध करनेके लिये ही आपने अवतार लिया है ॥ ६८ ॥ हे राम ! अब मैं